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Sudarshana Chakra
Adhyay 5, Shlok 18
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः

ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय, हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्माको देखनेवाले होते हैं। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

பசு, யானை, நாய், மற்றும் பிற்படுத்தப்பட்ட ஒரு பிராமணனையும், கற்றலும் அடக்கமும் கொண்ட பிராமணனை முனிவர்கள் சமக் கண்ணால் பார்க்கிறார்கள்.

KannadaIND

ಋಷಿಮುನಿಗಳು ವಿದ್ಯೆ ಮತ್ತು ವಿನಯದಿಂದ ಕೂಡಿದ ಬ್ರಾಹ್ಮಣನನ್ನು, ಹಸು, ಆನೆ, ನಾಯಿ ಮತ್ತು ಬಹಿಷ್ಕೃತರನ್ನು ಸಮಾನ ದೃಷ್ಟಿಯಲ್ಲಿ ನೋಡುತ್ತಾರೆ.

MalayalamIND

പാണ്ഡിത്യവും വിനയവും ഉള്ള ഒരു ബ്രാഹ്മണനെയും, പശുവിനെയും, ആനയെയും, പട്ടിയെയും, പിന്നെ ജാതിയിൽപ്പോലും ഇല്ലാത്തവരെപ്പോലും ഋഷികൾ ഒരേ കണ്ണോടെ നോക്കുന്നു.

GujaratiIND

ઋષિઓ વિદ્યા અને નમ્રતાથી સંપન્ન બ્રાહ્મણ, ગાય, હાથી, કૂતરા અને આઉટજાત પર પણ સમાન નજરથી જુએ છે.

TeluguIND

ఆవు, ఏనుగు, కుక్క మరియు బహిష్కృతుడైన బ్రాహ్మణుడిపై జ్ఞానులు మరియు వినయంతో సమాన దృష్టితో ఋషులు చూస్తారు.

MarathiIND

ऋषी विद्वान आणि नम्रता संपन्न ब्राह्मणाकडे, गाय, हत्ती, कुत्रा आणि अगदी बहिष्कृत व्यक्तीकडे समान नजरेने पाहतात.

PunjabiIND

ਸਾਧੂ ਵਿਦਿਆ ਅਤੇ ਨਿਮਰਤਾ ਨਾਲ ਸੰਪੰਨ ਬ੍ਰਾਹਮਣ, ਗਾਂ, ਹਾਥੀ, ਕੁੱਤੇ ਅਤੇ ਇੱਥੋਂ ਤੱਕ ਕਿ ਇੱਕ ਜਾਤੀ ਨੂੰ ਵੀ ਬਰਾਬਰ ਦੀ ਨਜ਼ਰ ਨਾਲ ਦੇਖਦੇ ਹਨ।

SindhiIND

ساجن هڪ برهمڻ کي هڪجهڙي نظر سان ڏسندا آهن جن کي علم ۽ عاجزي سان نوازيو ويندو آهي، هڪ ڳئون، هڪ هاٿي، هڪ ڪتو، ۽ ايستائين جو هڪ ٻاهرئين ذات تي.

BengaliIND

ঋষিরা বিদ্যা ও নম্রতা সম্পন্ন ব্রাহ্মণকে, গরু, হাতি, কুকুর, এমনকি বহিরাগতকেও সমান দৃষ্টিতে দেখেন।

NepaliIND

ऋषिहरूले विद्या र नम्रताले सम्पन्न ब्राह्मणलाई, गाई, हात्ती, कुकुर र बहिष्कृतलाई पनि समान नजरले हेर्छन्।

OdiaIND

ଶିକ୍ଷା ଏବଂ ନମ୍ରତା, ଏକ ଗା cow, ହାତୀ, କୁକୁର ଏବଂ ଏପରିକି ବାହାଘର ଉପରେ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଉପରେ ସମାନ ଆଖି ଦେଖାଯାଏ |

AssameseIND

ঋষিসকলে বিদ্বান আৰু নম্ৰতাৰে সমৃদ্ধ ব্ৰাহ্মণক, গৰু, হাতী, কুকুৰ, আনকি বহিষ্কৃত লোককো সমান দৃষ্টিৰে চায়।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

5.18।। व्याख्या--विद्याविनयसम्पन्ने ৷৷. पण्डिताः समदर्शिनः यहाँ ब्राह्मणके लिये दो विशेषण दिये गये हैं विद्यायुक्त और विनययुक्त अर्थात् ऐसा ब्राह्मण जो विद्वान् भी है और विनम्र स्वभाववाला (ब्राह्मणपनेके अभिमानसे रहित) भी है। ब्राह्मण होनेसे वह जातिसे तो ऊँचा है ही साथहीसाथ विद्या और विनयसे भी सम्पन्न है यह ब्राह्मणत्वकी पूर्णता है। जहाँ पूर्णता होती है वहाँ अभिमान नहीं रहता। अभिमान वहीं रहता है जहाँ पूर्णता नहीं होती।ब्राह्मण और चाण्डालमें तथा गाय हाथी एवं कुत्तेमें व्यवहारकी विषमता अनिवार्य है। इनमें समान बर्ताव शास्त्र भी नहीं कहता उचित भी नहीं और कर सकते भी नहीं। जैसे पूजन विद्याविनययुक्त ब्राह्मणका ही हो सकता है न कि चाण्डालका दूध गायका ही पीया जाता है न कि कुतियाका सवारी हाथीकी ही हो सकती है न कि कुत्तेकी। इन पाँचों प्राणियोंका उदाहरण देकर भगवान् यह कह रहे हैं कि इनमें व्यवहारकी समता सम्भव न होनेपर भी तत्त्वतः सबमें एक ही परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है। महापुरुषोंकी दृष्टि उस परमात्मतत्त्वपर ही सदासर्वदा रहती है। इसलिये उनकी दृष्टि कभी विषम नहीं होती। यहाँ एक शङ्का हो सकती है कि दृष्टि विषम हुए बिना व्यवहारमें भिन्नता कैसे होगी इसका समाधान यह है कि अपने शरीरके सब अङ्गों (मस्तक पैर हाथ गुदा आदि) में हमारी दृष्टि अर्थात् अपनेपन और हितकी भावना समान रहती है फिर भी हम उनके व्यवहारमें भेद रखते हैं जैसे किसीको पैर लग जाय तो क्षमायाचना करते हैं पर किसीको हाथ लग जाय तो क्षमायाचना नहीं करते। प्रणाम मस्तक और हाथोंसे करते हैं पैरोंसे नहीं। गुदासे हाथ लगनेपर हाथ धोते हैं हाथसे हाथ लगनेपर नहीं। इतना ही नहीं एक हाथकी अँगुलियोंमें भी व्यवहारमें भेद रहता है। किसीको तर्जनी अँगुली दिखाने और अँगूठा दिखानेका तो भेद तो सब जानते ही हैं। इस प्रकार शरीरके भिन्नभिन्न अङ्गोंके व्यवहारमें तो भेद होता है पर आत्मीयतामें भेद नहीं होता। इसलिये शरीरके किसी भी पीड़ित अङ्गकी उपेक्षा नहीं होती। व्यवहारमें भेद होनेपर भी पीड़ा मिटानेमें हम समानताका व्यवहार करते हैं। शरीरके सभी अङ्गोंके सुखदुःखमें हमारा एक ही भाव रहता है (गीता 6। 32)। इसी प्रकार प्राणियोंमें खानपान गुण आचरण जाति आदिका भेद होनेसे उनके साथ ज्ञानी महापुरुषोंके व्यवहारमें भी भेद होता है और होना भी चाहिये। परन्तु उन सब प्राणियोंमें एक ही परमात्मतत्त्व परिपूर्ण होनेके कारण महापुरुषकी दृष्टिमें भेद नहीं होता। उन प्राणियोंके प्रति महापुरुषकी आत्मीयता प्रेम हित दया आदिके भावमें कभी फरक नहीं पड़ता। उनके अन्तःकरणमें रागद्वेष ममता आसक्ति अभिमान पक्षपात विषमता आदिका सर्वथा अभाव होता है। जैसे अपने शरीरके किसी अङ्गका दुःख दूर करनेकी चेष्टा स्वाभाविक होती है ऐसे ही पता लगनेपर दूसरे प्राणीका दुःख दूर करनेकी और उसे सुख पहुँचानेकी चेष्टा भी उनके द्वारा स्वाभाविक होती है। यही कारण है कि भगवान्ने यहाँ महापुरुषोंको समदर्शी कहा है न कि समवर्ती। गीतामें दूसरी जगह भी सम देखनेकी या समबुद्धिकी ही बात आयी है जैसे समबुद्धिर्विशिष्यते (6। 9) सर्वत्र समदर्शनः (6। 29) आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति (6। 32) सर्वत्र समबुद्धयः (12। 4) समं सर्वेषु भूतेषु ৷৷. यः पश्यति स पश्यति (13। 27) और समं पश्यन् हि सर्वत्र (13। 28)।श्रीशङ्कराचार्यजी महाराज कहते हैं भावाद्वैतं सदा कुर्यात् क्रियाद्वैतं न कुत्रचित्। (तत्त्वोपदेश)भावमें ही सदा अद्वैत होना चाहिये क्रिया (व्यवहार) में कहीं नहीं।समतासम्बन्धी विशेष बात आजकल समतापर विशेष चर्चा चल रही है। सबके साथ समताका बर्ताव करो ऐसा प्रचार किया जा रहा है। परन्तु वास्तवमें समता किसे कहते हैं और वह कब आती है इसे समझनेकी बड़ी आवश्यकता है। समता कोई खेलतमाशा नहीं है प्रत्युत परमात्माका साक्षात् स्वरूप है। जिनका मन समतामें स्थित हो जाता है वे यहाँ जीतेजी ही संसारपर विजय प्राप्त कर लेते हैं और परब्रह्म परमात्माका अनुभव कर लेते हैं (गीता 5। 19)। यह समता तब आती है जब दूसरोंका दुःख अपना दुःख और दूसरोंका सुख अपना सुख हो जाता है। गीतामें भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन जो पुरुष अपने शरीरकी तरह सब जगह सम देखता है और सुख अथवा दुःखको भी सब जगह सम देखता है वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है (6। 12)। जैसे शरीरके किसी भी अङ्गमें पीड़ा होनेपर उसको दूर करनेकी लगन लग जाती है ऐसे ही किसी प्राणीको दुःख सन्ताप आदि होनेपर उसको दूर करनेकी लगन लग जाय तब समता आती है। सन्तोंके लक्षणोंमें भी आया है पर दुख दुख सुख सुख देखे पर (मानस 7। 38। 1)जबतक अपने सुखकी लालसा है तबतक चाहे जितना उद्योग कर लें समता नहीं आयेगी। परन्तु जब हृदयसे यह लगन लग जायगी कि दूसरोंको सुख कैसे पहुँचे उनको आराम कैसे हो उनको लाभ कैसे हो उनका कल्याण कैसे हो तब समता स्वतः आ जायगी। इसका आरम्भ सर्वप्रथम अपने घरसे करना चाहिये। हृदयमें ऐसा भाव हो कि किसीको किञ्चिन्मात्र भी दुःख या कष्ट न पहुँचे किसीका कभी अनिष्ट न हो। चाहे मैं कितना ही कष्ट पाऊँ पर मेरे मातापिता स्त्रीपुत्र भाईभौजाई आदिको सुख होना चाहिये। घरवालोंको सुख पहुँचानेसे अपने हृदयमें शान्ति आयेगी ही। जहाँ अपने घरका भी सम्बन्ध नहीं है वहाँ सुख पहुँचायेंगे तो विशेष आनन्दकी लहरें आने लग जायँगी। परन्तु ममतापूर्वक सुख पहुँचानेसे हमारी उन्नति नहीं होगी। जहाँ हमारी ममता न हो वहाँ सुख पहुँचायें अथवा जहाँ हम ममतापूर्वक सुख पहुँचाते हैं वहाँसे अपनी ममता हटा लें दोनोंका परिणाम एक ही होगा।चित्रकूटमें लक्ष्मणजी भगवान् राम और सीताकी सेवा कैसे करते हैं यह बताते हुए गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि ।।(मानस 2। 142। 1)अर्थात् लक्ष्मणजी भगवान् राम और सीताजीकी वैसे ही सेवा करते हैं जैसे अज्ञानी मनुष्य अपने शरीरकी सेवा करता है। अपने शरीरकी सेवा करना उसे सुख पहुँचाना समझदारी नहीं है। अपने शरीरकी सेवा तो पशु भी करते हैं। जैसे बँदरीकी अपने बच्चेपर इतनी ममता रहती है कि उसके मरनेके बाद भी वह उसके शरीरको पकड़े हुए चलती है छोड़ती नहीं। परन्तु जब कोई वस्तु खानेके लिये मिल जाती है तब वह स्वयं तो खा लेती है पर बच्चेको नहीं खाने देती। बच्चा खानेकी चेष्टा करता है तो उसे ऐसी घुड़की मारती है कि वह चींचीं करते भाग जाता है। अतः ममताके रहते हुए समताका आना असम्भव है।जिससे हमें कुछ लेना नहीं है जिससे हमारा कोई स्वार्थ नहीं है ऐसे व्यक्तिके साथ भी हम प्रेमपूर्वकअच्छासेअच्छा बर्ताव करें जिससे उसका हित हो। कोई व्यक्ति मार्गमें भटक गया है उसे मार्गका पता नहीं है और वह हमसे पूछता है। हम उसे बड़ी प्रसन्नतासे मार्ग बतायें अथवा कुछ दूरतक उसके साथ चलें तो हमें हृदयमें प्रत्यक्ष सुखका शान्तिका अनुभव होगा। परन्तु यदि हम जानते हुए भी उसे मार्ग नहीं बतायेंगे तो हमारे हृदयमें सुख नहीं होगा। यह अनुभवकी बात है कोई करके देख ले। किसीको प्यास लगी है तो उसे बता दे कि भाई इधर आओ इधर ठण्डा जल है। फिर हम अपना हृदय देखें। हमारे हृदयमें प्रसन्नता आयेगी सुख आयेगा। यह सुख हमारा कल्याण करनेवाला है। दूसरा दुःख पाये पर मैं सुख ले लूँ यह सुख पतन करनेवाला है। इससे न तो व्यवहारमें हमारी उन्नति होगी और न परमार्थमें। हम सत्सङ्गका आयोजन करते हैं। उसमें आनेवाले व्यक्तियोंके बैठनेकी व्यवस्था करते हैं तो उनसे प्रेमपूर्वक कहें कि आइये यहाँ बैठिये। उन्हें वहाँ बैठायें जहाँसे वे ठीक तरहसे कैसे सुन सकें। वे आरामसे कैसे बैठ सकें ठीक तरहसे कैसे सुन सकें ऐसा भाव रखकर उनसे बर्ताव करें। ऐसा करनेसे हमारे हृदयमें प्रत्यक्ष शान्ति आयेगी। पर वहीं हुक्म चलायें कि क्या करते हो इधर बैठो इधर नहीं तो बात वही होनेपर भी हृदयमें शान्ति नहीं आयेगी। भीतरमें जो अभिमान है वह दूसरोंको चुभेगा बुरा लगेगा। ऐसा बर्ताव करें और चाहें कि समता आ जाय तो वह कभी आयेगी नहीं। सबके हितमें जिसकी प्रीति हो गयी है उन्हें भगवान् प्राप्त हो जाते हैं ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः (गीता 12। 4)। कारण कि भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद् हैं (गीता 5। 29)। वे प्राणिमात्रका पालनपोषण करनेवाले हैं। आस्तिकसेआस्तिक हो अथवा नास्तिकसेनास्तिक दोनोंके लिये भगवान्का विधान बराबर है। एक व्यक्ति बड़ा आस्तिक है भगवान्को बहुत मानता है और उन्हें पानेके लिये साधनभजन करता है और एक व्यक्ति ऐसा नास्तिक है कि संसारसे भगवान्का खाता उठा देना चाहता है। भगवान्को माननेसे और भगवान्के कारण ही दुनिया दुःख पा रही है भगवान् नामकी कोई चीज है ही नहीं ऐसा उसके हृदयमें भाव है और ऐसा ही प्रचार करता है। ऐसे नास्तिकसेनास्तिक व्यक्तिकी भी प्यास जल मिटाता है और यही जल आस्तिकसेआस्तिक व्यक्तिकी भी प्यास मिटाता है। जलमें यह भेद नहीं है कि वह आस्तिककी प्यास ठीक तरहसे शान्ति करे और नास्तिककी प्यास शान्त न करे। वह समान रीतिसे सबकी प्यास मिटाता है। ऐसे ही सूर्य समान रीतिसे सबको प्रकाश देता है हवा समान रीतिसे सबको श्वास लेने देती है पृथ्वी समान रीतिसे सबको रहनेका स्थान देती है। इस प्रकार भगवान्की रची हुई प्रत्येक वस्तु सबको समान रीतिसे मिलती है। समताका अर्थ यह नहीं है कि समान रीतिसे सबके साथ रोटीबेटी (भोजन और विवाह) का बर्ताव करें। व्यवहारमें समता तो महान् पतन करनेवाली चीज है। समान बर्ताव यमराजका मौतका नाम है क्योंकि उसके बर्तावमें विषमता नहीं होती। चाहे महात्मा हो चाहे गृहस्थ हो चाहे साधु हो चाहे पशु हो चाहे देवता हो मौत सबकी बराबर होती है। इसलिये यमराजको समवर्ती (समान बर्ताव करनेवाला) कहा गया है । अतः जो समान बर्ताव करते हैं वे भी यमराज हैं।पशुओंमें भी समान बर्ताव पाया जाता है। कुत्ता ब्राह्मणकी रसोईमें जाता है तो पैर धोकर नहीं जाता। ब्राह्मणकी रसोई हो अथवा हरिजनकी वह तो जैसा है वैसा ही चला जाता है क्योंकि यह उसकी समता है। पर मनुष्यके लिये यह समता नहीं है प्रत्युत महान् पशुता है। समता तो यह है कि दूसरेका दुःख कैसे मिटे दूसरेको सुख कैसे हो आराम कैसे हो ऐसी समता रखते हुए बर्तावमें पवित्रता निर्मलता रखनी चाहिये। बर्तावमें पवित्रता रखनेसे अन्तःकरण पवित्र निर्मल होता है। परन्तु बर्तावमें अपवित्रता रखनेसे खानपान आदि एक करनेसे अन्तःकरणमें अपवित्रता आती है जिससे अशान्ति बढ़ती है। केवल बाहरका बर्ताव समान रखना शास्त्र और समाजकी मर्यादाके विरुद्ध है। इससे समाजमें संघर्ष पैदा होता है।वर्णोंमें ब्राह्मण ऊँचे हैं और शूद्र नीचे हैं ऐसा शास्त्रोंका सिद्धान्त नहीं है। ब्राह्मण उपदेशके द्वारा क्षत्रिय रक्षाके द्वारा वैश्य धनसम्पत्ति आवश्यक वस्तुओँके द्वारा और शूद्र शरीरसे परिश्रम करके सभी वर्णोंकी सेवाकरे। इसका अर्थ यह नहीं है कि दूसरे अपने कर्तव्यपालनमें परिश्रम न करें प्रत्युत अपने कर्तव्यपालनमें समान रीतिसे सभी परिश्रम करें। जिसके पास जिस प्रकारकी शक्ति विद्या वस्तु कला आदि है उसके द्वारा चारों ही वर्ण चारों वर्णोंकी सेवा करें उनके कार्योंमें सहायक बनें। परन्तु चारों वर्णोंकी सेवा करनेमें भेदभाव न रखें।आजकल वर्णाश्रमको मिटाकर पार्टीबाजी हो रही है। आज वर्णाश्रममें इतनी लड़ाई नहीं है जितनी लड़ाई पार्टीबाजीमें हो रही है यह प्रत्यक्ष बात है। पहले लोग चारों वर्णों और आश्रमोंकी मर्यादामें चलते थे और सुखशान्तिपूर्वक रहते थे। आज वर्णाश्रमकी मर्यादाको मिटाकर अनेक पार्टियाँ बनायी जा रही हैं जिससे संघर्षको बढ़ावा मिल रहा है। गाँवोंमें सब लोगोंको पानी मिलना कठिन हो रहा है। जिनके अधिकारमें कुआँ है वे कहते हैं कि तुमने उस पार्टीको वोट दिया है इसलिये तुम यहाँसे पानी नहीं भर सकते। माँ बाप और बेटा तीनों अलगअलग पार्टियोंको वोट देते हैं और घरमें लड़ते हैं। भीतरमें वैर बाँध लिया कि तुम उस पार्टीके और हम इस पार्टीके। कितना महान् अनर्थ हो रहा हैयदि समता लानी हो तो दूसरा व्यक्ति किसी भी वर्ण आश्रम धर्म सम्प्रदाय मत आदिका क्यों न हो उसे सुख देना है उसका दुःख दूर करना है और उसका वास्तविक हित करना है। उनमें यह भेद हो सकता है कि आप रामराम कहते हैं हम कृष्णकृष्ण कहेंगे आप वैष्णव हैं हम शैव हैं आप मुसलमान हैं हम हिन्दू हैं इत्यादि। परन्तु इससे कोई बाधा नहीं आती है। बाधा तब आती है जब यह भाव रहता है कि वे हमारी पार्टीके नहीं हैं इसलिये उनको चाहे दुःख होता रहे पर हमें और हमारी पार्टीवालोंको सुख हो जाय। यह भाव महान् पतन करनेवाला है। इसलिये कभी किसी वर्ण आदिके मनुष्योंको कष्ट हो तो उनके हितकी चिन्ता समान रीतिसे होनी चाहिये और उन्हें सुख हो तो उससे प्रसन्नता समान रीतिसे होनी चाहिये। जैसे ब्राह्मणों और हरिजनोंमें संघर्ष हुआ। उसमें हरिजनोंकी हार और ब्राह्मणोंकी जीत होनेपर हमारे मनमें प्रसन्नता हो अथवा ब्राह्मणोंकी हार और हरिजनोंकी जीत होनेपर हमारे मनमें दुःख हो तो यह विषमता है जो बहुत हानिकारक है। ब्राह्मणों और हरिजनों दोनोंके प्रति ही हमारे मनमें हितकी समान भावना होनी चाहिये। किसीका भी अहित हमें सहन न हो। किसीका भी दुःख हमें समान रीतिसे खटकना चाहिये। यदि ब्राह्मण दुःखी है तो उसे सुख पहुँचायें और यदि हरिजन दुःखी है तो उसे सुख न पहुँचायें ऐसा पक्षपात नहीं होना चाहिये प्रत्युत हरिजनको सुख पहुँचानेकी विशेष चेष्टा होनी चाहिये। हरिजनोंको सुख पहुँचानेकी चेष्टा करते हुए भी ब्राह्मणोंके दुःखकी उपेक्षा नहीं होनी चाहिये। इस प्रकार किसी भी वर्ण आश्रम धर्म सम्प्रदाय आदिको लेकर पक्षपात नहीं होना चाहिये। सभीके प्रति समान रीतिसे हितका बर्ताव होना चाहिये। यदि कोई निम्नवर्ग है और उसे हम ऊँचा उठाना चाहते हों तो उस वर्गके लोगोंके भावों और आचरणोंको शुद्ध और श्रेष्ठ बनाना चाहिये उनके पास वस्तुओंकी कमी हो तो उसकी पूर्ति करनी चाहिये परन्तु उन्हें उकसाकर उनके हृदयोंमें दूसरे वर्गके प्रति ईर्ष्या और द्वेषके भाव भर देना अत्यन्त ही अहितकर घातक है तथा लोकपरलोकमें पतन करनेवाला है। कारण कि ईर्ष्या द्वेष अभिमान आदि मनुष्यका महान् पतन करनेवाले हैं। यदि ऐसे भाव ब्राह्मणोंमें हैं तो उनका भी पतन होगा और हरिजनोंमें हैं तो उनका भी पतन होगा। उत्थान तो सद्भावों सद्गुणों सदाचारोंसे ही होता है। भोजन वस्त्र मकान आदि निर्वाहकी वस्तुओंकी जिनके पास कमी है उन्हें ये वस्तुएँ विशेषतासे देनी चाहिये चाहे वे किसी भी वर्ण आश्रम धर्म सम्प्रदाय आदिके क्यों न हों। सबका जीवनयापन सुखपूर्वक होना चाहिये। सभी सुखी हों सभी नीरोग हों सभीका हित हो कभी किसीको किञ्चिन्मात्र भी दुःख न हो ऐसा भाव रखते हुए यथायोग्य बर्ताव करना ही समता है जो सम्पूर्ण मनुष्योंके लिये हितकर है। सम्बन्ध अब भगवान् पूर्वश्लोकमें वर्णित समताकी विशेष महिमा कहते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

जिनके आत्माका अज्ञान ज्ञानद्वारा नष्ट हो चुका है वे पण्डितजन परमार्थतत्त्वको कैसे देखते हैं सो कहते हैं विद्या और विनययुक्त ब्राह्मणमें अर्थात् विद्याआत्मबोध और विनयउपरामता इन दोनों गुणोंसे सम्पन्न जो विद्वान् और विनीत ब्राह्मण है उस ब्राह्मणमें गौमें हाथीमें कुत्ते और चाण्डालमें भी पण्डितजन समभावसे देखनेवाले ( होते हैं )। अभिप्राय यह कि उत्तम प्राणी संस्कारयुक्त विद्याविनयसम्पन्न सात्त्विक ब्राह्मणमें मध्यम प्राणीसंस्काररहित रजोगुणयुक्त गौमें और ( कनिष्ठ प्राणी ) अतिशय मूढ़ केवल तमोगुणयुक्त हाथी आदिमें सत्त्वादि गुणोंसे और उनके संस्कारोंसे तथा राजस और तामस संस्कारोंसे सर्वथा ही निर्लेप रहनेवाले सम एक निर्विकार ब्रह्मको देखना ही जिनका स्वभाव है वे पण्डित समदर्शी हैं। पू0 वे ( इस प्रकार देखनेवाले ) दोषयुक्त हैं उनका अन्न भोजन करने योग्य नहीं क्योंकि यह स्मृतिका प्रमाण है कि समान गुणशीलवालोंकी विषम पूजा करनेसे और विषम गुणशीलवालोंकी सम पूजा करनेसे ( यजमान दोषी होता है )।

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Sri Anandgiri

यदपुनरावृत्तिसाधनं तत्त्वज्ञानं तदेव प्रश्नद्वारेण विवृणोति येषामित्यादिना। विद्या वेदार्थविज्ञानमित्यङ्गीकृत्य विनय व्याचष्टे विनय इति। उपशमो निरहंकारत्वमनौद्धत्यम्। पदार्थमेवमुक्त्वा वाक्यार्थं दर्शयति विद्वानिति। गवीत्याद्यनूद्य वाक्यार्थं कथयति विद्येति। हस्त्यादौ पण्डिताः समदर्शिन इत्युत्तरत्र संबन्धः। तत्र तत्र प्राणिभेदेषु तत्तद्गुणैस्तत्तन्निमित्तसंस्कारैश्च संस्पृष्टत्वसंभवान्न ब्रह्मणः समत्वमित्याशङ्क्याह सत्त्वादीति। तज्जैश्चेत्यत्र तच्छब्देन सत्त्वमेव गृह्यते। सात्त्विकसंस्कारैरिव राजससंस्कारैरपि सर्वथैवासंस्पृष्टं ब्रह्मेत्याह तथेति। राजसैरिव तामसैरपि संस्कारैर्ब्रह्मात्यन्तमेवास्पृष्टमित्याह तथा तामसैरिति। ब्रह्मणोऽद्वितीयत्वं कूटस्थत्वमसङ्गत्वं चोक्तेऽर्थे हेतुरिति मत्वा समशब्दार्थमाह सममिति। समदर्शित्वमेव पाण्डित्यं तद्व्याचष्टे ब्रह्मेति।

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Sri Dhanpati

येषां ज्ञानेन नाशितमात्मनोऽज्ञानं ते पण्डिता मोक्षगामिनः कथमात्मतत्त्वं पश्यन्तीति तत्राह विद्येति। विद्या आत्मबोधः विनय उपशम औद्धत्याद्यभावः। दैन्यवारणाय विद्यापदमौद्धत्यादिवारणाय विनयपदं ताभ्यां संपन्ने युक्ते उत्तमसंस्कारवति सात्त्विके ब्राह्मणे मध्यमायां राजस्यां गवि संस्काररहितायां अधमे केवलतामसे हस्तिनि गजे शुनि सारभेये श्वपाके चाण्डाले। तामसानां बहूनामुपादानं तु सात्त्विकराजसापेक्षया तेषां बाहुल्यसूचनार्थम्। समं सत्त्वादिगुणैस्तज्जन्यसंस्कारैश्चास्पृष्टमेकमविक्रियं गङ्गाजले तडागोदके मूत्रादावच्छिन्नाकाशमिव ब्रह्म द्रष्टुं शीलं येषां ते पण्डिताः समदर्शिन इत्यर्थः। यत्तु ननु ज्ञानसंन्याससंपन्नानामेव जीवे कोऽयमतिशयो यत्परैक्यं नाम। नहि मनुष्याणां लोके उत्तममध्यमतया व्यवह्नियमाणानां पशूनां वा तादृशानां न जीवोऽस्ति सन्वा न परैक्यं प्रतिपद्यते। इत्याशङ्क्याह विद्येति।अत्र गवि हस्तिनि शुनीति गोत्वादिजात्याधारपिण्डरुपोपाधी नाभुत्तममध्यमाधमानामुक्तत्वान्मानुषपिण्डानामप्यात्मोपाधीनामेवं विवेको ज्ञेयः। ब्राह्मणस्योत्तमस्य पृथगभिधानात्। विद्यासंपन्नाबशिष्टौ क्षत्रियवैश्यपिण्डौ। विनयसंपन्नस्त्रैवर्णिकसेवामात्रधर्मकः शूद्रपिण्डः। पिण्डसमुदायाभिप्रायं चैकवचनम्। तथोत्तमो ब्राह्मणः क्षत्रियवैश्यौ मध्यमौ ततः किंचिन्निकृष्टः शूद्रः सर्वथाधमः श्वपाकः। एतेषु मानुषपशूत्तममध्यमाधमेषु पिण्डेष्वात्मोपाधिषु सत्स्वप्यनुपहितं सर्वत्राविशेषत्वात् समं ब्रह्मैव तत्रतत्र प्रविष्टं पण्डिताः पश्यन्ति नत्वात्मानमेव ब्रह्मात्मकं पश्यन्तीत्यर्थ इतीतरे व्याचख्युः। तन्मन्दम्। सर्वभूतात्मभूतब्रह्मदर्शिन इत्येतावतैवोक्तार्थे सिद्धेऽमूलोक्तानामुपाधिभेदानां क्लिष्टकल्पनया प्रदर्शितानां समपदस्य च वैयर्थ्यप्रसङ्गात्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
vidyādivine knowledge
vinayahumbleness
sampanneequipped with
brāhmaṇea Brahmin
gavia cow
hastinian elephant
śhunia dog
chaand
evacertainly
śhvapāke
chaand
paṇḍitāḥthe learned
samadarśhinaḥ
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 5.17
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः। गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः

जिनकी बुद्धि तदाकार हो रही है, जिनका मन तदाकार हो रहा है, जिनकी स्थिति परमात्मतत्वमें है, ऐसे परमात्मपरायण साधक ज्ञानके द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति (परमगति) को प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 5.19
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः

जिनका अन्तःकरण समतामें स्थित है, उन्होंने इस जीवित-अवस्थामें ही सम्पूर्ण संसारको जीत लिया है; ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिये वे ब्रह्ममें ही स्थित हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 5Shlok 18
Bhagavad Gita · Adhyay 5, Shlok 18
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः

ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय, हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्माको देखनेवाले होते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ: "ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय, हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्माको देखनेवाले होते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 18?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 18 translates to: "Sages look with an equal eye on a Brahmana endowed with learning and humility, on a cow, an elephant, a dog, and even an outcaste. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 5, श्लोक 18 है जो Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga में संकलित है। ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय, हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्माको देखनेवाले होते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "vidyā-vinaya-sampanne brāhmaṇe gavi hastini" mean in English?

"vidyā-vinaya-sampanne brāhmaṇe gavi hastini" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 18. Sages look with an equal eye on a Brahmana endowed with learning and humility, on a cow, an elephant, a dog, and even an outcaste. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.