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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 3
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्

तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है; क्योंकि यह बड़ा उत्तम रहस्य है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

KannadaIND

ಅದೇ ಪ್ರಾಚೀನ ಯೋಗವನ್ನು ಇಂದು ನಾನು ನಿಮಗೆ ಕಲಿಸಿದೆ, ಏಕೆಂದರೆ ನೀವು ನನ್ನ ಭಕ್ತ ಮತ್ತು ನನ್ನ ಸ್ನೇಹಿತ; ಇದು ಪರಮ ರಹಸ್ಯವಾಗಿದೆ.

MarathiIND

तोच प्राचीन योग आज मी तुला शिकवला आहे, कारण तू माझा भक्त आणि माझा मित्र आहेस; हे सर्वोच्च रहस्य आहे.

NepaliIND

त्यही पुरातन योग आज मैले तिमीलाई सिकाएको छु, किनकि तिमी मेरो भक्त र मेरो साथी हौ; यो सर्वोच्च रहस्य हो।

SindhiIND

اهو ئي قديم يوگا اڄ مون توهان کي سيکاريو آهي، ڇو ته تون منهنجو ديني ۽ منهنجو دوست آهين. اهو عظيم راز آهي.

PunjabiIND

ਉਹੀ ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਯੋਗ ਅੱਜ ਮੇਰੇ ਦੁਆਰਾ ਤੁਹਾਨੂੰ ਸਿਖਾਇਆ ਗਿਆ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਤੁਸੀਂ ਮੇਰੇ ਸ਼ਰਧਾਲੂ ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਮਿੱਤਰ ਹੋ; ਇਹ ਪਰਮ ਰਾਜ਼ ਹੈ।

MalayalamIND

അതേ പ്രാചീനമായ യോഗയാണ് ഇന്ന് ഞാൻ നിങ്ങളെ പഠിപ്പിച്ചത്, കാരണം നിങ്ങൾ എൻ്റെ ഭക്തനും എൻ്റെ സുഹൃത്തുമാണ്; അത് പരമ രഹസ്യമാണ്.

TamilIND

அதே பழங்கால யோகம் இன்று என்னால் உனக்குக் கற்றுத் தரப்பட்டது, ஏனென்றால் நீ என் பக்தன் மற்றும் என் நண்பன்; அது மிக உயர்ந்த ரகசியம்.

GujaratiIND

તે જ પ્રાચીન યોગ આજે મારા દ્વારા તમને શીખવવામાં આવ્યો છે, કારણ કે તમે મારા ભક્ત અને મારા મિત્ર છો; તે સર્વોચ્ચ રહસ્ય છે.

BengaliIND

সেই একই প্রাচীন যোগ আজ আমার দ্বারা আপনাকে শেখানো হয়েছে, কারণ আপনি আমার ভক্ত এবং আমার বন্ধু; এটা সর্বোচ্চ গোপন.

TeluguIND

అదే ప్రాచీన యోగాన్ని ఈ రోజు నేను మీకు నేర్పించాను, ఎందుకంటే మీరు నా భక్తుడు మరియు నా స్నేహితుడు; అది పరమ రహస్యం.

OdiaIND

ସେହି ପ୍ରାଚୀନ ଯୋଗ ଆଜି ମୋତେ ତୁମକୁ ଶିକ୍ଷା ଦେଇଛି, କାରଣ ତୁମେ ମୋର ଭକ୍ତ ଏବଂ ମୋର ବନ୍ଧୁ; ଏହା ହେଉଛି ସର୍ବୋଚ୍ଚ ରହସ୍ୟ |

ManipuriIND

ꯆꯞ ꯃꯥꯟꯅꯕꯥ ꯑꯔꯤꯕꯥ ꯌꯣꯒ ꯑꯗꯨ ꯉꯁꯤ ꯑꯩꯅꯥ ꯅꯈꯣꯌꯗꯥ ꯇꯝꯕꯤꯔꯦ, ꯃꯔꯃꯗꯤ ꯅꯈꯣꯌ ꯑꯩꯒꯤ ꯚꯛꯇꯅꯤ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯩꯒꯤ ꯏꯔꯩꯕꯥꯀꯆꯥꯅꯤ; ꯃꯁꯤ ꯈ꯭ꯕꯥꯏꯗꯒꯤ ꯋꯥꯡꯕꯥ ꯋꯥꯐꯝꯅꯤ꯫

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

4.3।। व्याख्या-- 'भक्तोऽसि मे सखा चेति' अर्जुन भगवान्को अपना प्रिय सखा पहलेसे ही मानते थे (गीता 11। 41 42), पर भक्त अभी (गीता 2। 7 में) हुए हैं अर्थात् अर्जुन सखा भक्त तो पुराने हैं, पर दास्य भक्त नये हैं। आदेश या उपदेश दास अथवा शिष्यको ही दिया जाता है, सखाको नहीं। अर्जुन जब भगवान्के शरण हुए, तभी भगवान्का उपदेश आरम्भ हुआ।जो बात सखासे भी नहीं कही जाती, वह बात भी शरणागत शिष्यके सामने प्रकट कर दी जाती है। अर्जुन भगवान्से कहते हैं कि 'मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये आपके शरण हुए, मुझको शिक्षा दीजिये।' इसलिये भगवान् अर्जुनके सामने अपनेआपको प्रकट कर देते हैं, रहस्यको खोल देते हैं। अर्जुनका भगवान्के प्रति बहुत विशेष भाव था, तभी तो उन्होंने वैभव और अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित 'नारायणी सेना' का त्याग करके निःशस्त्र भगवान्को अपने 'सारथि' के रूपमें स्वीकार किया ।साधारण लोग भगवान्की दी हुई वस्तुओंको तो अपनी मानते हैं (जो अपनी हैं ही नहीं), पर भगवान्को अपना नहीं मानते (जो वास्तवमें अपने हैं)। वे लोग वैभवशाली भगवान्को न देखकर उनके वैभवको ही देखते हैं। वैभवको ही सच्चा माननेसे उनकी बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो जाती है कि वे भगवान्का अभाव ही मान लेते हैं अर्थात् भगवान्की तरफ उनकी दृष्टि जाती ही नहीं। कुछ लोग वैभवकी प्राप्तिके लिये ही भगवान्का भजन करते हैं। भगवान्को चाहनेसे तो वैभव भी पीछे आ जाता है, पर वैभवको चाहनेसे भगवान् नहीं आ सकते। वैभव तो भक्तके चरणोंमें लोटता है; परन्तु सच्चे भक्त वैभवकी प्राप्तिके लिये भगवान्का भजन नहीं करते। वे वैभवको नहीं चाहते, अपितु भगवान्को ही चाहते हैं। वैभवको चाहनेवाले मनुष्य वैभवके भक्त (दास) होते हैं और भगवान्को चाहनेवाले मनुष्य भगवान्के भक्त होते हैं। अर्जुनने वैभव-(नारायणी सेना-) का त्याग करके केवल भगवान्को अपनाया, तो युद्धक्षेत्रमें भीष्म, द्रोण, युधिष्ठिर आदि महापुरुषोंके रहते हुए भी गीताका महान् दिव्य उपदेश केवल अर्जुनको ही प्राप्त हुआ और बादमें राज्य भी अर्जुनको मिल गया!

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

अजितेन्द्रिय और दुर्बल मनुष्योंके हाथमें पड़कर यह योग नष्ट हो गया है यह देखकर और साथ ही लोगोंको पुरुषार्थरहित हुए देखकर वही यह पुराना योग यह सोचकर कि तू मेरा भक्त और मित्र है अब मैंने तुझसे कहा है क्योंकि यह ज्ञानरूप योग बड़ा ही उत्तम रहस्य है।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

किमिति वर्तमाने काले प्रकृतो योगः संप्रदायरहितोऽभूदित्याशङ्क्याधिकार्यभावादित्याह दुर्बलानिति। तदेव दौर्बल्यं प्रकृतोपयोगित्वेन व्याकरोति अजितेन्द्रियानिति। यद्यपि कामक्रोधादिप्रधानान्पुरुषान्प्रतिलभ्य कामक्रोधादिभिरभिभूयमानो योगो नष्टो विच्छिन्नसंप्रदायः संजातस्तथापि योगादृते पुरुषार्थो लोकस्य लभ्यते चेत् किमनेन योगोपदेशेनेत्याशङ्क्य यथोक्तयोगाभावे परमपुरुषार्थाप्राप्तेर्मैवमित्याह लोकं चेति। पूर्वो योगो विच्छिन्नसंप्रदायोऽधुना त्वन्यो योगो मदर्थमुच्यतेभगवतेत्याशङ्क्याह स एवेति। कस्मादन्यस्मै यस्मै कस्मैचित्पुरातनो योगो नोक्तो भगवतेत्याशङ्क्याह भक्तोऽसीति। उक्तमधिकारिणं प्रति योगस्य वक्तव्यत्वे हेतुमाह रहस्यं हीति। अनादिवेदमूलत्वाद्योगस्य पुरातनत्वम्। भक्तिः शरणबुद्ध्या प्रीतिस्तया युक्तो निजरूपमवेक्ष्य भक्तो विवक्षितः। समानवयाः स्निग्धः सहायः सखेत्युच्यते। एतदिति कथं योगो विशेष्यते तत्राह ज्ञानमिति।

VaniSagar Research Vault
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Sri Dhanpati

स आदित्यं प्रत्युक्त एव पुरातनोऽयं अध्यायद्वयनिरुपितस्ते तुभ्यं मया प्रोक्तो भक्तोऽसि मे सखा चासीति हेतोः। नन्वन्यस्मै कुतो नोच्यते इत्यत आह। रहस्यं गुह्यं हि यस्मादेतज्ज्ञानमुत्तमम्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
saḥthat
evacertainly
ayamthis
mayāby me
teunto you
adyatoday
yogaḥthe science of Yog
proktaḥreveal
purātanaḥancient
bhaktaḥdevotee
asiyou are
memy
sakhāfriend
chaand
ititherefore
rahasyamsecret
hicertainly
etatthis
uttamamsupreme
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 4.2
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप

हे परंतप ! इस तरह परम्परासे प्राप्त इस कर्मयोग को राजर्षियोंने जाना। परन्तु बहुत समय बीत जानेके कारण वह योग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.4
अर्जुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति

आपका जन्म तो अभीका है और सूर्यका जन्म बहुत पुराना है; अतः आपने ही सृष्टिके आदिमें सूर्यसे यह योग कहा था - यह बात मैं कैसे समझूँ? — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 3
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 3
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्

तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है; क्योंकि यह बड़ा उत्तम रहस्य है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 3 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 3 का हिंदी अर्थ: "तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है; क्योंकि यह बड़ा उत्तम रहस्य है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 3?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 3 translates to: "That same ancient yoga has been today taught to you by me, for you are my devotee and my friend; it is the supreme secret. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्त" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 3 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है; क्योंकि यह बड़ा उत्तम रहस्य है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sa evāyaṁ mayā te ’dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ" mean in English?

"sa evāyaṁ mayā te ’dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 3. That same ancient yoga has been today taught to you by me, for you are my devotee and my friend; it is the supreme secret. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.