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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 2
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप

हे परंतप ! इस तरह परम्परासे प्राप्त इस कर्मयोग को राजर्षियोंने जाना। परन्तु बहुत समय बीत जानेके कारण वह योग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया। — VaniSagar

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TamilIND

இது, அரச முனிவர்களால் தொடர்ச்சியாக வழங்கப்பட்டு வந்தது. இருப்பினும், இந்த யோகம் காலப்போக்கில் இங்கே தொலைந்து விட்டது, ஓ பரந்தபா (எதிரிகளை எரிப்பவர்).

TeluguIND

ఇది రాజ ఋషులచే క్రమం తప్పకుండా అందించబడినది. అయితే, ఈ యోగం, ఓ పరంతపా (శత్రువులను కాల్చేవాడు) కాలక్రమేణా ఇక్కడ కోల్పోయింది.

KannadaIND

ಇದು ರಾಜ ಋಷಿಗಳಿಂದ ನಿಯಮಿತ ಅನುಕ್ರಮವಾಗಿ ಹಸ್ತಾಂತರಿಸಲ್ಪಟ್ಟಿದೆ, ಇದು ತಿಳಿದಿತ್ತು. ಆದಾಗ್ಯೂ, ಈ ಯೋಗವು ಕಾಲಾನಂತರದಲ್ಲಿ ಇಲ್ಲಿ ಕಳೆದುಹೋಗಿದೆ, ಓ ಪರಂತಪಾ (ವೈರಿಗಳನ್ನು ಸುಡುವವನು).

SindhiIND

اهو، شاهي بابا جي طرفان باقاعدي جانشين ۾ هٿ ڪيو ويو، معلوم ٿيو. پر هي يوگا، پر وقت گذرڻ سان گڏ هتي گم ٿي ويو آهي، اي پرانتپا (دشمنن جو ساڙيندڙ).

GujaratiIND

આ, રાજવી ઋષિઓ દ્વારા નિયમિત ઉત્તરાધિકારમાં આપવામાં આવ્યું હતું, તે જાણીતું હતું. આ યોગ, જો કે, સમય જતાં અહીં ખોવાઈ ગયો છે, હે પરંતપ (શત્રુઓને બાળનાર)

NepaliIND

यो, शाही ऋषिहरु द्वारा नियमित उत्तराधिकार मा हस्तान्तरण, ज्ञात थियो। हे परन्तपा (शत्रुहरूलाई जलाउने) यो योग यहाँ समयसँगै हराएको छ।

BengaliIND

এটি, রাজকীয় ঋষিদের দ্বারা নিয়মিত ধারাবাহিকভাবে হস্তান্তর করা হয়েছিল, জানা ছিল। এই যোগ অবশ্য কালক্রমে এখানে হারিয়ে গেছে, হে পরন্তপ (শত্রুদের দগ্ধকারী)।

MaithiliIND

ई बात, जे राजऋषि लोकनि द्वारा नियमित उत्तराधिकार मे चलैत छल, ज्ञात छल | ई योग तथापि काल के संग एतय हेरा गेल अछि हे परंतप (शत्रु के दाहनिहार)।

ManipuriIND

ꯃꯁꯤ ꯔꯥꯖꯅꯤꯇꯤꯒꯤ ꯔ꯭ꯏꯁꯤꯁꯤꯡꯅꯥ ꯆꯥꯡ ꯅꯥꯏꯅꯥ ꯃꯊꯪ ꯃꯊꯪ ꯄꯤꯔꯀꯄꯥ ꯑꯁꯤ ꯈꯉꯅꯔꯝꯃꯤ꯫ ꯑꯗꯨꯕꯨ ꯌꯣꯒ ꯑꯁꯤꯗꯤ ꯃꯇꯃꯒꯤ ꯃꯇꯨꯡ ꯏꯟꯅꯥ ꯃꯐꯝ ꯑꯁꯤꯗꯥ ꯃꯥꯡꯈ꯭ꯔꯦ, ꯍꯦ ꯄꯔꯟꯇꯄꯥ (ꯌꯦꯛꯅꯕꯁꯤꯡꯒꯤ ꯃꯩꯔꯥ)꯫

AssameseIND

ৰাজঋষিসকলে নিয়মিতভাৱে একেৰাহে প্ৰেৰণ কৰা এই কথা জনা গৈছিল। এই যোগ অৱশ্যে সময়ৰ লগে লগে ইয়াত হেৰাই গৈছে হে পৰন্তপ (শত্ৰুৰ দহনকাৰী)।

DogriIND

राज ऋषि-मुनिएं आसेआ नियमित तौर उप्पर चलाए जाने आह्ले इस गल्लै दा पता हा। यह योग ऩयन्तु वभम के साथ इव ऩय खो गमा शै हे परन्तऩ (शत्रुओॊ का दहनक)।

MarathiIND

हे, राजेशाही ऋषींनी नियमितपणे दिलेले, ज्ञात होते. हे परंतपा (शत्रूंना जळणारे) हा योग मात्र कालांतराने इथे लुप्त झाला आहे.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः'--सूर्य, मनु, इक्ष्वाकु आदि राजाओंने कर्मयोगको भलीभाँति जानकर उसका स्वयं भी आचरण किया और प्रजासे भी वैसा आचरण कराया। इस प्रकार राजर्षियोंमें इस कर्मयोगकी परम्परा चली। यह राजाओं-(क्षत्रियों-) की खास (निजी) विद्या है, इसलिये प्रत्येक राजाको यह विद्या जाननी चाहिये। इसी प्रकार परिवार, समाज, गाँव आदिके जो मुख्य व्यक्ति हैं, उन्हें भी यह विद्या अवश्य जाननी चाहिये।प्राचीनकालमें कर्मयोगको जाननेवाले राजालोग राज्यके भोगोंमें आसक्त हुए बिना सुचारुरूपसे राज्यका संचालन करते थे। प्रजाके हितमें उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति रहती थी। सूर्यवंशी राजाओंके विषयमें महाकवि कालिदास लिखते हैं

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

इस प्रकार क्षत्रियोंकी परम्परासे प्राप्त हुए इस योगको राजर्षियोंने जो कि राजा और ऋषि दोनों थे जाना। हे परंतप ( अब ) वह योग इस मनुष्यलोकमें बहुत कालसे नष्ट हो गया है। अर्थात् उसकी सम्प्रदायपरम्परा टूट गयी है। अपने विपक्षियोंको पर कहते हैं उन्हें जो शौर्यरूप तेजकी किरणोंके द्वारा सूर्यके समान तपता है वह पपातप यानी शत्रुओंको तपानेवाला कहा जाता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

यथोक्ते योगे परंपरागते विशिष्टजनसंमतिमुदाहरति एवमिति। तस्य कथं संप्रति वक्तव्यत्वं तदाह स कालेनेति। पूर्वार्धं व्याकरोति एवमित्यादिना। ऐश्वर्यसंपत्ती राजत्वं येषां तेषामेव सूक्ष्मार्थनिरीक्षणक्षमत्वमृषित्वम्। इहेति भगवतोऽर्जुनेन सह संव्यवहारकालो गृह्यते। परंतपेति संबोधनं विभजते आत्मन इति।

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Sri Dhanpati

एवं क्षत्रियपरंपरया प्राप्तमागतमिमं योगं राजानश्च ते ऋषयश्च प्रभुत्वे सति सूक्ष्मार्थदर्शनसमर्थाः निमिप्रभृतयो विदुः। यत्तु जनकाजातशत्रुकैकयप्रभृयो राजानः ऋषयश्च सनकवसिष्ठाद्याः सूक्ष्मार्थदर्शिन इति पक्षान्तरप्रदर्शनं तदरुचिग्रस्तम्। तद्वीजं तु अभ्यर्हितस्य पूर्वनिपातादि। स योगो महता कालेनेह लोके नष्टः संप्रदायविच्छेदेनादर्शनं गतः। परान्शत्रून्कामादीन् तापयातीति परंतपः। दुर्बलानजितेन्द्रियान् प्राप्य नष्टं योगं मत्त उपलभ्य जीतेन्द्रियस्त्वं पुनर्लोके स्थापयेति सूचयन्संबोधयति परंतपेति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
evamthus
paramparāin a continuous tradition
prāptamreceived
imamthis (science)
rājaṛiṣhayaḥ
viduḥunderstood
saḥthat
kālenawith the long passage of time
ihain this world
mahatāgreat
yogaḥthe science of Yog
naṣhṭaḥlost
parantapaArjun, the scorcher of foes
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 4.1
श्री भगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्

श्रीभगवान् बोले - मैंने इस अविनाशी योगको सूर्यसे कहा था। फिर सूर्यने (अपने पुत्र) वैवस्वत मनुसे कहा और मनुने (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकुसे कहा। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.3
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्

तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है; क्योंकि यह बड़ा उत्तम रहस्य है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 2
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 2
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप

हे परंतप ! इस तरह परम्परासे प्राप्त इस कर्मयोग को राजर्षियोंने जाना। परन्तु बहुत समय बीत जानेके कारण वह योग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 2 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 2 का हिंदी अर्थ: "हे परंतप ! इस तरह परम्परासे प्राप्त इस कर्मयोग को राजर्षियोंने जाना। परन्तु बहुत समय बीत जानेके कारण वह योग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 2?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 2 translates to: "This, handed down in regular succession by the royal sages, was known. This Yoga, however, has been lost here over time, O Parantapa (burner of the foes). — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 2 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। हे परंतप ! इस तरह परम्परासे प्राप्त इस कर्मयोग को राजर्षियोंने जाना। परन्तु बहुत समय बीत जानेके कारण वह योग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "evaṁ paramparā-prāptam imaṁ rājarṣhayo viduḥ" mean in English?

"evaṁ paramparā-prāptam imaṁ rājarṣhayo viduḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 2. This, handed down in regular succession by the royal sages, was known. This Yoga, however, has been lost here over time, O Parantapa (burner of the foes). — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.