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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 1
श्री भगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्

श्रीभगवान् बोले - मैंने इस अविनाशी योगको सूर्यसे कहा था। फिर सूर्यने (अपने पुत्र) वैवस्वत मनुसे कहा और मनुने (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकुसे कहा। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

, "నేను వివస్వాన్‌కు ఈ నశించని యోగాన్ని బోధించాను; అతను దానిని మనువుకు చెప్పాడు; మనువు దానిని ఇక్ష్వాకుకి ప్రకటించాడు.

MalayalamIND

, "ഞാൻ വിവസ്വാനെ ഈ അചഞ്ചലമായ യോഗ പഠിപ്പിച്ചു; അവൻ അത് മനുവിനോട് പറഞ്ഞു; മനു അത് ഇക്ഷ്വാകുവിനോട് പ്രഖ്യാപിച്ചു.

TamilIND

, "நான் இந்த அழிவற்ற யோகத்தை விவஸ்வானுக்குக் கற்றுக் கொடுத்தேன்; அவர் அதை மனுவுக்குச் சொன்னார்; மனு இக்ஷ்வாகுவுக்கு அறிவித்தார்.

BengaliIND

, "আমি বিভাসবানকে এই অবিনশ্বর যোগ শিখিয়েছিলাম; তিনি তখন মনুকে বলেছিলেন; মনু ইক্ষ্বাকুকে এটি ঘোষণা করেছিলেন।

KannadaIND

, "ನಾನು ವಿವಸ್ವಾನನಿಗೆ ಈ ಅವಿನಾಶಿ ಯೋಗವನ್ನು ಕಲಿಸಿದೆ; ಅವನು ಅದನ್ನು ಮನುವಿಗೆ ಹೇಳಿದನು; ಮನು ಅದನ್ನು ಇಕ್ಷ್ವಾಕುವಿಗೆ ಘೋಷಿಸಿದನು.

PunjabiIND

, "ਮੈਂ ਇਹ ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਯੋਗਾ ਵਿਵਾਸਵਨ ਨੂੰ ਸਿਖਾਇਆ ਸੀ; ਉਸਨੇ ਫਿਰ ਇਹ ਮਨੂ ਨੂੰ ਦੱਸਿਆ; ਮਨੂ ਨੇ ਇਕਸ਼ਵਾਕੁ ਨੂੰ ਇਸ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕੀਤਾ।

GujaratiIND

, "મેં વિવસ્વને આ અવિનાશી યોગ શીખવ્યો; પછી તેણે મનુને કહ્યું; મનુએ ઇક્ષ્વાકુને તેની જાહેરાત કરી.

NepaliIND

, "मैले यो अविनाशी योग विवस्वनलाई सिकाएको थिएँ, त्यसपछि उनले मनुलाई भने, मनुले इक्ष्वाकुलाई घोषणा गरे।

ManipuriIND

, "ꯑꯩꯍꯥꯛꯅꯥ ꯕꯤꯕꯁ꯭ꯕꯅꯗꯥ ꯑꯁꯣꯀꯄꯥ ꯌꯣꯒ ꯑꯁꯤ ꯇꯝꯕꯤꯈꯤ; ꯃꯗꯨꯒꯤ ꯃꯇꯨꯡꯗꯥ ꯃꯍꯥꯛꯅꯥ ꯃꯅꯨꯗꯥ ꯍꯥꯌꯈꯤ; ꯃꯅꯨꯅꯥ ꯏꯛꯁꯕꯥꯀꯨꯗꯥ ꯂꯥꯑꯣꯊꯣꯀꯈꯤ꯫"

DogriIND

, "मैं इस अविनाशी योग गी विवस्वन गी सिखाया; उसने फिर मनु गी दस्सेया; मनु ने इक्ष्वाकु गी इसदा ऐलान कीता।"

AssameseIND

, "মই বিৱস্বনক এই অক্ষয় যোগ শিকাইছিলো; তাৰ পিছত তেওঁ মনুক ক'লে; মনুৱে ইক্ষ্ৱকুক ঘোষণা কৰিলে।"

MarathiIND

, "मी हा अविनाशी योग विवस्वानला शिकवला; नंतर त्याने तो मनूला सांगितला; मनूने तो इक्ष्वाकुला सांगितला.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या-- 'इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्'--भगवान्ने जिन सूर्य, मनु और इक्ष्वाकु राजाओंका उल्लेख किया है, वे सभी गृहस्थ थे और उन्होंने गृहस्थाश्रममें रहते हुए ही कर्मयोगके द्वारा परमसिद्धि प्राप्त की थी; अतः यहाँके 'इमम् अव्ययम्, योगम्' पदोंका तात्पर्य पूर्वप्रकरणके अनुसार तथा राजपरम्पराके अनुसार 'कर्मयोग' लेना ही उचित प्रतीत होता है।यद्यपि पुराणोंमें और उपनिषदोंमें भी कर्मयोगका वर्णन आता है, तथापि वह गीतामें वर्णित कर्मयोगके समान साङ्गोपाङ्ग और विस्तृत नहीं है। गीतामें भगवान्ने विविध युक्तियोंसे कर्मयोगका सरल और साङ्गोपाङ्ग विवेचन किया है। कर्मयोगका इतना विशद वर्णन पुराणों और उपनिषदोंमें देखनेमें नहीं आता। भगवान् नित्य हैं और उनका अंश जीवात्मा भी नित्य है तथा भगवान्के साथ जीवका सम्बन्ध भी नित्य है। अतः भगवत्प्राप्तिके सब मार्ग (योगमार्ग, ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग आदि) भी नित्य हैं । यहाँ 'अव्ययम्' पदसे भगवान् कर्मयोगकी नित्यताका प्रतिपादन करते हैं।परमात्माके साथ जीवका स्वतःसिद्ध सम्बन्ध (नित्य-योग) है। जैसे पतिव्रता स्त्रीको पतिकी होनेके लिये करना कुछ नहीं पड़ता; क्योंकि वह पतिकी तो है ही, ऐसे ही साधकको परमात्माका होनेके लिये करना कुछ नहीं है, वह तो परमात्माका है ही; परन्तु अनित्य क्रिया, पदार्थ, घटना आदिके साथ जब वह अपनी सम्बन्ध मान लेता है, तब उसे 'नित्ययोग' अर्थात् परमात्माके साथ अपने नित्यसम्बन्धका अनुभव नहीं होता। अतः उस अनित्यके साथ माने हुए सम्बन्धको मिटानेके लिये कर्मयोगी शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि मिली हुई समस्त वस्तुओंको संसारकी ही मानकर संसारकी सेवामें लगा देता है। वह मानता है कि जैसे धूलका छोटा-से-छोटा कण भी विशाल पृथ्वीका ही एक अंश है ,ऐसे ही यह शरीर भी विशाल ब्रह्माण्डका ही एक अंश है। ऐसा माननेसे 'कर्म' तो संसारके लिये होंगे पर 'योग' (नित्ययोग) अपने लिये होगा अर्थात् नित्ययोगका अनुभव हो जायगा। भगवान् 'विवस्वते प्रोक्तवान्' पदोंसे साधकोंको मानो यह लक्ष्य कराते हैं कि जैसे सूर्य सदा चलते ही रहते हैं अर्थात् कर्म करते ही रहते हैं और सबको प्रकाशित करनेपर भी स्वयं निर्लिप्त रहते हैं, ऐसे ही साधकोंको भी प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अपने कर्तव्य-कर्मोंका पालन स्वयं करते रहना चाहिये (गीता 3। 19) और दूसरोंको भी कर्मयोगकी शिक्षा देकर लोकसंग्रह करते रहना चाहिये; पर स्वयं उनसे निर्लिप्त (निष्काम, निर्मम और अनासक्त) रहना चाहिये।सृष्टिमें सूर्य सबके आदि हैं। सृष्टिकी रचनाके समय भी सूर्य जैसे पूर्वकल्पमें थे, वैसे ही प्रकट हुए-- 'सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।' उन (सबके आदि) सूर्यको भगवान्ने अविनाशी कर्मयोगका उपदेश दिया। इससे सिद्ध हुआ कि भगवान् सबके आदिगुरु हैं और साथ ही कर्मयोग भी अनादि है। भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि मैं तुम्हें जो कर्मयोगकी बात बता रहा हूँ, वह कोई आजकी नयी बात नहीं है। जो योग सृष्टिके आदिसे अर्थात् सदासे है, उसी योगकी बात मैं तुम्हें बता रहा हूँ। प्रश्न-- भगवान्ने सृष्टिके आदिकालमें सूर्यको कर्म-योगका उपदेश क्यों दिया उत्तर-- (1) सृष्टिके आरम्भमें भगवान्ने सूर्यको ही कर्मयोगका वास्तविक अधिकारी जानकर उन्हें सर्वप्रथम इस योगका उपदेश दिया। (2) सृष्टिमें जो सर्वप्रथम उत्पन्न होता है, उसे ही उपदेश दिया जाता है; जैसे-- ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिमें प्रजाओँको उपदेश दिया (गीता 3। 10)। उपदेश देनेका तात्पर्य है-- कर्तव्यका ज्ञान कराना। सृष्टिमें सर्वप्रथम सूर्यकी उत्पत्ति हुई, फिर सूर्यसे समस्त लोक उत्पन्न हुए। सबको उत्पन्न करनेवाले सूर्यको सर्वप्रथम कर्मयोगका उपदेश देनेका अभिप्राय उनसे उत्पन्न सम्पूर्ण सृष्टिको परम्परासे कर्मयोग सुलभ करा देना था। (3) सूर्य सम्पूर्ण जगत्के नेत्र हैं। उनसे ही सबको ज्ञान प्राप्त होता है एवं उनके उदित होनेपर प्रायः समस्त प्राणी जाग्रत् हो जाते हैं और अपने-अपने कर्मोंमें लग जाते हैं। सूर्यसे ही मनुष्योंमें कर्तव्य-परायणता आती है। सूर्यको सम्पूर्ण जगत्की आत्मा भी कहा गया है-- 'सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च' । अतः सूर्यको जो उपदेश प्राप्त होगा, वह सम्पूर्ण प्राणियोंको भी स्वतः प्राप्त हो जायगा। इसलिये भगवान्ने सर्वप्रथम सूर्यको ही उपदेश दिया।वास्तवमें नारायणके रूपमें उपदेश देना और सूर्यके रूपमें उपदेश ग्रहण करना जगन्नाट्यसूत्रधार भगवान्की एक लीला ही समझनी चाहिये, जो संसारके हितके लिये बहुत आवश्यक थी। जिस प्रकार अर्जुन महान् ज्ञानी नर-ऋषिके अवतार थे; परन्तु लोकसंग्रहके लिये उन्हें भी उपदेश लेनेकी आवश्यकता हुई, ठीक उसी प्रकार भगवान्ने स्वयं ज्ञानस्वरूप सूर्यको उपदेश दिया, जिसके फलस्वरूप संसारका महान् उपकार हुआ है, हो रहा है और होता रहेगा।

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Sri Harikrishnadas Goenka

कर्मयोग जिसका उपाय है ऐसा जो यह संन्याससहित ज्ञाननिष्ठारूप योग पूर्वके दो अध्यायोंमें ( दूसरे और तीसरेमें ) कहा गया है जिसमें कि वेदका प्रवृत्तिधर्मरूप और निवृत्तिधर्मरूप दोनों प्रकारका सम्पूर्ण तात्पर्य आ जाता है आगे सारी गीतामें भी भगावन्को योग शब्दसे यही ( ज्ञानयोग ) विवक्षित है इसलिये वेदके अर्थको ( ज्ञानयोगमें ) परिसमाप्त यानी पूर्णरूपसे आ गया समझकर भगवान् वंशपरम्पराकथनसे उस ( ज्ञाननिष्ठारूप योग ) की स्तुति करते हैं श्रीभगवान् बोले जगत्प्रतिपालक क्षत्रियोंमें बल स्थापन करनेके लिये मैंने उक्त दो अध्यायोंमें कहे हुए इस योगको पहले सृष्टिके आदिकालमें सूर्यसे कहा था ( क्योंकि ) उस योगबलसे युक्त हुए क्षत्रिय ब्रह्मत्वकी रक्षा करनेमें समर्थ होते हैं तथा ब्राह्मण और क्षत्रियोंका पालन ठीक तरह हो जानेपर ये दोनों सब जगत्का पालन अनायास कर सकते हैं। इस योगका फल अविनाशी है इसलिये यह अव्यय है क्योंकि इस सम्यक् ज्ञाननिष्ठारूप योगका मोक्षरूप फल कभी नष्ट नहीं होता। उस सूर्यने यह योग अपने पुत्र मनुसे कहा और मनुने अपने पुत्र सबसे पहले राजा बननेवाले इक्ष्वाकुसे कहा।

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Sri Anandgiri

पूर्वाभ्यामध्यायाभ्यां निष्ठाद्वयात्मनो योगस्य गीतत्वाद् वेदार्थस्य च समाप्तत्वाद् वक्तव्यशेषाभावाद् उक्तयोगस्य कृत्रिमत्वशङ्कानिवृत्तये वंशकथनपूर्विका स्तुतिं भगवानुक्तवानित्याह श्रीभगवानिति। तदेतद्भगवद्वचनं वृत्तानुवादद्वारेण प्रस्तौति योऽयमिति। उक्तमेव योगं विभज्यानुवदति ज्ञानेति। संन्यासेनेतिकर्तव्यतया सहितस्य ज्ञानात्मनो योगस्य कर्माख्यो योगो हेतुरतश्चोपायोपेयभूतं निष्ठाद्वयं प्रतिष्ठापितमित्यर्थः। उक्ते योगद्वये प्रमाणमुपन्यस्यति यस्मिन्निति। अथवा ज्ञानयोगस्य कर्मयोगोपायत्वमेव स्फुटयति यस्मिन्निति। प्रवृत्त्या लक्ष्यते ज्ञायते कर्मयोगो निवृत्त्या च लक्ष्यते ज्ञानयोग इति विभागः। यद्यपि पूर्वस्मिन्नध्यायद्वये यथोक्तनिष्ठाद्वयं व्याख्यातं तथापि वक्ष्यमाणाध्यायेषु वक्तव्यान्तरमस्तीत्याशङ्क्याह गीतासु चेति। कथं तर्हि समनन्तराध्यायस्य प्रवृत्तिरत आह अत इति। वंशकथनं संप्रदायोपन्यासः संप्रदायोपदेशश्च कृत्रिमत्वशङ्कानिवृत्त्या योगस्तुतौ पर्यवस्यति। गुरुशिष्यपरंपरोपन्यासमेवानुक्रामति इममिति। इममित्यस्य संनिहितं विषयं दर्शयति अध्यायेति। योगं ज्ञाननिष्ठालक्षणं कर्मयोगोपायलभ्यमित्यर्थः। स्वयमकृतार्थानां प्रयोजनव्यग्राणां परार्थप्रवृत्त्यसंभवाद्भगवतस्तथाविधप्रवृत्तिदर्शनात्कृतार्थता कल्पनीयेत्याह विवस्वत इति। अव्ययवेदमूलत्वादव्ययत्वं योगस्य गमयितव्यं किमिति भगवता कृतार्थेनापि योगप्रवचनं कृतमिति तदाह जगदिति। कथं यथोक्तेन योगेन क्षत्रियाणां बलाधानं तदाह तेनेति। युक्ताः क्षत्रिया इति शेषः। ब्रह्मशब्देन ब्राह्मणत्वजातिरुच्यते। यद्यपि योगप्रवचनेन क्षत्रं रक्षितं तेन च ब्राह्मणत्वं तथापि कथं रक्षणीयं जगदशेषं रक्षितमित्याशङ्क्याह ब्रह्मेति। ताभ्यां हि कर्मफलभूतं जगदनुष्ठानद्वारा रक्षितुं शक्यमित्यर्थः। योगस्याव्ययत्वे हेत्वन्तरमाह अव्ययफलत्वादिति। ननु कर्मफलवदुक्तयोगफलस्यापि साध्यत्वेन क्षयिष्णुत्वमनुमीयते नेत्याह नहीति। अपुनरावृत्तिश्रुतिप्रतिहतमनुमानं न प्रमाणीभवतीति भावः। भगवता विवस्वते प्रोक्तो योगस्तत्रैव पर्यवस्यतीत्याशङ्क्याह स चेति। स्वपुत्रायेत्युभयत्र संबध्यते। आदिराजायेतीक्ष्वाकोः सूर्यवंशप्रवर्तकत्वेन वैशिष्ट्यमुच्यते।

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Sri Dhanpati

एवमध्यायद्वयेनोक्तस्य निष्ठाद्वयात्मकस्य वेदार्थस्य समाप्तिं मन्यमानः संप्रदायप्रदर्शनेन तं स्तुवन श्रीभगवानुवाच। इममध्यायद्वयेनोक्तं योगं सांख्ययोगं कर्मयोगरुपोपायसहितं ससंन्यासं इमं संध्योपासनादिनिर्विकल्पकसमाध्यनुष्ठानान्तं कर्मयोगं ज्ञाननिष्ठोपसर्जनं पारिव्राज्यानधिकारिणं राज्ञामेव योग्यमित्यन्येषां व्याख्याने तु द्वितीयाध्यायार्थस्येदंशब्देनाग्रहणप्रसङ्गः। नचेष्टापत्तिः। अध्यायद्वयोक्तेऽर्थेऽप्रामाण्यशङ्का माभूदिति। विद्यावंशसंप्रदायं दर्शयति इममित्यादिनेति स्वोक्तिविरोधात्। एतेन राज्ञामेव योग्यमित्यपि प्रत्युक्तम्। अध्यायद्वयेन प्रतिपादिते वेदार्थेऽग्रे विस्तरेण वक्ष्यमाणे ब्राह्मणादियोग्यताभावप्रसङ्गात्। सर्गादौ विवस्वते सूर्यायाहं श्रीकृष्णः प्रोक्तवान्। ब्रह्मपरिपालनसमर्थबलाधानाय। ब्रह्मक्षत्रे परिपालिते सर्वं जगद्रक्षितं भवति। अव्ययमव्ययफलत्वादिदं भाष्यमुपलक्षणं अव्ययवेदमूलत्वात्। न व्येति स्वफलादित्यव्ययं अव्यभिचारिफलमित्यस्यापि। यत्त्वव्ययमविच्छिन्नसंप्रदायमिति तत्तु स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतपेति वाक्यशेषविरोधादुपेक्ष्यम्। सच विवस्वान्मनवे श्राद्धदेवाय प्राह। सच मनुरिक्ष्वाकवे स्वपुत्रायादिराजायाब्रवीत्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhrībhagavān uvācha
imamthis
vivasvateto the Sun
yogamthe science of Yog
proktavāntaught
ahamI
avyayameternal
vivasvānSun
manaveto Manu, the original progenitor of humankind
prāhatold
manuḥManu
ikṣhvākaveto Ikshvaku, first king of the Solar dynasty
abravītinstructed
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 4.2
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप

हे परंतप ! इस तरह परम्परासे प्राप्त इस कर्मयोग को राजर्षियोंने जाना। परन्तु बहुत समय बीत जानेके कारण वह योग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 1
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 1
श्री भगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्

श्रीभगवान् बोले - मैंने इस अविनाशी योगको सूर्यसे कहा था। फिर सूर्यने (अपने पुत्र) वैवस्वत मनुसे कहा और मनुने (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकुसे कहा। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 1 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 1 का हिंदी अर्थ: "श्रीभगवान् बोले - मैंने इस अविनाशी योगको सूर्यसे कहा था। फिर सूर्यने (अपने पुत्र) वैवस्वत मनुसे कहा और मनुने (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकुसे कहा। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 1?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 1 translates to: ", "I taught this imperishable Yoga to Vivasvan; he then told it to Manu; Manu proclaimed it to Ikshvaku. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"श्री भगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 1 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। श्रीभगवान् बोले - मैंने इस अविनाशी योगको सूर्यसे कहा था। फिर सूर्यने (अपने पुत्र) वैवस्वत मनुसे कहा और मनुने (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकुसे कहा। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhrī bhagavān uvācha" mean in English?

"śhrī bhagavān uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 1. , "I taught this imperishable Yoga to Vivasvan; he then told it to Manu; Manu proclaimed it to Ikshvaku. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.