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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 16
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्

कर्म क्या है और अकर्म क्या है -- इस प्रकार इस विषयमें विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं। अतः वह कर्म-तत्त्व मैं तुम्हें भलीभाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ- (संसार-बन्धन-) से मुक्त हो जायगा। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

செயல் என்றால் என்ன? செயலற்ற தன்மை என்றால் என்ன? அறிவுள்ளவர்களும் இதைப் பற்றிக் குழப்பத்தில் உள்ளனர். எனவே, பிறப்பு மற்றும் இறப்பு சக்கரமான சம்சாரத்தின் தீமையிலிருந்து நீங்கள் விடுபடுவீர்கள் என்பதை அறிவதன் மூலம், செயல் மற்றும் செயலற்ற தன்மையை நான் உங்களுக்குக் கற்பிக்கிறேன்.

GujaratiIND

ક્રિયા શું છે? નિષ્ક્રિયતા શું છે? જ્ઞાનીઓ પણ આ બાબતે મૂંઝવણમાં છે. તેથી, હું તમને ક્રિયા અને નિષ્ક્રિયતાનું સ્વરૂપ શીખવીશ, જે જાણીને તમે જન્મ અને મૃત્યુના ચક્ર સંસારના અનિષ્ટથી મુક્ત થશો.

MarathiIND

कृती म्हणजे काय? निष्क्रियता म्हणजे काय? याबाबत सुज्ञ लोकही संभ्रमात आहेत. म्हणून, मी तुला कर्म आणि निष्क्रियतेचे स्वरूप शिकवीन, ज्याच्या ज्ञानाने तू जन्म-मृत्यूच्या चक्रातून संसाराच्या दुष्टतेपासून मुक्त होईल.

BengaliIND

কর্ম কি? নিষ্ক্রিয়তা কি? জ্ঞানীরাও এ নিয়ে বিভ্রান্ত। অতএব, আমি তোমাকে কর্ম ও নিষ্ক্রিয়তার স্বরূপ শিক্ষা দিব, যা জানলে তুমি জন্ম-মৃত্যুর চাকা সংসারের অনিষ্ট থেকে মুক্তি পাবে।

KannadaIND

ಕ್ರಿಯೆ ಎಂದರೇನು? ನಿಷ್ಕ್ರಿಯತೆ ಎಂದರೇನು? ಪ್ರಜ್ಞಾವಂತರೂ ಈ ಬಗ್ಗೆ ಗೊಂದಲದಲ್ಲಿದ್ದಾರೆ. ಆದ್ದರಿಂದ, ನಾನು ನಿಮಗೆ ಕ್ರಿಯೆ ಮತ್ತು ನಿಷ್ಕ್ರಿಯತೆಯ ಸ್ವರೂಪವನ್ನು ಕಲಿಸುತ್ತೇನೆ, ನೀವು ಸಂಸಾರದ ದುಷ್ಟತನದಿಂದ ಬಿಡುಗಡೆ ಹೊಂದುವಿರಿ ಎಂದು ತಿಳಿದುಕೊಳ್ಳುವ ಮೂಲಕ ಜನ್ಮ ಮತ್ತು ಮರಣದ ಚಕ್ರ.

TeluguIND

చర్య అంటే ఏమిటి? నిష్క్రియాత్మకత అంటే ఏమిటి? దీనిపై జ్ఞానులు కూడా అయోమయంలో ఉన్నారు. అందుచేత, నేను మీకు క్రియ మరియు నిష్క్రియ స్వభావాన్ని బోధిస్తాను, మీరు సంసారం యొక్క చెడు నుండి, జనన మరణాల నుండి విముక్తి పొందుతారని తెలుసుకోవడం ద్వారా.

MalayalamIND

എന്താണ് പ്രവർത്തനം? എന്താണ് നിഷ്ക്രിയത്വം? ബുദ്ധിയുള്ളവർ പോലും ഇക്കാര്യത്തിൽ ആശയക്കുഴപ്പത്തിലാണ്. അതിനാൽ, ജനനമരണ ചക്രമായ സംസാര തിന്മയിൽ നിന്ന് നിങ്ങൾക്ക് മോചനം ലഭിക്കുമെന്ന് അറിയുന്നതിലൂടെ, പ്രവർത്തനത്തിൻ്റെയും നിഷ്ക്രിയത്വത്തിൻ്റെയും സ്വഭാവം ഞാൻ നിങ്ങളെ പഠിപ്പിക്കും.

PunjabiIND

ਕਾਰਵਾਈ ਕੀ ਹੈ? ਅਕਿਰਿਆਸ਼ੀਲਤਾ ਕੀ ਹੈ? ਸਿਆਣੇ ਵੀ ਇਸ ਬਾਰੇ ਭੰਬਲਭੂਸੇ ਵਿਚ ਹਨ। ਇਸ ਲਈ, ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ ਕਰਮ ਅਤੇ ਅਕ੍ਰਿਤਘਣ ਦਾ ਸਰੂਪ ਸਿਖਾਵਾਂਗਾ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਜਾਣ ਕੇ ਤੂੰ ਜਨਮ ਮਰਨ ਦੇ ਚੱਕਰ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਹੋ ਜਾਵੇਂਗਾ।

NepaliIND

कारबाही भनेको के हो? निष्क्रियता भनेको के हो? यो कुरामा बुद्धिजीवीहरू पनि अन्योलमा छन् । तसर्थ, म तिमीलाई कर्म र अकर्मण्यताको स्वरूप सिकाउनेछु, जसको ज्ञानले तिमी जन्म मृत्युको चक्र संसारको दुष्टबाट मुक्त हुनेछौ।

SindhiIND

عمل ڇا آهي؟ غير فعالي ڇا آهي؟ عقل وارا به ان بابت پريشان آهن. تنهن ڪري، مان توهان کي عمل ۽ عمل جي فطرت سيکاريندس، جنهن کي ڄاڻڻ سان توهان سمسارا جي برائي، جنم ۽ موت جي چڪر کان آزاد ٿي ويندا.

DogriIND

कर्म कीह है? निष्क्रियता क्या ऐ? इस बारे च ज्ञानी बी उलझन च पेदे न। इस करिए मैं तुसें गी कर्म ते अकर्म दा स्वभाव सिखाना, जिसगी जानने कन्नै तुस जन्म-मरण दे चक्का संसार दी बुराई थमां मुक्त होगे।

MizoIND

Thiltih chu eng nge ni? Thiltih lohna chu eng nge ni? Hemi chungchangah hian mi fingte pawh an buai hle. Chuvangin thiltih leh thiltih loh zia hi ka zirtir ang che u, chu chu i hriat chuan pian leh thihna kekawrte Samsara sual lakah i chhuah zalen ang.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

4.16।। व्याख्या--'किं कर्म'--साधारणतः मनुष्य शरीर और इन्द्रियोंकी क्रियाओँको ही कर्म मान लेते हैं तथा शरीर और इन्द्रियोंकी क्रियाएँ बंद होनेको अकर्म मान लेते हैं। परन्तु भगवान्ने शरीर वाणी और मनके द्वारा होनेवाली मात्र क्रियाओँको कर्म माना है--'शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः' (गीता 18। 15)।भावके अनुसार ही कर्मकी संज्ञा होती है। भाव बदलनेपर कर्मकी संज्ञा भी बदल जाती है। जैसे कर्म स्वरूपसे सात्त्विक दीखता हुआ भी यदि कर्ताका भाव राजस या तामस होता है तो वह कर्म भी राजस या तामस हो जाता है। जैसे कोई देवीकी उपासनारूप कर्म कर रहा है जो स्वरूपसे सात्त्विक है। परन्तु यदि कर्ता उसे किसी कामनाकी सिद्धिके लिये करता है तो वह कर्म राजस हो जाता है और किसीका नाश करनेके लिये करता है तो वही कर्म तामस हो जाता है। इस प्रकार यदि कर्तामें फलेच्छा ममता और आसक्ति नहीं है तो उसके द्वारा किये गये कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् फलमें बाँधनेवाले नहीं होते। तात्पर्य यह है कि केवल बाहरी क्रिया करने अथवा न करनेसे कर्मके वास्तविक स्वरूपका ज्ञान नहीं होता। इस विषयमें शास्त्रोंको जाननेवाले बड़ेबड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं अर्थात् कर्मके तत्त्वका यथार्थ निर्णय नहीं कर पाते। जिस क्रियाको वे कर्म मानते हैं वह कर्म भी हो सकता है अकर्म भी हो सकता है और विकर्म भी हो सकता है। कारण कि कर्ताके भावके अनुसार कर्मका स्वरूप बदल जाता है। इसलिये भगवान् मानो यह कहते हैं कि वास्तविक कर्म क्या है वह क्यों बाँधता है कैसे बाँधता है इससे किस तरह मुक्त हो सकते हैं इन सबका मैं विवेचन करूँगा जिसको जानकर उस रीतिसे कर्म करनेपर वे बाँधनेवाले न हो सकेंगे।यदि मनुष्यमें ममता आसक्ति और फलेच्छा है तो कर्म न करते हुए भी वास्तवमें कर्म ही हो रहा है अर्थात् कर्मोंसे लिप्तता है। परन्तु यदि ममता आसक्ति और फलेच्छा नहीं है तो कर्म करते हुए भी कर्म नहीं हो रहा है अर्थात् कर्मोंसे निर्लिप्तता है। तात्पर्य यह है कि यदि कर्ता निर्लिप्त है तो कर्म करना अथवा न करना दोनों ही अकर्म हैं और यदि कर्ता लिप्त है तो कर्म करना अथवा न करना दोनों ही कर्म हैं औरबाँधनेवाले हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

यदि कर्म ही कर्तव्य है तो मैं आपकी आज्ञासे ही करनेको तैयार हूँ फिर पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् विशेषण देनेकी क्या आवश्यकता है इसपर कहते हैं कि कर्मके विषयमें बड़ी भारी विषमता है अर्थात् कर्मका विषय बड़ा गहन है। सो किस प्रकार कर्म क्या है और अकर्म क्या है इस कर्मादिके विषयमें बड़ेबड़े बुद्धिमान् भी मोहित हो चुके हैं इसलिये मैं तुझे वह कर्म और अकर्म बतलाऊँगा जिस कर्मादिको जानकर तू अशुभसे यानी संसारसे मुक्त हो जायगा।

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Sri Anandgiri

कर्मविशेषणमाक्षिपति तत्रेति। मनुष्यलोकः सप्तम्यर्थः। कर्मणि महतो वैषम्यस्य विद्यमानत्वात्तस्य पूर्वैरनुष्ठितत्वेन पूर्वतरत्वेन च विशेषितत्वे तस्मिन्प्रवृत्तिस्तव सुकरेति युक्तं विशेषणमिति परिहरति उच्यत इति। कर्मणि देहादिचेष्टारूपे लोकप्रसिद्धे नास्ति वैषम्यमिति शङ्कते कथमिति। विज्ञानवतामपि कर्मादिविषये व्यामोहोपपत्तेः सुतरामेव तव तद्विषये व्यामोहसंभवात्तदपोहार्थमाप्तवाक्यापेक्षणादस्ति कर्मणि वैषम्यमित्युत्तरमाह किं कर्मेति। तत्ते कर्मेत्यत्राकारानुबन्धेनापि पदं छेत्तव्यम्। कर्मादिप्रवचनस्य प्रयोजनमाह यज्ज्ञात्वेति। तत्कर्माकर्म चेति संबन्धः। अतो मेधाविनामपि यथोक्ते विषये व्यामोहस्य सत्त्वादित्यर्थः। कर्मणोऽकर्मणश्च प्रसिद्धत्वात्तद्विषये न किंचिद्बोद्धव्यमिति चोद्यमनूद्य निरस्यति नचेति।

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Sri Dhanpati

ननु कर्म कर्तव्यं चेत्त्वदुत्त्यैवाहमिदं कर्मेति खबुद्य्धा विचार्य करोमि किं पूर्वैः पूर्वतरं कतमिति विशेषितेनेत्याशङ्क्य कर्मणि महावैषम्यस्य सत्त्वात् तस्य पूर्वौरत्यादिविशेषितत्वेन तव प्रवृत्तिस्तस्मिन्सुकरेत्याशयेन कर्मणो दुर्विज्ञेयत्वमाह किमिति। यत्तु तच्च तत्त्वविद्भिः सह विचार्य कर्तव्यं न लोकपरम्परामात्रेणेत्याहिति तच्चिन्त्यम्। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतमिति स्वयमतिनिर्बन्धेनोक्त्वा पुनस्तत्रैवानिर्बन्धं वदतः परमेश्वरस्य पूर्वोपरविरोधापत्तेः। अत्रास्मिन्कर्मादिविषये कवयो मेधाविनोऽपि मोहं किं कर्म किम कर्मेति संशयं गताः प्राप्ताः। अतस्ते तुभ्यमहं कर्म अकारप्रश्लेषेणाकर्म च प्रवक्ष्यामि। यत्कर्मादि ज्ञात्वाऽशुभात्संसारान्मोक्ष्यसे।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
kimwhat
karmaaction
kimwhat
akarmainaction
itithus
kavayaḥthe wise
apieven
atrain this
mohitāḥare confused
tatthat
teto you
karmaaction
pravakṣhyāmiI shall explain
yatwhich
jñātvāknowing
mokṣhyaseyou may free yourself
aśhubhātfrom inauspiciousness
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 4.15
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्

पूर्वकालके मुमुक्षुओंने भी इस प्रकार जानकर कर्म किये हैं, इसलिये तू भी पूर्वजोंके द्वारा सदासे किये जानेवाले कर्मोंको ही (उन्हींकी तरह) कर। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.17
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः

कर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्मकी गति गहन है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 16
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 16
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्

कर्म क्या है और अकर्म क्या है -- इस प्रकार इस विषयमें विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं। अतः वह कर्म-तत्त्व मैं तुम्हें भलीभाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ- (संसार-बन्धन-) से मुक्त हो जायगा। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ: "कर्म क्या है और अकर्म क्या है -- इस प्रकार इस विषयमें विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं। अतः वह कर्म-तत्त्व मैं तुम्हें भलीभाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ- (संसार-बन्धन-) से मुक्त हो जायगा। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 16?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 16 translates to: "What is action? What is inaction? Even the wise are confused about this. Therefore, I shall teach you the nature of action and inaction, by knowing which you will be liberated from the evil of Samsara, the wheel of birth and death. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 16 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। कर्म क्या है और अकर्म क्या है -- इस प्रकार इस विषयमें विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं। अतः वह कर्म-तत्त्व मैं तुम्हें भलीभाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ- (संसार-बन्धन-) से मुक्त हो जायगा। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "kiṁ karma kim akarmeti kavayo ’pyatra mohitāḥ" mean in English?

"kiṁ karma kim akarmeti kavayo ’pyatra mohitāḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 16. What is action? What is inaction? Even the wise are confused about this. Therefore, I shall teach you the nature of action and inaction, by knowing which you will be liberated from the evil of Samsara, the wheel of birth and death. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.