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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 15
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्

पूर्वकालके मुमुक्षुओंने भी इस प्रकार जानकर कर्म किये हैं, इसलिये तू भी पूर्वजोंके द्वारा सदासे किये जानेवाले कर्मोंको ही (उन्हींकी तरह) कर। — VaniSagar

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TamilIND

இதை அறிந்து, பழங்கால சுதந்திர வேட்கையாளர்களும் செயலைச் செய்தனர்; ஆகையால், முற்காலத்தில் முன்னோர்கள் செய்தது போல் நீயும் செய்வாயாக.

GujaratiIND

આ જાણીને, સ્વતંત્રતાના પ્રાચીન સાધકોએ પણ ક્રિયાઓ કરી; તેથી, તમે પણ ક્રિયા કરો, જેમ કે પ્રાચીન સમયમાં કરવામાં આવ્યું હતું.

BengaliIND

এটা জানার পর, স্বাধীনতাকামী প্রাচীনরাও কর্ম সম্পাদন করেছিলেন; অতএব, তুমিও কার্য সম্পাদন কর, যেমন পূর্ববর্তীরা করত।

DogriIND

इस गल्ल गी जानदे होई आजादी दे प्राचीन साधक बी कर्म करदे हे; इस आस् ते तू बी कर्म करो, जिय् यां पुराने समें च करदे हे।

BhojpuriIND

एकरा के जान के प्राचीन स्वतंत्रता के साधक लोग भी कर्म करत रहे; एह से तू भी कर्म करऽ, जइसे पुरनका लोग करत रहे।

ManipuriIND

ꯃꯁꯤ ꯈꯉꯂꯗꯨꯅꯥ ꯑꯔꯤꯕꯥ ꯃꯇꯃꯒꯤ ꯅꯤꯡꯇꯝꯕꯥ ꯊꯤꯔꯤꯕꯁꯤꯡꯅꯁꯨ ꯊꯕꯛ ꯇꯧꯔꯝꯃꯤ; ꯃꯔꯝ ꯑꯗꯨꯅꯥ ꯅꯍꯥꯀꯁꯨ ꯃꯃꯥꯡꯉꯩꯒꯤ ꯃꯇꯃꯗꯥ ꯇꯧꯔꯝꯕꯥ ꯑꯗꯨꯒꯨꯝꯅꯥ ꯊꯕꯛ ꯇꯧ꯫

MizoIND

Chu chu an hriat chuan hmân lai zalenna zawngtute pawhin thiltih an ti ve bawk a; chuvangin, hmanlai mite tih ang khan nang pawhin thiltih ti rawh.

PunjabiIND

ਇਹ ਜਾਣ ਕੇ, ਆਜ਼ਾਦੀ ਦੇ ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਚਾਹਵਾਨਾਂ ਨੇ ਵੀ ਕਾਰਵਾਈ ਕੀਤੀ; ਇਸ ਲਈ, ਤੁਸੀਂ ਵੀ ਕੰਮ ਕਰੋ, ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਪੁਰਾਣੇ ਦਿਨਾਂ ਵਿੱਚ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ।

KonkaniIND

हें जाणून पुर्विल्ल्या स्वातंत्र्याच्या साधकांनीय कृती केली; देखून, आदल्या काळार पुर्विल्ल्या लोकांनी केल्ले भशेन तूंय कर्म कर.

NepaliIND

यो थाहा पाएर, स्वतन्त्रता खोज्नेहरूले पनि कर्म गरे। यसकारण, तिमी पनि कर्म गर, जसरी पहिलेका दिनहरूमा गर्थे।

MaithiliIND

ई जानि प्राचीन स्वतंत्रताक साधक लोकनि सेहो कर्म करैत छलाह; तेँ अहाँ सेहो कर्म करू जेना प्राचीन लोक सभ पहिने करैत छलाह |

TeluguIND

ఇది తెలిసిన తరువాత, స్వాతంత్ర్యం కోసం పురాతన అన్వేషకులు కూడా చర్య చేపట్టారు; కావున పూర్వకాలములో పూర్వులు చేసినట్లుగా నీవు కూడా కార్యము చేయుము.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

4.15।। व्याख्या-- [नवें श्लोकमें भगवान्ने अपने कर्मोंकी दिव्यताका जो प्रसङ्ग आरम्भ किया था उसका यहाँ उपसंहार करते हैं।] 'एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः'--अर्जुन मुमुक्षु थे अर्थात् अपना कल्याण चाहते थे। परन्तु युद्धरूपसे प्राप्त अपने कर्तव्य-कर्मको करनेमें उन्हें अपना कल्याण नहीं दीखता, प्रत्युत वे उसको घोर-कर्म समझकर उसका त्याग करना चाहते हैं (गीता 3। 1)। इसलिये भगवान् अर्जुनको पूर्वकालके मुमुक्षु पुरुषोंका उदाहरण देते हैं कि उन्होंने भी अपने-अपने कर्तव्य-कर्मोंका पालन करके कल्याणकी प्राप्ति की है, इसलिये तुम्हें भी उनकी तरह अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये।तीसरे अध्यायके बीसवें श्लोकमें जनकादिका उदाहरण देकर तथा इसी (चौथे) अध्यायके पहले-दूसरे श्लोकोंमें विवस्वान्, मनु, इक्ष्वाकु आदिका उदाहरण देकर भगवान्ने जो बातें कही थी, वही बात इस श्लोकमें भी कह रहे हैं। शास्त्रोंमें ऐसी प्रसिद्धि है कि मुमुक्षा जाग्रत् होनेपर कर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर देना चाहिये; क्योंकि मुमुक्षाके बाद मनुष्य कर्मका अधिकारी नहीं होता; प्रत्युत ज्ञानका अधिकारी हो जाता है । परन्तु यहाँ भगवान् कहते हैं कि मुमुक्षुओंने भी कर्मयोगका तत्त्व जानकर कर्म किये हैं। इसलिये मुमुक्षा जाग्रत् होनेपर भी अपने कर्तव्य-कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत निष्कामभावपूर्वक कर्तव्य-कर्म करते रहना चाहिये।कर्मयोगका तत्त्व है--कर्म करते हुए योगमें स्थित रहना और योगमें स्थित रहते हुए कर्म करना। कर्म संसारके लिये और योग अपने लिये होता है। कर्मोंको करना और न करना--दोनों अवस्थाएँ हैं। अतः प्रवृत्ति (कर्म करना) और निवृत्ति (कर्म न करना) दोनों ही प्रवृत्ति (कर्म करना) है। प्रवृत्ति और निवृत्ति--दोनोंसे ऊँचा उठ जाना योग है, जो पूर्ण निवृत्ति है। पूर्ण निवृत्ति कोई अवस्था नहीं है। चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि कर्मफलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म नहीं बाँधते। जो मनुष्य कर्म करनेकी इस विद्या-(कर्मयोग-) को जानकर फलेच्छाका त्याग करके कर्म करता है, वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता; कारण कि फलेच्छासे ही मनुष्य बँधता है--फले सक्तो निबध्यते (गीता 5। 12)। अगर मनुष्य अपने सुखभोगके लिये अथवा धन, मान, बड़ाई, स्वर्ग आदिकी प्राप्तिके लिये कर्म करता है तो वे कर्म उसे बाँध देते हैं (गीता 3। 9)। परन्तु यदि उसका लक्ष्य उत्पत्ति-विनाशशील संसार नहीं है, प्रत्युत वह संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये निःस्वार्थ सेवा-भावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है, तो वे कर्म उसे बाँधते नहीं (गीता 4। 23)। कारण कि दूसरोंके लिये कर्म करनेसे कर्मोंका प्रवाह संसारकी तरफ हो जाता है, जिससे कर्मोंका सम्बन्ध (राग) मिट जाता है और फलेच्छा न रहनेसे नया सम्बन्ध पैदा नहीं होता।

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Sri Harikrishnadas Goenka

मैं न तो कर्मोंका कर्ता ही हूँ और न मुझे कर्मफलकी चाहना ही है ऐसा समझकर ही पूर्वकालके मुमुक्षु पुरुषोंने भी कर्म किये थे। इसलिये तू भी कर्म ही कर। तेरे लिये चुपचाप बैठ रहना या संन्यास लेना यह दोनों ही कर्तव्य नहीं है। क्योंकि पूर्वजोंने भी कर्मका आचरण किया है इसलिये यदि तू आत्मज्ञानी नहीं है तब तो अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये और यदि तत्त्वज्ञानी है तो लोकसंग्रहके लिये जनकादि पूर्वजोंद्वारा सदासे किये हुए (प्रकारसे ही ) कर्म कर नये ढंगसे किये जानेवाले कर्म मत कर।

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Sri Anandgiri

तव कर्मतत्फलसंबन्धाभावे तथा ज्ञानवतश्च तदसंबन्धे ममापि किं कर्मणेत्याशङ्क्य कर्मणि कर्तृत्वाभिमानं तत्फले स्पृहां चाकृत्वा मुमुक्षुवत्त्वया कर्म कर्तव्यमेवेत्याह नाहमित्यादिना। नाहं कर्तेत्येवमादि एवमा परामृश्यते तेन पूर्वैर्मुमुक्षुभिरनुष्ठितत्वेन हेतुनेत्यर्थः। कर्मैवेत्येवकारार्थमाह नेत्यादिना। त्वंशब्दस्य क्रियापदेन संबन्धः। तस्मादित्युक्तमेव स्फुटयति पूर्वैरिति। यदुक्तं किं मम कर्मणेति तत्र त्वमज्ञो वा तत्त्वविद्वा। यद्यज्ञस्तदा चित्तशुद्ध्यर्थं कुरु कर्मेत्याह यदीति। द्वितीयं प्रत्याह तत्त्वविदिति। कुरु कर्मेति संबन्धः। पूर्वैर्मूढैराचरितमित्येतावता किमिति विवेकवता मया तत्कर्तव्यमित्याशङ्क्याह जनकादिभिरिति। ते तावदेवं संपाद्य कर्म कृतवन्तो न तदिदानीमप्रामाणिकत्वादनुष्ठेयमित्याशङ्क्याह पूर्वतरमिति।

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Sri Dhanpati

नाहं कर्ता न मे कर्मफले स्पृहेत्येवंज्ञात्वा पूर्वैरपि मुमुक्षुभिश्चित्तशुद्धिद्वारा ज्ञानार्थं कर्म कृतं तस्मात्त्वमपि कर्मैव कुरु। नापि तूष्णीमासनं नापि संन्यासम्। यस्मात्त्वत्तोऽपि पूर्वैर्जनकादिभिः ज्ञानिभिर्लोकसंग्रहार्थं अनादिसिद्धत्वात्पूर्वतरं कृतम्। यद्यज्ञो मुमुक्षुस्त्वं तर्हि सत्त्वशुद्य्धर्थं तत्त्वविच्चेत्तर्हि लोकसंग्रहार्थं कर्म कुर्वित्यभिप्रायः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
evamthus
jñātvāknowing
kṛitamperformed
karmaactions
pūrvaiḥof ancient times
apiindeed
mumukṣhubhiḥseekers of liberation
kurushould perform
karmaduty
evacertainly
tasmāttherefore
tvamyou
pūrvaiḥof those ancient sages
pūrvataram
kṛitamperformed
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Bhagavad Gita · 4.14
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते

मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। उस-(सृष्टि-रचना आदि-) का कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय परमेश्वरको तू अकर्ता जान। कारण कि कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है, वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.16
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्

कर्म क्या है और अकर्म क्या है -- इस प्रकार इस विषयमें विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं। अतः वह कर्म-तत्त्व मैं तुम्हें भलीभाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ- (संसार-बन्धन-) से मुक्त हो जायगा। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 15
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 15
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्

पूर्वकालके मुमुक्षुओंने भी इस प्रकार जानकर कर्म किये हैं, इसलिये तू भी पूर्वजोंके द्वारा सदासे किये जानेवाले कर्मोंको ही (उन्हींकी तरह) कर। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ: "पूर्वकालके मुमुक्षुओंने भी इस प्रकार जानकर कर्म किये हैं, इसलिये तू भी पूर्वजोंके द्वारा सदासे किये जानेवाले कर्मोंको ही (उन्हींकी तरह) कर। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 15?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 15 translates to: "Having known this, the ancient seekers of freedom also performed action; therefore, do thou also perform action, as the ancients did in days of yore. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पू" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 15 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। पूर्वकालके मुमुक्षुओंने भी इस प्रकार जानकर कर्म किये हैं, इसलिये तू भी पूर्वजोंके द्वारा सदासे किये जानेवाले कर्मोंको ही (उन्हींकी तरह) कर। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "evaṁ jñātvā kṛitaṁ karma pūrvair api mumukṣhubhiḥ" mean in English?

"evaṁ jñātvā kṛitaṁ karma pūrvair api mumukṣhubhiḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 15. Having known this, the ancient seekers of freedom also performed action; therefore, do thou also perform action, as the ancients did in days of yore. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.