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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 14
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते

मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। उस-(सृष्टि-रचना आदि-) का कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय परमेश्वरको तू अकर्ता जान। कारण कि कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है, वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता। — VaniSagar

Global Translations

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PunjabiIND

ਕਰਮ ਮੈਨੂੰ ਕਲੰਕਿਤ ਨਹੀਂ ਕਰਦੇ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਮੈਨੂੰ ਕਰਮਾਂ ਦੇ ਫਲ ਦੀ ਲਾਲਸਾ ਹੈ। ਜੋ ਮੈਨੂੰ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਜਾਣਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਕਰਮਾਂ ਨਾਲ ਬੱਝਾ ਨਹੀਂ ਹੈ।

TamilIND

செயல்கள் என்னைக் களங்கப்படுத்துவதில்லை, செயல்களின் பலனில் எனக்கு ஆசையும் இல்லை. இவ்வாறு என்னை அறிந்தவன் செயல்களுக்கு கட்டுப்பட்டவன் அல்ல.

GujaratiIND

ક્રિયાઓ મને કલંકિત કરતી નથી, અને મને કર્મોના ફળની ઈચ્છા નથી. જે મને આ રીતે જાણે છે તે ક્રિયાઓથી બંધાયેલો નથી.

BengaliIND

কর্ম আমাকে কলঙ্কিত করে না এবং আমার কর্মের ফল কামনাও নেই। যে আমাকে এইভাবে জানে সে কর্ম দ্বারা আবদ্ধ নয়।

MarathiIND

कर्म मला कलंकित करत नाहीत आणि मला कर्मांच्या फळाची इच्छाही नाही. जो मला अशा प्रकारे जाणतो तो कर्मांनी बांधलेला नाही.

MalayalamIND

കർമ്മങ്ങൾ എന്നെ കളങ്കപ്പെടുത്തുന്നില്ല, കർമ്മങ്ങളുടെ ഫലത്തിനായി എനിക്ക് ആഗ്രഹവുമില്ല. എന്നെ ഇങ്ങനെ അറിയുന്നവൻ പ്രവൃത്തികളാൽ ബന്ധിതനല്ല.

TeluguIND

క్రియలు నన్ను కలుషితం చేయవు, క్రియల ఫలం కోసం నాకు కోరిక లేదు. నన్ను ఈ విధంగా తెలుసుకున్నవాడు చర్యలకు కట్టుబడి ఉండడు.

KannadaIND

ಕ್ರಿಯೆಗಳು ನನ್ನನ್ನು ದೂಷಿಸುವುದಿಲ್ಲ, ಅಥವಾ ಕ್ರಿಯೆಗಳ ಫಲದ ಬಯಕೆಯೂ ಇಲ್ಲ. ನನ್ನನ್ನು ಹೀಗೆ ತಿಳಿದಿರುವವನು ಕ್ರಿಯೆಗಳಿಂದ ಬದ್ಧನಾಗಿರುವುದಿಲ್ಲ.

NepaliIND

कर्मले मलाई कलंकित गर्दैन, न मलाई कर्मको फलको चाहना छ। जसले मलाई यसरी जान्दछ उसलाई कर्मले बाँधिदैन।

SindhiIND

عمل مون کي داغدار نٿا ڪن، ۽ نه ئي مون کي عمل جي ميوي جي خواهش آهي. جيڪو مون کي اهڙيءَ طرح ڄاڻي ٿو، سو عملن جو پابند ناهي.

OdiaIND

କାର୍ଯ୍ୟଗୁଡ଼ିକ ମୋତେ କଳଙ୍କିତ କରେ ନାହିଁ, କିମ୍ବା କାର୍ଯ୍ୟର ଫଳ ପାଇଁ ମୋର ଇଚ୍ଛା ନାହିଁ | ଯିଏ ମୋତେ ଏହିପରି ଜାଣେ, ସେ କାର୍ଯ୍ୟରେ ବନ୍ଧା ନୁହେଁ |

KonkaniIND

कर्मां म्हाका कलंकीत करिनात, तशेंच कर्मांच्या फळाची इत्सा ना. जो म्हाका अशें वळखता तो कर्मांनी बांदिल्लो ना.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

4.14।। व्याख्या--'चातुर्वर्ण्यं' 'मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः'--पूर्वजन्मोंमें किये गये कर्मोंके अनुसार सत्त्व, रज और तम--इन तीनों गुणोंमें न्यूनाधिकता रहती है। सृष्टि-रचनाके समय उन गुणों और कर्मोंके अनुसार भगवान् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र--इन चारों वर्णोंकी रचना करते हैं । मनुष्यके सिवाय देव, पितर, तिर्यक् आदि दूसरी योनियोंकी रचना भी भगवान् गुणों और कर्मोंके अनुसार ही करते हैं। इसमें भगवान्की किञ्चिन्मात्र भी विषमता नहीं है।'चातुर्वर्ण्यम्' पद प्राणिमात्रका उपलक्षण है। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य ही चार प्रकारके नहीं होते, अपितु पशु, पक्षी, वृक्ष आदि भी चार प्रकारके होते हैं; जैसे--पक्षियोंमें कबूतर आदि ब्राह्मण, बाज आदि क्षत्रिय, चील आदि वैश्य और कौआ आदि शूद्र पक्षी हैं। इसी प्रकार वृक्षोंमें पीपल आदि ब्राह्मण, नीम आदि क्षत्रिय, इमली आदि वैश्य और बबूल (कीकर) आदि शूद्र वृक्ष हैं। परन्तु यहाँ 'चातुर्वर्ण्यम्' पदसे मनुष्योंको ही लेना चाहिये; क्योंकि वर्ण-विभागको मनुष्य ही समझ सकते हैं और उसके अनुसार कर्म कर सकते हैं। कर्म करनेका अधिकार मनुष्यको ही है। चारों वर्णोंकी रचना मैंने ही की है--इससे भगवान्का यह भाव भी है कि एक तो ये मेरे ही अंश हैं; और दूसरे, मैं प्राणिमात्रका सुहृद् हूँ, इसलिये मैं सदा उनके हितको ही देखता हूँ। इसके विपरीत ये न तो देवताके अंश हैं और न देवता सबसे सुहृद् ही हैं। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह अपने वर्णके अनुसार समस्त कर्तव्य-कर्मोंसे मेरा ही पूजन करे (गीता 18। 46)।

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Sri Harikrishnadas Goenka

जिन कर्मोंका तू मुझे कर्ता मानता है वास्तवमें मैं उनका अकर्ता ही हूँ क्योंकि मुझमें अहंकारका अभाव है इसलिये वे कर्म देहादिकी उत्पत्तिके कारण बनकर मुझे लिप्त नहीं करते और उन कर्मोंके फलमें मेरी लालसा अर्थात् तृष्णा भी नहीं है। जिन संसारी मनुष्योंका कर्मोंमें मैं कर्ता हूँ ऐसा अभिमान रहता है एवं जिनकी उन कर्मोंमें और उनके फलोमें लालसा रहती है उनको कर्म लिप्त करते हैं यह ठीक है परंतु उन दोनोंका अभाव होनेके कारण वे ( कर्म ) मुझे लिप्त नहीं कर सकते। इस प्रकार जो कोई दूसरा भी मुझे आत्मरूपसे जान लेता है कि मैं कर्मोंका कर्ता नहीं हूँ मेरी कर्मफलमें स्पृहा भी नहीं है वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता अर्थात् उसके भी कर्म देहादिके उत्पादक नहीं होते।

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Sri Anandgiri

ईश्वरस्य कर्तृत्वभोक्तृत्वयोर्वस्तुतोऽभावे कर्मतत्फलसंबन्धवैधुर्यं फलतीत्याह येषां त्विति। कर्मतत्फलसंस्पर्शशून्यमीश्वरं पश्यतो दर्शनानुरूपं फलं दर्शयति न मामिति। तानि कर्माणीति येषां कर्मणामहं कर्ता तवाभिमतस्तानीति यावत्। देहेन्द्रियाद्यारम्भकत्वेन तेषां कर्मणामीश्वरे संस्पर्शाभावे तस्य तत्कारणावस्थायामहंकाराभावं हेतुं करोति अहंकाराभावादिति। कर्मफलतृष्णाभावाच्चेश्वरं कर्माणि न लिम्पन्तीत्याह नचेति। उक्तमेव प्रपञ्चयति येषां त्विति। तदभावात्कर्मस्वहं कर्तेत्यभिमानस्य तत्फलेषु स्पृहायाश्चाभावादित्यर्थः। ईश्वरस्य कर्मनिर्लेपेऽपि क्षेत्रज्ञस्य किमायातमित्याशङ्क्योत्तरार्धं व्याचष्टे इत्येवमिति। अभिज्ञानप्रकारमभिनयति नाहमिति। ज्ञानफलं कथयति स कर्मभिरिति। कर्मासंबन्धं विदुषि विशदयति तस्यापीति।

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Sri Dhanpati

अतएवाहंकाराभावात्तानि कर्माणि मां न लिम्पन्ति देहाद्यारम्भकत्वेन न निबन्धन्ति। आसक्तं न कुर्वन्तीत्यर्थस्तु न मे कर्मफले स्पृहेत्यनेन पौनरुक्त्यमभिप्रेत्याचार्यैर्न दर्शितः। मे मम कर्मफले स्पृहा तृष्णा आसक्तिर्नास्ति। अतोऽपि मां कर्माणि न लिम्पन्तीत्येतत्। यत्तु ननु कर्तुरपि कथमकर्तृत्वमत आह न मामिति। कर्मलेपोऽपि कुतो नास्तीत्यत आह न मे इति। यः कर्तृत्वाभिमानी स लिप्यते। यस्तु फलेच्छुः स एवात्मनः कर्तृत्वं मन्यत इति। फलेच्छाभावादकर्ताऽकर्तृत्वाच्च न लिप्यत इति तच्चिन्त्यम्। कर्तृत्वाभिनिवेशस्य फलासक्तेश्च बन्धकतयोक्तत्वेनात्रान्यथावर्णनस्या नौचित्यात्। फलेच्छारहितस्य मुमुक्षोस्तावतैवाकर्तृत्वापत्त्या। निर्लेपत्वेन जन्माभावप्रसङ्गाश्च। मां कर्माणि न लिम्पन्तीति क वक्तव्यम्। इति मां य आत्मत्वेनाभिजानाति परात्माभिन्नस्य मे कर्तृत्वं कर्मफले स्पृहा च नास्तीति स कर्मभिर्न निबध्यते। देहादि संबन्धं प्राप्य न संसरतीत्यर्थः। यत्तु मम निर्लेपत्वे कारणं निरहंकारत्वनिस्पृहत्वादिकं जानतस्तस्याप्यहंकारशैथित्यादिति तच्चिन्त्यम्। ईश्वराभेदसाक्षात्कारं विना कर्तृत्वादेर्मूलोच्छेदाभावेनोक्तज्ञानवतो मोक्षासंभवात्। अन्यथा मूर्खाणामप्येतावज्ज्ञानवतां कर्मप्रयुक्तबन्धनाभावप्रसङ्गात्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
nanot
māmme
karmāṇiactivities
limpantitaint
nanor
memy
karmaphale
spṛihādesire
itithus
māmme
yaḥwho
abhijānātiknows
karmabhiḥresult of action
nanever
saḥthat person
badhyateis bound
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 4.13
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्

मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। उस-(सृष्टि-रचना आदि-) का कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय रमेश्वरको तू अकर्ता जान। कारण कि कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है, वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.15
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्

पूर्वकालके मुमुक्षुओंने भी इस प्रकार जानकर कर्म किये हैं, इसलिये तू भी पूर्वजोंके द्वारा सदासे किये जानेवाले कर्मोंको ही (उन्हींकी तरह) कर। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 14
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 14
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते

मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। उस-(सृष्टि-रचना आदि-) का कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय परमेश्वरको तू अकर्ता जान। कारण कि कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है, वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 14 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 14 का हिंदी अर्थ: "मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। उस-(सृष्टि-रचना आदि-) का कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय परमेश्वरको तू अकर्ता जान। कारण कि कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है, वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 14?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 14 translates to: "Actions do not taint Me, nor do I have a desire for the fruit of actions. He who knows Me thus is not bound by actions. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 14 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। उस-(सृष्टि-रचना आदि-) का कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय परमेश्वरको तू अकर्ता जान। कारण कि कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है, वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता। — Van Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "na māṁ karmāṇi limpanti na me karma-phale spṛihā" mean in English?

"na māṁ karmāṇi limpanti na me karma-phale spṛihā" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 14. Actions do not taint Me, nor do I have a desire for the fruit of actions. He who knows Me thus is not bound by actions. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.