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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 17
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः

कर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्मकी गति गहन है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

உண்மையாகவே, புனித நூல்களால் கட்டளையிடப்பட்ட செயலின் உண்மையான தன்மையும், தடைசெய்யப்பட்ட அல்லது சட்டத்திற்குப் புறம்பான செயல் மற்றும் செயலற்ற தன்மையும் அறியப்பட வேண்டும்; செயலின் தன்மை புரிந்து கொள்ள கடினமாக உள்ளது.

KannadaIND

ನಿಜವಾಗಿ, ಧರ್ಮಗ್ರಂಥಗಳು ವಿಧಿಸಿರುವ ಕ್ರಿಯೆಯ ನೈಜ ಸ್ವರೂಪವನ್ನು ತಿಳಿಯಬೇಕು, ಹಾಗೆಯೇ ನಿಷೇಧಿತ ಅಥವಾ ಕಾನೂನುಬಾಹಿರ ಕ್ರಿಯೆ ಮತ್ತು ನಿಷ್ಕ್ರಿಯತೆಯ ಬಗ್ಗೆ ತಿಳಿದಿರಬೇಕು; ಕ್ರಿಯೆಯ ಸ್ವರೂಪವನ್ನು ಅರ್ಥಮಾಡಿಕೊಳ್ಳುವುದು ಕಷ್ಟ.

MalayalamIND

തീർച്ചയായും, വേദഗ്രന്ഥങ്ങൾ അനുശാസിക്കുന്ന പ്രവർത്തനത്തിൻ്റെ യഥാർത്ഥ സ്വഭാവം, അതുപോലെ നിഷിദ്ധമോ നിയമവിരുദ്ധമോ ആയ പ്രവൃത്തി, നിഷ്‌ക്രിയത്വം എന്നിവ അറിയണം; പ്രവർത്തനത്തിൻ്റെ സ്വഭാവം മനസ്സിലാക്കാൻ പ്രയാസമാണ്.

TeluguIND

నిశ్చయంగా, గ్రంధాలచే సూచించబడిన చర్య యొక్క నిజమైన స్వభావం, అలాగే నిషేధించబడిన లేదా చట్టవిరుద్ధమైన చర్య మరియు నిష్క్రియాత్మకత గురించి తెలుసుకోవాలి; చర్య యొక్క స్వభావం అర్థం చేసుకోవడం కష్టం.

GujaratiIND

ખરેખર, શાસ્ત્રો દ્વારા આજ્ઞા કરાયેલી ક્રિયાની સાચી પ્રકૃતિ તેમજ નિષિદ્ધ અથવા ગેરકાનૂની ક્રિયા અને નિષ્ક્રિયતા વિશે જાણવું જોઈએ; ક્રિયાની પ્રકૃતિ સમજવી મુશ્કેલ છે.

BengaliIND

প্রকৃতপক্ষে, ধর্মগ্রন্থ দ্বারা নির্দেশিত কর্মের প্রকৃত প্রকৃতি এবং সেই সাথে নিষিদ্ধ বা বেআইনী কর্ম এবং নিষ্ক্রিয়তা সম্পর্কে জানা উচিত; কর্মের প্রকৃতি বোঝা কঠিন।

MarathiIND

कारण, धर्मग्रंथांनी सांगितलेल्या कृतीचे खरे स्वरूप तसेच निषिद्ध किंवा बेकायदेशीर कृती आणि निष्क्रियतेचे खरे स्वरूप जाणून घेतले पाहिजे; कृतीचे स्वरूप समजणे कठीण आहे.

SindhiIND

ڇو ته حقيقت ۾، صحيفن پاران حڪم ڪيل عمل جي حقيقي نوعيت کي ڄاڻڻ گهرجي، انهي سان گڏ حرام يا غير قانوني عمل جي، ۽ غير عمل جي؛ عمل جي فطرت کي سمجهڻ ڏکيو آهي.

NepaliIND

निस्सन्देह, शास्त्रहरूले आज्ञा गरेको कार्यको वास्तविक प्रकृति जान्नु पर्छ, साथै निषेधित वा गैरकानूनी कार्य, र निष्क्रियताको बारेमा; कार्यको प्रकृति बुझ्न गाह्रो छ।

PunjabiIND

ਸੱਚਮੁੱਚ, ਧਰਮ-ਗ੍ਰੰਥਾਂ ਦੁਆਰਾ ਨਿਸ਼ਚਿਤ ਕੀਤੀ ਗਈ ਕਾਰਵਾਈ ਦੀ ਅਸਲ ਪ੍ਰਕਿਰਤੀ ਨੂੰ ਜਾਣਿਆ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਨਾਲ ਹੀ ਵਰਜਿਤ ਜਾਂ ਗੈਰ-ਕਾਨੂੰਨੀ ਕਾਰਵਾਈ, ਅਤੇ ਅਕਿਰਿਆਸ਼ੀਲਤਾ ਦਾ; ਕਾਰਵਾਈ ਦੀ ਪ੍ਰਕਿਰਤੀ ਨੂੰ ਸਮਝਣਾ ਔਖਾ ਹੈ।

MizoIND

Tih tak zetin, Pathian Lehkha Thuin a tih thiltih awmzia dik tak chu hriat tur a ni a, chutiang bawkin thiltih khap emaw, dan bawhchhia emaw, leh thiltih lohna te pawh hriat tur a ni thiltih awmzia hi hriatthiam a har hle.

MaithiliIND

कारण, तत्त्वतः शास्त्र द्वारा आज्ञापित कर्मक यथार्थ स्वरूप ज्ञात हेबाक चाही, संगहि निषिद्ध वा अवैध कर्म आ अकर्मक सेहो; कर्मक प्रकृति बुझब कठिन अछि।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

4.17।। व्याख्या--'कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यम्'-- कर्म करते हुए निर्लिप्त रहना ही कर्मके तत्त्वको जानना है, जिसका वर्णन आगे अठारहवें श्लोकमें 'कर्मण्यकर्म यः पश्येत्' पदोंसे किया गया है।कर्म स्वरूपसे एक दीखनेपर भी अन्तःकरणके भावके अनुसार उसके तीन भेद हो जाते हैं--कर्म, अकर्म और विकर्म। सकामभावसे की गयी शास्त्रविहित क्रिया 'कर्म' बन जाती है। फलेच्छा, ममता और आसक्तिसे रहित होकर केवल दूसरोंके हितके लिये किया गया कर्म 'अकर्म' बन जाता है। विहित कर्म भी यदि दूसरेका हित करने अथवा उसे दुःख पहुँचानेके भावसे किया गया हो तो वह भी 'विकर्म' बन जाता है। निषिद्ध कर्म तो 'विकर्म' है ही।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तुझे यह नहीं समझना चाहिये कि केवल देहादिकी चेष्टाका नाम कर्म है और उसे न करके चुपचाप बैठ रहनेका नाम अकर्म है उसमें जाननेकी बात ही क्या है यह तो लोकमें प्रसिद्ध ही है। क्यों ( ऐसा नहीं समझना चाहिये ) इस पर कहते हैं कर्मकाशास्त्रविहित क्रियाका भी ( रहस्य ) जानना चाहिये विकर्मकाशास्त्रवर्जित कर्मका भी ( रहस्य ) जानना चाहिये और अकर्मका अर्थात् चुपचाप बैठ रहनेका भी ( रहस्य ) समझना चाहिये। क्योंकि कर्मोंकी अर्थात् कर्म अकर्म और विकर्मकी गति उनका यथार्थ स्वरूप तत्त्व बड़ा गहन है समझनेमें बड़ा ही कठिन है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

तत्र हेत्वाकाङ्क्षापूर्वकमनन्तरं श्लोकमवतारयति कस्मादिति। त्रिष्वपि कर्माकर्मविकर्मसु बोद्धव्यमस्तीति यस्मादध्याहारस्तस्मान्मदीयं प्रवचनमर्थवदिति योजना। बोद्धव्यसद्भावे हेतुमाह यस्मादिति। त्रितयं प्रकृत्यान्यतमस्य गहनत्ववचनमयुक्तमित्याशङ्क्यान्यतमग्रहणस्योपलक्षणार्थत्वमुपेत्य विवक्षितमर्थमाह कर्मादीनामिति।

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Scripture Scholar

Sri Dhanpati

ननु देहादिव्यापारः कर्माकरणं तूष्णीमासनमिति लोकप्रसिद्य्धैव ज्ञातुं शक्यमिति तत्राह कर्मण इति। हि यस्मात्कर्मणः शास्त्रविहितस्यापि तत्त्वं बोद्धव्यं ज्ञातव्यमस्ति। विकर्मणश्च प्रतिषिद्धस्य तत्त्वं बोद्धव्यमस्ति। अकर्मणश्च तूष्णींभावस्य तत्त्वं बोद्धव्यमस्ति। सर्वत्र तत्त्वमस्तीति पदाध्याहारः। भाष्ये त्वस्तीत्यस्याध्याहारकथनमुपलक्षणमित्यविरोधः। यस्माद्गहना कर्मण इत्युपलक्षणार्थम्। कर्माकर्मविकर्मणां गतिस्तत्त्वं याथात्म्यमित्यर्थः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
karmaṇaḥrecommended action
hicertainly
apialso
boddhavyamshould be known
boddhavyammust understand
chaand
vikarmaṇaḥforbidden action
akarmaṇaḥinaction
chaand
boddhavyammust understand
gahanāprofound
karmaṇaḥof action
gatiḥthe true path
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 4.16
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्

कर्म क्या है और अकर्म क्या है -- इस प्रकार इस विषयमें विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं। अतः वह कर्म-तत्त्व मैं तुम्हें भलीभाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ- (संसार-बन्धन-) से मुक्त हो जायगा। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.18
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्

जो मनुष्य कर्ममें अकर्म देखता है और जो अकर्ममें कर्म देखता है, वह मनुष्योंमें बुद्धिमान् है, योगी है और सम्पूर्ण कर्मोंको करनेवाला है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 17
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 17
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः

कर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्मकी गति गहन है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 17 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 17 का हिंदी अर्थ: "कर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्मकी गति गहन है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 17?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 17 translates to: "For verily, the true nature of action enjoined by the scriptures should be known, as well as that of forbidden or unlawful action, and of inaction; the nature of action is hard to understand. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 17 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। कर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्मकी गति गहन है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "karmaṇo hyapi boddhavyaṁ boddhavyaṁ cha vikarmaṇaḥ" mean in English?

"karmaṇo hyapi boddhavyaṁ boddhavyaṁ cha vikarmaṇaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 17. For verily, the true nature of action enjoined by the scriptures should be known, as well as that of forbidden or unlawful action, and of inaction; the nature of action is hard to understand. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.