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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 11
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः

हे पृथानन्दन ! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुकरण करते हैं। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

மனிதர்கள் என்னை அணுகும் விதத்தில், நான் அவர்களுக்கு வெகுமதி அளிக்கிறேன்; என் பாதையை மனிதர்கள் எல்லா வழிகளிலும் செல்கிறார்கள், அர்ஜுனா.

BengaliIND

লোকেরা যেভাবে আমার কাছে আসে, আমি তাদের পুরস্কৃত করি; হে অর্জুন, আমার পথ মানুষ সব পথে চলে।

MalayalamIND

മനുഷ്യർ ഏതു വിധത്തിൽ എന്നെ സമീപിക്കുന്നുവോ, അതുപോലെ ഞാൻ അവർക്കു പ്രതിഫലം നൽകുന്നു. ഹേ അർജുനാ, എൻ്റെ പാത മനുഷ്യർ എല്ലാ വഴികളിലും ചവിട്ടുന്നു.

PunjabiIND

ਜਿਸ ਤਰੀਕੇ ਨਾਲ ਲੋਕ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਆਉਂਦੇ ਹਨ, ਮੈਂ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਇਨਾਮ ਦਿੰਦਾ ਹਾਂ; ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਮੇਰੇ ਮਾਰਗ ਆਦਮੀ ਸਾਰੇ ਤਰੀਕਿਆਂ ਨਾਲ ਚੱਲਦੇ ਹਨ।

GujaratiIND

જે રીતે માણસો મારી પાસે આવે છે, તેમ હું તેમને બદલો આપું છું; હે અર્જુન, મારા માર્ગે માણસો બધી રીતે ચાલે છે.

TeluguIND

మనుష్యులు నన్ను ఏ విధంగా సమీపించినా, నేను వారికి ప్రతిఫలమిస్తాను; నా మార్గాన్ని మనుష్యులు అన్ని విధాలుగా నడపగలరు, ఓ అర్జునా.

MarathiIND

लोक ज्या मार्गाने माझ्याकडे येतात, त्याच प्रकारे मी त्यांना प्रतिफळ देतो. हे अर्जुना, माझ्या मार्गाने लोक सर्व मार्गांनी चालतात.

KannadaIND

ಯಾವ ರೀತಿಯಲ್ಲಿ ಮನುಷ್ಯರು ನನ್ನನ್ನು ಸಮೀಪಿಸುತ್ತಾರೋ, ಹಾಗೆಯೇ ನಾನು ಅವರಿಗೆ ಪ್ರತಿಫಲವನ್ನು ನೀಡುತ್ತೇನೆ; ಓ ಅರ್ಜುನಾ, ನನ್ನ ಮಾರ್ಗವನ್ನು ಮನುಷ್ಯರು ಎಲ್ಲಾ ರೀತಿಯಲ್ಲೂ ನಡೆಸುತ್ತಾರೆ.

NepaliIND

जसरी मानिसहरू मसँग नजिक छन्, म तिनीहरूलाई इनाम दिन्छु। हे अर्जुन, मेरो मार्गमा मानिसहरू सबै तरिकाले हिँड्छन्।

SindhiIND

جنهن به طريقي سان ماڻهو مون وٽ ايندا آهن، تيئن ئي آئون انهن کي انعام ڏيان ٿو. اي ارجن، منهنجو رستو ماڻهو هر طرح سان هلن ٿا.

MaithiliIND

मनुष्य हमरा लग जे कोनो तरहेँ पहुँचैत अछि, तहिना हम ओकरा पुरस्कृत करैत छी। हमर मार्ग मनुष्य सब तरहे चलैत अछि हे अर्जुन।

AssameseIND

মানুহে মোৰ ওচৰলৈ যি ধৰণেৰে কাষ চাপিছে, মইও তেওঁলোকক পুৰস্কৃত কৰিম; মোৰ পথত পুৰুষে ভৰি দিয়ে সকলো দিশতে হে অৰ্জুন।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

4.11।। व्याख्या--'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्'--भक्त भगवान्की जिस भावसे, जिस सम्बन्धसे, जिस प्रकारसे शरण लेता है, भगवान् भी उसे उसी भावसे, उसी सम्बन्धसे, उसी प्रकारसे आश्रय देते हैं। जैसे, भक्त भगवान्को अपना गुरु मानता है तो वे श्रेष्ठ गुरु बन जाते हैं, शिष्य मानता है तो वे श्रेष्ठ शिष्य बन जाते हैं, माता-पिता मानता है तो वे श्रेष्ठ माता-पिता बन जाते हैं, पुत्र मानता है तो वे श्रेष्ठ पुत्र बन जाते हैं, भाई मानता है तो वे श्रेष्ठ भाई बन जाते हैं, सखा मानता है तो वे श्रेष्ठ सखा बन जाते हैं, नौकर मानता है तो वे श्रेष्ठ नौकर बन जाते हैं। भक्त भगवान्के बिना व्याकुल हो जाता है तो भगवान् भी भक्तके बिना व्याकुल हो जाते हैं।अर्जुनका भगवान् श्रीकृष्णके प्रति सखाभाव था तथा वे उन्हें अपना सारथि बनाना चाहते थे; अतः भगवान् सखाभावसे उनके सारथि बन गये। विश्वामित्र ऋषिने भगवान् श्रीरामको अपना शिष्य मान लिया तो भगवान् उनके शिष्य बन गये। इस प्रकार भक्तोंके श्रद्धाभावके अनुसार भगवान्का वैसा ही बननेका स्वभाव है।अनन्त ब्रह्माण्डोंके स्वामी भगवान् भी अपने ही बनाये हुए साधारण मनुष्योंके भावोंके अनुसार बर्ताव करते हैं, यह उनकी कितनी विलक्षण उदारता, दयालुता और अपनापन है? भगवान् विशेषरूपसे भक्तोंके लिये ही अवतार लेते हैं--ऐसा प्रस्तुत प्रकरणसे सिद्ध होता है। भक्तलोग जिस भावसे, जिस रूपमें भगवान्की सेवा करना चाहते हैं ,भगवान्को उनके लिये उसी रूपमें आना पड़ता है। जैसे, उपनिषद्में आया है--'एकाकी न रमते' (बृहदारण्यक0 1। 4। 3)--अकेले भगवान्का मन नहीं लगा, तो वे ही भगवान् अनेक रूपोंमें प्रकट होकर खेल खेलने लगे। ऐसे ही जब भक्तोंके मनमें भगवान्के साथ खेल खेलनेकी इच्छा हो जाती है, तब भगवान् उनके साथ खेल खेलने-(लीला करने-) के लिये प्रकट हो जाते हैं। भक्त भगवान्के बिना नहीं रह सकता तो भगवान् भी भक्तके बिना नहीं रह सकते। यहाँ आये ''यथा' और 'तथा'--इन प्रकारवाचक पदोंका अभिप्राय 'सम्बन्ध', 'भाव' और 'लगन' से है। भक्त और भगवान्का प्रकार एक-सा होनेपर भी इनमें एक बहुत बड़ा अन्तर यह है कि भगवान् भक्तकी चालसे नहीं चलते, प्रत्युत अपनी चाल-(शक्ति-) से चलते हैं । भगवान् सर्वत्र विद्यमान, सर्वसमर्थ, सर्वज्ञ, परम सुहृद् और सत्यसंकल्प हैं। भक्तको केवल अपनी पूरी शक्ति लगा देनी है, फिर भगवान् भी अपनी पूरी शक्तिसे उसे प्राप्त हो जाते हैं।भगवत्प्राप्तिमें बाधा साधक स्वयं लगाता है क्योंकि भगवत्प्राप्तिके लिये वह समझ, सामग्री, समय और सामर्थ्यको अपनी मानकर उन्हें पूरा नहीं लगाता, प्रत्युत अपने पास बचाकर रख लेता है। यदि वह उन्हें अपना न मानकर उन्हें पूरा लगा दे तो उसे शीघ्र ही भगवत्प्राप्ति हो जाती है। कारण कि यह समझ, सामग्री आदि उसकी अपनी नहीं हैं; प्रत्युत भगवान्से मिली हैं; भगवान्की हैं। अतः इन्हें अपनी मानना ही बाधा है। साधक स्वयं भी भगवान्का ही अंश है। उसने खुद अपनेको भगवान्से अलग माना है, भगवान्ने नहीं। भक्ति (प्रेम) कर्मजन्य अर्थात् किसी साधन-विशेषका फल नहीं है। भगवान्के सर्वथा शरण होनेवालेको भक्ति स्वतः प्राप्त होती है। दास्य, सख्य, वात्सल्य, माधुर्य आदि भावोंमें सबसे श्रेष्ठ शरणागतिका भाव है। यहाँ भगवान् मानो इस बातको कह रहे हैं कि तुम अपना सब कुछ मुझे दे दोगे तो मैं भी अपना सब कुछ तुम्हें दे दूँगा और तुम अपने-आपको मुझे दे दोगे तो मैं भी अपने-आपको तुम्हें दे दूँगा। भगवत्प्राप्तिका कितना सरल और सस्ता सौदा हैअपने-आपको भगवच्चरणोंमें समर्पित करनेके बाद भगवान् भक्तकी पुरानी त्रुटियोंको यादतक नहीं करते। वे तो वर्तमानमें साधकके हृदयका दृढ़ भाव देखते हैं--रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की।।(मानस 1। 29। 3)इस (ग्यारहवें) श्लोकमें द्वैत-अद्वैत, सगुण-निर्गुण, सायुज्य-सामीप्य आदि शास्त्रीय विषयका वर्णन नहीं है, प्रत्युत भगवान्से अपनेपनका ही वर्णन है। जैसे, नवें श्लोकमें भगवान्के जन्म-कर्मकी दिव्यताको जाननेसे भगवत्प्राप्ति होनेका वर्णन है। 'केवल भगवान् ही मेरे हैं और मैं भगवान्का ही हूँ; दूसरा कोई भी मेरा नहीं है और मैं किसीका भी नहीं हूँ'-- इस प्रकार भगवान्में अपनापन करनेसे उनकी प्राप्ति शीघ्र एवं सुगमतासेहो जाती है। अतः साधकको केवल भगवान्में ही अपनापन मान लेना चाहिये (जो वास्तवमें है), चाहे समझमें आये अथवा न आये। मान लेनेपर जब संसारके झूठे सम्बन्ध भी सच्चे प्रतीत होने लगते हैं, फिर जो भगवान्का सदासे ही सच्चा सम्बन्ध है, वह अनुभवमें क्यों नहीं आयेगा? अर्थात् अवश्य आयेगा। शङ्का--जो भगवान्को जिस भावसे स्वीकार करते हैं, भगवान् भी उनसे उसी भावसे बर्ताव करते हैं, तो फिर यदि कोई भगवान्को द्वैष, वैर आदिके भावसे स्वीकार करेगा तो क्या भगवान् भी उससे उसी (द्वेष आदिके) भावसे बर्ताव करेंगे?

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Sri Harikrishnadas Goenka

तब क्या आपमें रागद्वेष हैं जिससे कि आप किसीकिसीको ही आत्मभाव प्रदान करते हैं सबको नहीं करते इसपर कहते हैं जो भक्त जिस प्रकारसे जिस प्रयोजनसे जिस फलप्राप्तिकी इच्छासे मुझे भजते हैं उनको मैं उसी प्रकार भजता हूँ अर्थात् उनकी कामनाके अनुसार ही फल देकर मैं उनपर अनुग्रह करता हूँ क्योंकि उन्हेंमोक्षकी इच्छा नहीं होती। एक ही पुरुषमें मुमुक्षुत्व और फलार्थित्व ( फलकी इच्छा करना ) यह दोनों एक साथ नहीं हो सकते। इसलिये जो फलकी इच्छावाले हैं उन्हें फल देकर जो फलको न चाहते हुए शास्त्रोक्त प्रकारसे कर्म करनेवाले और मुमुक्षु हैं उनको ज्ञान देकर जो ज्ञानी संन्यासी और मुमुक्षु हैं उन्हें मोक्ष देकर तथा आर्तोंका दुःख दूर करके इस प्रकार जो जिस तरहसे मुझे भजते हैं उनको मैं भी वैसे ही भजता हूँ। रागद्वेषके कारण यह मोहके कारण तो मैं किसीको भी नहीं भजता। हे पार्थ मनुष्य सब तरहसे बर्तते हुए भी सर्वत्र स्थित मुझ ईश्वरके ही मार्गका सब प्रकारसे अनुसरण करते हैं जो जिस फलकी इच्छासे जिस कर्मके अधिकारी बने हुए ( उस कर्मके अनुरूप ) प्रयत्न करते हैं वे ही मनुष्य कहे जाते हैं।

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Sri Anandgiri

ईश्वरः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो मोक्षं प्रयच्छति चेत्प्रागुक्तविशेषणवैयर्थ्यं यदि तु केभ्यश्चिदेव मोक्षं प्रयच्छेत्तर्हि तस्य रागादिमत्त्वादनीश्वरत्वापत्तिरिति शङ्कते तव तर्हीति। ये मुमुक्षवस्तेभ्यो मोक्षमीश्वरो ज्ञानसंपादनद्वारा प्रयच्छति फलान्तरार्थिभ्यस्तु तत्तदुपायानुष्ठानेन तत्तदेव ददातीति नास्य रागद्वेषाविति परिहरति उच्यत इति। मुमुक्षूणामीश्वरानुसारित्वेऽपि फलान्तरार्थिनां कुतस्तदनुसारित्वमित्याशङ्क्यफलमत उपपत्ते रिति न्यायेन तत्फलस्येश्वरायत्तत्वात्तदनुवर्तित्वमावश्यकमित्याह ममेति। भगवद्वचनभागिनां सर्वेषामेव कैवल्यमेकरूपं किमिति नानुगृह्यते तत्राह तेषामिति। अभ्युदयनिःश्रेयसार्थित्वं प्रार्थनावैचित्र्यादेकस्यैव किं न स्यादित्याशङ्क्य पर्यायेण तदनुपपत्तिं साधयति नहीति। मुमुक्षूणां फलार्थिनां च विभागे स्थिते सत्यनुग्रहविभागं फलितमाह अत इति। फलप्रदानेनानुगृह्णामीति संबन्धः। नित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठायिनामेव फलार्थित्वाभावे सति मुमुक्षुत्वे कथं तेष्वनुग्रहः स्यादिति तत्राह ये यथोक्तेति। ज्ञानप्रदानेन भजामीत्युत्तरत्र संबन्धः। सन्ति केचित्त्यक्तसर्वकर्माणो ज्ञानिनो मोक्षमेवापेक्ष्यमाणास्तेष्वनुग्रहप्रकारं प्रकटयति ये ज्ञानिन इति। केचिदार्ताः सन्तो ज्ञानादिसाधनान्तररहिता भगवन्तमेवार्तिमपहर्तुमनुवर्तन्ते तेषु भगवतोऽनुग्रहविशेषं दर्शयति तथेति। पूर्वार्धव्याख्यानमुपसंहरति इत्येवमिति। भगवतोऽनुग्रहे निमित्तान्तरं निवारयति न पुनरिति। फलार्थित्वे मुमुक्षुत्वे च जन्तूनां भगवदनुसरणमावश्यकमित्युत्तरार्धं विभजते सर्वथापीति। सर्वावस्थत्वं तेन तेनात्मना परस्यैवेश्वरस्यावस्थानं मार्गो ज्ञानकर्मलक्षणः। मनुष्यग्रहणादितरेषामीश्वरमार्गानुवर्तित्वपर्युदासः स्यादित्याशङ्क्याह यत्फलेति। सर्वप्रकारैर्मम मार्गमनुवर्तन्त इति पूर्वेण संबन्धः।

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Sri Dhanpati

एवं स्वस्मिन्प्रसक्तौ रागद्वेषौ वारयति य इति। ये यथा येन प्रकारेण यदर्थं मोक्षाथमर्थार्थमार्तिनिवृत्त्यर्थं ज्ञानार्थं च मां प्रपद्यन्ते भजन्ति तांस्तथैव तत्तत्फलप्रदानेनाहं समस्तफलप्रदाता परमेश्वरो भजाम्यनुगृह्णामि। ये मनुष्याः यत्फलार्थितया यस्मिन्कर्मण्यधिकृता इन्द्रादिदेवतान्तरं यजन्ते सर्वशः सर्वप्रकारेण प्रवृत्तास्ते ममैव सर्वात्मनस्तत्कर्मात्मकं वर्त्म मार्गभनुवर्तन्ते। येतु ये मनुष्याः मां सर्वशरीरस्थं यथा येन प्रकारेण शत्रुत्वेन मित्रत्वेन वा प्रपद्यन्ते प्राप्नुवन्ति तांस्तेनैव प्रकारेणाहमपि भजाम्यनुसरामि। येतु मम वर्त्म भक्तिध्यानप्रणिधानात्मकं अनुवर्तन्ते तान्ममात्मभूतान् तथैव सर्वशः सर्वप्रकारैः अनुवर्तेऽहमिति वर्णयन्ति तैस्त्वर्थान्तरं वर्णनीयमिति व्यग्रचित्तैः मामुपाश्रिताः यजन्त इति पूर्वोत्तरग्रन्थानुसारी प्रपद्यन्ते भजामीत्यनयोर्यथाश्रुतार्थः परित्यक्तः। एतेन ममेत्यादिक्लिष्टकल्पनापि प्रत्युक्ता। इतरमनुष्या अपि मम वर्त्मानुवर्तन्ते त्वया तु मत्संबन्धिनापि मदनुर्वतनं न क्रियत इत्यत्याश्चर्यमिति द्योतयन्नाह पार्थेति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yewho
yathāin whatever way
māmunto me
prapadyantesurrender
tānthem
tathāso
evacertainly
bhajāmireciprocate
ahamI
mamamy
vartmapath
anuvartantefollow
manuṣhyāḥmen
pārthaArjun, the son of Pritha
sarvaśhaḥin all respects
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 4.10
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः

राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित, मेरेमें ही तल्लीन, मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तपसे पवित्र हुए बहुत-से भक्त मेरे भाव- (स्वरूप-) को प्राप्त हो चुके हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.12
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः। क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा

कर्मोंकी सिद्धि (फल) चाहनेवाले मनुष्य देवताओंकी उपासना किया करते हैं; क्योंकि इस मनुष्यलोकमें कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाली सिद्धि जल्दी मिल जाती है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 11
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 11
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः

हे पृथानन्दन ! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुकरण करते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 11 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 11 का हिंदी अर्थ: "हे पृथानन्दन ! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुकरण करते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 11?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 11 translates to: "In whatever way men approach Me, even so do I reward them; My path do men tread in all ways, O Arjuna. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ " — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 11 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। हे पृथानन्दन ! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुकरण करते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "ye yathā māṁ prapadyante tāns tathaiva bhajāmyaham" mean in English?

"ye yathā māṁ prapadyante tāns tathaiva bhajāmyaham" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 11. In whatever way men approach Me, even so do I reward them; My path do men tread in all ways, O Arjuna. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.