Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 12
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः। क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा

कर्मोंकी सिद्धि (फल) चाहनेवाले मनुष्य देवताओंकी उपासना किया करते हैं; क्योंकि इस मनुष्यलोकमें कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाली सिद्धि जल्दी मिल जाती है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

இவ்வுலகில் செயல் வெற்றிக்காக ஏங்குபவர்கள் தெய்வங்களுக்குப் பலியிடுகிறார்கள்; ஏனெனில், செயலின் மூலம் வெற்றியை மனிதர்கள் விரைவில் அடைகிறார்கள்.

TeluguIND

ఈ లోకంలో కార్యసాధనలో విజయం కోసం కాంక్షించే వారు దేవతలకు త్యాగం చేస్తారు; ఎందుకంటే చర్య ద్వారా పురుషులు త్వరగా విజయం సాధిస్తారు.

NepaliIND

यस संसारमा कर्ममा सफलताको चाहनेहरू देवताहरूलाई बलि चढाउँछन्। किनकी पुरुषले कर्मद्वारा सफलता चाँडै प्राप्त गर्छ।

SindhiIND

جيڪي هن دنيا ۾ عمل ۾ ڪاميابيءَ جي تمنا رکن ٿا، سي ديوتائن کي قربان ڪن ٿا. ڇاڪاڻ ته ڪاميابي انسانن جي عمل ذريعي جلدي حاصل ڪري ٿي.

MaithiliIND

जे लोक एहि संसार मे कर्म मे सफलताक लेल तरसैत छथि, ओ देवता केँ बलि दैत छथि; कारण सफलता मनुष्य केँ कर्म सँ जल्दी भेटैत छैक |

BengaliIND

যারা এই পৃথিবীতে কর্মে সাফল্য কামনা করে তারা দেবতাদের উদ্দেশ্যে বলিদান করে; কারণ কর্মের মাধ্যমে পুরুষরা দ্রুত সাফল্য অর্জন করে।

GujaratiIND

જેઓ આ જગતમાં કાર્યમાં સફળતાની ઝંખના કરે છે તેઓ દેવતાઓને બલિદાન આપે છે; કારણ કે સફળતા પુરુષો દ્વારા ક્રિયા દ્વારા ઝડપથી પ્રાપ્ત થાય છે.

KannadaIND

ಈ ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಕಾರ್ಯದಲ್ಲಿ ಯಶಸ್ಸನ್ನು ಹಂಬಲಿಸುವವರು ದೇವತೆಗಳಿಗೆ ತ್ಯಾಗ ಮಾಡುತ್ತಾರೆ; ಏಕೆಂದರೆ ಯಶಸ್ಸನ್ನು ಪುರುಷರು ಕ್ರಿಯೆಯ ಮೂಲಕ ತ್ವರಿತವಾಗಿ ಸಾಧಿಸುತ್ತಾರೆ.

PunjabiIND

ਜੋ ਲੋਕ ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ ਕਰਮ ਵਿੱਚ ਸਫ਼ਲਤਾ ਲਈ ਤਰਸਦੇ ਹਨ, ਉਹ ਦੇਵਤਿਆਂ ਨੂੰ ਬਲੀਦਾਨ ਦਿੰਦੇ ਹਨ; ਕਿਉਂਕਿ ਸਫਲਤਾ ਪੁਰਸ਼ਾਂ ਦੁਆਰਾ ਕਿਰਿਆ ਦੁਆਰਾ ਜਲਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ।

MarathiIND

जे लोक या जगात कृतीत यश मिळवू इच्छितात ते देवांना यज्ञ करतात; कारण पुरुषांना कृतीतून यश लवकर मिळते.

MalayalamIND

ഈ ലോകത്തിൽ കർമ്മവിജയം കാംക്ഷിക്കുന്നവർ ദൈവങ്ങൾക്ക് ബലിയർപ്പിക്കുന്നു; എന്തെന്നാൽ, മനുഷ്യൻ പ്രവൃത്തിയിലൂടെ വേഗത്തിൽ വിജയം കൈവരിക്കുന്നു.

OdiaIND

ଯେଉଁମାନେ ଏହି ଜଗତରେ କାର୍ଯ୍ୟରେ ସଫଳତା ପାଇବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, ସେମାନେ ଦେବତାମାନଙ୍କୁ ବଳିଦାନ ଦିଅନ୍ତି; କାରଣ ସଫଳତା ଦ୍ୱାରା ପୁରୁଷମାନେ ଶୀଘ୍ର କାର୍ଯ୍ୟ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଅନ୍ତି |

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

4.12।। व्याख्या--'काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः'--मनुष्यको नवीन कर्म करनेका अधिकार मिला हुआ है। कर्म करनेसे ही सिद्धि होती है--ऐसा प्रत्यक्ष देखनेमें आता है। इस कारण मनुष्यके अन्तःकरणमें यह बात दृढ़तासे बैठी हुई है कि कर्म किये बिना कोई भी वस्तु नहीं मिलती। वे ऐसा समझते हैं कि सांसारिक वस्तुओंकी तरह भगवान्की प्राप्ति भी कर्म (तप, ध्यान, समाधि आदि) करनेसे ही होती है। नाशवान् पदार्थोंकी कामनाओंके कारण उनकी दृष्टि इस वास्तविकताकी ओर जाती ही नहीं कि सांसारिक वस्तुएँ कर्मजन्य हैं, एकदेशीय हैं, हमें नित्य प्राप्त नहीं हैं, हमारेसे अलग हैं और परिवर्तनशील हैं, इसलिये उनकी प्राप्तिके लिये कर्म करने आवश्यक हैं। परन्तु भगवान् कर्मजन्य नहीं हैं, सर्वत्र परिपूर्ण हैं, हमें नित्यप्राप्त हैं, हमारेसे अलग नहीं हैं और अपरिवर्तनशील हैं, इसलिये भगवत्प्राप्तिमें सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्तिका नियम नहीं चल सकता। भगवत्प्राप्ति केवल उत्कट अभिलाषासे होती है। उत्कट अभिलाषा जाग्रत् न होनेमें खास कारण सांसारिक भोगोंकी कामना ही है। भगवान् तो पिताके समान हैं और देवता दूकानदारके समान। अगर दूकानदार वस्तु न दे, तो उसको पैसे लेनेका अधिकार नहीं है; परन्तु पिताको पैसे लेनेका भी अधिकार है और वस्तु देनेका भी। बालकको पितासे कोई वस्तु लेनेके लिये कोई मूल्य नहीं देना पड़ता, पर दूकानदारसे वस्तु लेनेके लिये मूल्य देना पड़ता है। ऐसे ही भगवान्से कुछ लेनेके लिये कोई मूल्य देनेकी जरूरत नहीं है; परन्तु देवताओंसे कुछ प्राप्त करनेके लिये विधिपूर्वक कर्म करने पड़ते हैं। दूकानदारसे बालक दियासलाई, चाकू आदि हानिकारक वस्तुएँ भी पैसे देकर खरीद सकता है; परन्तु यदि वह पितासे ऐसी हानिकारक वस्तुएँ माँगे तो वे उसे नहीं देंगे और पैसे भी ले लेंगे। पिता वही वस्तु देते हैं, जिसमें बालकका हित हो। इसी प्रकार देवतालोग अपने उपासकोंको (उनकी उपासना साङ्गोपाङ्ग होनेपर) उनके हित-अहितका विचार किये बिना उनकी इच्छित वस्तुएँ दे देते हैं; परन्तु परमपिता भगवान् अपने भक्तोंको अपनी इच्छासे वे ही वस्तुएँ देते हैं, जिसमें उनका परमहित हो। ऐसे होनेपर भी नाशवान् पदार्थोंकी आसक्ति, ममता और कामनाके कारण अल्प-बुद्धिवाले मनुष्य भगवान्की महत्ता और सुहृत्ताको नहीं जानते इसलिये वे अज्ञानवश देवताओंकी उपासना करते हैं (गीता 7। 20 23 9। 23 24)। 'क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा'--यह मनुष्यलोक कर्मभूमि है--'कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके' (गीता 15। 2)। इसके सिवाय दूसरे लोक (स्वर्ग-नरकादि) भोगभूमियाँ हैं। मनुष्यलोकमें भी नया कर्म करनेका अधिकार मनुष्यको ही है, पशु-पक्षी आदिको नहीं। मनुष्य-शरीरमें किये हुए कर्मोंका फल ही लोक तथा परलोकमें भोगा जाता है। मनुष्यलोकमें कर्मोंकी आसक्तिवाले मनुष्य रहते हैं--'कर्मसङ्गिषु जायते' (गीता 14। 15)। कर्मोंकी आसक्तिके कारण वे कर्मजन्य सिद्धिपर ही लुब्ध होते हैं। कर्मोंसे जो सिद्धि होती है, वह यद्यपि शीघ्र मिल जाती है, तथापि वह सदा रहनेवाली नहीं होती। जब कर्मोंका आदि और अन्त होता है, तब उनसे होनेवाली सिद्धि (फल) सदा कैसे रह सकती है? इसलिये नाशवान् कर्मोंका फल भी नाशवान् ही होता है। परन्तु कामनावाले मनुष्यकी दृष्टि शीघ्र मिलनेवाले फलपर तो जाती है, पर उसके नाशकी ओर नहीं जाती। विधिपूर्वक साङ्गोपाङ्ग किये गये कर्मोंका फल देवताओंसे शीघ्र मिल जाया करता है; इसलिये वे देवताओंकी ही शरण लेते हैं और उन्हींकी आराधना करते हैं। कर्मजन्य फल चाहनेके कारण वे कर्मबन्धनसे मुक्त नहीं होते और परिणामस्वरूप बारंबार जन्मते-मरते रहते हैं। जो वास्तविक सिद्धि है वह कर्मजन्य नहीं है। वास्तविक सिद्धि 'भगवत्प्राप्ति' है। भगवत्प्राप्तिके साधन--कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग भी कर्मजन्य नहीं हैं। योगकी सिद्धि कर्मोंके द्वारा नहीं होती, प्रत्युत कर्मोंके सम्बन्ध-विच्छेदसे होती है। शङ्का--'कर्मयोग' की सिद्धि तो कर्म करनेसे ही बतायी गयी है--'आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते' (गीता 6। 3), तो फिर कर्मयोग कर्मजन्य कैसे नहीं है?समाधान--कर्मयोगमें कर्मोंसे और कर्म-सामग्रीसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये ही कर्म किये जाते हैं। योग (परमात्माका नित्य-सम्बन्ध) तो स्वतःसिद्ध और स्वाभाविक है। अतः योग अथवा परमात्मप्राप्ति कर्मजन्य नहीं है। वास्तवमें कर्म सत्य नहीं है, प्रत्युत परमात्मप्राप्तिके साधनरूप कर्मोंका विधान सत्य है। कोई भी कर्म जब सत्के लिये किया जाता है, तब उसका परिणाम सत् होनेसे उस कर्मका नाम भी सत् हो जाता है--'कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते' (गीता 17। 27)। अपने लिये कर्म करनेसे ही 'योग'-(परमात्माके साथ नित्ययोग-) का अनुभव नहीं होता। कर्मयोगमें दूसरोंके लिये ही सब कर्म किये जाते हैं, अपने लिये अर्थात् फल-प्राप्तिके लिये नहीं--'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'(गीता 2। 47)। अपने लिये कर्म करनेसे मनुष्य बँधता है (गीता 3। 9) और दूसरोंके लिये कर्म करनेसे वह मुक्त होता है (गीता 4। 23)। कर्मयोगमें दूसरोंके लिये ही सब कर्म करनेसे कर्म और फलसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, जो 'योग' का अनुभव करानेमें हेतु है।कर्म करनेमें 'पर' अर्थात् शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ, व्यक्ति, देश, काल आदि परिवर्तनशीलवस्तुओंकी सहायता लेनी पड़ती है। 'पर' की सहायता लेना परतन्त्रता है। स्वरूप ज्यों-का-त्यों है। उसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। इसलिये उसकी अनुभूतिमें 'पर' कहे जानेवाले शरीरादि पदार्थोंके सहयोगकी लेशमात्र भी अपेक्षा, आवश्यकता नहीं है। 'पर' से माने हुए सम्बन्धका त्याग होनेसे स्वरूपमें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध--आठवें श्लोकमें अपने अवतारके उद्देश्यका वर्णन करके नवें श्लोकमें भगवान्ने अपने कर्मोंकी दिव्यताको जाननेका माहात्म्य बताया। कर्मजन्य सिद्धि चाहनेसे ही कर्मोंमें अदिव्यता (मलिनता) आती है। अतः कर्मोंमें दिव्यता (पवित्रता) कैसे आती है--इसे बतानेके लिये अब भगवान् अपने कर्मोंकी दिव्यताका विशेष वर्णन करते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

यदि रागादि दोषोंका अभाव होनेके कारण सभी प्राणियोंपर आप ईश्वरकी दया समान है एवं आप सब फल देनेमें समर्थ भी हैं तो फिर सभी मनुष्य मुमुक्षु होकर यह सारा विश्व वासुदेवरूप है इस प्रकारके ज्ञानसे केवल आपको ही क्यों नहीं भजते इसका कारण सुन कर्मोंकी सिद्धि चाहनेवाले अर्थात् फलप्राप्तिकी कामना करनेवाले मनुष्य इस लोकमें इन्द्र अग्नि आदि देवोंकी पूजा किया करते हैं। श्रुतिमें कहा है कि जो अन्य देवताकी इस भावसे उपासना करता है कि वह ( देवता ) दूसरा है और मैं ( उपासक ) दूसरा हूँ वह कुछ नहीं जानता जैसे पशु होता है वैसे ही वह देवताओंका पशु है। ऐसे उन भिन्नरूपसे देवताओंका पूजन करनेवाले फलेच्छुक मनुष्योंकी इस मनुष्यलोकमें ( कर्मसे उत्पन्न हुई ) सिद्धि शीघ्र ही हो जाती है क्योंकि मनुष्यलोकमें शास्त्रका अधिकार है ( यह विशेषता है )। क्षिप्रं हि मानुषे लोके इस वाक्यमें क्षिप्र विशेषणसे भगवान् अन्य लोकोंमें भी कर्मफलकी सिद्धि दिखलाते हैं। पर मनुष्यलोकमें वर्णआश्रम आदिके कर्मोंका अधिकार है यह विशेषता है। उन वर्णाश्रम आदिमें अधिकार रखनेवालोंके कर्मोंकी कर्मजनित फलसिद्धि शीघ्र होती है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

अनुग्राह्याणां ज्ञानकर्मानुरोधेन भगवता तेष्वनुग्रहविधानात्तस्य रागद्वेषौ यदि न भवतस्तर्हि तस्य रागाद्यभावादेव सर्वेषु प्राणिष्वनुग्रहेच्छा तुल्या प्राप्ता नच तस्यां सत्यामेव फलस्याल्पीयसः संपादने सामर्थ्यं नतु भगवतो महतो मोक्षाख्यस्य फलस्य प्रदानेऽशक्तिरिति युक्तमप्रतिहतज्ञानेच्छाक्रियाशक्तिमतस्तव सर्वफलप्रदानसामर्थ्यात् तथाच यथोक्तानुजिघृक्षायां सत्यां त्वयि च यथोक्तसामर्थ्यवति सति सर्वे फल्गुफलादभ्युदयाद्विमुखा मोक्षमेवापेक्षमाणा ज्ञानेन त्वामेव किमिति न प्रतिपद्येरन्निति चोदयति यदीति। मोक्षापेक्षाभावात्तदुपायभूतज्ञानादपि वैमुख्याद्भगवत्प्राप्त्यभावे हेतुमभिदधानः समाधत्ते शृण्विति। कर्मफलसिद्धिमिच्छता किमिति मानुषे लोके देवतापूजनमिष्यते तत्राह क्षिप्रं हीति। कर्मफलसंपत्त्यर्थिनां यष्टृयष्टव्यविभागदर्शिनां तद्दर्शने कारणमात्मज्ञानमित्यत्र बृहदारण्यकश्रुतिमुदाहरति अथेति। अविद्याप्रकरणोपक्रमार्थमथेत्युक्तम्। उपासनं भेददर्शनमित्यनूद्य कारणमात्माज्ञानं न तत्रेति दर्शयति नेति। यथास्मदादीनां हलवहनादिना पशुरुपकरोत्येवमज्ञो देवादीनां यागादिभिरुपकरोतीत्याह यथेति। किमिति ते फलाकाङ्क्षिणो भिन्नदेवतायाजिनो ज्ञानमार्गं नापेक्षन्ते तत्रोत्तरार्धमुत्तरत्वेन योजयति तेषामित्यादिना। यस्माद्यथोक्तानामधिकारिणां कर्मप्रयुक्तं फलं लोकविशेषे झटिति सिध्यति तस्मात्तेषां मोक्षमार्गादस्ति वैमुख्यमित्यर्थः। मानुषलोकविशेषणं किमर्थमित्याशङ्क्याह मनुष्यलोके हीति। लोकान्तरेषु तर्हि कर्मफलसिद्धिर्नास्तीत्याशङ्क्य क्षिप्रविशेषणस्य तात्पर्यमाह क्षिप्रमिति। क्वचित्कर्मफलसिद्धिरविलम्बेन भवत्यन्यत्र तु विलम्बेनेति विभागे को हेतुरित्याशङ्क्य सामग्रीभावाभावाभ्यामित्याह मानुष इति। मनुष्यलोके कर्मफलसिद्धेः शैघ्र्यात्तदभिमुखानां ज्ञानमार्गवैमुख्यं प्रायिकमित्युपसंहरति तेषामिति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

ननु वासुदेवः सर्वमिति ज्ञानार्थं सर्वे त्वामेव कुतो नानुवर्तन्त इत्याशङ्क्य मम वर्त्मेत्यादिविवृण्वन् तत्र कारणमाह। काङ्क्षन्तः प्रार्थयन्तः इहास्िमँल्लोके इन्द्राग्नयादयः देवता यजन्ते। हि यस्मान्मानुषे लोके काम्यकर्मजा सिद्धिः फलं क्षिप्रं शीघ्रं भवति। क्षिप्रं मानुषे लोके इति विशेषणादन्येष्वपि कर्मफलसिद्धिं दर्शयति भगवान्। मानुषे लोके वर्णाश्रमादिकर्माणीति विशेषः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
kāṅkṣhantaḥdesiring
karmaṇāmmaterial activities
siddhimsuccess
yajanteworship
ihain this world
devatāḥthe celestial gods
kṣhipramquickly
hicertainly
mānuṣhein human society
lokewithin this world
siddhiḥrewarding
bhavatimanifest
karma
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 4.11
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः

हे पृथानन्दन ! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुकरण करते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.13
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्

मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। उस-(सृष्टि-रचना आदि-) का कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय रमेश्वरको तू अकर्ता जान। कारण कि कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है, वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 12
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 12
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः। क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा

कर्मोंकी सिद्धि (फल) चाहनेवाले मनुष्य देवताओंकी उपासना किया करते हैं; क्योंकि इस मनुष्यलोकमें कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाली सिद्धि जल्दी मिल जाती है। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ: "कर्मोंकी सिद्धि (फल) चाहनेवाले मनुष्य देवताओंकी उपासना किया करते हैं; क्योंकि इस मनुष्यलोकमें कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाली सिद्धि जल्दी मिल जाती है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 12?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 12 translates to: "Those who long for success in action in this world sacrifice to the gods; for success is quickly attained by men through action. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः। क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवत" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 12 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। कर्मोंकी सिद्धि (फल) चाहनेवाले मनुष्य देवताओंकी उपासना किया करते हैं; क्योंकि इस मनुष्यलोकमें कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाली सिद्धि जल्दी मिल जाती है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "kāṅkṣhantaḥ karmaṇāṁ siddhiṁ yajanta iha devatāḥ" mean in English?

"kāṅkṣhantaḥ karmaṇāṁ siddhiṁ yajanta iha devatāḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 12. Those who long for success in action in this world sacrifice to the gods; for success is quickly attained by men through action. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.