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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 10
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः

राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित, मेरेमें ही तल्लीन, मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तपसे पवित्र हुए बहुत-से भक्त मेरे भाव- (स्वरूप-) को प्राप्त हो चुके हैं। — VaniSagar

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TamilIND

பற்று, பயம், கோபம் ஆகியவற்றிலிருந்து விடுபட்டு, என்னில் ஆழ்ந்து, என்னிடத்தில் அடைக்கலம் புகுந்து, ஞானத் தீயினால் சுத்திகரிக்கப்பட்டு, பலர் என் இருப்பை அடைந்துள்ளனர்.

TeluguIND

బంధం, భయం మరియు కోపం నుండి విముక్తి పొంది, నాలో లీనమై, నన్ను ఆశ్రయించి, జ్ఞానాగ్నిచే శుద్ధి చేయబడి, అనేకులు నా ఉనికిని పొందారు.

SindhiIND

وابستگي، خوف ۽ ڪاوڙ کان آزاد ٿي، مون ۾ جذب ​​ٿي، مون ۾ پناهه وٺي، علم جي باهه کان پاڪ ٿي، ڪيترائي منهنجي وجود کي حاصل ڪيا آهن.

NepaliIND

आसक्ति, भय र क्रोधबाट मुक्त भएर, ममा लीन भएर, ममा शरण लिएर, ज्ञानको अग्निले पावन भएर धेरैले मेरो अस्तित्व प्राप्त गरेका छन्।

MalayalamIND

ആസക്തി, ഭയം, ക്രോധം എന്നിവയിൽ നിന്ന് മുക്തരായി, എന്നിൽ ലയിച്ചു, എന്നിൽ അഭയം പ്രാപിച്ച്, ജ്ഞാനാഗ്നിയാൽ ശുദ്ധീകരിക്കപ്പെട്ട, പലരും എൻ്റെ അസ്തിത്വം പ്രാപിച്ചു.

MarathiIND

आसक्ती, भय, क्रोध यापासून मुक्त होऊन, माझ्यात लीन होऊन, माझा आश्रय घेऊन, ज्ञानाच्या अग्नीने शुद्ध होऊन अनेकांना माझे अस्तित्व प्राप्त झाले आहे.

KannadaIND

ಮೋಹ, ಭಯ ಮತ್ತು ಕ್ರೋಧದಿಂದ ಮುಕ್ತರಾಗಿ, ನನ್ನಲ್ಲಿ ಲೀನವಾಗಿ, ನನ್ನಲ್ಲಿ ಆಶ್ರಯ ಪಡೆದು, ಜ್ಞಾನದ ಅಗ್ನಿಯಿಂದ ಶುದ್ಧರಾಗಿ, ಅನೇಕರು ನನ್ನ ಅಸ್ತಿತ್ವವನ್ನು ಪಡೆದಿದ್ದಾರೆ.

GujaratiIND

આસક્તિ, ભય અને ક્રોધથી મુક્ત થઈને, મારામાં લીન થઈને, મારું શરણ લઈને, જ્ઞાનના અગ્નિથી શુદ્ધ થઈને, ઘણાએ મારા અસ્તિત્વને પ્રાપ્ત કર્યું છે.

BengaliIND

আসক্তি, ভয় ও ক্রোধ থেকে মুক্ত হয়ে, আমার মধ্যে লীন হয়ে, আমার শরণাপন্ন হয়ে, জ্ঞানের অগ্নি দ্বারা শুদ্ধ হয়ে অনেকেই আমার সত্তাকে লাভ করেছে।

PunjabiIND

ਮੋਹ, ਡਰ ਅਤੇ ਕ੍ਰੋਧ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਹੋ ਕੇ, ਮੇਰੇ ਅੰਦਰ ਲੀਨ ਹੋ ਕੇ, ਮੇਰੀ ਸ਼ਰਨ ਲੈ ਕੇ, ਗਿਆਨ ਦੀ ਅੱਗ ਦੁਆਰਾ ਪਵਿੱਤਰ ਹੋ ਕੇ, ਬਹੁਤਿਆਂ ਨੇ ਮੇਰੇ ਹਸਤੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਲਿਆ ਹੈ।

KonkaniIND

आसक्ति, भंय आनी रागांतल्यान मुक्त जावन, माझ्यांत लीन जावन, म्हाका आलाशिरो घेवन, गिन्यानाच्या उज्यान शुध्द जावन, जायत्या जाणांनी म्हजें अस्तित्व मेळयलां.

AssameseIND

মোহ, ভয়, ক্ৰোধৰ পৰা মুক্ত হৈ, মোৰ মাজত নিমগ্ন হৈ, মোক আশ্ৰয় লৈ, জ্ঞানৰ অগ্নিৰ দ্বাৰা শুদ্ধ হৈ, বহুতে মোৰ সত্তা লাভ কৰিছে।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

4.10।। व्याख्या--'वीतरागभयक्रोधाः'--परमात्मासे विमुख होनेपर नाशवान् पदार्थोंमें 'राग' हो जाता है। रागसे फिर प्राप्तमें 'ममता' और अप्राप्तकी कामना उत्पन्न होती है। रागवाले (प्रिय) पदार्थोंकी प्राप्ति होनेपर तो 'लोभ' होता है, पर उनकी प्राप्तिमें बाधा पहुँचनेपर (बाधा पहुँचानेवालेपर) 'क्रोध' होता है। यदि बाधा पहुँचानेवाला व्यक्ति अपनेसे अधिक बलवान् हो और उसपर अपना वश न चल सकता हो तथासमयपर वह हमारा अनिष्ट कर देगा--ऐसी सम्भावना हो तो 'भय' होता है। इस प्रकार नाशवान् पदार्थोंके रागसे ही भय, क्रोध, लोभ, ममता, कामना आदि सभी दोषोंकी उत्पत्ति होती है। रागके मिटनेपर ये सभी दोष मिट जाते हैं। पदार्थोंको अपना और अपने लिये न मानकर, दूसरोंका और दूसरोंके लिये मानकर उनकी सेवा करनेसे राग मिटता है। कारण कि वास्तवमें पदार्थ और क्रियासे हमारा सम्बन्ध है ही नहीं।अपना कोई प्रयोजन न रहनेपर भी भगवान् केवल हमारे कल्याणके लिये ही अवतार लेते हैं। कारण कि वे प्राणीमात्रके परम सुहृद् हैं और उनकी सम्पूर्ण क्रियाएँ मात्र जीवोंके कल्याणके लिये ही होती हैं। इस प्रकार भगवान्की परम सुहृत्तापर दृढ़ विश्वास होनेसे भगवान्में आकर्षण हो जाता है। भगवान्में आकर्षण होनेसे संसारका आकर्षण (राग) स्वतः मिट जाता है। जैसे, बचपनमें बालकोंका कंकड़-पत्थरोंमें आकर्षण होता है और उनसे वे खेलते हैं। खेलमें वे कंकड़-पत्थरोंके लिये लड़ पड़ते हैं। एक कहता है कि यह मेरा है और दूसरा कहता है कि यह मेरा है। इस प्रकार गलीमें पड़े कंकड़-पत्थरोंमें ही उन्हें महत्ता दीखती है। परन्तु जब वे बड़े हो जाते हैं ,तब कंकड़-पत्थरोंमें उनका आकर्षण मिट जाता है और रुपयोंमें आकर्षण हो जाता है। रुपयोंमें आकर्षण होनेपर उन्हें कंकड़पत्थरोंमें अथवा खिलौनोंमें कोई महत्ता नहीं दीखती। ऐसे ही जब मनुष्यकी परमात्मामें लगन लग जाती है तब उसके लिये संसारके रुपये और सब पदार्थ आकर्षक न रहकर फीके पड़ जाते हैं। उसका संसारमें आकर्षण या राग मिट जाता है। राग मिटते ही भय और क्रोध दोनों मिट जाते हैं क्योंकि ये दोनों रागके ही आश्रित रहते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

यह मोक्षमार्ग अभी आरम्भ हुआ है ऐसी बात नहीं किंतु पहले भी जिनके राग भय और क्रोध चले गये हैं ऐसे रागादि दोषोंसे रहित ईश्वरमें तन्मय हुए ईश्वरसे अपना अभेद समझनेवाले ब्रह्मवेत्ता और मुझ परमेश्वरके ही आश्रित केवल ज्ञाननिष्ठामें स्थित ऐसे बहुतसे महापुरुष परमात्मविषयक ज्ञानरूप तपसे परमशुद्धिको प्राप्त होकर मुझ ईश्वरके भावको मोक्षको प्राप्त हो गये हैं। ज्ञानतपसा यह विशेषण इस बातका द्योतक है कि ज्ञाननिष्ठा अन्य तपोंकी अपेक्षा नहीं रखती।

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Sri Anandgiri

संप्रति प्रस्तुतमोक्षमार्गस्य नूतनत्वेनाव्यवस्थितत्वमाशङ्क्य परिहरति नैष इति। मन्मयत्वस्य मद्भावगमनेनापौनरुक्त्यं दर्शयति ब्रह्मविद इति। आत्मनो भिन्नत्वेन भिन्नाभिन्नत्वेन वा ब्रह्मणो वेदनं व्यावर्तयति ईश्वरेति। अभेददर्शनेन समुच्चित्य कर्मानुष्ठानं प्रत्याचष्टे मामेवेति। तदुपाश्रयत्वमेवविशदयति केवलेति। मामुपाश्रिता इति केवलज्ञाननिष्ठत्वमुक्त्वा ज्ञानतपसा पूता इति किमर्थं पुनरुच्यते तत्राह इतरेति।

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Sri Dhanpati

अस्य मोक्षर्मागस्याधुनिकत्वं वारयति वीतेति। रागो विषयेषु रञ्जनात्मकश्िचत्तवृत्तिविशेषः विषयत्यागान्नाशाच्च भयम् विषयप्राप्तौ विघ्नकर्तुषु ताडनाक्रोशनादिकर्तृषु च क्रोधः। वीता विगता रागादयो येभ्यस्ते अतएव मन्मया ईश्वराभेददर्शिनः। कर्मानुष्ठानसहभावं वारयति। मामेव परमेश्वरमुपाश्रिताः। केवलज्ञाननिष्ठा इत्यर्थः। तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशादिति न्यायात् इतरकर्मानपेक्षाः। केवलज्ञाननिष्ठा मुच्यन्त इति ज्ञापयन् विशिनष्टि। बहवोऽनेके ज्ञानमेव तपः तेन पूताः परां शुद्धिं गताः पूर्वेषामघानां नाशादुत्तरेषामसंबाधाच्चतदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्य्वपदेशात् इति न्यायात्। मद्भावं ब्रह्मभावं मोक्षं प्राप्ताः। यत्तु मन्मयाः मदेकचित्ताः मामुपाश्रिता एकान्तभक्त्या मामीश्वरं शरणं गताः सन्तो मत्प्रसादलभ्यं यदात्मज्ञानं तपश्च तत्परिपाकहेतुः स्वधर्मस्तयोः। द्वन्द्वैकवद्भावः। तेन पूताः शुद्धाः निरस्ताज्ञानतत्कार्यमलाः मद्भावं सायुज्यं प्राप्ता इति। तत्रेदं बोध्यम् मन्मयशब्दार्थत्यागे कारणाभावात्तच्छब्दार्थानुरोधेन मामुपाश्रिता इत्यस्यापि भाष्योक्तव्याख्यानमेव सम्यगिति। यदपि यदात्मज्ञानं चेत्यादि तदपि न। समुच्चयप्रसङ्गात्। यत्तु मद्भावं मद्विषयं भावं रत्याख्यं प्रेमाणमागता इति वेति तच्चिन्त्यम्। त्यक्त्वा देहमित्यादिपूर्वग्रन्थानुगुण्याभावप्रसङ्गात्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
vītafreed from
rāgaattachment
bhayafear
krodhāḥand anger
matmayā
māmin me
upāśhritāḥtaking refuge (of)
bahavaḥmany (persons)
jñānaof knowledge
tapasāby the fire of knowledge
pūtāḥpurified
matbhāvam
āgatāḥattained
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Bhagavad Gita · 4.9
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन

हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार (मेरे जन्म और कर्मको) जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है, वह शरीरका त्याग करके पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.11
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः

हे पृथानन्दन ! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुकरण करते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 10
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 10
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः

राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित, मेरेमें ही तल्लीन, मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तपसे पवित्र हुए बहुत-से भक्त मेरे भाव- (स्वरूप-) को प्राप्त हो चुके हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ: "राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित, मेरेमें ही तल्लीन, मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तपसे पवित्र हुए बहुत-से भक्त मेरे भाव- (स्वरूप-) को प्राप्त हो चुके हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 10?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 10 translates to: "Freed from attachment, fear, and anger, absorbed in Me, taking refuge in Me, purified by the fire of knowledge, many have attained My Being. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 10 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित, मेरेमें ही तल्लीन, मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तपसे पवित्र हुए बहुत-से भक्त मेरे भाव- (स्वरूप-) को प्राप्त हो चुके हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "vīta-rāga-bhaya-krodhā man-mayā mām upāśhritāḥ" mean in English?

"vīta-rāga-bhaya-krodhā man-mayā mām upāśhritāḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 10. Freed from attachment, fear, and anger, absorbed in Me, taking refuge in Me, purified by the fire of knowledge, many have attained My Being. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.