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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 32
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्। सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः

परन्तु जो मनुष्य मेरे इस मतमें दोष-दृष्टि करते हुए इसका अनुष्ठान नहीं करते, उन सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित और अविवेकी मनुष्योंको नष्ट हुए ही समझो। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

কিন্তু যারা আমার শিক্ষার সমালোচনা করে এবং তা পালন করে না, সমস্ত জ্ঞান থেকে বঞ্চিত এবং বিচক্ষণতার অভাব, তারা ধ্বংসের দিকে ধাবিত বলে জানে।

KannadaIND

ಆದರೆ ನನ್ನ ಬೋಧನೆಯನ್ನು ಟೀಕಿಸುವವರು ಮತ್ತು ಅದನ್ನು ಅಭ್ಯಾಸ ಮಾಡದಿರುವವರು, ಎಲ್ಲಾ ಜ್ಞಾನದಿಂದ ವಂಚಿತರಾಗಿ ಮತ್ತು ವಿವೇಚನೆಯ ಕೊರತೆಯನ್ನು ಹೊಂದಿದ್ದಾರೆ, ಅವರು ವಿನಾಶಕ್ಕೆ ಅವನತಿ ಹೊಂದುತ್ತಾರೆ ಎಂದು ತಿಳಿದಿದ್ದಾರೆ.

PunjabiIND

ਪਰ ਜੋ ਲੋਕ ਮੇਰੇ ਉਪਦੇਸ਼ ਦੀ ਆਲੋਚਨਾ ਕਰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਇਸ 'ਤੇ ਅਮਲ ਨਹੀਂ ਕਰਦੇ, ਸਾਰੇ ਗਿਆਨ ਤੋਂ ਵਾਂਝੇ ਅਤੇ ਸਮਝ ਤੋਂ ਵਾਂਝੇ ਹਨ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਵਿਨਾਸ਼ ਦਾ ਸ਼ਿਕਾਰ ਸਮਝਦੇ ਹਨ।

GujaratiIND

પરંતુ જેઓ મારા ઉપદેશની ટીકા કરે છે અને તેનું પાલન કરતા નથી, તમામ જ્ઞાનથી વંચિત છે અને વિવેકબુદ્ધિનો અભાવ છે, તેઓ જાણે છે કે તેઓ વિનાશ માટે વિનાશકારી છે.

MalayalamIND

എന്നാൽ എൻ്റെ ഉപദേശത്തെ വിമർശിക്കുകയും അത് അനുഷ്ഠിക്കാതിരിക്കുകയും ചെയ്യുന്നവർ, എല്ലാ അറിവും നഷ്ടപ്പെട്ടവരും വിവേചനശക്തിയില്ലാത്തവരും, തങ്ങളെ നാശത്തിലേക്ക് നയിക്കുമെന്ന് അറിയുന്നു.

TeluguIND

కానీ నా బోధను విమర్శించి, ఆచరించని, జ్ఞానాన్ని కోల్పోయి, విచక్షణారహితంగా ఉన్నవారు నాశనానికి గురవుతారని తెలుసు.

TamilIND

ஆனால், எனது போதனையை விமர்சித்து, அதை நடைமுறைப்படுத்தாமல், அனைத்து அறிவையும் இழந்து, பகுத்தறிவு இல்லாதவர்கள், அழிவுக்கு ஆளாக நேரிடும் என்பதை அறிவார்கள்.

MarathiIND

परंतु जे लोक माझ्या शिकवणीवर टीका करतात आणि ते आचरणात आणत नाहीत, सर्व ज्ञानापासून वंचित असतात आणि विवेकबुद्धी नसतात, त्यांना सर्वनाश समजतात.

SindhiIND

پر جيڪي ماڻهو منهنجي تعليم تي تنقيد ڪن ٿا ۽ ان تي عمل نه ٿا ڪن، سڀني علمن کان محروم ۽ سمجهه کان محروم آهن، انهن کي تباهيءَ جو شڪار سمجهن ٿا.

NepaliIND

तर मेरो शिक्षाको आलोचना गर्ने र व्यवहार नगर्ने, सबै ज्ञानबाट वञ्चित र विवेकको अभावमा उनीहरूलाई विनाशमा पर्न जान्छ।

MizoIND

Mahse Ka zirtirna sawiseltu leh zawm lo, hriatna zawng zawng hloh leh hriatthiamna nei lote chuan boral tur an ni tih an hre chiang hle.

ManipuriIND

ꯑꯗꯨꯕꯨ ꯑꯩꯒꯤ ꯇꯝꯕꯤꯕꯥ ꯑꯁꯤꯕꯨ ꯂꯥꯟꯅꯥ ꯂꯃꯖꯤꯡꯕꯤꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯁꯤꯕꯨ ꯆꯠꯅꯍꯟꯗꯕꯥ, ꯂꯧꯁꯤꯡ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛꯇꯒꯤ ꯂꯥꯄꯊꯣꯛꯅꯥ ꯂꯩꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯋꯥꯈꯜ ꯂꯧꯁꯤꯡ ꯂꯩꯇꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏꯁꯤꯡꯅꯥ ꯃꯈꯣꯌꯕꯨ ꯃꯥꯡꯍꯟ ꯇꯥꯀꯍꯅꯕꯥ ꯉꯃꯒꯅꯤ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯈꯉꯏ꯫

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

3.32।। व्याख्या--'ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्'-- तीसवें श्लोकमें वर्णित सिद्धान्तके अनुसार चलनेवालोंके लाभका वर्णन इकतीसवें श्लोकमें करनेके बाद इस सिद्धान्तके अनुसार न चलनेवालोंकी पृथक्ता करने-हेतु यहाँ 'तु' पदका प्रयोग हुआ है।जैसे संसारमें सभी स्वार्थी मनुष्य चाहते हैं कि हमें ही सब पदार्थ मिलें, हमें ही लाभ हो, ऐसे ही भगवान् भी चाहते हैं कि समस्त कर्मोंको मेरे ही अर्पण किया जाय, मेरेको ही स्वामी माना जाय-- इस प्रकार मानना 'भगवान्' पर दोषारोपण करना है।कामनाके बिना संसारका कार्य कैसे चलेगा? ममताका सर्वथा त्याग तो हो ही नहीं सकता; राग-द्वेषादि विकारोंसे रहित होना असम्भव है-- इस प्रकार मानना भगवान्के 'मत' पर दोषारोपण करना है।भोग और संग्रहकी इच्छावाले जो मनुष्य शरीरादि पदार्थोंको अपने और अपने लिये मानते हैं और समस्त कर्म अपने लिये ही करते हैं, वे भगवान्के मतके अनुसार नहीं चलते।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

परंतु जो उनसे विपरीत हैं मेरे इस मतको निन्दा करते हुए इस मेरे मतके अनुसार आचरण नहीं करते वे समस्त ज्ञानोंमें अनेक प्रकारसे मूढ़ हैं। सब ज्ञानोंमें मोहित हुए उन अविवेकियोंको तो तू नाशको प्राप्त हुए ही जान।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

भगवन्मताननुवर्तिनां प्रत्यवायित्वं प्रत्याययति ये त्विति। तद्विपरीतत्वं भगवन्मतानुवर्तिभ्यो वैपरीत्यंतदेव दर्शयति एतदित्यादिना। अभ्यसूयन्तस्तत्रासन्तमपि दोषमुद्भावयन्त इत्यर्थः। सर्वज्ञानानि सगुणनिर्गुणविषयाणि। प्रमाणप्रमेयप्रयोजनविभागतो विविधत्वम्।

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Scripture Scholar

Sri Dhanpati

येतु तद्विपरीताः श्रद्धाहीना एतन्मम मतमभ्यसूयन्तः गुणेऽपि दोषमारोप्य निन्दन्तः नानुतिष्ठन्ति तान् कर्मज्ञाने सगुणज्ञाने निर्गुणज्ञाने चेति सर्वेषु ज्ञानेषु विविधप्रमाणप्रमेयप्रयोजनविभागे मूढान् सर्वप्रकारेणायोग्यान् अचेतसोऽविवेकिनो दुष्टचेतसो नष्टान् सर्वपुरुषार्थेभ्यो भ्रष्टान् विद्धि। सर्वशब्द ईश्वरवाचीसर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः इति निर्वचनात्। तस्य ज्ञाने इति व्याख्यानं तुक्तव्याख्याने ईश्वरज्ञानस्यान्तर्भावात् व्यर्थमेव लोकप्रसिद्धित्याग इत्यत उपेक्ष्यम्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yethose
tubut
etatthis
abhyasūyantaḥcavilling
nanot
anutiṣhṭhantifollow
memy
matamteachings
sarvajñāna
vimūḍhāndeluded
tānthey are
viddhiknow
naṣhṭānruined
achetasaḥdevoid of discrimination
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.31
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः। श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः

जो मनुष्य दोष-दृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.33
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि। प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति

सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं। ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसीका हठ क्या करेगा? — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 32
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 32
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्। सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः

परन्तु जो मनुष्य मेरे इस मतमें दोष-दृष्टि करते हुए इसका अनुष्ठान नहीं करते, उन सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित और अविवेकी मनुष्योंको नष्ट हुए ही समझो। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 32 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 32 का हिंदी अर्थ: "परन्तु जो मनुष्य मेरे इस मतमें दोष-दृष्टि करते हुए इसका अनुष्ठान नहीं करते, उन सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित और अविवेकी मनुष्योंको नष्ट हुए ही समझो। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 32?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 32 translates to: "But those who criticize My teaching and do not practice it, deprived of all knowledge and lacking discernment, know them to be doomed to destruction. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्। सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचे" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 32 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। परन्तु जो मनुष्य मेरे इस मतमें दोष-दृष्टि करते हुए इसका अनुष्ठान नहीं करते, उन सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित और अविवेकी मनुष्योंको नष्ट हुए ही समझो। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "ye tvetad abhyasūyanto nānutiṣhṭhanti me matam" mean in English?

"ye tvetad abhyasūyanto nānutiṣhṭhanti me matam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 32. But those who criticize My teaching and do not practice it, deprived of all knowledge and lacking discernment, know them to be doomed to destruction. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.