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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 33
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि। प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति

सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं। ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसीका हठ क्या करेगा? — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

এমনকি একজন জ্ঞানী মানুষও তার স্বভাব অনুযায়ী কাজ করে; মানুষ তাদের প্রকৃতি অনুসরণ করবে; সংযম কি করতে পারে?

KannadaIND

ಬುದ್ಧಿವಂತ ಮನುಷ್ಯನು ಸಹ ತನ್ನ ಸ್ವಂತ ಸ್ವಭಾವಕ್ಕೆ ಅನುಗುಣವಾಗಿ ವರ್ತಿಸುತ್ತಾನೆ; ಜೀವಿಗಳು ತಮ್ಮ ಸ್ವಭಾವವನ್ನು ಅನುಸರಿಸುತ್ತವೆ; ಸಂಯಮ ಏನು ಮಾಡಬಹುದು?

MarathiIND

ज्ञानी माणूसही स्वतःच्या स्वभावानुसार वागतो; प्राणी त्यांच्या स्वभावाचे पालन करतील; संयम काय करू शकतो?

GujaratiIND

જ્ઞાની માણસ પણ પોતાના સ્વભાવ પ્રમાણે જ વર્તે છે; જીવો તેમના સ્વભાવને અનુસરશે; સંયમ શું કરી શકે?

PunjabiIND

ਸਿਆਣਾ ਮਨੁੱਖ ਵੀ ਆਪਣੇ ਸੁਭਾਅ ਅਨੁਸਾਰ ਹੀ ਕੰਮ ਕਰਦਾ ਹੈ; ਜੀਵ ਆਪਣੇ ਸੁਭਾਅ ਦੀ ਪਾਲਣਾ ਕਰਨਗੇ; ਸੰਜਮ ਕੀ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ?

TamilIND

அறிவுள்ள மனிதனும் தன் இயல்புக்கு ஏற்ப செயல்படுகிறான்; உயிரினங்கள் அவற்றின் இயல்புகளைப் பின்பற்றும்; கட்டுப்பாடு என்ன செய்ய முடியும்?

TeluguIND

తెలివైన వ్యక్తి కూడా తన స్వభావానికి అనుగుణంగా వ్యవహరిస్తాడు; జీవులు వారి స్వభావాన్ని అనుసరిస్తాయి; సంయమనం ఏమి చేయగలదు?

NepaliIND

ज्ञानी मानिसले पनि आफ्नो स्वभाव अनुसार काम गर्छ। प्राणीहरूले तिनीहरूको प्रकृति पछ्याउनेछन्; संयमले के गर्न सक्छ?

OdiaIND

ଜଣେ ଜ୍ଞାନୀ ବ୍ୟକ୍ତି ମଧ୍ୟ ନିଜ ପ୍ରକୃତି ଅନୁଯାୟୀ କାର୍ଯ୍ୟ କରେ; ପ୍ରାଣୀମାନେ ସେମାନଙ୍କର ପ୍ରକୃତି ଅନୁସରଣ କରିବେ; ପ୍ରତିବନ୍ଧକ କ’ଣ କରିପାରିବ?

MalayalamIND

ജ്ഞാനിയായ ഒരു മനുഷ്യൻ പോലും സ്വന്തം സ്വഭാവത്തിന് അനുസൃതമായി പ്രവർത്തിക്കുന്നു; ജീവികൾ അവരുടെ സ്വഭാവം പിന്തുടരും; സംയമനത്തിന് എന്ത് ചെയ്യാൻ കഴിയും?

SindhiIND

ايستائين جو عقلمند انسان به پنهنجي فطرت مطابق ڪم ڪري ٿو. مخلوق پنهنجي فطرت جي پيروي ڪندي؛ پابندي ڇا ڪري سگهي ٿي؟

KonkaniIND

ज्ञानी मनीस लेगीत आपल्या स्वभावा प्रमाण वागता; जीव आपल्या स्वभावाक पाळो दितले; संयम कितें करूंक शकता?

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या-- 'प्रकृतिं यान्ति भूतानि'-- जितने भी कर्म किये जाते हैं, वे स्वभाव अथवा सिद्धान्तको सामने रखकर किये जाते हैं। स्वभाव दो प्रकारका होता है-- राग-द्वेषरहित और राग-द्वेषयुक्त। जैसे, रास्तेमें चलते हुए कोई बोर्ड दिखायी दिया और उसपर लिखा हुआ पढ़ लिया तो यह पढ़ना न तो राग- द्वेषसे हुआ और न किसी सिद्धान्तसे, अपितु राग-द्वेषरहित स्वभावसे स्वतः हुआ। किसी मित्रका पत्र आनेपर उसे रागपूर्वक पढ़ते हैं, और शत्रुका पत्र आनेपर उसे द्वेषपूर्वक पढ़ते हैं तो यह पढ़ना राग-द्वेषयुक्त स्वभावसे हुआ। गीता, रामायण आदि सत्- शास्त्रोंको पढ़ना 'सिद्धान्त' से पढ़ना हुआ। मनुष्य-जन्म परमात्मप्राप्तिके लिये ही है; अतः परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे कर्म करना भी सिद्धान्तके अनुसार कर्म करना है।इस प्रकार देखना, सुनना, सूघँना, स्पर्श करना आदि मात्र क्रियाएँ स्वभाव और सिद्धान्त--दोनोंसे होती हैं। राग-द्वेषरहित स्वभाव दोषी नहीं होता, प्रत्युत राग-द्वेषयुक्त स्वभाव दोषी होता है। राग-द्वेषपूर्वक होनेवाली क्रियाएँ मनुष्यको बाँधती हैं; क्योंकि इनसे स्वभाव अशुद्ध होता है और सिद्धान्तसे होनेवाली क्रियाएँ उद्धार करनेवाली होती हैं; क्योंकि इनसे स्वभाव शुद्ध होता है। स्वभाव अशुद्ध होनेके कारण ही संसारसे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद नहीं होता। स्वभाव शुद्ध होनेसे संसारसे माने हुए सम्बन्धकासुगमतापूर्वक विच्छेद हो जाता है।ज्ञानी महापुरुषके अपने कहलानेवाले शरीरद्वारा स्वतः क्रियाएँ हुआ करती हैं; क्योंकि उसमें कर्तृत्वाभिमान नहीं होता। परमात्मप्राप्ति चाहनेवाले साधककी क्रियाएँ सिद्धान्तके अनुसार होती है। जैसे लोभी पुरुष सदा सावधान रहता है कि कहीं कोई घाटा न लग जाय, ऐसे ही साधक निरन्तर सावधान रहता है कि कहीं कोई क्रिया राग-द्वेषपूर्वक न हो जाय। ऐसी सावधानी होनेपर साधकका स्वभाव शीघ्र शुद्ध हो जाता है और परिणाम-स्वरूप वह कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।यद्यपि क्रियामात्र स्वाभाविक ही प्रकृतिके द्वारा होती है, तथापि अज्ञानी पुरुष क्रियाओंके साथ अपना सम्बन्ध मानकर अपनेको उन क्रियाओंका कर्ता मान लेता है (गीता 3। 27)। पदार्थों और क्रियाओंसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण ही राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं, जिनसे जन्म-मरणरूप बन्धन होता है। परन्तु प्रकृतिसे सम्बन्ध न माननेवाला साधक अपनेको सदा अकर्ता ही देखता है (गीता 13। 29)।स्वभावमें मुख्य दोष प्राकृत पदार्थोंका राग ही है। जबतक स्वभावमें राग रहता है, तभीतक अशुद्ध कर्म होते हैं। अतः साधकके लिये राग ही बन्धनका मुख्य कारण है।राग माने हुए 'अहम्' में रहता है और मन, बुद्धि, इन्द्रियों एवं इन्द्रियोंके विषयोंमें दिखायी देता है। अहम् दो प्रकारका है 1 चेतनद्वारा जडके साथ माने हुए सम्बन्धसे होनेवाला तादात्म्यरूप अहम्। 2 जड प्रकृतिका धातुरूप 'अहम्'-- 'महाभूतान्यहंकारः' (गीता 13। 5)।जड प्रकृतिके धातुरूप अहम् में कोई दोष नहीं है; क्योंकि यह 'अहम्' मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदिकी तरह एक करण ही है। इसलिये सम्पूर्ण दोष माने हुए 'अहम्' में ही हैं। ज्ञानी महापुरुषमें तादात्म्यरूप 'अहम्' का सर्वथा अभाव होता है; अतः उसके कहलानेवाले शरीरके द्वारा होनेवाली समस्त क्रियाएँ प्रकृतिके धातुरूप 'अहम्' से ही होती हैं। वास्तवमें समस्त प्राणियोंकी सब क्रियाएँ इस धातुरूप 'अहम्' से ही होती हैं, परन्तु जड शरीरको 'मैं' और 'मेरा' माननेवाला अज्ञानी पुरुष उन क्रियाओंको अपनी तथा अपने लिये मान लेता है और बँध जाता है। कारण कि क्रियाओंको अपनी और अपने लिये माननेसे ही राग उत्पन्न होता है ।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तो फिर वे ( लोग ) किस कारणसे आपके मतके अनुसार नहीं चलते दूसरेके धर्मका अनुष्ठान करते हैं और स्वधर्माचरण नहीं करते आपके प्रतिकूल होकर आपके शासनको उल्लङ्घन करनेके दोषसे क्यों नहीं डरते इसमें क्या कारण है इसपर कहते हैं सभी प्राणी एवं ज्ञानवान् भी अपनी प्रकृतिके अनुसार ही चेष्टा करते हैं अर्थात् जो पूर्वकृत पुण्यपाप आदिका संस्कार वर्तमान जन्मादिमें प्रकट होता है उसका नाम प्रकृति है उसके अनुसार ज्ञानवान् भी चेष्टा किया करता है। फिर मूर्खकी तो बात ही क्या है इसलिये सभी प्राणी ( अपनी ) प्रकृति अर्थात् स्वभावकी ओर जा रहे हैं इसमें मेरा या दूसरेका शासन क्या कर सकता है।

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Sri Anandgiri

भगवन्मतानुवर्तनमन्तरेण परधर्मानुष्ठाने स्वधर्माननुष्ठाने च कारणं पृच्छति कस्मादिति। भगवत्प्रतिकूलत्वमेव तत्र कारणमित्याशङ्क्याह तत्प्रतिकूला इति। राजानुशासनातिक्रमे दोषदर्शनाद्भगवदनुशासनातिक्रमेऽपि दोषसंभवात्प्रतिकूलत्वं भयकारणमित्यर्थः। उत्तरत्वेन श्लोकमवतारयति सदृशमिति। तत्राहेति। सर्वस्य प्राणिवर्गस्य प्रकृतिवशवर्तित्वे कैमुतिकन्यायं सूचयति ज्ञानवानपीति। सर्वाण्यपि भूतान्यनिच्छन्त्यपि प्रकृतिसदृशीं चेष्टां गच्छन्तीति निगमयति प्रकृतिमिति। भूतानां प्रकृत्यधीनत्वेऽपि प्रकृतिर्भगवता निग्राह्येत्याशङ्क्याह निग्रह इति। का पुनरियं प्रकृतिर्यदनुसारिणी भूतानां चेष्टेति पृच्छति प्रकृतिर्नामेति। भगवदभिप्रेतां प्रकृतिं प्रकटयति पूर्वेति। आदिशब्देन ज्ञानेच्छादि संगृह्यते। यथोक्तः संस्कारः स्वशक्त्या प्रवर्तकश्चेत्प्रलयेऽपि प्रवृत्तिः स्यादित्याशङ्क्य विशिनष्टि वर्तमानेति। सर्वो जन्तुरित्युक्तं विवेकिप्रवृत्तेरतथात्वादित्याशङ्क्यपश्वादिमिश्चाविशेषात् इति न्यायमनुसरन्नाह ज्ञानवानिति। ज्ञानवतामज्ञानवतां च प्रकृत्यधीनत्वाविशेषे फलितमाह तस्मादिति। प्रकृतिं यान्ति प्रकृतिसदृशीं चेष्टां गच्छन्त्यनिच्छन्त्यपि सर्वाणि भूतानीत्यर्थः। प्रकृतेर्भगवता तत्तुल्येन वा केनचिन्निग्रहमाशङ्क्यावतारितचतुर्थपादस्यार्थापेक्षितं पूरयति मम वेति।

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Sri Dhanpati

ननु कस्मात्त्वत्प्रतिकूलास्त्वच्छासनातिक्रमान्न बिभ्यति त्वदीयं मतं स्वधर्मं नानुतिष्ठन्ति परधर्मं चानुतिष्ठन्तीति चेत्तत्राह सदृशमिति। ज्ञानवानपिपश्वादिभिश्चाविशेषात् इति न्यायात् गुणदोषज्ञानवानपीति वा। स्वस्याः प्रकृतेः साच पूर्वकृतधर्माधर्मादिसंस्कारो वर्तमानजन्मादावभिव्यक्तः तस्याः सदृशमनुरुपं चेष्टां करोति किं पुनर्मुर्खः। तस्माद्भूतानि प्राणिनः प्रकृतिं यान्त्यनुगच्छन्ति। निग्रहो निषेधरुपः मम परमेश्वरस्यान्यस्य राज्ञो वा किं करिष्यति। प्रकृतेः प्राबल्यान्नास्मदादिशासनाद्विभ्यतीति भावः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sadṛiśhamaccordingly
cheṣhṭateact
svasyāḥby their own
prakṛiteḥmodes of nature
jñānavān
apieven
prakṛitimnature
yāntifollow
bhūtāniall living beings
nigrahaḥrepression
kimwhat
kariṣhyatiwill do
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.32
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्। सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः

परन्तु जो मनुष्य मेरे इस मतमें दोष-दृष्टि करते हुए इसका अनुष्ठान नहीं करते, उन सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित और अविवेकी मनुष्योंको नष्ट हुए ही समझो। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.34
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ। तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ

इन्द्रिय-इन्द्रियके अर्थमें (प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें) मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे (अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर) स्थित हैं। मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये; क्योंकि वे दोनों ही इसके (पारमार्थिक मार्गमें विघ्न डालनेवाले) शत्रु हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 33
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 33
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि। प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति

सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं। ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसीका हठ क्या करेगा? — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 33 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 33 का हिंदी अर्थ: "सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं। ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसीका हठ क्या करेगा? — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 33?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 33 translates to: "Even a wise man acts in accordance with his own nature; beings will follow their nature; what can restraint do? — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि। प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं क" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 33 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं। ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसीका हठ क्या करेगा? — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sadṛiśhaṁ cheṣhṭate svasyāḥ prakṛiter jñānavān api" mean in English?

"sadṛiśhaṁ cheṣhṭate svasyāḥ prakṛiter jñānavān api" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 33. Even a wise man acts in accordance with his own nature; beings will follow their nature; what can restraint do? — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.