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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 31
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः। श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः

जो मनुष्य दोष-दृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

যারা আমার এই শিক্ষাকে অবিরাম বিশ্বাসের সাথে এবং বিনা বাধায় পালন করে, তারাও কর্ম থেকে মুক্তি পায়।

KannadaIND

ಯಾರು ನನ್ನ ಈ ಬೋಧನೆಯನ್ನು ಶ್ರದ್ಧೆಯಿಂದ ಮತ್ತು ಕುಹಕವಿಲ್ಲದೆ ನಿರಂತರವಾಗಿ ಅಭ್ಯಾಸ ಮಾಡುತ್ತಾರೆ, ಅವರೂ ಸಹ ಕ್ರಿಯೆಗಳಿಂದ ಮುಕ್ತರಾಗುತ್ತಾರೆ.

MarathiIND

जे माझ्या या शिकवणीचा श्रद्धेने आणि विनयभंग न करता सतत आचरण करतात, ते सुद्धा कर्मांपासून मुक्त होतात.

NepaliIND

जो मेरो यो उपदेशलाई श्रद्धेय र विना आस्थाका साथ अभ्यास गर्दछन्, तिनीहरू पनि कर्मबाट मुक्त हुन्छन्।

TeluguIND

ఎవరైతే నా ఈ బోధనను నిరంతరం విశ్వాసంతో మరియు కవ్వించకుండా ఆచరిస్తారో, వారు కూడా క్రియల నుండి విముక్తులవుతారు.

DogriIND

जेह्ड़े लोक लगातार मेरी इस शिक्षा दा पालन विश्वास कन्नै ते बिना कैविलिंग दे करदे न, ओह् बी कम्में थमां मुक्त होंदे न।

BhojpuriIND

जे लोग लगातार हमार एह शिक्षा के आस्था के साथे आ बिना कैविलिंग के अभ्यास करेला, उहो लोग कर्म से मुक्त हो जाला।

AssameseIND

যিসকলে মোৰ এই শিক্ষাক বিশ্বাসেৰে আৰু কেভিলিং নকৰাকৈ অহৰহ অনুশীলন কৰে, তেওঁলোকো কৰ্মৰ পৰা মুক্ত হয়।

TamilIND

என்னுடைய இந்த உபதேசத்தை நம்பிக்கையுடனும், துக்கமின்றியும் தொடர்ந்து கடைப்பிடிப்பவர்களும் செயல்களிலிருந்து விடுபடுகிறார்கள்.

GujaratiIND

જેઓ મારા આ ઉપદેશનો નિરંતર શ્રધ્ધાથી અને કલંક વિના આચરણ કરે છે, તેઓ પણ કર્મથી મુક્ત થાય છે.

PunjabiIND

ਜੋ ਮੇਰੇ ਇਸ ਉਪਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਨਿਸ਼ਚਾ ਅਤੇ ਬੇਵਕੂਫੀ ਨਾਲ ਨਿਰੰਤਰ ਅਭਿਆਸ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਉਹ ਵੀ ਕਰਮਾਂ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ।

MalayalamIND

എൻ്റെ ഈ ഉപദേശം വിശ്വാസത്തോടും കൂസലില്ലാതെയും നിരന്തരം പരിശീലിക്കുന്നവർ, അവരും കർമ്മങ്ങളിൽ നിന്ന് മുക്തരാകുന്നു.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'ये मे मतमिदं ৷৷. श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो'-- किसी भी वर्ण, आश्रम, धर्म, सम्प्रदाय आदिका कोई भी मनुष्य यदि कर्म-बन्धनसे मुक्त होना चाहता है, तो उसे इस सिद्धान्तको मानकर इसका अनुसरण करना चाहिये। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ, कर्म आदि कुछ भी अपना नहीं है-- इस वास्तविकताको जान लेनेवाले सभी मनुष्य कर्म-बन्धनसे छूट जाते हैं। भगवान् और उनके मतमें प्रत्यक्षकी तरह निःसन्देह दृढ़ विश्वास और पूज्यभावसे युक्त मनुष्यको 'श्रद्धावन्तः' पदसे कहा गया है।शरीरादि जड पदार्थोंको अपने और अपने लिये न माननेसे मनुष्य मुक्त हो जाता है--इस वास्तविकतापर श्रद्धा होनेसे जडताके माने हुए सम्बन्धका त्याग करना सुगम हो जाता है।श्रद्धावान् साधक ही सत्- शास्त्र, सत्-चर्चा और सत्सङ्गकी बातें सुनता है और उनको आचरणोंमें लाता है।मनुष्यशरीर परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। अतः परमात्माको ही प्राप्त करनेकी एकमात्र उत्कट अभिलाषा होनेपर साधकमें श्रद्धा, तत्परता, संयतेन्द्रियता आदि स्वतः आ जाते हैं। अतः साधकको मुख्यरूपसेपरमात्मप्राप्तिकी अभिलाषा ही तीव्र बनाना चाहिये।पीछेके (तीसवें) श्लोकमें भगवान्ने अपना जो मत बताया है, उसमें दोष-दृष्टि न करनेके लिये यहाँ 'अन-सूयन्तः' पद दिया गया है। गुणोंमें दोष देखनेको 'असूया' कहते हैं। असूया-(दोषदृष्टि-) से रहित मनुष्योंको यहाँ अनसूयन्तः कहा गया है। जहाँ श्रद्धा रहती है, वहाँ भी किसी अंशमें दोषदृष्टि रह सकती है। इसलिये भगवान्ने 'श्रद्धावन्तः' पदके साथ 'अनसूयन्तः' पद भी देकर मनुष्यको दोषदृष्टिसे सर्वथा रहित (पूर्ण श्रद्धावान्) होनेके लिये कहा है। इसी प्रकार गीता-श्रवणका माहात्म्य बताते हुए भी भगवान्ने श्रद्धावाननसूयश्च (गीता 18। 71) पद देकर श्रोताके लिये श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टिसे रहित होनेकी बात कही है। 'भगवान्का मत तो उत्तम है, पर भगवान् कितनी आत्मश्लाघा, अभिमानकी बात कहते हैं कि सब कुछ मेरे ही अर्पण कर दो' अथवा 'यह मत तो अच्छा है, पर कर्मोंके द्वारा भगवत्प्राप्ति कैसे हो सकती है? कर्म तो जड और बाँधनेवाले होते हैं' आदि-आदि भाव आना ही भगवान्के मतमें दोष-दृष्टि करना है। साधकको भगवान् और उनके मत दोनोंमें ही दोष-दृष्टि नहीं करनी चाहिये।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

कर्म करने चाहिये ऐसा जो यह मत प्रमाणसहित कहा गया वह यथार्थ है ( ऐसा मानकर ) जो श्रद्धायुक्त मनुष्य गुरुस्वरूप मुझ वासुदेवमें असूया न करते हुए ( मेरे गुणोंमें दोष न देखते हुए ) मेरे इस मतके अनुसार चलते हैं वे ऐसे मनुष्य भी पुण्यपापरूप कर्मोंसे मुक्त हो जाते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

प्रकृतं भगवतो मतमुक्तप्रकारमनुसृत्यैवानुतिष्ठतां क्रममुक्तिफलं कथयति यदेतदिति। शास्त्राचार्योपदिष्टेऽदृष्टार्थे विश्वासवत्त्वं श्रद्दधानत्वं गुणेषु दोषाविष्करणमसूया अपिर्यथोक्ताया मुक्तेरमुख्यत्वद्योतनार्थः।

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Sri Dhanpati

येऽन्येऽपि मानवाः मम परमेश्वरस्य मतं फलाभिसंधिराहित्येन चित्तशोधकं कर्मानुष्ठेयमित्येवंरुपं सप्रमाणमुक्तमीश्वरेण सर्वज्ञेनाप्ततमेनोक्तं यत्तत्तथ्यमेवेति निश्चयः श्रद्धा तद्युक्ता अतएवानुसूयन्तो मयि परम गुरौ वासुदेवेऽसूयादुःखात्मके कर्मण्यस्मान् प्रेरयतीति सुखसाधने तस्मिन्दोषारोपणमकुर्वन्तोऽनुतिष्ठन्ति अनुवर्तन्ते तेऽप्येवंभूताः सत्त्वशुद्धद्धिद्वारा ज्ञानप्राप्त्या धर्माधर्माख्यैः कर्मभिर्मुच्यन्ते।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yewho
memy
matamteachings
idamthese
nityamconstantly
anutiṣhṭhantiabide by
mānavāḥhuman beings
śhraddhāvantaḥ
anasūyantaḥfree from cavilling
muchyantebecome free
tethose
apialso
karmabhiḥfrom the bondage of karma
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Bhagavad Gita · 3.30
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः

तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना, ममता और संताप-रहित होकर युद्धरूप कर्तव्य-कर्मको कर। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.32
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्। सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः

परन्तु जो मनुष्य मेरे इस मतमें दोष-दृष्टि करते हुए इसका अनुष्ठान नहीं करते, उन सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित और अविवेकी मनुष्योंको नष्ट हुए ही समझो। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 31
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 31
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः। श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः

जो मनुष्य दोष-दृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 31 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 31 का हिंदी अर्थ: "जो मनुष्य दोष-दृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 31?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 31 translates to: "Those who constantly practice this teaching of Mine with faith and without caviling, they too are freed from actions. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः। श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 31 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। जो मनुष्य दोष-दृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "ye me matam idaṁ nityam anutiṣhṭhanti mānavāḥ" mean in English?

"ye me matam idaṁ nityam anutiṣhṭhanti mānavāḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 31. Those who constantly practice this teaching of Mine with faith and without caviling, they too are freed from actions. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.