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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 30
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः

तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना, ममता और संताप-रहित होकर युद्धरूप कर्तव्य-कर्मको कर। — VaniSagar

Global Translations

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KannadaIND

ನನ್ನಲ್ಲಿರುವ ಎಲ್ಲಾ ಕ್ರಿಯೆಗಳನ್ನು ತ್ಯಜಿಸಿ, ಆತ್ಮವನ್ನು ಕೇಂದ್ರೀಕರಿಸಿ, ಭರವಸೆ ಮತ್ತು ಅಹಂಕಾರದಿಂದ ಮುಕ್ತವಾಗಿ ಮತ್ತು ಮಾನಸಿಕ ಜ್ವರದಿಂದ, ನೀನು ಹೋರಾಡು.

BengaliIND

আমার মধ্যে সমস্ত কর্ম ত্যাগ করে, আত্মকেন্দ্রিক মন নিয়ে, আশা ও অহংবোধ থেকে মুক্ত এবং মানসিক জ্বর থেকে তুমি যুদ্ধ কর।

TeluguIND

నాలోని అన్ని క్రియలను త్యజించి, ఆత్మపై మనస్సు కేంద్రీకరించి, ఆశ మరియు అహంభావం నుండి మరియు మానసిక జ్వరం నుండి విముక్తి పొంది, నీవు పోరాడు.

MarathiIND

माझ्यातील सर्व कर्मांचा त्याग करून, मन आत्मकेंद्री ठेवून, आशा आणि अहंकारापासून मुक्त होऊन आणि मानसिक तापापासून तू युद्ध कर.

TamilIND

என்னில் உள்ள அனைத்து செயல்களையும் துறந்து, சுயத்தை மையமாகக் கொண்டு, நம்பிக்கை மற்றும் அகங்காரத்திலிருந்து விடுபட்டு, மன காய்ச்சலிலிருந்து விடுபட்டு, போரிடு.

SindhiIND

مون ۾ سڀني عملن کي ڇڏي، نفس تي مرڪوز ذهن سان، اميد ۽ انا کان آزاد ٿي، ۽ ذهني بخار کان، توهان وڙهندا.

NepaliIND

ममा सबै कर्म त्यागेर, मनमा केन्द्रित भएर, आशा र अहंकारबाट मुक्त भएर, मानसिक ज्वरबाट मुक्त भएर तिमी युद्ध गर।

PunjabiIND

ਮੇਰੇ ਅੰਦਰ ਸਾਰੇ ਕਰਮਾਂ ਨੂੰ ਤਿਆਗ ਕੇ, ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਕੇਂਦਰਿਤ ਕਰ ਕੇ, ਆਸ਼ਾ ਅਤੇ ਹਉਮੈ ਤੋਂ ਰਹਿਤ ਅਤੇ ਮਾਨਸਿਕ ਤਾਪ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਹੋ ਕੇ, ਤੂੰ ਲੜ।

MalayalamIND

എന്നിലുള്ള എല്ലാ കർമ്മങ്ങളെയും ത്യജിച്ച്, മനസ്സിൽ കേന്ദ്രീകരിച്ച്, പ്രത്യാശയിൽ നിന്നും അഹംഭാവത്തിൽ നിന്നും, മാനസിക ജ്വരത്തിൽ നിന്നും, നീ യുദ്ധം ചെയ്യുക.

BhojpuriIND

हमरा में मौजूद सभ कर्म के त्याग करत, आत्म पर केंद्रित मन के साथ, आशा आ अहंकार से मुक्त, आ मानसिक बोखार से मुक्त, तू लड़ाई लड़ऽ।

MaithiliIND

हमरा मे सब कर्म के त्याग करैत, आत्म पर केन्द्रित मन, आशा आ अहंकार सँ मुक्त, आ मानसिक ज्वर सँ मुक्त, अहाँ लड़ू।

KonkaniIND

म्हज्यांतल्या सगळ्या कर्मांचो त्याग करून, आत्म्याक केंद्रीत आशिल्लें मन, आशा आनी अहंकार मुक्त आनी मानसीक जोरांतल्यान मुक्त करून तूं झुजचें.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

3.30।। व्याख्या--'मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा'-- प्रायः साधकका यह विचार रहता है कि कर्मोंसे बन्धन होता है और कर्म किये बिना कोई रह सकता नहीं; इसलिये कर्म करनेसे तो मैं बँध जाऊँगा! अतः कर्म किस प्रकार करने चाहिये, जिससे कर्म बन्धनकारक न हों, प्रत्युत मुक्तिदायक हो जायँ-- इसके लिये भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तू अध्यात्मचित्त-(विवेक-विचारयुक्त अन्तःकरण-) से सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको मेरे अर्पण कर दे अर्थात् इनसे अपना कोई सम्बन्ध मत मान। कारण कि वास्तवमें संसार-मात्रकी सम्पूर्ण क्रियाओंमें केवल मेरी शक्ति ही काम कर रही है। शरीर, इन्द्रियाँ, पदार्थ आदि भी मेरे हैं और शक्ति भी मेरी है। इसलिये 'सब कुछ भगवान्का है और भगवान् अपने हैं'-- गम्भीरतापूर्वक ऐसा विचार करके जब तू कर्वव्य-कर्म करेगा, तब वे कर्म तेरेको बाँधनेवाले नहीं होंगे, प्रत्युत उद्धार करनेवाले हो जायँगे। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ आदिपर अपना कोई अधिकार नहीं चलता-- यह मनुष्यमात्रका अनुभव है। ये सब प्रकृतिके हैं-- 'प्रकृतिस्थानि' और 'स्वयं 'परमात्माका है-- 'ममैवांशो जीवलोके' (गीता 15। 7)। अतः शरीरादि पदार्थोंमें भूलसे माने हुए अपनेपनको हटाकर इनको भगवान्का ही मानना (जो कि वास्तवमें है) 'अर्पण' कहलाता है। अतः अपने विवेकको महत्त्व देकर पदार्थों और कर्मोंसे मूर्खतावश माने हुए सम्बन्धका त्याग करना ही अर्पण करनेका तात्पर्य है।'अध्यात्मचेतसा' पदसे भगवान्का यह तात्पर्य है कि किसी भी मार्गका साधक हो, उसका उद्देश्य आध्यात्मिक होना चाहिये, लौकिक नहीं। वास्तवमें उद्देश्य या आवश्यकता सदैव नित्यतत्त्वकी (आध्यात्मिक) होती है और कामना सदैव अनित्यतत्त्व (उत्पत्ति विनाशशील वस्तु) की होती है। साधकमें उद्देश्य होना चाहिये कामना नहीं। उद्देश्यवाला अन्तःकरण विवेक-विचारयुक्त ही रहता है।दार्शनिक अथवा वैज्ञानिक, किसी भी दृष्टिसे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि शरीरादि भौतिक पदार्थ अपने हैं। वास्तवमें ये पदार्थ अपने और अपने लिये हैं ही नहीं, प्रत्युत केवल सदुपयोग करनेके लिये मिले हुए हैं। अपने न होनेके कारण ही इनपर किसीका आधिपत्य नहीं चलता।संसारमात्र परमात्माका है; परन्तु जीव भूलसे परमात्माकी वस्तुको अपनी मान लेता है और इसीलिये बन्धनमें पड़ जाता है। अतः विवेक-विचारके द्वारा इस भूलको मिटाकर सम्पूर्ण पदार्थों और कर्मोंको अध्यात्मतत्त्व(परमात्मा) का स्वीकार कर लेना ही अध्यात्मचित्तके द्वारा उनका अर्पण करना है।इस श्लोकमें 'अध्यात्मचेतसा' पद मुख्यरूपसे आया है। तात्पर्य यह है कि अविवेकसे ही उत्पत्ति-विनाशशील शरीर (संसार) अपना दीखता है। यदि विवेक-विचार-पूर्वक देखा जाय तो शरीर या संसार अपना नहीं दीखेगा, प्रत्युत एक अविनाशी परमात्मतत्त्व ही अपना दीखेगा। संसारको अपना देखना ही पतन है और अपना न देखना ही उत्थान है--

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तो फिर कर्माधिकारी अज्ञानी मुमुक्षुको किस प्रकार कर्म करना चाहिये सो कहते हैं मुझ सर्वात्मरूप सर्वज्ञ परमेश्वर वासुदेवमें विवेकबुद्धिसे सब कर्म छोड़कर अर्थात् मैं सब कर्म ईश्वरके लिये सेवककी तरह कर रहा हूँ इस बुद्धिसे सब कर्म मुझमें अर्पण करके तथा निराशी आशारहित और निर्मम यानी जिसका मेरापन सर्वथा नष्ट हो चुका हो उसे निर्मम कहते हैं ऐसा होकर तू शोकरहित हुआ युद्ध कर अर्थात् चिन्तासंतापसे रहित हुआ युद्ध कर।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

यद्यपि कर्मण्यज्ञोऽधिक्रियते तथापि मोक्ष्यमाणेन तेन कर्म त्यक्तव्यं मोक्षस्य कर्मासाध्यत्वान्नतु तेन कर्म कर्तुं शक्यं कर्मणः सापेक्षितविरोधित्वादिति शङ्कते कथमिति। श्लोकेनोत्तरमाह उच्यत इति। यथोक्ते परस्मिन्नात्मनि सर्वकर्मणां समर्पणे कारणमाह अध्यात्मेति। विवेकबुद्धिमेव व्याकरोति अहमिति। दर्शितरीत्या कर्मसु प्रवृत्तस्य कर्तव्यान्तरमाह किञ्चेति। त्यक्ताशीः फलप्रार्थनाहीनः सन्नित्यर्थः। निर्ममो भूत्वा पुत्रभ्रात्रादिष्विति शेषः। ननु युद्धे नियोगो नोपपद्यते पुत्रभ्रात्रादिहिंसात्मनस्तस्य संतापहेतोर्नियोगविषयत्वायोगादिति तत्राह विगतेति।

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Sri Dhanpati

ननु नाहं तत्त्ववित् किंत्वज्ञो मुमुक्षुर्मया कथं कर्म कर्तव्यमिति चेत्तत्राह मयीति। मयि परमेश्वरे सर्वाणि वैदिकानि लौकिकानि च कर्माणि अध्यात्मचेतसा विवेकबुद्य्धाऽहंकर्तेश्वराय भृत्यवत्करोमीत्यनया बुद्य्धा संन्यस्य समर्प्य निराशीः फलाभिसंधिरहितः ममत्वशून्यस्त्वं भूत्वा विगतज्वरो विगतशोकः सन् युध्यस्व। यत्त्वत्र भगवदर्पणं निष्कामत्वं च सर्वकर्मसाधारणं मुमुक्षोः निर्ममत्वं त्यक्तशोकत्वं च युद्धमात्रे प्रकृत इति द्रष्टव्यमन्यत्र ममताशोकयोप्रसक्तत्वादिति तच्चिन्त्यम्। सर्वस्मिन्कर्मणि ममेदमिति ममत्वस्य निष्फले कष्टसाध्ये वा कर्मणि ज्वरस्य च प्रसक्तत्वात्। शोकादेर्निवृत्त्यर्थमेव सिद्य्धसिद्य्धोः समो भूत्वेति भगवतोक्तत्वाच्चेति दिक्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
mayiunto me
sarvāṇiall
karmāṇiworks
sannyasyarenouncing completely
adhyātmachetasā
nirāśhīḥfree from hankering for the results of the actions
nirmamaḥwithout ownership
bhūtvāso being
yudhyasvafight
vigatajvaraḥ
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.29
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु। तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्

प्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं। उन पूर्णतया न समझनेवाले मन्दबुद्धि अज्ञानियोंको पूर्णतया जाननेवाला ज्ञानी मनुष्य विचलित न करे। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.31
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः। श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः

जो मनुष्य दोष-दृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 30
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 30
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः

तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना, ममता और संताप-रहित होकर युद्धरूप कर्तव्य-कर्मको कर। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 30 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 30 का हिंदी अर्थ: "तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना, ममता और संताप-रहित होकर युद्धरूप कर्तव्य-कर्मको कर। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 30?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 30 translates to: "Renouncing all actions in Me, with the mind centered on the Self, free from hope and egoism, and from mental fever, fight thou. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 30 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना, ममता और संताप-रहित होकर युद्धरूप कर्तव्य-कर्मको कर। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "mayi sarvāṇi karmāṇi sannyasyādhyātma-chetasā" mean in English?

"mayi sarvāṇi karmāṇi sannyasyādhyātma-chetasā" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 30. Renouncing all actions in Me, with the mind centered on the Self, free from hope and egoism, and from mental fever, fight thou. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.