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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 29
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु। तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्

प्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं। उन पूर्णतया न समझनेवाले मन्दबुद्धि अज्ञानियोंको पूर्णतया जाननेवाला ज्ञानी मनुष्य विचलित न करे। — VaniSagar

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BengaliIND

যারা প্রকৃতির গুণাবলী দ্বারা বিভ্রান্ত হয় তারা গুণের কাজের সাথে সংযুক্ত থাকে। নিখুঁত জ্ঞানের লোকের উচিত অপূর্ণ জ্ঞানের মূর্খকে অস্থির করা না।

KannadaIND

ಪ್ರಕೃತಿಯ ಗುಣಗಳಿಂದ ಭ್ರಮೆಗೊಂಡವರು ಗುಣಗಳ ಕಾರ್ಯಗಳಿಗೆ ಅಂಟಿಕೊಂಡಿರುತ್ತಾರೆ. ಪರಿಪೂರ್ಣ ಜ್ಞಾನದ ಮನುಷ್ಯನು ಅಪೂರ್ಣ ಜ್ಞಾನದ ಮೂರ್ಖನನ್ನು ಅಶಾಂತಿಗೊಳಿಸಬಾರದು.

TamilIND

இயற்கையின் குணங்களால் ஏமாற்றப்பட்டவர்கள் குணங்களின் செயல்பாடுகளுடன் இணைந்திருக்கிறார்கள். பரிபூரண அறிவுடைய மனிதன், அபூரண அறிவுடைய முட்டாள் ஒருவனைத் தொந்தரவு செய்யக்கூடாது.

MalayalamIND

പ്രകൃതിയുടെ ഗുണങ്ങളാൽ വഞ്ചിതരായവർ ഗുണങ്ങളുടെ പ്രവർത്തനങ്ങളുമായി ബന്ധപ്പെട്ടിരിക്കുന്നു. തികഞ്ഞ അറിവുള്ള മനുഷ്യൻ അപൂർണ്ണമായ അറിവുള്ള മൂഢനെ അസ്വസ്ഥനാക്കരുത്.

TeluguIND

ప్రకృతి గుణములచే భ్రమింపబడిన వారు గుణముల యొక్క విధులతో ముడిపడి ఉంటారు. పరిపూర్ణ జ్ఞానం ఉన్న వ్యక్తి అపరిపూర్ణ జ్ఞానం ఉన్న మూర్ఖుడిని కలవరపెట్టకూడదు.

NepaliIND

प्रकृतिका गुणहरूद्वारा मोहित भएकाहरू गुणहरूको कार्यमा संलग्न हुन्छन्। सिद्ध ज्ञान भएको मानिसले अपूर्ण ज्ञान भएको मूर्खलाई विचलित गर्नु हुँदैन।

MarathiIND

जे प्रकृतीच्या गुणांनी मोहित होतात ते गुणांच्या कार्याशी संलग्न असतात. परिपूर्ण ज्ञान असलेल्या माणसाने अपूर्ण ज्ञान असलेल्या मूर्खाला अस्वस्थ करू नये.

PunjabiIND

ਕੁਦਰਤ ਦੇ ਗੁਣਾਂ ਦੁਆਰਾ ਭਰਮਾਉਣ ਵਾਲੇ ਗੁਣਾਂ ਦੇ ਕਾਰਜਾਂ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਹੋਏ ਹਨ। ਪੂਰਨ ਗਿਆਨ ਵਾਲੇ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਅਪੂਰਣ ਗਿਆਨ ਵਾਲੇ ਮੂਰਖ ਨੂੰ ਪਰੇਸ਼ਾਨ ਨਹੀਂ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ।

GujaratiIND

પ્રકૃતિના ગુણોથી ભ્રમિત થયેલાઓ ગુણોના કાર્યો સાથે જોડાયેલા છે. સંપૂર્ણ જ્ઞાનવાળા માણસે અપૂર્ણ જ્ઞાનવાળા મૂર્ખને અસ્વસ્થ ન કરવું જોઈએ.

SindhiIND

جيڪي فطرت جي خاصيتن کان گمراھ ٿيل آھن، اھي صفتن جي ڪمن سان جڙيل آھن. ڪامل علم رکندڙ انسان کي ان بيوقوف کي پريشان نه ڪرڻ گهرجي جيڪو ناقص علم وارو آهي.

AssameseIND

প্ৰকৃতিৰ গুণেৰে মোহগ্ৰস্ত সকল গুণৰ কাৰ্য্যৰ লগত জড়িত হৈ থাকে। সিদ্ধ জ্ঞানৰ মানুহে অসিদ্ধ জ্ঞানৰ মূৰ্খক অস্থিৰ কৰিব নালাগে।

MizoIND

Nature miziain a tihbuaite chu mizia hnathawhnaah an innghat tlat a ni. Hriatna famkim neitu chuan hriatna famkim nei mi â chu a tibuai tur a ni lo.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

3.29।। व्याख्या--'प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु'-- सत्त्व, रज और तम-- ये तीनों प्रकृतिजन्य गुण मनुष्यको बाँधनेवाले हैं। सत्त्वगुण सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे रजोगुण कर्मकी आसक्तिसे, और तमोगुण प्रमाद, आलस्य तथा निद्रासे मनुष्यको बाँधता है (गीता 14। 6 8)। उपर्युक्त पदोंमें उन अज्ञानियोंका वर्णन है, जो प्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित अर्थात् बँधे हुए हैं; परन्तु जिनका शास्त्रोंमें, शास्त्रविहित शुभकर्मोंमें तथा उन कर्मोंके फलोंमें श्रद्धा-विश्वास है। इसी अध्यायके पचीसवें-छब्बीसवें श्लोकोंमें ऐसे अज्ञानी पुरुषोंका 'सक्ताः अविद्वांसः' और 'कर्मसङ्गिनाम् अज्ञानाम्'नामसे वर्णन हुआ है। लौकिक और पारलौकिक भोगोंकी कामनाके कारण ये पुरुष पदार्थों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं। इस कराण इनसे ऊँचे उठनेकी बात समझ नहीं सकते। इसीलिये भगवान्ने इन्हें अज्ञानी कहा है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

परंतु जो प्रकृतिके गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए पुरुष हम अमुक फलके लिये यह कर्म करते हैं इस प्रकार गुणोंके कर्मोंमें आसक्त होते हैं। उन पूर्णरूपसे न समझनेवाले कर्मफलमात्रको ही देखनेवाले और कर्मोंमें आसक्त मन्दबुद्धि पुरुषोंको अच्छी प्रकार समस्त तत्त्वको समझनेवाला आत्मज्ञानी पुरुष स्वयं चलायमान न करे। अभिप्राय यह कि बुद्धिभेद करना ही उनको चलायमान करना है सो न करे।

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Sri Anandgiri

विद्वानविद्वानित्युभावपि प्रकृत्य विद्वानविदुषो बुद्धिभेदं न कुर्यादित्युपसंहरति ये पुनरिति। प्रकृतेरुक्तगुणैर्देहादिभिर्विकारैः संमूढास्तानेवात्मत्वेन मन्यमाना ये ते गुणानां तेषामेव देहादीनां कर्मसु व्यापारेषु सज्जन्ते सक्तिं दृढतरामात्मीयबुद्धिं कुर्वन्तीत्याह प्रकृतेरित्यादिना। तेषामनात्मविदां स्वयमात्मविद् बुद्धिभेदं नापादयेदित्याह तानित्यादिना।

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Sri Dhanpati

विद्वत्स्वरुपमविद्वत्स्वरुपं च प्रकृतमुपपाद्य विद्वानविदुषो बुद्धिभेदनं न कुर्यादित्युपसंहरति प्रकृतेरिति। प्रकृतेः प्रधानस्य मायाशक्तेर्गुणैर्विकारैः कार्यकरणरुपैः सम्यग्मूढाः स्वस्वरुपास्फुरणेन तानेवात्मतया मन्यमानास्तेषामेव गुणानां कर्मसु व्यापारेषु सज्जन्ते। वयं कुर्मः फलायेति दृढतस्वकीयबुद्धिं कुर्वन्ति ये तान्कर्मसङ्गिनोऽतएवाकृत्स्त्रविद आत्मज्ञानशून्यान् यतो मन्दप्रज्ञान् कृत्स्त्रविदात्मवित्आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् इतिश्रुत्यात्मविदः कृतस्त्रवित्त्वप्रतिपादनात् स्वयं न विचालयेत्। बुद्धिभेदं न कुर्यादित्यर्थः। प्रकृतेर्गुणैः सत्त्वादिभिरिति व्याख्यानं तु भाष्यविरुद्धम्। प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैरित्यत्रेन्द्रियैरिति स्वोत्त्यननुरुपं च। एतेन गुणेष्विन्द्रियेषु तत्कर्मसु च प्रकृतेः संबन्धिषु गुणेषु देहादिषु कर्मसु गमनादिषु चेति व्याख्यानद्वयमपि प्रत्युक्तम्। देहेन्द्रियाद्यासक्तेर्गुणसंमूढा इत्यनेनैवोक्तत्वात्। प्रकृतेरित्यस्य गुणकर्मस्वित्यनेन संबन्धस्य प्रयोजनशून्यत्वाच्च।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
prakṛiteḥof material nature
guṇaby the modes of material nature
sammūḍhāḥdeluded
sajjantebecome attached
guṇakarmasu
tānthose
akṛitsnavidaḥ
mandānthe ignorant
kṛitsnavit
na vichālayetshould not unsettle
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.28
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते

हे महाबाहो! गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष 'सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं' -- ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.30
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः

तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना, ममता और संताप-रहित होकर युद्धरूप कर्तव्य-कर्मको कर। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 29
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 29
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु। तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्

प्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं। उन पूर्णतया न समझनेवाले मन्दबुद्धि अज्ञानियोंको पूर्णतया जाननेवाला ज्ञानी मनुष्य विचलित न करे। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 29 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 29 का हिंदी अर्थ: "प्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं। उन पूर्णतया न समझनेवाले मन्दबुद्धि अज्ञानियोंको पूर्णतया जाननेवाला ज्ञानी मनुष्य विचलित न करे। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 29?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 29 translates to: "Those deluded by the qualities of Nature are attached to the functions of the qualities. The man of perfect knowledge should not unsettle the foolish one who is of imperfect knowledge. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु। तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचा" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 29 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। प्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं। उन पूर्णतया न समझनेवाले मन्दबुद्धि अज्ञानियोंको पूर्णतया जाननेवाला ज्ञानी मनुष्य विचलित न करे। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "prakṛiter guṇa-sammūḍhāḥ sajjante guṇa-karmasu" mean in English?

"prakṛiter guṇa-sammūḍhāḥ sajjante guṇa-karmasu" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 29. Those deluded by the qualities of Nature are attached to the functions of the qualities. The man of perfect knowledge should not unsettle the foolish one who is of imperfect knowledge. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.