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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 28
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते

हे महाबाहो! गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष 'सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं' -- ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता। — VaniSagar

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KannadaIND

ಆದರೆ ಹೇ ಪರಾಕ್ರಮಿ ಅರ್ಜುನನೇ, ಗುಣಗಳ ವಿಭಾಗಗಳು ಮತ್ತು ಅವುಗಳ ಕಾರ್ಯಗಳ ಬಗ್ಗೆ ಸತ್ಯವನ್ನು ತಿಳಿದಿರುವವನು, ಗುಣಗಳು ಇಂದ್ರಿಯಗಳಾಗಿ, ಗುಣಗಳ ನಡುವೆ, ಇಂದ್ರಿಯ-ವಸ್ತುಗಳಾಗಿ, ಅಂಟಿಕೊಂಡಿಲ್ಲ ಎಂದು ತಿಳಿದಿರುತ್ತಾನೆ.

BengaliIND

কিন্তু যিনি সত্য জানেন, হে পরাক্রমশালী অর্জুন, গুণের বিভাজন ও তাদের কার্যাবলী সম্বন্ধে, তিনি জানেন যে গুণ, ইন্দ্রিয়রূপে, গুণের মধ্যে, ইন্দ্রিয়-বস্তু হিসাবে, সংযুক্ত নয়।

PunjabiIND

ਪਰ ਉਹ ਜੋ ਸੱਚ ਨੂੰ ਜਾਣਦਾ ਹੈ, ਹੇ ਸ਼ਕਤੀਸ਼ਾਲੀ ਅਰਜੁਨ, ਗੁਣਾਂ ਦੀ ਵੰਡ ਅਤੇ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਕਾਰਜਾਂ ਬਾਰੇ, ਇਹ ਜਾਣਦਾ ਹੈ ਕਿ ਗੁਣ, ਇੰਦਰੀਆਂ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ, ਗੁਣਾਂ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ, ਗਿਆਨ-ਵਸਤੂਆਂ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ, ਜੁੜੇ ਨਹੀਂ ਹਨ।

SindhiIND

پر اھو جيڪو سچ کي ڄاڻي ٿو، اي طاقتور ارجن، خاصيتن جي تقسيم ۽ انھن جي ڪمن جي باري ۾، اھو ڄاڻندو آھي ته گونا، حسي طور تي، گون جي وچ ۾ ھلندا آھن، جيئن حسي شيون، جڙيل نه آھن.

TeluguIND

కానీ గుణాలు, ఇంద్రియాలు, ఇంద్రియాల మధ్య, ఇంద్రియ వస్తువులుగా, గుణాల మధ్య కదులుతాయని తెలుసుకుని, గుణాల విభజనలు మరియు వాటి విధుల గురించి సత్యాన్ని తెలిసినవాడు.

MarathiIND

परंतु हे पराक्रमी अर्जुना, ज्याला सत्य माहीत आहे, गुणांच्या विभागणीबद्दल आणि त्यांच्या कार्यांबद्दल, तो जाणतो की, गुण, इंद्रियांच्या रूपात, गुणांमध्ये, इंद्रिय-वस्तुंप्रमाणे फिरतात, संलग्न नाहीत.

GujaratiIND

પણ જે સત્યને જાણે છે, હે પરાક્રમી અર્જુન, ગુણોના વિભાજન અને તેમના કાર્યો વિશે, તે જાણીને કે ગુણો, ઇન્દ્રિયોની જેમ, ગુણોની વચ્ચે, ઇન્દ્રિય-પદાર્થો તરીકે ફરે છે, તે જોડાયેલ નથી.

NepaliIND

तर, हे पराक्रमी अर्जुन, गुणहरूको विभाजन र तिनका कार्यहरूका बारेमा सत्यलाई जान्ने व्यक्तिले गुणहरू इन्द्रियहरूका रूपमा गुणहरूका बीचमा इन्द्रिय-वस्तुहरूका रूपमा चल्दछन् भन्ने कुरालाई जान्दछन्।

TamilIND

ஆனால், ஓ வலிமையான ஆயுதம் கொண்ட அர்ஜுனா, குணங்களின் பிரிவுகள் மற்றும் அவற்றின் செயல்பாடுகள் பற்றிய உண்மையை அறிந்தவன், குணங்கள், புலன்களாக, குணங்களின் மத்தியில், இந்திரியப் பொருட்களாக, இணைக்கப்படவில்லை என்பதை அறிவான்.

MalayalamIND

എന്നാൽ, ബലവാനായ അർജ്ജുനാ, ഗുണങ്ങളുടെ വിഭജനത്തെയും അവയുടെ പ്രവർത്തനങ്ങളെയും കുറിച്ചുള്ള സത്യം അറിയുന്നവൻ, ഗുണങ്ങൾ ഇന്ദ്രിയങ്ങളായി, ഗുണങ്ങൾക്കിടയിൽ, ഇന്ദ്രിയവസ്തുക്കൾ എന്ന നിലയിൽ, ചലിക്കുന്നില്ലെന്ന് അറിയുന്നു.

KonkaniIND

पूण जो गुणांच्या विभागाविशीं आनी तांच्या कार्यांविशीं सत्य जाणता, हे पराक्रमी अर्जुन, गुणां इंद्रियां म्हणून गुणांमदीं, इंद्रिय-वस्तू म्हूण हालतात हें जाणून, तो आसक्त ना.

OdiaIND

କିନ୍ତୁ ଯିଏ ସତ୍ୟ ଜାଣେ, ହେ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ସଶସ୍ତ୍ର ଅର୍ଜୁନ, ଗୁଣଗୁଡ଼ିକର ବିଭାଜନ ଏବଂ ସେମାନଙ୍କର କାର୍ଯ୍ୟ ବିଷୟରେ, ଜାଣେ ଯେ ଗୁନାମାନେ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ଭାବରେ ଗୁନା ମଧ୍ୟରେ ଗତି କରନ୍ତି, ଯେପରି ଇନ୍ଦ୍ରିୟ-ବସ୍ତୁଗୁଡ଼ିକ ସଂଲଗ୍ନ ନୁହେଁ |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः'-- पूर्वश्लोकमें वर्णित 'अहंकारविमूढात्मा' (अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाले पुरुष) से तत्त्वज्ञ महापुरुषको सर्वथा भिन्न और विलक्षण बतानेके लिये यहाँ 'तु' पदका प्रयोग हुआ है।सत्त्व, रज और तम--ये तीनों गुण प्रकृतिजन्य हैं। इन तीनों गुणोंका कार्य होनेसे सम्पूर्ण सृष्टि त्रिगुणात्मिका है। अतः शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राणी, पदार्थ आदि सब गुणमय ही हैं। यही 'गुण-विभाग' कहलाता है। इन (शरीरादि) से होनेवाली क्रिया 'कर्मविभाग' कहलाती है।गुण और कर्म अर्थात् पदार्थ और क्रियाएँ निरन्तर परिवर्तनशील हैं। पदार्थ उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं तथा क्रियाएँ आरम्भ और समाप्त होनेवाली हैं। ऐसा ठीक-ठीक अनुभव करना ही गुण और कर्म-विभागको तत्त्वसे जानना है। चेतन (स्वरूप) में कभी क्रिया नहीं होती। वह सदा निर्लिप्त ,निर्विकार रहता है अर्थात् उसका किसी भी प्राकृत पदार्थ और क्रियासे सम्बन्ध नहीं होता। ऐसा ठीक-ठीक अनुभव करना ही चेतनको तत्त्वसे जानना है।अज्ञानी पुरुष जब इन गुण-विभाग और कर्म-विभागसे अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह बँध जाता है। शास्त्रीय दृष्टिसे तो इस बन्धनका मुख्य कारण 'अज्ञान' है, पर साधककी दृष्टिसे 'राग' ही मुख्य कारण है। राग 'अविवेक' से होता है। विवेक जाग्रत् होनेपर राग नष्ट हो जाता है। यह विवेक मनुष्यमें विशेषरूपसे है। आवश्यकता केवल इस विवेकको महत्त्व देकर जाग्रत् करनेकी है। अतः साधकको (विवेक जाग्रत् करके) विशेषरूपसे रागको ही मिटाना चाहिये।तत्त्वको जाननेकी इच्छा रखनेवाला साधक भी अगर गुण (पदार्थ) और कर्म-(क्रिया-) से अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानता, तो वह भी गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जान लेता है। चाहे गुणविभाग और कर्मविभागको तत्त्वसे जाने, चाहे 'स्वयं'-(चेतन-स्वरूप-) को तत्त्वसे जाने, दोनोंका परिणाम एक ही होगा।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

परंतु जो ज्ञानी है हे महाबाहो वह तत्त्ववेत्ता किसका तत्त्ववेत्ता गुणकर्मविभागका अर्थात् गुणविभाग और कर्मविभागके तत्त्वको जाननेवाला ज्ञानी इन्द्रियादिरूप गुण ही विषयरूप गुणोंमें बर्त रहे हैं आत्मा नहीं बर्तता ऐसे मानकर आसक्त नहीं होता। उन कर्मोंमें प्रीति नहीं करता।

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Sri Anandgiri

अज्ञस्य कर्मसु शक्तिमुक्त्वा विदुषस्तदभावमभिदधाति यः पुनरिति। तत्त्वं याथार्थ्यं वेत्तीति व्युत्पत्त्या तत्त्वविदिति तुशब्देनाज्ञाद्विशिष्टे निर्दिष्टप्रश्नपूर्वकं द्वितीयपादमवतार्य व्याचष्टे कस्येत्यादिना। गुणानामेव गुणेषु वर्तमानत्वमयुक्तं निर्गुणत्वात्तेषामित्याशङ्क्य विभजते गुणा इति। कार्यकरणानामेव विषयेषु प्रवृत्तिरात्मनस्तु कूटस्थत्वान्मैवमिति ज्ञात्वा तत्त्ववित्कर्मसु दृढतरं कर्तव्याभिमानं न करोतीत्यर्थः।

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Sri Dhanpati

तत्त्ववित्तु। तुशब्दोऽज्ञाद्वैलक्षण्यद्योतनार्थः। कस्य तत्त्वविदित्यतआह। गुणकर्मविभागयोः गुणविभागस्य कर्मविभागस्य च तत्त्वविदित्यर्थ इति भाष्यम्। अस्यायमर्थः। नाहं कार्यकरणसंघातात्मेति गुणेभ्य आत्मनो विभागः न मे कर्माणीत्यात्मनस्तेभ्यो विभागः गुणकर्मभ्यां विभक्तात्मसाक्षात्कारवान्। तथाच नायमहंकारविमूढात्मा नापि कर्मण्यासक्तो येनाहंकर्तेति मन्येत। विभागपदाभावे त्वयमर्थो न लभ्यते। विग्रहस्तु विभागश्च विभागश्च विभागौ गुणकर्मभ्यो विभागौ गुणकर्मविभागौ तयोर्गुणकर्मविभागयोरिति बोध्यः। एतेन गुणविभागस्य कर्मविभागस्य च तत्त्वविदिति वा। अस्मिन्पक्षे गुणकर्मणोरित्येतावतैव निर्वाहे विभागपदस्य प्रयोजनं चिन्त्यमित्याक्षेपः प्रत्युक्तः। यत्त्वाक्षेप्त्रा स्वव्याख्यानं प्रदर्शितं गुणानि देहेन्द्रियान्तःकरणान्यहंकारास्पदानि कर्माणि च तेषां व्यापारभूतानि ममकारास्पदानीति। गुणकर्मेति द्वन्द्वैकवद्भावः। विभज्यते सर्वेषां जडानां विकारिणां भासकत्वेन यथा भवतीति विभागः स्वप्रकाशज्ञानरुपोऽसङ्ग आत्मा गुणकर्म च विभागश्चेति द्वन्द्वः तयोर्गुणकर्मविभागयोर्भास्यभासकयोर्जडचैतन्ययोर्विकारीनिर्विकारयोस्तत्त्वं याथात्म्यं यो वेत्तीति तच्चिन्त्यम्। गुणकर्मेत्यस्यैकपदत्वेऽल्पाच्त्वाद्भ्यर्हितत्वाच्च विभागपदस्य पूर्वनिपातापत्तेश्छान्दसत्वनिपातप्रकरणानित्यत्वयोराश्रयणस्य भाष्योक्तरीत्या सत्यां गतावनुचितत्वात्। विभागपदस्य प्रसिद्धमर्थं परित्यज्याप्रसिद्धार्थकल्पनायाः क्लिष्टकल्पनायाश्चान्याय्यत्वादितिदिक्। यदप्यन्ते यस्तत्त्ववित्सः गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा गुणविभागे कर्मविभागे च न सज्जत इति योजना। गुणानां सत्त्वरजस्तमसां विभागः बुद्य्धहंकारज्ञानेन्द्रियविषयरुपेण विभज्यावस्थानं तस्मिन्न सज्जते इदमहमिति न मन्यते। एतेन कर्मविभागोऽप्यावश्यकत्वेन व्याख्यातः। अन्यथा चिदात्मन्येवादानादिकर्तृव्यं दुःखादिमत्त्वं चापतति तथाचात्मानात्मनोर्याथात्म्यज्ञः व्यापृतेष्वहंकारादिषु तत्कर्मसु चाभिमानादिषु कुसुमेषु सूत्रमिवानुवर्तमानमात्मानं तेभ्यः पृथग्भूतं जानन् गुणा धीचक्षुरादयो गुणेषु दुःखरुपादिषु वर्तन्ते न त्वात्मेति मत्वा न सज्जतेऽहमेव हस्तादिसंघातरूपो ममैवेदमादानादिकं कर्मेति न सक्तो भवतीत्यर्थ इति तदपि विचार्यम्। गुणाकर्मणोर्न सज्जत इत्येतावतैव निर्वाहे विभागपदवैयर्थ्यापत्तेः तथाचेत्यादिग्रन्थस्य स्वव्याख्यानाननुरुपत्वाच्चेति दिक्। गुणाः करणात्मकाः गुणेषु विषयेषु प्रवर्तन्ते नात्मेति मत्वा न सज्जते सक्तिं कर्तृत्वाभिनिवेशं न करोति। महान्तौ बाहू शत्रुहनने प्रवर्तेते नाहमिति मत्वा त्वमपि कर्तृत्वाभिनिवेशं कर्तुं नार्हसीति ध्वनयन्नाह हे माहबाहो इति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
tattvavit
tubut
mahābāho
guṇakarma
vibhāgayoḥdistinguish
guṇāḥmodes of material nature in the shape of the senses, mind, etc
guṇeṣhumodes of material nature in the shape of objects of perception
vartanteare engaged
itithus
matvāknowing
nanever
sajjatebecomes attached
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.27
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते

सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' -- ऐसा मानता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.29
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु। तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्

प्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं। उन पूर्णतया न समझनेवाले मन्दबुद्धि अज्ञानियोंको पूर्णतया जाननेवाला ज्ञानी मनुष्य विचलित न करे। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 28
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 28
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते

हे महाबाहो! गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष 'सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं' -- ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 28 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 28 का हिंदी अर्थ: "हे महाबाहो! गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष 'सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं' -- ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 28?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 28 translates to: "But he who knows the Truth, O mighty-armed Arjuna, about the divisions of the qualities and their functions, knowing that the Gunas, as senses, move amidst the Gunas, as the sense-objects, is not attached. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 28 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। हे महाबाहो! गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष 'सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं' -- ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "tattva-vit tu mahā-bāho guṇa-karma-vibhāgayoḥ" mean in English?

"tattva-vit tu mahā-bāho guṇa-karma-vibhāgayoḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 28. But he who knows the Truth, O mighty-armed Arjuna, about the divisions of the qualities and their functions, knowing that the Gunas, as senses, move amidst the Gunas, as the sense-objects, is not attached. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.