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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 27
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते

सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' -- ऐसा मानता है। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

সমস্ত কর্ম সব ক্ষেত্রেই প্রকৃতির গুণাবলী দ্বারা পরিচালিত হয়। যার মন অহংকারে বিভ্রান্ত হয় সে মনে করে, "আমিই কর্তা।

NepaliIND

सबै कार्यहरू सबै अवस्थामा प्रकृतिका गुणहरूद्वारा मात्र गरिन्छ। जसको मन अहंकारले मोहित छ, उसले सोच्छ– म कर्ता हुँ।

KannadaIND

ಎಲ್ಲಾ ಕ್ರಿಯೆಗಳು ಎಲ್ಲಾ ಸಂದರ್ಭಗಳಲ್ಲಿ ಕೇವಲ ಪ್ರಕೃತಿಯ ಗುಣಗಳಿಂದ ಮಾಡಲ್ಪಟ್ಟಿದೆ. ಯಾರ ಮನಸ್ಸು ಅಹಂಕಾರದಿಂದ ಭ್ರಮಿಸಲ್ಪಟ್ಟಿದೆಯೋ ಅವನು ಯೋಚಿಸುತ್ತಾನೆ, "ನಾನೇ ಮಾಡುವವನು.

MalayalamIND

എല്ലാ പ്രവർത്തനങ്ങളും പ്രകൃതിയുടെ ഗുണങ്ങളാൽ മാത്രം സംഭവിക്കുന്നു. അഹംഭാവത്താൽ വഞ്ചിതനായ മനസ്സ് ചിന്തിക്കുന്നു, "ഞാൻ തന്നെയാണ് ചെയ്യുന്നവൻ.

GujaratiIND

બધી ક્રિયાઓ બધા કિસ્સાઓમાં માત્ર પ્રકૃતિના ગુણો દ્વારા કરવામાં આવે છે. જેનું મન અહંકારથી ભ્રમિત છે તે વિચારે છે, "હું કર્તા છું.

SindhiIND

سڀئي عمل سڀني صورتن ۾ صرف فطرت جي خاصيتن سان ڪيا ويا آهن. جنهن جو ذهن انا پرستيءَ ۾ ڦاٿل آهي سو سوچي ٿو، ”مان ڪرڻ وارو آهيان.

MarathiIND

सर्व क्रिया सर्व बाबतीत केवळ निसर्गाच्या गुणांनीच घडतात. ज्याचे मन अहंकाराने भ्रमित झाले आहे तो विचार करतो, "मी कर्ता आहे.

TeluguIND

అన్ని చర్యలు ప్రకృతి యొక్క లక్షణాల ద్వారా మాత్రమే అన్ని సందర్భాలలో జరుగుతాయి. ఎవరి మనస్సు అహంకారముచే భ్రమింపబడుతుందో, "నేనే కర్తను.

PunjabiIND

ਸਾਰੀਆਂ ਕਿਰਿਆਵਾਂ ਹਰ ਹਾਲਤ ਵਿੱਚ ਕੁਦਰਤ ਦੇ ਗੁਣਾਂ ਦੁਆਰਾ ਹੀ ਕੀਤੀਆਂ ਜਾਂਦੀਆਂ ਹਨ। ਜਿਸ ਦਾ ਮਨ ਹੰਕਾਰ ਨਾਲ ਕੁਰਾਹੇ ਪਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ ਉਹ ਸੋਚਦਾ ਹੈ, “ਮੈਂ ਕਰਤਾ ਹਾਂ।

TamilIND

அனைத்து செயல்களும் இயற்கையின் குணங்களால் மட்டுமே எல்லா நிகழ்வுகளிலும் செய்யப்படுகின்றன. எவனுடைய மனம் அகங்காரத்தால் ஏமாற்றப்பட்டிருக்கிறதோ அவன் நினைக்கிறான், "நான் செய்பவன்.

AssameseIND

সকলো ক্ৰিয়া সকলো ক্ষেত্ৰতে কেৱল প্ৰকৃতিৰ গুণৰ দ্বাৰাই কৰা হয়। যাৰ মন অহংকাৰে মোহিত হৈছে, তেওঁ ভাবে, "মই কৰ্তা।"

BhojpuriIND

सभ कर्म सभ मामला में अकेले प्रकृति के गुण से कईल जाला। जेकर मन अहंकार से मोहित हो जाला ऊ सोचेला कि "हम कर्ता हईं."

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः'-- जिस समष्टि शक्तिसे शरीर, वृक्ष आदि पैदा होते और बढ़ते-घटते हैं, गङ्गा आदि नदियाँ प्रवाहित होती हैं, मकान आदि पदार्थोंमें परिवर्तन होताहै, उसी समष्टि शक्तिसे मनुष्यकी देखना, सुनना, खाना-पीना आदि सब क्रियाएँ होती हैं। परन्तु मनुष्य अहंकारसे मोहित होकर, अज्ञानवश एक ही समष्टि शक्तिसे होनेवाली क्रियाओंके दो विभाग कर लेता है-- एक तो स्वतः होनेवाली क्रियाएँ; जैसे-- शरीरका बनना, भोजनका पचना इत्यादि; और दूसरी, ज्ञानपूर्वक होनेवाली क्रियाएँ; जैसे-- देखना, बोलना, भोजन करना इत्यादि। ज्ञानपूर्वक होनेवाली क्रियाओंको मनुष्य अज्ञानवश अपनेद्वारा की जानेवाली मान लेता है।प्रकृतिसे उत्पन्न गुणों-(सत्त्व, रज और तम-) का कार्य होनेसे बुद्धि, अहंकार, मन, पञ्चमहाभूत, दस इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके शब्दादि पाँच विषय-- ये भी प्रकृतिके गुण कहे जाते हैं। उपर्युक्त पदोंमें भगवान् स्पष्ट करते हैं कि सम्पूर्ण क्रियाएँ (चाहे समष्टिकी हों या व्यष्टिकी) प्रकृतिके गुणों द्वारा ही की जाती हैं, स्वरूपके द्वारा नहीं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

मूर्ख अज्ञानी मनुष्य कर्मोंमें किस प्रकार आसक्त होता है सो कहते हैं सत्त्व रजस् और तमस् इन तीनों गुणोंकी जो साम्यावस्था है उसका नाम प्रधान या प्रकृति है उस प्रकृतिके गुणोंसे अर्थात् कार्य और करणरूप समस्त विकारोंसे लौकिक और शास्त्रीय सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे किये जाते हैं। परंतु अहंकारविमूढात्मा कार्य और करणके संघातरूप शरीरमें आत्मभावकी प्रतीतिका नाम अहंकार है उस अहंकारसे जिसका अन्तःकरण अनेक प्रकारसे मोहित हो चुका है ऐसा देहेन्द्रियके धर्मको अपना धर्म माननेवाला देहाभिमानी पुरुष अविद्यावश प्रकृतिके कर्मोंको अपनेमें मानता हुआ उनउन कर्मोंका मैं कर्ता हूँ ऐसा मान बैठता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

अज्ञानां कर्मसङ्गिनामित्युक्तं तेनोत्तरश्लोकस्य संगतिमाह अविद्वानिति। कर्तृत्वमात्मनो वास्तवमित्यभ्युपगमाद्विद्वान्कथं कुर्वन्नेव तस्याभावं पश्यतीत्याशङ्क्याह प्रकृतेरिति। कर्मस्वविदुषः सक्तिप्रकारं प्रकटयन्व्याकरोति प्रकृतेरित्यादिना। प्रधानशब्देन मायाशक्तिरुच्यते अविद्ययेत्युभयतः संबध्यते।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

सक्ताः कर्मणीत्येतं श्लोकं व्याचष्टे प्रकृतेरिति द्वाभ्याम्। प्रकृतेः प्रधानस्य मायाशक्तेर्गुणैर्विकारैः कार्यकारणरुपैः क्रियमाणानि कर्माणि सर्वाणि सर्वशः सर्वप्रकारैः कार्यकरणसंघातेऽहंप्रत्ययोऽहंकारस्तेन विमूढः स्वात्मस्वरुपविवेकासमर्थः आत्मान्तःकरणं यस्य सोऽविद्यया कर्मणाभहंकर्तेति मन्यते।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
prakṛiteḥof material nature
kriyamāṇānicarried out
guṇaiḥby the three modes
karmāṇiactivities
sarvaśhaḥall kinds of
ahankāravimūḍha
kartāthe doer
ahamI
itithus
manyatethinks
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.26
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्। जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे। सावधान तत्त्वज्ञ महापुरुष कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमें भ्रम उत्पन्न न करे, प्रत्युत स्वयं समस्त कर्मोंको अच्छी तरहसे करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाये। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.28
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते

हे महाबाहो! गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष 'सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं' -- ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 27
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 27
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते

सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' -- ऐसा मानता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 27 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 27 का हिंदी अर्थ: "सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' -- ऐसा मानता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 27?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 27 translates to: "All actions are wrought in all cases by the qualities of Nature alone. He whose mind is deluded by egoism thinks, "I am the doer. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 27 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' -- ऐसा मानता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "prakṛiteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśhaḥ" mean in English?

"prakṛiteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśhaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 27. All actions are wrought in all cases by the qualities of Nature alone. He whose mind is deluded by egoism thinks, "I am the doer. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.