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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 26
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्। जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे। सावधान तत्त्वज्ञ महापुरुष कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमें भ्रम उत्पन्न न करे, प्रत्युत स्वयं समस्त कर्मोंको अच्छी तरहसे करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाये। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

எந்த அறிவாளியும் செயலில் பற்று கொண்ட அறிவிலிகளின் மனதை நிலைகுலையச் செய்ய வேண்டாம்; அவர் அவர்களை எல்லாச் செயல்களிலும் ஈடுபடுத்தி, பக்தியுடன் அவற்றை நிறைவேற்ற வேண்டும்.

BengaliIND

কোন জ্ঞানী ব্যক্তি কর্মের সাথে সংযুক্ত অজ্ঞ লোকদের মনকে অস্থির না করুক; তিনি তাদের সমস্ত কর্মে নিযুক্ত করা উচিত, নিজে ভক্তি সহকারে সেগুলি পূরণ করেন।

KannadaIND

ಯಾವುದೇ ಬುದ್ಧಿವಂತ ಮನುಷ್ಯನು ಕ್ರಿಯೆಗೆ ಅಂಟಿಕೊಂಡಿರುವ ಅಜ್ಞಾನಿಗಳ ಮನಸ್ಸನ್ನು ಅಸ್ಥಿರಗೊಳಿಸದಿರಲಿ; ಅವನು ಅವರನ್ನು ಎಲ್ಲಾ ಕ್ರಿಯೆಗಳಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿಸಿಕೊಳ್ಳಬೇಕು, ಸ್ವತಃ ಅವುಗಳನ್ನು ಭಕ್ತಿಯಿಂದ ಪೂರೈಸಬೇಕು.

TeluguIND

ఏ జ్ఞాని అయినా చర్యతో ముడిపడి ఉన్న అజ్ఞానుల మనస్సులను కలవరపెట్టనివ్వండి; అతను వాటిని అన్ని చర్యలలో నిమగ్నం చేయాలి, వాటిని తాను భక్తితో నెరవేర్చాలి.

MalayalamIND

ജ്ഞാനികളാരും പ്രവൃത്തിയോട് ചേർന്നുനിൽക്കുന്ന അജ്ഞരുടെ മനസ്സിനെ അസ്വസ്ഥമാക്കരുത്; അവൻ അവരെ എല്ലാ പ്രവൃത്തികളിലും ഏർപ്പെടണം, സ്വയം അവ ഭക്തിയോടെ നിറവേറ്റണം.

SindhiIND

ڪنهن به عقلمند انسان کي جاهل ماڻهن جي ذهنن کي پريشان نه ڪرڻ ڏيو جيڪي عمل سان جڙيل آهن. هو انهن کي سڀني ڪمن ۾ مشغول ڪري، پاڻ انهن کي عقيدت سان پورو ڪري.

NepaliIND

कुनै पनि ज्ञानी मानिसले कर्ममा संलग्न भएका अज्ञानी मानिसहरूको दिमागलाई अस्थिर नगरोस्। उहाँलाई सबै कर्ममा संलग्न गराउनुपर्छ, स्वयम् भक्तिपूर्वक पूरा गर्नु पर्छ।

GujaratiIND

કોઈપણ જ્ઞાની માણસે અજ્ઞાન લોકોના મનને અસ્થિર ન કરવા દો જેઓ ક્રિયા સાથે જોડાયેલા છે; તેણે તેમને બધી ક્રિયાઓમાં સામેલ કરવું જોઈએ, પોતે તેમને ભક્તિ સાથે પૂર્ણ કરે છે.

MarathiIND

कोणत्याही ज्ञानी माणसाने कृतीशी आसक्त असलेल्या अज्ञानी लोकांचे मन अस्वस्थ करू नये; त्याने त्यांना सर्व कृतींमध्ये गुंतवून ठेवावे, ते स्वतः भक्तीने पूर्ण करावे.

PunjabiIND

ਕੋਈ ਵੀ ਬੁੱਧੀਮਾਨ ਮਨੁੱਖ ਬੇਸਮਝ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਮਨਾਂ ਨੂੰ ਅਸ਼ਾਂਤ ਨਾ ਕਰੇ ਜੋ ਕਰਮ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਹੋਏ ਹਨ; ਉਸਨੂੰ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਸਾਰੇ ਕੰਮਾਂ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਖੁਦ ਸ਼ਰਧਾ ਨਾਲ ਪੂਰਾ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।

OdiaIND

କ wise ଣସି ଜ୍ଞାନୀ ବ୍ୟକ୍ତି ଅଜ୍ଞ ଲୋକମାନଙ୍କ ମନକୁ ଅସନ୍ତୁଷ୍ଟ କରନ୍ତୁ ନାହିଁ, ଯେଉଁମାନେ କାର୍ଯ୍ୟ ସହିତ ଜଡିତ ଅଟନ୍ତି; ସେ ସେମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟରେ ନିୟୋଜିତ କରିବା ଉଚିତ୍, ନିଜେ ସେମାନଙ୍କୁ ଭକ୍ତି ସହିତ ପୂରଣ କରିବା ଉଚିତ୍ |

ManipuriIND

ꯂꯧꯁꯤꯡ ꯂꯩꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯃꯠꯇꯅꯥ ꯊꯕꯛꯇꯥ ꯂꯦꯞꯄꯥ ꯉꯃꯗꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏꯁꯤꯡꯒꯤ ꯋꯥꯈꯜ ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯇꯕꯥ ꯄꯣꯀꯍꯜꯂꯣꯏꯗꯕꯅꯤ; ꯃꯍꯥꯛꯅꯥ ꯃꯈꯣꯌꯕꯨ ꯊꯕꯛ ꯈꯨꯗꯤꯡꯃꯛꯇꯥ ꯌꯥꯑꯣꯍꯅꯒꯗꯕꯅꯤ, ꯃꯁꯥꯃꯛꯅꯥ ꯃꯈꯣꯌꯕꯨ ꯚꯛꯇꯤꯒꯥ ꯂꯣꯌꯅꯅꯥ ꯃꯄꯨꯡ ꯐꯥꯍꯅꯒꯗꯕꯅꯤ꯫

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

3.26।। व्याख्या--'सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो तथा कुर्वन्ति भारत'-- जिन मनुष्योंकी शास्त्र, शास्त्र-पद्धति और शास्त्र-विहित शुभकर्मोंपर पूरी श्रद्धा है एवं शास्त्रविहित कर्मोंका फल अवश्य मिलता है-- इस बातपर पूरा विश्वास है; जो न तो तत्त्वज्ञ हैं और न दुराचारी हैं; किन्तु कर्मों, भोगों एवं पदार्थोंमें आसक्त हैं, ऐसे मनुष्योंके लिये यहाँ 'सक्ताः अविद्वांसः' पद आये हैं। शास्त्रोंके ज्ञाता होनेपर भी केवल कामनाके कारण ऐसे मनुष्य अविद्वान् (अज्ञानी) कहे गये हैं। ऐसे पुरुष शास्त्रज्ञ तो हैं, पर तत्त्वज्ञ नहीं। ये केवल अपने लिये कर्म करते हैं, इसीलिये अज्ञानी कहलाते हैं।ऐसे अविद्वान् मनुष्य कर्मोंमें कभी प्रमाद, आलस्य आदि न रखकर सावधानी और तत्परतापूर्वक साङ्गोपाङ्ग विधिसे कर्म करते हैं; क्योंकि उनकी ऐसी मान्यता रहती है कि कर्मोंको करनेमें कोई कमी आ जानेसे उनके फलमें भी कमी आ जायगी। भगवान् उनके इस प्रकार कर्म करनेकी रीतिको आदर्श मानकर सर्वथा आसक्तिरहित विद्वान्के लिये भी इसी विधिसे लोकसंग्रहके लिये कर्म करनेकी प्रेरणा करते हैं। 'कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्'-- जिसमें कामना, ममता, आसक्ति, वासना, पक्षपात, स्वार्थ आदिका सर्वथा अभाव हो गया है और शरीरादि पदार्थोंके साथ किञ्चिन्मात्र भी लगाव नहीं रहा, ऐसे तत्त्वज्ञ महापुरुषके लिये यहाँ 'असक्तः विद्वान्' पद आये हैं ।बीसवें 'श्लोकमें''लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्' कहकर फिर इक्कीसवें श्लोकमें जिसकी व्याख्या की गयी, उसीको यहाँ 'लोकसंग्रहं चिकीर्षुः'पदोंसे कहा गया है।श्रेष्ठ मनुष्य (आसक्तिरहित विद्वान्) के सभी आचरण स्वाभाविक ही यज्ञके लिये, मर्यादा सुरक्षित रखनेके लिये होते हैं। जैसे भोगी मनुष्यकी भोगोंमें, मोही मनुष्यकी कुटुम्बमें और लोभी मनुष्यकी धनमें रति होती है, ऐसे ही श्रेष्ठ मनुष्यकी प्राणिमात्रके हितमें रति होती है। उसके अन्तःकरणमें 'मैं लोकहित करता हूँ'-- ऐसा भाव भी नहीं होता, प्रत्युत उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक लोकहित होता है। प्राकृत पदार्थमात्रसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जानेके कारण उस ज्ञानी महापुरुषके कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि भी 'लोकसंग्रह' पदमें आये 'लोक' शब्दके अन्तर्गत आते हैं।दूसरे लोगोंको ऐसे ज्ञानी महापुरुष लोकसंग्रहकी इच्छावाले दीखते हैं, पर वास्तवमें उनमें लोकसंग्रहकी भी इच्छा नहीं होती। कारण कि वे संसारसे प्राप्त शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ, पद, अधिकार, धन, योग्यता, सामर्थ्य आदिको साधनावस्थासे ही कभी किञ्चिन्मात्र भी अपने और अपने लिये नहीं मानते, प्रत्युत संसारके और संसारकी सेवाके लिये ही मानते हैं, जो कि वास्तवमें है। वही प्रवाह रहनेके कारण सिद्धावस्थामें भी उनके कहलानेवाले शरीरादि पदार्थ स्वतःस्वाभाविक, किसी प्रकारकी इच्छाके बिना संसारकी सेवामें लगे रहते हैं।इस श्लोकमें 'यथा' और 'तथा' पद कर्म करनेके प्रकारके अर्थमें आये हैं। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार अज्ञानी (सकाम) पुरुष अपने स्वार्थके लिये सावधानी और तत्परतापूर्वक कर्म करते हैं, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष भी लोकसंग्रह अर्थात् दूसरोंके हितके लिये कर्म करे। ज्ञानी पुरुषको प्राणिमात्रके हितका भाव रखकर सम्पूर्ण लौकिक और वैदिक कर्तव्य-कर्मोंका आचरण करते रहना चाहिये। सबका कल्याण कैसे हो?-- इस भावसे कर्तव्य-कर्म करनेपर लोकमें अच्छे भावोंका प्रचार स्वतः होता है।अज्ञानी पुरुष तो फलकी प्राप्तिके लिये सावधानी और तत्परतासे विधिपूर्वक कर्तव्य-कर्म करता है, पर ज्ञानी पुरुषकी फलमें आसक्ति नहीं होती और उसके लिये कोई कर्तव्य भी नहीं होता। अतः उसके द्वारा कर्मकी उपेक्षा होना सम्भव है। इसीलिये भगवान् कर्म करनेके विषयमें ज्ञानी पुरुषको भी अज्ञानी (सकाम) पुरुषकी ही तरह कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।इक्कीसवें श्लोकमें तो विद्वान्को 'आदर्श' बताया गया था पर यहाँ उसे 'अनुयायी' बताया है। तात्पर्य यह है कि विद्वान् चाहे आदर्श हो अथवा अनुयायी, उसके द्वारा स्वतः लोगसंग्रह होता है। जैसे भगवान् श्रीराम प्रजाको उपदेश भी देते हैं और पिताजीकी आज्ञाका पालन करके वनवास भी जाते हैं। दोनों ही परिस्थितियोंमें उनके द्वारा लोकसंग्रह होता है; क्योंकि उनका कर्मोंके करने अथवा न करनेसे अपना कोई प्रयोजन नहीं था।जब विद्वान् आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-कर्म करता है, तब आसक्तियुक्त चित्तवाले पुरुषोंके अन्तःकरणपर भी विद्वान्के कर्मोंका स्वतः प्रभाव पड़ता है, चाहे उन पुरुषोंको यह महापुरुष निष्कामभावसे कर्म कर रहा है'-- ऐसा प्रत्यक्ष दीखे या न दीखे। मनुष्यके निष्कामभावोंका दूसरोंपर स्वाभाविक प्रभाव पड़ता है-- यह सिद्धान्त है। इसलिये आसक्तिरहित विद्वान्के भावों आचरणोंका प्रभाव मनुष्योंपर ही नहीं, अपितु पशु-पक्षी आदिपर भी पड़ता है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

इस प्रकार लोकसंग्रह करनेकी इच्छावाले मुझ परमात्माका या दूसरे आत्मज्ञानीका लोकसंग्रहको छोड़कर दूसरा कोई कर्तव्य नहीं रह गया है। अतः उस आत्मवेत्ताके लिये यह उपदेश किया जाता है बुद्धिको विचलित करनेका नाम बुद्धिभेद है ( ज्ञानीको चाहिये कि ) कर्मोंमें आसक्तिवाले विवेकरहित अज्ञानियोंकी बुद्धिमें भेद उत्पन्न न करे अर्थात् मेरा यह कर्तव्य है इस कर्मका फल मुझे भोगना है इस प्रकार जो उनकी निश्चितरूपा बुद्धि बनी हुई है उसको विचलित करना बुद्धिभेद करना है सो न करे। तो फिर क्या करे समाहितचित्त विद्वान् स्वयं अज्ञानियोंके ही ( सदृश ) उन कर्मोंका ( शास्त्रानुकूल ) आचरण करता हुआ उनसे सब कर्म करावे।

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Sri Anandgiri

वृत्तमनूद्योत्तरश्लोकमवतारयति एवमिति। कर्तव्यं कर्मेति शेषः। पूर्वार्धमेवं व्याख्यायोत्तरार्धं प्रश्नपूर्वकमवतार्य व्याचष्टे किंतु कुर्यादिति। सर्वकर्माणि कारयेत्तेषु प्रीतिं कुर्वन्निति शेषः। कथं कारयेदित्याकाङ्क्षायामाह तदेवेति।

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Sri Dhanpati

लोकसंग्रह चिकीर्षोस्तत्त्वविद इदमुपदिश्यते नेति। अज्ञानामतएव कर्मसङ्गिनां फलार्थं कर्मण्यासक्तानां इदं कर्म भयावश्यं कर्तव्यं तत्फलं च भोक्तव्यमिति निश्चितरुपाया बुद्धेर्भेदनं चालनं न कर्मणेत्याद्युपदेशेन नोत्पादयेत्। किंतु विद्वान्युक्तः समाहितः सन्नविदुषां कर्म स्वयं समाचरन्सर्वकर्माणि जोषयेत्कारयेत्। अन्यथा कर्मसु तेषां श्रद्धापगमे चित्तशुद्य्धभावज्ज्ञानाप्राप्त्योभयभ्रष्टत्वं स्यादिति भावः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
nanot
buddhibhedam
janayetshould create
ajñānāmof the ignorant
karmasaṅginām
joṣhayetshould inspire (them) to perform
sarvaall
karmāṇiprescribed
vidvānthe wise
yuktaḥenlightened
samācharanperforming properly
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Bhagavad Gita · 3.25
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत। कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्िचकीर्षुर्लोकसंग्रहम्

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे। तत्त्वज्ञ महापुरुष कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमें भ्रम उत्पन्न न करे, प्रत्युत स्वयं समस्त कर्मोंको अच्छी तरहसे करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाये। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.27
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते

सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' -- ऐसा मानता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 26
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 26
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्। जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे। सावधान तत्त्वज्ञ महापुरुष कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमें भ्रम उत्पन्न न करे, प्रत्युत स्वयं समस्त कर्मोंको अच्छी तरहसे करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाये। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ: "हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे। सावधान तत्त्वज्ञ महापुरुष कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमें भ्रम उत्पन्न न करे, प्रत्युत स्वयं समस्त कर्मोंको अच्छी तरहसे करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाये। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 26?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 26 translates to: "Let no wise man unsettle the minds of ignorant people who are attached to action; he should engage them in all actions, himself fulfilling them with devotion. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्। जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाच" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 26 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे। सावधान तत्त्वज्ञ महापुरुष कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमें भ्रम उत्पन्न न करे, प्रत्युत स्वयं समस्त कर्मोंको अच्छी तरहसे करता हुआ उनसे भी व Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "na buddhi-bhedaṁ janayed ajñānāṁ karma-saṅginām" mean in English?

"na buddhi-bhedaṁ janayed ajñānāṁ karma-saṅginām" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 26. Let no wise man unsettle the minds of ignorant people who are attached to action; he should engage them in all actions, himself fulfilling them with devotion. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.