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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 66
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्

जिसके मन-इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है? — VaniSagar

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MarathiIND

अस्थिराला आत्म्याचे ज्ञान नाही, आणि अस्थिराला ध्यान करणे शक्य नाही, आणि ध्यान नसलेल्याला शांती नाही, आणि ज्याला शांती नाही त्याला सुख कसे मिळेल?

TeluguIND

అస్థిరమైన వారికి ఆత్మజ్ఞానం ఉండదు, అస్థిరమైన వారికి ధ్యానం సాధ్యం కాదు, ధ్యానం లేనివారికి శాంతి ఉండదు, శాంతి లేని వ్యక్తికి ఆనందం ఎలా ఉంటుంది?

GujaratiIND

અસ્થિર માટે આત્માનું જ્ઞાન નથી, અને અસ્થિર માટે કોઈ ધ્યાન શક્ય નથી, અને ધ્યાન વિનાના માટે શાંતિ નથી, અને જેને શાંતિ નથી તેને સુખ કેવી રીતે હોઈ શકે?

TamilIND

நிலையற்றவர்களுக்கு சுயம் பற்றிய அறிவு இல்லை, நிலையற்றவர்களுக்கு தியானம் சாத்தியமில்லை, தியானம் இல்லாதவர்களுக்கு அமைதி இல்லை, அமைதி இல்லாதவருக்கு எப்படி மகிழ்ச்சி ஏற்படும்?

PunjabiIND

ਅਸਥਿਰ ਲਈ ਆਪਣੇ ਆਪ ਦਾ ਗਿਆਨ ਨਹੀਂ, ਅਸਥਿਰ ਲਈ ਕੋਈ ਸਿਮਰਨ ਸੰਭਵ ਨਹੀਂ, ਅਤੇ ਅਚਿੰਤ ਲਈ ਕੋਈ ਸ਼ਾਂਤੀ ਨਹੀਂ, ਅਤੇ ਜਿਸ ਕੋਲ ਸ਼ਾਂਤੀ ਨਹੀਂ ਹੈ ਉਸ ਲਈ ਸੁਖ ਕਿਵੇਂ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ?

BengaliIND

অস্থিরের জন্য আত্মজ্ঞান নেই, অস্থিরের জন্য ধ্যান সম্ভব নয়, আর ধ্যানহীনের জন্য শান্তি নেই, আর যার শান্তি নেই তার সুখ হবে কী করে?

KannadaIND

ಅಸ್ಥಿರರಿಗೆ ಆತ್ಮದ ಜ್ಞಾನವಿಲ್ಲ, ಮತ್ತು ಅಸ್ಥಿರರಿಗೆ ಯಾವುದೇ ಧ್ಯಾನ ಸಾಧ್ಯವಿಲ್ಲ, ಮತ್ತು ಧ್ಯಾನವಿಲ್ಲದವರಿಗೆ ಶಾಂತಿಯಿಲ್ಲ, ಮತ್ತು ಶಾಂತಿಯಿಲ್ಲದವರಿಗೆ ಸಂತೋಷವು ಹೇಗೆ ಇರುತ್ತದೆ?

MalayalamIND

അചഞ്ചലർക്ക് ആത്മജ്ഞാനമില്ല, അചഞ്ചലർക്ക് ധ്യാനവും സാധ്യമല്ല, ധ്യാനമില്ലാത്തവർക്ക് സമാധാനവും ഇല്ല, ശാന്തിയില്ലാത്ത ഒരാൾക്ക് എങ്ങനെ സന്തോഷമുണ്ടാകും?

OdiaIND

ଅସ୍ଥିରତା ପାଇଁ ଆତ୍ମର କ knowledge ଣସି ଜ୍ଞାନ ନାହିଁ, ଏବଂ ଅସ୍ଥିରତା ପାଇଁ କ med ଣସି ଧ୍ୟାନ ସମ୍ଭବ ନୁହେଁ, ଏବଂ ଅବିଭକ୍ତ ବ୍ୟକ୍ତିଙ୍କ ପାଇଁ ଶାନ୍ତି ନାହିଁ, ଏବଂ ଶାନ୍ତି ନଥିବା ବ୍ୟକ୍ତିଙ୍କ ପାଇଁ କିପରି ସୁଖ ମିଳିବ?

AssameseIND

অস্থিৰৰ বাবে আত্মাৰ জ্ঞান নাই, অস্থিৰৰ বাবেও ধ্যান সম্ভৱ নহয়, অধ্যায়হীনৰ বাবেও শান্তি আৰু শান্তি নথকাৰ বাবে কেনেকৈ সুখ থাকিব পাৰে?

DogriIND

अस्थिर लोकें आस्तै आत्म दा ज्ञान नेईं ऐ ते अस्थिर आस्तै कोई ध्यान संभव नेईं ऐ ते अध्यान आह्ले आस्तै कोई शांति नेईं ऐ ते जिसदे कोल शांति नेईं ऐ उसी सुख किस चाल्ली होग ?

ManipuriIND

ꯇꯪꯗꯨ ꯂꯩꯇꯥꯗꯕꯁꯤꯡꯒꯤꯗꯃꯛꯇꯥ ꯃꯁꯥꯒꯤ ꯃꯔꯃꯗꯥ ꯈꯉꯕꯥ ꯂꯩꯇꯦ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯇꯪꯗꯨ ꯂꯩꯇꯥꯗꯕꯒꯤꯗꯃꯛ ꯙ꯭ꯌꯥꯟ ꯇꯧꯕꯥ ꯉꯃꯗꯦ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯋꯥꯈꯜ ꯈꯟꯊꯕꯥ ꯉꯃꯗꯕꯒꯤꯗꯃꯛ ꯁꯥꯟꯇꯤ ꯂꯩꯇꯦ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯁꯥꯟꯇꯤ ꯂꯩꯇꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯃꯒꯤꯗꯃꯛ ꯃꯇꯧ ꯀꯔꯝꯅꯥ ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯕꯥ ꯂꯩꯒꯅꯤ?

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.66।। व्याख्या-- [यहाँ कर्मयोगका विषय है। कर्मयोगमें मन और इन्द्रयोंका संयम करना मुख्य होता है। विवेकपूर्वक संयम किये बिना कामना नष्ट नहीं होती। कामनाके नष्ट हुए बिना बुद्धिकी स्थिरता नहीं होती। अतः कर्मयोगी साधकको पहले मन और इन्द्रियोंका संयम करना चाहिये। परन्तु जिसका मन और इन्द्रियाँ संयमित नहीं है, उसकी बात इस श्लोकमें कहते हैं।]

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Sri Harikrishnadas Goenka

उस प्रसन्नताकी स्तुति की जाती है अयुक्त पुरुषमें अर्थात् जिसका अन्तःकरण समाहित नहीं है ऐसे पुरुषमें आत्मस्वरूपविषयक बुद्धि नहीं होती अर्थात् नहीं रहती और उस अयुक्त पुरुषमें भावना अर्थात् आत्मज्ञानमें प्रगाढ प्रवेश अतिशय प्रीति भी नहीं होती। तथा भावना न करनेवालेको अर्थात् आत्मज्ञानके साधनमें प्रीतिपूर्वक संलग्न न होनेवालेको शान्ति अर्थात् उपशमता भी नहीं मिलती। शान्तिरहित पुरुषको भला सुख कहाँ क्योंकि विषयसेवनसम्बन्धी तृष्णासे जो इन्द्रियोंका निवृत्त होना है वही सुख है विषयसम्बन्धी तृष्णा कदापि सुख नहीं है वह तो दुःख ही है। अभिप्राय यह कि तृष्णाके रहते हुए तो सुखकी गन्धमात्र भी नहीं मिलती।

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Sri Anandgiri

किं पुनः सत्त्वशुद्ध्यैव यथोक्तबुद्धिः सिध्यति नेत्याह सेयमिति। असमाहितस्यापि बुद्धिमात्रमुत्पद्यमानं प्रतिभातीत्याशङ्क्य विशिनष्टि आत्मस्वरूपेति। नहि विक्षिप्तचित्तस्यात्मस्वरूपविषया बुद्धिरुदेतुमर्हतीत्यत्र हेतुमाह नचेति। आत्मज्ञाने शब्दादापाततो जाते स्मृतिसन्तानकरणं साक्षात्कारार्थमभिनिवेशो भावनेति चोच्यते। न चासौ विक्षिप्तबुद्धेः सिध्यतीति हेत्वर्थं विवक्षित्वाह आत्मज्ञानेति। भावनाद्वारा साक्षात्काराभावेऽपि का क्षतिरित्याशङ्क्याह तथेति। असमाहितस्य भावनाभाववदिति यावत्। आत्मन्यापाततो ज्ञाते श्रवणाद्यावृत्तिरूपां स्मृतिमनातन्वानस्यापरोक्षबुद्ध्यभावेनानर्थनिवृत्तिः सिध्यतीत्याह उपशम इति। अनिवृत्तानर्थस्य परमानन्दसागराद्विभक्तस्य संसारवारिधौ निमग्नस्य सुखाविर्भावो न संभवतीत्याह अशान्तस्येति। तस्यापि विषयसेवातो वैषयिकं सुखं संभवतीत्याशङ्क्याह इन्द्रियाणां हीति। तृष्णाक्षयस्य शास्त्रप्रसिद्धमानुभविकं च सुखत्वमिति वक्तुं हिशब्दः। विषयसेवातृष्णयापि विषयोपभोगद्वारा सुखमुपलब्धमित्याशङ्क्याह दुःखमेवेति। तत्रापि हिशब्दोऽनुभवद्योती। तदेव स्पष्टयति नेत्यादिना।

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Sri Dhanpati

ननु किं चित्तप्रसादस्यैव साक्षाद्बुद्धिप्रतिष्ठासाधनत्वमुत परम्परयेत्याकाङ्क्षायां निदिध्यासनद्वारेणेति वक्तुं चित्तप्रसादं विना तन्न जायत इति पूर्वोक्तेस्तात्पर्यं प्रसन्नतास्तुत्या स्फुटयति नास्तीति। यत्तु समनस्कानामिन्द्रियाणामनिग्रहे दोष उक्तः बुद्धेरपर्यवस्थाने को दोष इत्यत आहेति तच्चिन्त्यम्। अयुक्तस्य बुद्धिर्नास्तीत्युक्त्या चित्तप्रसादस्तुतेः स्पष्टप्रतीतेः तथोत्थापनानौचित्यात्। अयुक्तस्यासमाहितचेतसः। अप्रसन्नचित्तस्येति यावत्। बुद्धिरात्मस्वरुपज्ञानविषया ब्रह्मात्मैक्याकारा कुत आह नचेति। नचायुक्तस्य भावना पूजाप्रतिष्ठाद्यर्थ श्रवणमननयोः सत्त्वेऽपि भावनाऽभिनिवेशो निदिध्यासनं बुद्धिसाधनं नास्ति। नचाभावयतः विजातीयप्रत्ययस्य विषयानुसंधानस्य तिरस्कारमकुर्वतः शान्तिरुपशमः तृष्णाया इच्छापरपर्यायाया अभावो नास्ति। अशान्तस्य कुतः सुखं अविद्यानिवृत्त्या आविद्यकतृष्णाद्यभावकर्तुस्तत्त्वसाक्षात्कारस्याभावाद्ब्रह्मानन्दसुखं तु तस्य नास्त्येव विषयसुखमपि तस्य नास्तीति द्योतयितुं कुतःशब्दः। ननु विषयार्जनतद्विनाशयोः दुःखसाधनत्वेऽपि विषयोपभोगस्य सुखहेतुत्वं भविष्यतीति चेन्न। तस्मिन्कालेऽपि सर्वदुःखमूलभूतायास्तृष्णायाः सत्त्वेन सुखगन्धस्याप्यनुपपत्तेः। तृष्णायाः दुःखहेतुत्वमुक्तं वासिष्ठे यान्येतानि दुरन्तानि दुर्जराण्युन्नतानि च। तृष्णावल्लयाः फलानीह तानि दुःखानि राघव। इच्छोदयो यथा दुःखमिच्छाशान्तिर्यथा सुखम्। तथा न नरके नापि ब्रह्मलोकेऽनुभूयते।।यावतीयावती जन्तोरिच्छोदेति यथायथा। तावतीतावती दुःखबीजमुष्टिः प्ररोहति।। इत्यादि।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
nanot
astiis
buddhiḥintellect
ayuktasyanot united
nanot
chaand
ayuktasyanot united
bhāvanācontemplation
nanor
chaand
abhāvayataḥfor those not united
śhāntiḥpeace
aśhāntasyaof the unpeaceful
kutaḥwhere
sukhamhappiness
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.65
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते

वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.67
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि

अपने-अपने विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे एक ही इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जलमें नौकाको वायुकी तरह इसकी बुद्धिको हर लेता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 66
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 66
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्

जिसके मन-इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है? — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 66 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 66 का हिंदी अर्थ: "जिसके मन-इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है? — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 66?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 66 translates to: "There is no knowledge of the Self for the unsteady, and no meditation is possible for the unsteady, and no peace for the unmeditative, and how can there be happiness for one who has no peace? — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 66 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। जिसके मन-इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है? — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "nāsti buddhir-ayuktasya na chāyuktasya bhāvanā" mean in English?

"nāsti buddhir-ayuktasya na chāyuktasya bhāvanā" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 66. There is no knowledge of the Self for the unsteady, and no meditation is possible for the unsteady, and no peace for the unmeditative, and how can there be happiness for one who has no peace? — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.