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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 65
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते

वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है। — VaniSagar

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TeluguIND

ఆ శాంతిలో, అన్ని బాధలు నాశనం; ఎందుకంటే ప్రశాంతమైన మనస్సు గలవారి తెలివి త్వరలో స్థిరంగా మారుతుంది.

BengaliIND

সেই শান্তিতে সকল বেদনা বিনষ্ট হয়; কারণ প্রশান্ত চিত্তের বুদ্ধি শীঘ্রই স্থির হয়।

GujaratiIND

એ શાંતિમાં સર્વ દુઃખોનો નાશ થાય છે; કારણ કે શાંત ચિત્તવાળાની બુદ્ધિ જલ્દી સ્થિર થઈ જાય છે.

PunjabiIND

ਉਸ ਸ਼ਾਂਤੀ ਵਿਚ ਸਾਰੇ ਦੁੱਖ ਨਾਸ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ; ਕਿਉਂਕਿ ਸ਼ਾਂਤ ਚਿੱਤ ਦੀ ਬੁੱਧੀ ਛੇਤੀ ਹੀ ਸਥਿਰ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ।

MalayalamIND

ആ സമാധാനത്തിൽ എല്ലാ വേദനകളും നശിക്കുന്നു; എന്തെന്നാൽ, ശാന്തമായ മനസ്സുള്ളവരുടെ ബുദ്ധി പെട്ടെന്ന് സ്ഥിരത കൈവരിക്കും.

TamilIND

அந்த அமைதியில், எல்லா வலிகளும் அழிக்கப்படுகின்றன; ஏனெனில், அமைதியான எண்ணம் கொண்டவர்களின் புத்தி சீக்கிரமே சீராகிவிடும்.

MarathiIND

त्या शांततेत सर्व दुःखांचा नाश होतो; कारण शांत मनाची बुद्धी लवकरच स्थिर होते.

KannadaIND

ಆ ಶಾಂತಿಯಲ್ಲಿ, ಎಲ್ಲಾ ನೋವುಗಳು ನಾಶವಾಗುತ್ತವೆ; ಯಾಕಂದರೆ ಪ್ರಶಾಂತ ಮನಸ್ಸಿನವರ ಬುದ್ಧಿ ಬೇಗ ಸ್ಥಿರವಾಗುತ್ತದೆ.

NepaliIND

त्यो शान्तिमा सारा पीडा नाश हुन्छ। किनकि शान्त मनको बुद्धि चाँडै स्थिर हुन्छ।

SindhiIND

ان امن ۾، سڀ درد ناس ٿي ويندا آهن. ڇو ته سڪون وارن جي عقل جلد ئي ثابت قدم ٿي ويندي آهي.

AssameseIND

সেই শান্তিত সকলো যন্ত্ৰণা ধ্বংস হয়; কাৰণ শান্ত মনৰ বুদ্ধি অতি সোনকালে স্থিৰ হৈ পৰে।

DogriIND

उस शांति च सारे पीड़ नष्ट होई जंदे न; कीजे शान्त मनें दी बुद्धि जल्द गै स्थिर होई जंदी ऐ।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.65।। व्याख्या-- 'तु'-- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि आसक्ति रहते हुए विषयोंका चिन्तन करनेमात्रसे पतन हो जाता है और यहाँ कहते हैं कि आसक्ति न रहनेपर विषयोंका सेवन करनेसे उत्थान हो जाता है। वहाँ तो बुद्धिका नाश बताया और यहाँ बुद्धिका परमात्मामें स्थित होना बताया। इस प्रकार पहले कहे गये विषयससे यहाँके विषयका अन्तर बतानेके लिये यहाँ तु पद आया है। 'विधेयात्मा' साधकका अन्तःकरण अपने वशमें रहना चाहिये। अन्तःकरणको वशीभूत किये बिना कर्मयोगकी सिद्धि नहीं होती, प्रत्युत कर्म करते हुए विषयोंमें राग होनेकी और पतन होनेकी सम्भावना रहती है। वास्तवमें देखा जाय तो अन्तःकरणको अपने वशमें रखना हरेक साधकके लिये आवश्यक है। कर्मयोगीके लिये तो इसकी विशेष आवश्यकता है। 'आत्मवश्यैः रागद्वेषवियुक्तैः इन्द्रियैः'-- जैसे 'विधेयात्मा' पद अन्तःकरणको वशमें करनेके अर्थमें आया है, ऐसे ही 'आत्मवश्यैः' पद इन्द्रियोंको वशमें करनेके अर्थमें आया है। तात्पर्य है कि व्यवहार करते समय इन्द्रियाँ अपने वशीभूत होनी चाहिये और इन्द्रियाँ वशीभूत होनेके लिये इन्द्रियोंका राग-द्वेष रहित होना जरूरी है। अतः इन्द्रियोंसे किसी विषयका ग्रहण रागपूर्वक न हो और किसी विषयका त्याग द्वेषपूर्वक न हो। कारण कि विषयोंके ग्रहण और त्यागका इतना महत्त्व नहीं है, जितना महत्त्व इन्द्रियोंमें राग और द्वेष न होने देनेका है। इसीलिये तीसरे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने साधकके लिये सावधानी बतायी है कि 'प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें राग और द्वेष रहते हैं। साधक इनके वशीभूत न हो; क्योंकि ये दोनों ही साधकके शत्रु हैं।' पाँचवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि 'जो साधक राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे रहित हो जाता है, वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है।'

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Sri Harikrishnadas Goenka

प्रसन्नता होनेसे क्या होता है सो कहते हैं प्रसन्नता प्राप्त होनेपर इस यतिके आध्यात्मिकादि तीनों प्रकारके समस्त दुःखोंका नाश हो जाता है। क्योंकि ( उस ) प्रसन्नचित्तवालेकी अर्थात् स्वस्थ अन्तःकरणवाले पुरुषकी बुद्धि शीघ्र ही सब ओरसे आकाशकी भाँति स्थिर हो जाती है केवल आत्मरूपसे निश्चल हो जाती है। इस वाक्यका अभिप्राय यह है कि इस प्रकार प्रसन्नचित्त और स्थिरबुद्धिवाले पुरुषको कृतकृत्यता मिलती है इसलिये साधक पुरुषको चाहिये कि रागद्वेषसे रहित की हुई इन्द्रियोंद्वारा शास्त्रके अविरोधी अनिवार्य विषयोंका सेवन करे।

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Sri Anandgiri

तथापि नानाविधदुःखाभिभूतत्वान्न स्वास्थ्यमास्थातुं शक्यमित्याशयेन पृच्छति प्रसाद इति। श्लोकार्धेनोत्तरमाह उच्यत इति। सर्वदुःखहान्या बुद्धिस्वास्थ्येऽपि प्रकृतं प्रज्ञास्थैर्यं कथं सिद्धमित्याशङ्क्याह प्रसन्नेति। बुद्धिप्रसादस्यैव फलान्तरमाह किञ्चेति। तस्माद्बुद्धिप्रसादार्थं प्रयतितव्यमिति शेषः। श्लोकद्वयस्याक्षरोत्थमर्थमुक्त्वा तात्पर्यार्थमुपसंहरति एवमिति। युक्तः समाहितो विषयपारवश्यशून्यः सन्निति यावत्।

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Sri Dhanpati

प्रसादे इति। प्रसादे सति अस्य विवेकिनः सर्वदुःखानां त्रिविधतापानां हानिरुपजायते। कुत इत्यत आह प्रसन्नेति। हि यस्मात्प्रसन्नचेतस आशु शीघ्रं बुद्धिः आत्मस्वरुपेणैव निश्चलीभवतीत्यर्थः। एवं प्रसन्नचेतसः स्थिरबुद्धेः कृतकृत्यता यतः तस्माद्रागद्वेषवियुक्तैरिन्द्रियैः शास्त्राविरुद्धेष्वावश्यकेषु जीवनहेतुभूतेषु युक्तः समाचरेदिति वाक्यार्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
prasādeby divine grace
sarvaall
duḥkhānāmof sorrows
hāniḥdestruction
asyahis
upajāyatecomes
prasannachetasaḥ
hiindeed
āśhusoon
buddhiḥintellect
paryavatiṣhṭhatebecomes firmly established
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Bhagavad Gita · 2.64
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति

वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.66
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्

जिसके मन-इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है? — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 65
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 65
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते

वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 65 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 65 का हिंदी अर्थ: "वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 65?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 65 translates to: "In that peace, all pains are destroyed; for the intellect of the tranquil-minded soon becomes steady. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 65 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जात Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "prasāde sarva-duḥkhānāṁ hānir asyopajāyate" mean in English?

"prasāde sarva-duḥkhānāṁ hānir asyopajāyate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 65. In that peace, all pains are destroyed; for the intellect of the tranquil-minded soon becomes steady. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.