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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 64
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति

वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है। — VaniSagar

Global Translations

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MarathiIND

परंतु आत्मसंयमी मनुष्य, इंद्रियांमध्ये संयमी व आकर्षण व तिरस्कारापासून मुक्त होऊन वस्तूंमध्ये फिरतो, त्याला शांती प्राप्त होते.

KannadaIND

ಆದರೆ ಸ್ವಯಂ-ನಿಯಂತ್ರಿತ ಮನುಷ್ಯ, ಇಂದ್ರಿಯಗಳ ಸಂಯಮದೊಂದಿಗೆ ವಸ್ತುಗಳ ನಡುವೆ ಚಲಿಸುವ ಮತ್ತು ಆಕರ್ಷಣೆ ಮತ್ತು ವಿಕರ್ಷಣೆಯಿಂದ ಮುಕ್ತನಾಗುತ್ತಾನೆ, ಶಾಂತಿಯನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆ.

GujaratiIND

પરંતુ સંયમિત માણસ, સંયમિત અને આકર્ષણ અને પ્રતિકૂળતાથી મુક્ત ઇન્દ્રિયો સાથે વસ્તુઓની વચ્ચે ગતિ કરે છે, તે શાંતિ પ્રાપ્ત કરે છે.

TamilIND

ஆனால் தன்னடக்கமுள்ள மனிதன், புலன்களைக் கட்டுப்படுத்தி, ஈர்ப்பு மற்றும் விரட்டுதலின்றி, பொருள்களுக்கு மத்தியில் நகர்ந்து, அமைதியை அடைகிறான்.

TeluguIND

కానీ స్వీయ-నియంత్రణ మనిషి, ఇంద్రియాలను నిగ్రహించుకుని, ఆకర్షణ మరియు వికర్షణ లేకుండా వస్తువుల మధ్య తిరుగుతూ శాంతిని పొందుతాడు.

BengaliIND

কিন্তু আত্মনিয়ন্ত্রিত মানুষ ইন্দ্রিয় সংযত এবং আকর্ষণ ও বিকর্ষণমুক্ত হয়ে বস্তুর মধ্যে চলাফেরা করে শান্তি লাভ করে।

MalayalamIND

എന്നാൽ ആത്മനിയന്ത്രണമുള്ള മനുഷ്യൻ, ഇന്ദ്രിയങ്ങൾ നിയന്ത്രിച്ച്, ആകർഷണവും വികർഷണവും ഇല്ലാത്ത വസ്തുക്കളുടെ ഇടയിലേക്ക് നീങ്ങുന്നു, സമാധാനം കൈവരിക്കുന്നു.

SindhiIND

پر نفس تي ضابطو رکندڙ انسان، شين جي وچ ۾ حواس جي پابندي سان ۽ ڪشش ۽ تڪرار کان آزاد ٿي، امن حاصل ڪري ٿو.

PunjabiIND

ਪਰ ਸੰਜਮੀ ਮਨੁੱਖ, ਇੰਦਰੀਆਂ ਨੂੰ ਸੰਜਮੀ ਅਤੇ ਖਿੱਚ ਅਤੇ ਵਿਕਾਰ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਕਰ ਕੇ ਵਸਤੂਆਂ ਵਿਚ ਚਲਦਾ ਹੈ, ਸ਼ਾਂਤੀ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ।

NepaliIND

तर इंद्रिय संयमित र आकर्षण र प्रतिकर्षणबाट मुक्त भएर वस्तुहरूका बीचमा हिँड्ने आत्म-नियन्त्रित पुरुषले शान्ति प्राप्त गर्दछ।

MaithiliIND

मुदा आत्मसंयमी मनुष्य इन्द्रिय संयमित आ आकर्षण आ प्रतिकर्षण सँ मुक्त वस्तुक बीच चलैत शान्ति प्राप्त करैत अछि |

BhojpuriIND

बाकिर आत्मसंयमी आदमी, इंद्रियन के संयमित आ आकर्षण आ प्रतिकर्षण से मुक्त के साथे वस्तु के बीच घूमत शांति के प्राप्ति करेला।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.64।। व्याख्या-- 'तु'--पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि आसक्ति रहते हुए विषयोंका चिन्तन करनेमात्रसे पतन हो जाता है और यहाँ कहते हैं कि आसक्ति न रहनेपर विषयोंका सेवन करनेसे उत्थान हो जाता है। वहाँ तो बुद्धिका नाश बताया और यहाँ बुद्धिका परमात्मामें स्थित होना बताया। इस प्रकार पहले कहे गये विषयससे यहाँके विषयका अन्तर बतानेके लिये यहाँ 'तु' पद आया है। 'विधेयात्मा'-- साधकका अन्तःकरण अपने वशमें रहना चाहिये। अन्तःकरणको वशीभूत किये बिना कर्मयोगकी सिद्धि नहीं होती, प्रत्युत कर्म करते हुए विषयोंमें राग होनेकी और पतन होनेकी सम्भावना रहती है। वास्तवमें देखा जाय तो अन्तःकरणको अपने वशमें रखना हरेक साधकके लिये आवश्यक है। कर्मयोगीके लिये तो इसकी विशेष आवश्यकता है। 'आत्मवश्यैः रागद्वेषवियुक्तैः इन्द्रियैः'-- जैसे 'विधेयात्मा' पद अन्तःकरणको वशमें करनेके अर्थमें आया है, ऐसे ही 'आत्मवश्यैः' पद इन्द्रियोंको वशमें करनेके अर्थमें आया है। तात्पर्य है कि व्यवहार करते समय इन्द्रियाँ अपने वशीभूत होनी चाहिये और इन्द्रियाँ वशीभूत होनेके लिये इन्द्रियोंका राग-द्वेष रहित होना जरूरी है। अतः इन्द्रियोंसे किसी विषयका ग्रहण रागपूर्वक न हो और किसी विषयका त्याग द्वेषपूर्वक न हो। कारण कि विषयोंके ग्रहण और त्यागका इतना महत्त्व नहीं है, जितना महत्त्व इन्द्रियोंमें राग और द्वेष न होने देनेका है। इसीलिये तीसरे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने साधकके लिये सावधानी बतायी है कि 'प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें राग और द्वेष रहते हैं। साधक इनके वशीभूत न हो; क्योंकि ये दोनों ही साधकके शत्रु हैं।' पाँचवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि 'जो साधक राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे रहित हो जाता है, वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है।' 'विषयान् चरन्'-- जिसका अन्तःकरण अपने वशमें है और जिसकी इन्द्रियाँ राग-द्वेषसे रहित तथा अपने वशमें की हुई है, ऐसा साधक इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन अर्थात् सब प्रकारका व्यवहार तो करता है, पर विषयोंका भोग नहीं करता। भोगबुद्धिसे किया हुआ विषय-सेवन ही पतनका कारण होता है। इस भोगबुद्धिका निषेध करनेके लिये ही यहाँ 'विधेयात्मा','आत्मवश्यैः' आदि पद आये हैं। 'प्रसादमधिगच्छति'-- राग-द्वेषरहित होकर विषयों-का सेवन करनेसे साधक अन्तःकरणकी प्रसन्नता-(स्वच्छता-) को प्राप्त होता है। यह प्रसन्नता मानसिक तप है (गीता 17। 16), जो शारीरिक और वाचिक तपसे ऊँचा है। अतः साधकको न तो रागपूर्वक विषयोंका सेवन करना चाहिये और न द्वेषपूर्वक विषयोंका त्याग करना चाहिये; क्योंकि राग और द्वेष--इन दोनोंसे ही संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। राग-द्वेषसे रहित इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन करनेसे जो प्रसन्नता होती है, उसका अगर सङ्ग न किया जाय, भोग न किया जाय, तो वह प्रसन्नता परमात्माकी प्राप्ति करा देती है। 'प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते'-- चित्तकी प्रसन्नता (स्वच्छता) प्राप्त होनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है अर्थात् कोई भी दुःख नहीं रहता। कारण कि राग होनेसे ही चित्तमें खिन्नता होती है। खिन्नता होते ही कामना पैदा हो जाती है और कामनासे ही सब दुःख पैदा होते हैं। परन्तु जब राग मिट जाता है, तब चित्तमें प्रसन्नता होती है। उस प्रसन्नतासे सम्पूर्ण दुःख मिट जाते हैं। जितने भी दुःख हैं, वे सब-के-सब प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर-संसारके सम्बन्धसे ही होते हैं और शरीर-संसारसे सम्बन्ध होता है सुखकी लिप्सासे। सुखकी लिप्सा होती है खिन्नतासे। परन्तु जब प्रसन्नता होती है, तब खिन्नता मिट जाती है। खिन्नता मिटनेपर सुखकी लिप्सा नहीं रहती। सुखकी लिप्सा न रहनेसे शरीर-संसारके साथ सम्बन्ध नहीं रहता और सम्बन्ध न रहनेसे सम्पूर्ण दुःखोंका अभाव हो जाता है--'सर्वदुःखानां हानिः।' तात्पर्य है कि प्रसन्नतासे दो बातें होती हैं--संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद और परमात्मामें बुद्धिकी स्थिरता। यही बात भगवान्ने पहले तिरपनवें श्लोकमें निश्चला और अचला पदोंसे कही है कि उसकी बुद्धि संसारमें निश्चल और परमात्मामें अचल हो जाती है। यहाँ 'सर्वदुःखानां हानिः' का तात्पर्य यह नहीं है कि उसके सामने दुःखदायी परिस्थिति आयेगी ही नहीं, प्रत्युत इसका तात्पर्य यह है कि कर्मोंके अनुसार उसके सामने दुःखदायी घटना, परिस्थिति आ सकती है; परन्तु उसके अन्तःकरणमें दुःख, सन्ताप, हलचल आदि विकृति नहीं हो सकती। 'प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते'-- प्रसन्न (स्वच्छ) चित्तवालेकी बुद्धि बहुत जल्दी परमात्मानें स्थिर हो जाती है अर्थात् साधक स्वयं परमात्मामें स्थिर हो जाता है, उसकी बुद्धिमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता। मार्मिक बात

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Sri Harikrishnadas Goenka

विषयोंके चिन्तनको सब अनर्थोंका मूल बतलाया गया। अब यह मोक्षका साधन बतलाया जाता है आसक्ति और द्वेषको रागद्वेष कहते हैं इन दोनोंको लेकर ही इन्द्रियोंकी स्वाभाविक प्रवृत्ति हुआ करती है। परंतु जो मुमुक्षु होता है वह स्वाधीन अन्तःकरणवाला अर्थात् जिसका अन्तःकरण इच्छानुसार वशमें है ऐसा पुरुष रोगद्वेषसे रहित और अपने वशमें की हुई श्रोत्रादि इन्द्रियोंद्वारा अनिवार्य विषयोंको ग्रहण करता हुआ प्रसादको प्राप्त होता है। प्रसन्नता और स्वास्थ्यको प्रसाद कहते हैं।

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Sri Anandgiri

विषयाणां स्मरणमपि चेदनर्थकारणं सुतरां तर्हि भोगस्तेन जीवनार्थं भुञ्जानो विषयाननर्थं कथं न प्रतिपद्यत इत्याशङ्क्य वृत्तानुवादपूर्वकमुत्तरश्लोकतात्पर्यमाह सर्वानर्थस्येति। अनर्थमूलकथनानन्तर्यमथशब्दार्थः। परिहर्तव्ये निर्णीते तत्परिहारोपायजिज्ञासां दर्शयति इदानीमिति। रागद्वेषपूर्विका प्रवृत्तिरित्यत्रानुभवदर्शनार्थो हिशब्दः। शास्त्रीयप्रवृत्तिव्यासेधार्थं स्वाभाविकीत्युक्तं तत्रेत्यधिकृतानधिकृत्य प्रयोगः। अवर्जनीयानशनपानादीन् देहस्थितिहेतूनिति यावत्। इन्द्रियाणां विषयेषु प्रवृत्तिश्चेन्नियमानुपपत्त्या वर्जनीयेष्वपि सा स्यादित्याशङ्क्याह आत्मेति। अन्तःकरणाधीनत्वेऽपीन्द्रियाणां तदनियमात्तेषामपि नियमानुपपत्तिरित्याशङ्क्याह विधेयात्मेति।

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Sri Dhanpati

एवं विषयचिन्तनस्यानर्थोपायत्वमुक्त्वा अथेदानीं विषयध्यानरहितस्य स्वाधीनस्य चेतसः परमपुरुषार्थोपायत्वं वदन्किं व्रजेतेत्यस्योत्तरमाह रागेति। विधेयात्मा स्वाधीनचित्तोऽत एवात्मवश्यैः स्वाधीनैरतएव रागद्वेषाभ्यां स्वाभाविकेन्द्रिय प्रवृत्तिहेतुरुपाभ्यां वियुक्तैरिन्द्रियैः विषयान्जीवनहेतून्भोजनाच्छादनादींश्चरन्नुपलभमानः प्रसन्नतां स्वास्थ्यं प्राप्नोति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
rāgaattachment
dveṣhaaversion
viyuktaiḥfree
tubut
viṣhayānobjects of the senses
indriyaiḥby the senses
charanwhile using
ātmavaśhyaiḥ
vidheyaātmā
prasādamthe Grace of God
adhigachchhatiattains
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.63
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति

विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.65
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते

वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 64
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 64
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति

वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 64 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 64 का हिंदी अर्थ: "वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 64?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 64 translates to: "But the self-controlled man, moving among objects with the senses restrained and free from attraction and repulsion, attains peace. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छत" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 64 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जात Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "rāga-dveṣha-viyuktais tu viṣhayān indriyaiśh charan" mean in English?

"rāga-dveṣha-viyuktais tu viṣhayān indriyaiśh charan" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 64. But the self-controlled man, moving among objects with the senses restrained and free from attraction and repulsion, attains peace. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.