Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 63
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति

विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TeluguIND

కోపం మాయకు దారితీస్తుంది, ఇది జ్ఞాపకశక్తిని కోల్పోతుంది; ఇది క్రమంగా, వివక్ష యొక్క నాశనానికి దారితీస్తుంది, ఫలితంగా విధ్వంసం ఏర్పడుతుంది.

GujaratiIND

ગુસ્સો ભ્રમણા તરફ દોરી જાય છે, જે યાદશક્તિના નુકશાનનું કારણ બને છે; આ, બદલામાં, ભેદભાવના વિનાશ તરફ દોરી જાય છે, પરિણામે વિનાશ થાય છે.

MarathiIND

रागामुळे भ्रम निर्माण होतो, ज्यामुळे स्मरणशक्ती कमी होते; यामुळे, भेदभावाचा नाश होतो, परिणामी नाश होतो.

AssameseIND

খঙে মোহৰ সৃষ্টি কৰে, যাৰ ফলত স্মৃতিশক্তি হেৰুৱাই পেলায়; ইয়াৰ ফলত বৈষম্যৰ ধ্বংস হয়, যাৰ ফলত ধ্বংস হয়।

TamilIND

கோபம் மாயைக்கு வழிவகுக்கிறது, இது நினைவாற்றலை இழக்கிறது; இது, பாகுபாட்டின் அழிவுக்கு வழிவகுக்கிறது, இதன் விளைவாக அழிவு ஏற்படுகிறது.

OdiaIND

କ୍ରୋଧ ଭ୍ରାନ୍ତି ଆଡକୁ ଯାଏ, ଯାହା ସ୍ମୃତି ଶକ୍ତି ହରାଇଥାଏ; ଏହା ପରବର୍ତ୍ତୀ ସମୟରେ, ଭେଦଭାବର ବିନାଶକୁ ନେଇଥାଏ, ଫଳସ୍ୱରୂପ ବିନାଶ ହୁଏ |

BengaliIND

রাগ বিভ্রান্তির দিকে নিয়ে যায়, যা স্মৃতিশক্তি হ্রাস করে; এটি, ঘুরে, বৈষম্যের ধ্বংসের দিকে নিয়ে যায়, যার ফলে ধ্বংস হয়।

MalayalamIND

കോപം വ്യാമോഹത്തിലേക്ക് നയിക്കുന്നു, അത് ഓർമ്മശക്തി നഷ്ടപ്പെടുന്നു; ഇത് വിവേചനത്തിൻ്റെ നാശത്തിലേക്ക് നയിക്കുന്നു, അത് നാശത്തിലേക്ക് നയിക്കുന്നു.

SindhiIND

غضب، ٺڳيءَ جو سبب بڻجي ٿو، جيڪو ياداشت جي نقصان جو سبب بڻجي ٿو. اهو، بدلي ۾، تباهي جي تباهي ڏانهن وٺي ٿو، نتيجي ۾ تباهي.

KannadaIND

ಕೋಪವು ಭ್ರಮೆಗೆ ಕಾರಣವಾಗುತ್ತದೆ, ಇದು ಸ್ಮರಣೆಯ ನಷ್ಟವನ್ನು ಉಂಟುಮಾಡುತ್ತದೆ; ಇದು ಪ್ರತಿಯಾಗಿ, ತಾರತಮ್ಯದ ನಾಶಕ್ಕೆ ಕಾರಣವಾಗುತ್ತದೆ, ವಿನಾಶಕ್ಕೆ ಕಾರಣವಾಗುತ್ತದೆ.

MizoIND

Thinrimna hian delusion a thlen a, chu chuan hriatrengna a hloh phah a; hei hian inthliarna tihchhiatna a thlen a, chu chuan chhiatna a thlen a ni.

DogriIND

गुस्से च भ्रम पैदा होंदा ऐ, जिस कन्नै याददाश्त च कमी औंदी ऐ; इस कन्नै गै भेदभाव दा नाश होंदा ऐ, जिसदे फलस्वरूप विनाश होंदा ऐ।

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.63।। व्याख्या-- 'ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते'-- भगवान्के परायण न होनेसे, भगवान्का चिन्तन न होनेसे विषयोंका ही चिन्तन होता है। कारण कि जीवके एक तरफ परमात्मा है और एक तरफ संसार है। जब वह परमात्माका आश्रय छोड़ देता है, तब वह संसारका आश्रय लेकर संसारका ही चिन्तन करता है; क्योंकि संसारके सिवाय चिन्तनका कोई दूसरा विषय रहता ही नहीं। इस तरह चिन्तन करते-करते मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति, राग, प्रियता पैदा हो जाती है। आसक्ति पैदा होनेसे मनुष्य उन विषयोंका सेवन करता है। विषयोंका सेवन चाहे मानसिक हो चाहे शारीरिक हो, उससे जो सुख होता है, उससे विषयोंमें प्रियता पैदा होती है। प्रियतासे उस विषयका बार-बार चिन्तन होने लगता है। अब उस विषयका सेवन क,रे चाहे न करे, पर विषयोंमें राग पैदा हो ही जाता है--यह नियम है। 'सङ्गात्संजायते कामः'-- विषयोंमें राग पैदा होनेपर उन विषयोंको (भोगोंको) प्राप्त करनेकी कामना पैदा हो जाती है कि वे भोग, वस्तुएँ मेरेको मिलें। 'कामात्क्रोधोऽभिजायते'-- कामनाके अनुकूल पदार्थोंके मिलते रहनेसे 'लोभ' पैदा हो जाता है और कामनापूर्तिकी सम्भावना हो रही है, पर उसमें कोई बाधा देता है, तो उसपर 'क्रोध' आ जाता है। कामना एक ऐसी चीज है, जिसमें बाधा पड़नेपर क्रोध पैदा हो ही जाता है। वर्ण, आश्रम, गुण, योग्यता आदिको लेकर अपनेमें जो अच्छाईका अभिमान रहता है, उस अभिमानमें भी अपने आदर, सम्मान आदिकी कामना रहती है; उस कामनामें किसी व्यक्तिके द्वारा बाधा पड़नेपर भी क्रोध पैदा हो जाता है। 'कामना' रजोगुणी वृत्ति है, 'सम्मोह' तमोगुणी वृत्ति है और 'क्रोध' रजोगुण तथा तमोगुणके बीचकी वृत्ति है। कहीं भी किसी भी बातको लेकर क्रोध आता है तो उसके मूलमें कहीं-न-कहीं राग अवश्य होता है। जैसे, नीति-न्यायसे विरुद्ध काम करनेवालेको देखकर क्रोध आता है, तो नीति-न्यायमें राग है। अपमान-तिरस्कार करनेवालेपर क्रोध आता है, तो मान-सत्कारमें राग है। निन्दा करनेवालेपर क्रोध आता है, तो प्रशंसामें राग है। दोषारोपण करनेवालेपर क्रोध आता है, तो निर्दोषताके अभिमानमें राग है; आदिआदि। 'क्रोधाद्भवति सम्मोहः'-- क्रोधसे सम्मोह होता है अर्थात् मूढ़ता छा जाती है। वास्तवमें देखा जाय तो काम क्रोध लोभ और ममता इन चारोंसे ही सम्मोह होता है जैसे (1) कामसे जो सम्मोह होता है, उसमें विवेकशक्ति ढक जानेसे मनुष्य कामके वशीभूत होकर न करनेलायक कार्य भी कर बैठता है। (2) क्रोधसे जो सम्मोह होता है उसमें मनुष्य अपने मित्रों तथा पूज्यजनोंको भी उलटी-सीधी बातें कह बैठता है और न करनेलायक बर्ताव भी कर बैठता है। (3) लोभसे जो सम्मोह होता है उसमें मनुष्यको सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म आदिका विचार नहीं रहता, और वह कपट करके लोगोंको ठग लेता है। (4) ममतासे जो सम्मोह होता है, उसमें समभाव नहीं रहता, प्रत्युत पक्षपात पैदा हो जाता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

क्रोधसे संमोह अर्थात् कर्तव्यअकर्तव्यविषयक अविवेक उत्पन्न होता है क्योंकि क्रोधी मनुष्य मोहित होकर गुरुको ( बड़ेको ) भी गोली दे दिया करता है। मोहसे स्मृतिका विभ्रम होता है अर्थात् शास्त्र और आचार्यद्वारा सुने हुए उपदेशके संस्कारोंसे जो स्मृति उत्पन्न होती है उसके प्रकट होनेका निमित्त प्राप्त होनेपर वह प्रकट नहीं होती। इस प्रकार स्मृतिविभ्रम होनेसे बुद्धिका नाश हो जाता है। अन्तःकरणमें कार्यअकार्यविषयक विवेचनकी योग्यताका न रहना बुद्धिका नाश कहा जाता है। बुद्धिका नाश होनेसे ( यह मनुष्य ) नष्ट हो जाता है क्योंकि वह तबतक ही मनुष्य है जबतक उसका अन्तःकरण कार्यअकार्यके विवेचनमें समर्थ है ऐसी योग्यता न रहनेपर मनुष्य नष्टप्राय ( मनुष्यतासे हीन ) हो जाता है। अतः उस अन्तःकरणकी ( विवेकशक्तिरूप ) बुद्धिका नाश होनेसे पुरुषका नाश हो जाता है। इस कथनका यह अभिप्राय है कि वह पुरुषार्थके अयोग्य हो जाता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

क्रोधस्य संमोहहेतुत्वमनुभवेन द्रढयति क्रुद्धो हीति। आक्रोशत्यधिक्षिपति तदयोग्यत्वमपेरर्थः। संमोहकार्यं कथयति संमोहादिति। स्मृतेर्निमित्तनिवेदनद्वारा स्वरूपं निरूपयति शास्त्रेति। क्षणिकत्वादेव तस्याः स्वतो नाशसंभवान्न संमोहाधीनत्वं तस्येत्याशङ्क्याह स्मृतीति। स्मृतिभ्रंशेऽपि कथं बुद्धिनाशः स्वरूपतः सिध्यति तत्राह कार्येति। ननु पुरुषस्य नित्यसिद्धस्य बुद्धिनाशेऽपि प्रणाशो न कल्पते तत्राह तावदेवेति। कार्याकार्यविवेचनयोग्यान्तःकरणाभावे सतोऽपि पुरुषस्य करणाभावादपगततत्त्वविवेकविवक्षया नष्टत्वव्यपदेशः तदेतदाह पुरुषार्थेति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

इन्द्रियस्य जयः प्रयत्नेन संपाद्य इत्युक्तं तत्र मनसा विषयाचिन्तनाभ्यास एवोपाय इत्याशयेन व्यतिरेके दोषमाह ध्यायत इति। विषयांश्चिन्तयतः पुरुषस्य तेषु प्रीतिरुपजायते सङ्गादभिलाषः संजायते कामात्कुतश्चित्प्रतिहतात्क्रोधोऽभिजायते क्रोधात्कर्तव्याकर्तव्यविषये विभ्रमो भवति क्रुद्धो हि संमूढो गुरुनप्याक्रोशति तस्मात् स्मृतेः शास्त्राचार्योपदेशाहितसंस्कारजनितायाः विभ्रंशः स्यात् स्मृत्युत्पत्तिनिमित्तप्राप्तावनुत्पत्तिः ततः कार्याकार्यविवेकायोग्यता बुद्धेर्नाशः तस्मात्प्रणश्यति जीवन्नेव मृतः पुरुषार्थायोग्यो भवतीति द्वयोरर्थः। विषयध्यानमेव सर्वानर्थबीजमित्यभिप्रायः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
krodhātfrom anger
bhavaticomes
sammohaḥclouding of judgement
sammohātfrom clouding of judgement
smṛitimemory
vibhramaḥbewilderment
smṛitibhranśhāt
buddhināśhaḥ
buddhināśhāt
praṇaśhyatione is ruined
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.62
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते

विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.64
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति

वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 63
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 63
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति

विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 63 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 63 का हिंदी अर्थ: "विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 63?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 63 translates to: "Anger leads to delusion, which causes loss of memory; this, in turn, leads to the destruction of discrimination, resulting in destruction. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 63 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है। — Va Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ" mean in English?

"krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 63. Anger leads to delusion, which causes loss of memory; this, in turn, leads to the destruction of discrimination, resulting in destruction. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.