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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 62
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते

विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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MarathiIND

वस्तूंचा विचार केल्यावर त्यांच्याशी आसक्ती निर्माण होते; आसक्तीतून इच्छा जन्माला येते; इच्छेतून, क्रोध उत्पन्न होतो.

TeluguIND

వస్తువుల గురించి ఆలోచించినప్పుడు, వాటితో అనుబంధం పుడుతుంది; అనుబంధం నుండి, కోరిక పుడుతుంది; కోరిక నుండి, కోపం పుడుతుంది.

GujaratiIND

જ્યારે વ્યક્તિ વસ્તુઓ વિશે વિચારે છે, ત્યારે તેમની સાથે આસક્તિ ઉત્પન્ન થાય છે; આસક્તિમાંથી, ઇચ્છા જન્મે છે; ઈચ્છામાંથી, ક્રોધ ઉત્પન્ન થાય છે.

BengaliIND

যখন কেউ বস্তুর কথা চিন্তা করে, তখন তাদের প্রতি আসক্তি জন্মে; সংযুক্তি থেকে, ইচ্ছা জন্মে; ইচ্ছা থেকে, ক্রোধ জন্মায়।

SindhiIND

جڏهن ڪو شيون سوچيندو آهي، تڏهن انهن سان وابستگي پيدا ٿيندي آهي. وابستگي مان، خواهش پيدا ٿئي ٿي. خواهش مان، ڪاوڙ پيدا ٿئي ٿي.

TamilIND

பொருள்களை நினைக்கும் போது, ​​அவற்றின் மீது பற்று ஏற்படுகிறது; பற்றுதலிலிருந்து, ஆசை பிறக்கிறது; ஆசையில் இருந்து கோபம் வருகிறது.

PunjabiIND

ਜਦੋਂ ਕੋਈ ਵਸਤੂਆਂ ਬਾਰੇ ਸੋਚਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਉਹਨਾਂ ਨਾਲ ਮੋਹ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ; ਮੋਹ ਤੋਂ, ਇੱਛਾ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦੀ ਹੈ; ਇੱਛਾ ਤੋਂ, ਕ੍ਰੋਧ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।

MalayalamIND

വസ്തുക്കളെക്കുറിച്ചു ചിന്തിക്കുമ്പോൾ അവയോടുള്ള ആസക്തി ഉണ്ടാകുന്നു; ആസക്തിയിൽ നിന്ന് ആഗ്രഹം ജനിക്കുന്നു; ആഗ്രഹത്തിൽ നിന്നാണ് കോപം ഉണ്ടാകുന്നത്.

NepaliIND

जब व्यक्ति वस्तुहरूको बारेमा सोच्दछ, तिनीहरूमा आसक्ति उत्पन्न हुन्छ; आसक्तिबाट इच्छा जन्मन्छ; इच्छाबाट, क्रोध उत्पन्न हुन्छ।

KannadaIND

ಒಬ್ಬನು ವಸ್ತುಗಳ ಬಗ್ಗೆ ಯೋಚಿಸಿದಾಗ, ಅವುಗಳಿಗೆ ಬಾಂಧವ್ಯ ಉಂಟಾಗುತ್ತದೆ; ಬಾಂಧವ್ಯದಿಂದ ಆಸೆ ಹುಟ್ಟುತ್ತದೆ; ಆಸೆಯಿಂದ ಕೋಪ ಹುಟ್ಟುತ್ತದೆ.

OdiaIND

ଯେତେବେଳେ ଜଣେ ବସ୍ତୁ ବିଷୟରେ ଚିନ୍ତା କରେ, ସେମାନଙ୍କ ସହିତ ସଂଲଗ୍ନ ହୁଏ; ସଂଲଗ୍ନରୁ, ଇଚ୍ଛା ଜନ୍ମ ହୁଏ; ଇଚ୍ଛାଠାରୁ କ୍ରୋଧ ଉତ୍ପନ୍ନ ହୁଏ |

BhojpuriIND

जब वस्तु के बारे में सोचेला त ओकरा से लगाव पैदा हो जाला; लगाव से, इच्छा के जनम होला; इच्छा से क्रोध पैदा हो जाला।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.62।। व्याख्या--'ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते'-- भगवान्के परायण न होनेसे भगवान्का चिन्तन न होनेसे विषयोंका ही चिन्तन होता है। कारण कि जीवके एक तरफ परमात्मा है और एक तरफ संसार है। जब वह परमात्माका आश्रय छोड़ देता है तब वह संसारका आश्रय लेकर संसारका ही चिन्तन करता है क्योंकि संसारके सिवाय चिन्तनका कोई दूसरा विषय रहता ही नहीं। इस तरह चिन्तन करतेकरते मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति राग प्रियता पैदा हो जाती है। आसक्ति पैदा होनेसे मनुष्य उन विषयोंका सेवन करता है। विषयोंका सेवन चाहे मानसिक हो चाहे शारीरिक हो उससे जो सुख होता है उससे विषयोंमें प्रियता पैदा होती है। प्रियतासे उस विषयका बारबार चिन्तन होने लगता है। अब उस विषयका सेवन करे चाहे न करे पर विषयोंमें राग पैदा हो ही जाता है यह नियम है। 'सङ्गात्संजायते कामः'-- विषयोंमें राग पैदा होनेपर उन विषयोंको (भोगोंको) प्राप्त करनेकी कामना पैदा हो जाती है कि वे भोग वस्तुएँ मेरेको मिलें। 'कामात्क्रोधोऽभिजायते'-- कामनाके अनुकूल पदार्थोंके मिलते रहनेसे लोभ पैदा हो जाता है और कामनापूर्तिकी सम्भावना हो रही है पर उसमें कोई बाधा देता है तो उसपर क्रोध आ जाता है। कामना एक ऐसी चीज है जिसमें बाधा पड़नेपर क्रोध पैदा हो ही जाता है। वर्ण आश्रम गुण योग्यता आदिको लेकर अपनेमें जो अच्छाईका अभिमान रहता है उस अभिमानमें भी अपने आदर सम्मान आदिकी कामना रहती है उस कामनामें किसी व्यक्तिके द्वारा बाधा पड़नेपर भी क्रोध पैदा हो जाता है। कामना रजोगुणी वृत्ति है सम्मोह तमोगुणी वृत्ति है और क्रोध रजोगुण तथा तमोगुणके बीचकी वृत्ति है। कहीं भी किसी भी बातको लेकर क्रोध आता है तो उसके मूलमें कहींनकहीं राग अवश्य होता है। जैसे नीतिन्यायसे विरुद्ध काम करनेवालेको देखकर क्रोध आता है तो नीतिन्यायमें राग है। अपमानतिरस्कार करनेवालेपर क्रोध आता है तो मानसत्कारमें राग है। निन्दा करनेवालेपर क्रोध आता है तो प्रशंसामें राग है। दोषारोपण करनेवालेपर क्रोध आता है तो निर्दोषताके अभिमानमें राग है आदिआदि। 'क्रोधाद्भवति सम्मोहः'-- क्रोधसे सम्मोह होता है अर्थात् मूढ़ता छा जाती है। वास्तवमें देखा जाय तो काम क्रोध लोभ और ममता इन चारोंसे ही सम्मोह होता है जैसे (1) कामसे जो सम्मोह होता है उसमें विवेकशक्ति ढक जानेसे मनुष्य कामके वशीभूत होकर न करनेलायक कार्य भी कर बैठता है। (2) क्रोधसे जो सम्मोह होता है उसमें मनुष्य अपने मित्रों तथा पूज्यजनोंको भी उलटीसीधी बातें कह बैठता है और न करनेलायक बर्ताव भी कर बैठता है। (3) लोभसे जो सम्मोह होता है उसमें मनुष्यको सत्यअसत्य धर्मअधर्म आदिका विचार नहीं रहता और वह कपट करके लोगोंको ठग लेता है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

इतना कहनेके उपरान्त अब यह पतनाभिमुख पुरुषके समस्त अनर्थोंका कारण बतलाया जाता है विषयोंका ध्यान चिन्तन करनेवाले पुरुषकी अर्थात् शब्दादि विषयोंके भेदोंकी बारंबार आलोचना करनेवाले पुरुषकी उन विषयोंमें आसक्ति प्रीति उत्पन्न हो जाती है। आसक्तिसे कामना तृष्णा उत्पन्न होती है। कामसे अर्थात् किसी भी कारणवश विच्छिन्न हुई इच्छासे क्रोध उत्पन्न होता है।

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Sri Anandgiri

समनन्तरश्लोकद्वयतात्पर्यमाह अथेति। पुरुषार्थोपायोपदेशानन्तर्यमथशब्दार्थः। तन्निष्ठत्वराहित्यावस्थां दर्शयति इदानीमिति। पराभविष्यतो महान्तमनर्थं गमिष्यतो विवेकविज्ञानविहीनस्येति यावत् सर्वानर्थमूलं विषयाभिध्यानं तस्य तथात्वमनुभवसिद्धमिति वक्तुमिदमित्युक्तन्। विषयेषु विशेषत्वमारोपितरमणीयत्वं प्रीतिरासक्तिरिति साधारणासक्तिमात्रं गृह्यते। तृष्णेत्युद्रिका शक्तिरुक्ता प्रतिबन्धेन प्रणाशेन वा प्रतिहतिः।

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Sri Dhanpati

इन्द्रियस्य जयः प्रयत्नेन संपाद्य इत्युक्तं तत्र मनसा विषयाचिन्तनाभ्यास एवोपाय इत्याशयेन व्यतिरेके दोषमाह ध्यायत इति। विषयांश्चिन्तयतः पुरुषस्य तेषु प्रीतिरुपजायते सङ्गादभिलाषः संजायते कामात्कुतश्चित्प्रतिहतात्क्रोधोऽभिजायते क्रोधात्कर्तव्याकर्तव्यविषये विभ्रमो भवति क्रुद्धो हि संमूढो गुरुनप्याक्रोशति तस्मात् स्मृतेः शास्त्राचार्योपदेशाहितसंस्कारजनितायाः विभ्रंशः स्यात् स्मृत्युत्पत्तिनिमित्तप्राप्तावनुत्पत्तिः ततः कार्याकार्यविवेकायोग्यता बुद्धेर्नाशः तस्मात्प्रणश्यति जीवन्नेव मृतः पुरुषार्थायोग्यो भवतीति द्वयोरर्थः। विषयध्यानमेव सर्वानर्थबीजमित्यभिप्रायः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
dhyāyataḥcontemplating
viṣhayānsense objects
puṁsaḥof a person
saṅgaḥattachment
teṣhuto them (sense objects)
upajāyatearises
saṅgātfrom attachment
sañjāyatedevelops
kāmaḥdesire
kāmātfrom desire
krodhaḥanger
abhijāyatearises
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.61
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः। वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता

कर्मयोगी साधक उन सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें करके मेरे परायण होकर बैठे; क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हैं, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.63
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति

विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 62
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 62
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते

विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 62 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 62 का हिंदी अर्थ: "विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 62?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 62 translates to: "When one thinks of objects, attachment to them arises; from attachment, desire is born; from desire, anger arises. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 62 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है। — Va Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "dhyāyato viṣhayān puṁsaḥ saṅgas teṣhūpajāyate" mean in English?

"dhyāyato viṣhayān puṁsaḥ saṅgas teṣhūpajāyate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 62. When one thinks of objects, attachment to them arises; from attachment, desire is born; from desire, anger arises. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.