Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 67
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि

अपने-अपने विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे एक ही इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जलमें नौकाको वायुकी तरह इसकी बुद्धिको हर लेता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TeluguIND

సంచరించే ఇంద్రియాలను అనుసరించే మనస్సు, గాలి నీటిపై పడవను తీసుకువెళ్లినట్లుగా, అతని వివక్షను దూరం చేస్తుంది.

GujaratiIND

કારણ કે મન, જે ભટકતી ઇન્દ્રિયોને પગલે ચાલે છે, તે તેના ભેદભાવને દૂર કરે છે, જેમ પવન પાણીમાં હોડીને વહન કરે છે.

MarathiIND

कारण, भटकणाऱ्या इंद्रियांच्या मागे लागलेले मन, जसा वारा पाण्यावर बोट वाहून नेतो, त्याचप्रमाणे त्याचे भेदभाव वाहून जाते.

TamilIND

அலைந்து திரியும் புலன்களின் விழிப்பில் பின்தொடரும் மனம், காற்று நீரில் படகை எடுத்துச் செல்வது போல, அவனது பாகுபாட்டை எடுத்துச் செல்கிறது.

PunjabiIND

ਕਿਉਂਕਿ ਜੋ ਮਨ ਭਟਕਦੀਆਂ ਇੰਦਰੀਆਂ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਤੁਰਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਦਾ ਵਿਤਕਰਾ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੂਰ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਜਿਵੇਂ ਹਵਾ ਪਾਣੀ ਦੀ ਬੇੜੀ ਨੂੰ ਲੈ ਜਾਂਦੀ ਹੈ।

BengaliIND

কারণ মন, যা বিচরণ ইন্দ্রিয়ের অনুসরণে চলে, তার বৈষম্য দূর করে, যেমন বাতাস জলের উপর নৌকাকে নিয়ে যায়।

NepaliIND

किनकी भटकने इन्द्रियको पछि लाग्ने मनले आफ्नो भेदभावलाई जसरी हावाले पानीमा डुङ्गा बोकेर लैजान्छ।

SindhiIND

ڇو ته عقل، جيڪو ڀوڳيندڙ حواس جي پٺيان ڊوڙندو آهي، سو پنهنجي تفاوت کي ائين کڻي وڃي ٿو، جيئن واءُ پاڻيءَ تي ٻيڙيءَ کي کڻي وڃي ٿو.

MalayalamIND

അലഞ്ഞുതിരിയുന്ന ഇന്ദ്രിയങ്ങളെ പിന്തുടരുന്ന മനസ്സ്, കാറ്റ് വെള്ളത്തിൽ ഒരു ബോട്ടിനെ കൊണ്ടുപോകുന്നതുപോലെ, അവൻ്റെ വിവേചനത്തെ അകറ്റുന്നു.

KannadaIND

ಅಲೆದಾಡುವ ಇಂದ್ರಿಯಗಳ ಹಿನ್ನೆಲೆಯಲ್ಲಿ ಅನುಸರಿಸುವ ಮನಸ್ಸು, ಗಾಳಿಯು ನೀರಿನಲ್ಲಿ ದೋಣಿಯನ್ನು ಒಯ್ಯುವಂತೆ ತನ್ನ ತಾರತಮ್ಯವನ್ನು ಒಯ್ಯುತ್ತದೆ.

DogriIND

कीजे भटकदे इंद्रियें दे मद्देनजर औने आह्ला मन उसी भेदभाव गी उस चाल्लीं लेई जंदा ऐ, जि'यां हवा पानी उप्पर इक नाव गी लेई जंदी ऐ।

KonkaniIND

कारण भोंवतणच्या इंद्रियांच्या फाटल्यान येवपी मन ताचो भेदभाव व्हरता, जशें वारें उदकाचेर बोट व्हरता.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.67।। व्याख्या-- [मनुष्यका यह जन्म केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। अतः मुझे तो केवल परमात्मप्राप्ति ही करनी है, चाहे जो हो जाय--ऐसा अपना ध्येय दृढ़ होना चाहिये। ध्येय दृढ़ होनेसे साधककी अहंतामेंसे भोगोंका महत्त्व हट जाता है। महत्त्व हट जानेसे व्यवसायात्मिका बुद्धि दृढ़ हो जाती है। परन्तु जबतक व्यवसायात्मिका बुद्धि दृढ़ नहीं होती, तबतक उसकी क्या दशा होती है--इसका वर्णन यहाँ कर रहे हैं।] 'इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते' -- जब साधक कार्यक्षेत्रमें सब तरहका व्यवहार करता है, तब इन्द्रियोंके सामने अपने-अपने विषय आ ही जाते हैं। उनमेंसे जिस इन्द्रियका अपने विषयमे राग हो जाता है, वह इन्द्रिय मनको अपना अनुगामी बना लेती है, मनको अपने साथ कर लेती है। अतः मन उस विषयका सुखभोग करने लग जाता है अर्थात् मनमें सुखबुद्धि, भोगबुद्धि पैदा हो जाती है; मनमें उस विषयका रंग चढ़ जाता है, उसका महत्त्व बैठ जाता है। जैसे, भोजन करते समय किसी पदार्थका स्वाद आता है तो रसनेन्द्रिय उसमें आसक्त हो जाती है। आसक्त होनेपर रसनेन्द्रिय मनको भी खीँच लेती है, तो मन उस स्वादमें प्रसन्न हो जाता है राजी हो जाता है। 'तदस्य हरति प्रज्ञाम्'-- जब मनमें विषयका महत्त्व बैठ जाता है, तब वह अकेला मन ही साधककी बुद्धिको हर लेता है अर्थात् साधकमें कर्तव्य-परायणता न रहकर भोगबुद्धि पैदा हो जाती है। वह भोगबुद्धि होनेसे साधकमें 'मुझे परमात्माकी ही प्राप्ति करनी है'--यह व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं रहती। इस तरहका विवेचन करनेमें तो देरी लगती है, पर बुद्धि विचलित होनेमें देरी नहीं लगती अर्थात् जहाँ इन्द्रियने मनको अपना अनुगामी बनाया कि मनमें भोगबुद्धि पैदा हो जाती है और उसी समय बुद्धि मारी जाती है। 'वायुर्नावमिवाम्भसि'-- वह बुद्धि किस तरह हर ली जाती है इसको दृष्टान्तरूपसे समझाते हैं कि जलमें चलती हुई नौकाको वायु जैसे हर लेती है, ऐसे ही मन बुद्धिको हर लेता है। जैसे, कोई मनुष्य नौकाके द्वारा नदी या समुद्रको पार करते हुए अपने गन्तव्य स्थानको जा रहा है। यदि उस समय नौकाके विपरीत वायु चलती है तो वह वायु उस नौकाको गन्तव्य स्थानसे विपरीत ले जाती है। ऐसे ही साधक व्यवसायात्मिका बुद्धिरूप नौकापर आरूढ़ होकर संसारसागरको पार करता हुआ परमात्माकी तरफ चलता है, तो एक इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बनाती है, वह अकेला मन ही बुद्धिरूप नौकाको हर लेता है अर्थात् उसे संसारकी तरफ ले जाता है। इससे साधककी विषयोंमें सुख-बुद्धि और उनके उपयोगी पदार्थोंमें महत्त्वबुद्धि हो जाती है। वायु नौकाको दो तरहसे विचलित करती है--नौकाको पथभ्रष्ट कर देती है अथवा जलमें डुबा देती है। परन्तु कोई चतुर नाविक होता है तो वह वायुकी क्रियाको अपने अनुकूल बना लेता है, जिससे वायु नौकाको अपने मार्गसे अलग नहीं ले जा सकती, प्रत्युत उसको गन्तव्य स्थानतक पहुँचानेमें सहायता करती है--ऐसे ही इन्द्रियोंके अनुगामी हुआ मन बुद्धिको दो तरहसे विचलित करता है--परमात्मप्राप्तिके निश्चय को दबाकर भोगबुद्धि पैदा कर देता है अथवा निषिद्ध भोगोंमें लगाकर पतन करा देता है। परन्तु जिसका मन और इन्द्रियाँ वशमें होती हैं, उसकी बुद्धिको मन विचलित नहीं करता, प्रत्युत परमात्माके पास पहुँचानेमें सहायता करता है (2। 6465)। सम्बन्ध-- अयुक्त पुरुषकी निश्चयात्मिका बुद्धि क्यों नहीं होती, इसका हेतु तो पूर्वश्लोकमें बता दिया। अब जो युक्त होता है, उसकी स्थितिका वर्णन करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

अयुक्त पुरुषमें बुद्धि क्यों नहीं होती इसपर कहते हैं क्योंकि अपनेअपने विषयमें विचरनेवाली अर्थात् विषयोंमें प्रवृत्त हुई इन्द्रियोंमेंसे जिसके पीछेपीछे यह मन जाता है विषयोंमें प्रवृत्त होता है वह उस इन्द्रियके विषयको विभागपूर्वक ग्रहण करनेमें लगा हुआ मन इस साधककी आत्मअनात्मसम्बन्धी विवेकज्ञानसे उत्पन्न हुई बुद्धिको हर लेता है अर्थात् नष्ट कर देता है। कैसे जैसे जलमें नौकाको वायु हर लेता है वैसे ही अर्थात् जैसे जलमें चलनेकी इच्छावाले पुरुषोंकी नौकाको वायु गन्तव्य मार्गसे हटाकर उल्टे मार्गपर ले जाता है वैसे ही यह मन आत्मविषयक बुद्धिको विचलित करके विषयविषयक बना देता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

आकाङ्क्षाद्वारा श्लोकान्तरमुत्थापयति अयुक्तस्येति। विक्षिप्तचेतसो भावनाभावे साक्षात्कारलक्षणा बुद्धिर्न भवतीति हेत्वन्तरेण साधयति इन्द्रियाणामिति। यत्पदोपात्तं मनस्तत्पदेनापि गृह्यते। इन्द्रियाणां श्रोत्रादीनां विषयाः शब्दादयस्तेषां विकल्पनं मिथो विभज्य ग्रहणं तेनेति यावत्। दृष्टान्तं व्याकरोति उदक इति। करोति यस्मात्तस्मादयुक्तस्य नोत्पद्यते बुद्धिरिति योजना।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

अयुक्तस्य बुद्धिर्नास्तीत्युक्तं तत्र हेतुमाह इन्द्रियाणामिति। यत्तु तदभावे दोषमाहेति तदयुक्तम्। पूर्वश्लोकऽपि दोषस्यैवोक्तत्वात्। इन्द्रियाणां स्वविषये प्रवर्तमानानां यन्मनोऽनुवर्तते तदिन्द्रियविषयविकल्पे प्रवृत्तमस्य पुरुषस्य विवेकिनः प्रज्ञामात्मानात्मविवेकजां हरति। अम्भसि नावं वायुरिव जले जिगमिषतां मार्गादुद्धृत्योन्मार्गे यथा वायुः प्रवर्तयति तद्वत्। यत्त्विन्द्रियाणां मध्ये यदेकमपीन्द्रियमनु लक्षीकृत्य विधीयते प्रेर्यते। प्रवर्तत इति यावत्। तदिन्द्रियमेकमपि मनसानुसृतं अस्य साधकस्य मनसो वा प्रज्ञां हरतीत्यादि तदयुक्तम्।नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य इत्यनुरोधेन इन्द्रियानुगतमनस एव बुद्धिहरणकर्तृत्वस्य विवक्षितत्वात्। श्रुतं मनःपदं त्यक्त्वाऽश्रुतस्यैकेन्द्रियस्य यत्तत्पदेनोपादानानौचित्यात्। मनस इत्यपि न। साधकस्यैव प्रकृतत्वात्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
indriyāṇāmof the senses
hiindeed
charatāmroaming
yatwhich
manaḥthe mind
anuvidhīyatebecomes constantly engaged
tatthat
asyaof that
haraticarries away
prajñāmintellect
vāyuḥwind
nāvamboat
ivaas
ambhasion the water
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.66
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्

जिसके मन-इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है? — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.68
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता

इसलिये हे महाबाहो ! जिस मनुष्यकी इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंसे सर्वथा निगृहीत (वशमें की हुई) हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 67
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 67
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि

अपने-अपने विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे एक ही इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जलमें नौकाको वायुकी तरह इसकी बुद्धिको हर लेता है। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 67 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 67 का हिंदी अर्थ: "अपने-अपने विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे एक ही इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जलमें नौकाको वायुकी तरह इसकी बुद्धिको हर लेता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 67?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 67 translates to: "For the mind, which follows in the wake of the wandering senses, carries away his discrimination, as the wind carries away a boat on the waters. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 67 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। अपने-अपने विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे एक ही इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जलमें नौकाको वायुकी तरह इसकी बुद्धिको हर लेता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "indriyāṇāṁ hi charatāṁ yan mano ’nuvidhīyate" mean in English?

"indriyāṇāṁ hi charatāṁ yan mano ’nuvidhīyate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 67. For the mind, which follows in the wake of the wandering senses, carries away his discrimination, as the wind carries away a boat on the waters. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.