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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 5
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्

महानुभाव गुरुजनोंको न मारकर इस लोकमें मैं भिक्षाका अन्न खाना भी श्रेष्ठ समझता हूँ। क्योंकि गुरुजनोंको मारकर यहाँ रक्तसे सने हुए तथा धनकी कामनाकी मुख्यतावाले भोगोंको ही तो भोगूँगा! — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

MarathiIND

खरंच, या जगात श्रेष्ठ शिक्षकांना मारण्यापेक्षा भिक्षा स्वीकारणे चांगले आहे. पण जर मी त्यांना मारले तर या जगात माझ्या संपत्तीचे सर्व भोग आणि पूर्ण इच्छा त्यांच्या रक्ताने माखतील.

GujaratiIND

ખરેખર, આ વિશ્વમાં સૌથી ઉમદા શિક્ષકોને મારવા કરતાં દાન સ્વીકારવું વધુ સારું છે. પણ જો હું તેમને મારી નાખીશ તો આ જગતમાં પણ મારી બધી જ સંપત્તિ અને પૂર્ણ ઈચ્છાઓ તેમના લોહીથી રંગાઈ જશે.

KannadaIND

ಅತ್ಯಂತ ಶ್ರೇಷ್ಠ ಗುರುಗಳನ್ನು ಕೊಲ್ಲುವುದಕ್ಕಿಂತ ಭಿಕ್ಷೆಯನ್ನು ಸ್ವೀಕರಿಸುವುದು ಈ ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಉತ್ತಮವಾಗಿದೆ. ಆದರೆ ನಾನು ಅವರನ್ನು ಕೊಂದರೆ, ಈ ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿಯೂ ಸಹ, ನನ್ನ ಎಲ್ಲಾ ಸಂಪತ್ತು ಮತ್ತು ಈಡೇರಿದ ಆಸೆಗಳು ಅವರ ರಕ್ತದಿಂದ ಮಸುಕಾಗುತ್ತವೆ.

TeluguIND

ఈ ప్రపంచంలో అత్యంత శ్రేష్ఠులైన గురువులను చంపడం కంటే భిక్షను స్వీకరించడం ఉత్తమం. కానీ నేను వారిని చంపినట్లయితే, ఈ ప్రపంచంలో కూడా, నా సంపద మరియు కోరికలు నెరవేరడం వారి రక్తంతో తడిసినవి.

BengaliIND

প্রকৃতপক্ষে, এই পৃথিবীতে সর্বশ্রেষ্ঠ শিক্ষকদের হত্যা করার চেয়ে ভিক্ষা গ্রহণ করা ভাল। কিন্তু আমি যদি তাদের হত্যা করি তবে এই পৃথিবীতেও আমার সমস্ত ভোগ-সম্পদ ও ইচ্ছা পূরণ তাদের রক্তে রঞ্জিত হবে।

MalayalamIND

ശ്രേഷ്ഠരായ ഗുരുക്കന്മാരെ കൊല്ലുന്നതിനേക്കാൾ നല്ലത് ഈ ലോകത്ത് ദാനം സ്വീകരിക്കുന്നതാണ്. എന്നാൽ ഞാൻ അവരെ കൊല്ലുകയാണെങ്കിൽ, ഈ ലോകത്തിൽ പോലും, എൻ്റെ സമ്പത്തിൻ്റെ എല്ലാ ആസ്വാദനങ്ങളും സഫലമായ ആഗ്രഹങ്ങളും അവരുടെ രക്തത്താൽ കറപ്പെട്ടിരിക്കും.

NepaliIND

वास्तवमा, यो संसारमा सबैभन्दा महान शिक्षकहरूलाई मार्नु भन्दा दान स्वीकार गर्नु राम्रो छ। तर यदि मैले उनीहरूलाई मारे भने, यस संसारमा पनि, मेरो सबै धन र इच्छाहरू पूरा गर्ने तिनीहरूको रगतले रंगिनेछ।

SindhiIND

هن دنيا ۾ چڱو آهي ته خيرات قبول ڪجي، ان کان ته، جي وڏن استادن کي قتل ڪيو وڃي. پر جيڪڏهن مان انهن کي ماري ڇڏيان ته هن دنيا ۾ به منهنجون سموريون دولتون ۽ خواهشون پوريون ڪري انهن جي رت سان رنگجي وينديون.

TamilIND

இந்த உலகில் மிகவும் உன்னதமான ஆசிரியர்களைக் கொல்வதை விட பிச்சை எடுப்பது சிறந்தது. ஆனால் நான் அவர்களைக் கொன்றால், இந்த உலகத்தில் கூட, என் செல்வம் மற்றும் நிறைவேறிய ஆசைகள் அனைத்தும் அவர்களின் இரத்தத்தால் கறைபட்டுவிடும்.

PunjabiIND

ਵਾਸਤਵ ਵਿੱਚ, ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ ਸਭ ਤੋਂ ਚੰਗੇ ਗੁਰੂਆਂ ਨੂੰ ਮਾਰਨ ਨਾਲੋਂ ਦਾਨ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰਨਾ ਬਿਹਤਰ ਹੈ। ਪਰ ਜੇ ਮੈਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਮਾਰ ਦੇਵਾਂ, ਤਾਂ ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਵਿਚ ਵੀ, ਮੇਰੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਧਨ-ਦੌਲਤਾਂ ਅਤੇ ਪੂਰੀਆਂ ਇੱਛਾਵਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਖੂਨ ਨਾਲ ਰੰਗੀਆਂ ਜਾਣਗੀਆਂ।

AssameseIND

সঁচাকৈয়ে এই জগতত অতি সম্ভ্ৰান্ত গুৰুসকলক বধ কৰাতকৈ দান-বৰঙণি গ্ৰহণ কৰাটোৱেই ভাল। কিন্তু যদি মই তেওঁলোকক বধ কৰি দিওঁ, তেন্তে এই পৃথিৱীতো মোৰ সকলো ধন-সম্পত্তিৰ ভোগ আৰু পূৰ্ণ হোৱা কামনা তেওঁলোকৰ তেজেৰে কলংকিত হ’লহেঁতেন।

OdiaIND

ପ୍ରକୃତରେ, ଏହି ଦୁନିଆରେ ସବୁଠାରୁ ସମ୍ଭ୍ରାନ୍ତ ଶିକ୍ଷକମାନଙ୍କୁ ହତ୍ୟା କରିବା ଅପେକ୍ଷା ଭିକ୍ଷା ଗ୍ରହଣ କରିବା ଭଲ | କିନ୍ତୁ ଯଦି ମୁଁ ସେମାନଙ୍କୁ ହତ୍ୟା କରିବାକୁ ଚାହେଁ, ଏପରିକି ଏହି ଦୁନିଆରେ, ମୋର ସମସ୍ତ ଧନ ଉପଭୋଗ ଏବଂ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଇଚ୍ଛା ସେମାନଙ୍କ ରକ୍ତରେ ଦାଗ ହୋଇଯିବ |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- [इस श्लोकसे ऐसा प्रतीत होता है कि दूसरे-तीसरे श्लोकोंमें भगवान्के कहे हुए वचन अब अर्जुनके भीतर असर कर रहे हैं। इससे अर्जुनके मनमें यह विचार आ रहा है कि भीष्म, द्रोण आदि गुरुजनोंको मारना धर्मयुक्त नहीं है--ऐसा जानते हुए भी भगवान् मुझे बिना किसी सन्देहके युद्धके लिये आज्ञा दे रहे हैं, तो कहीं-न-कहीं मेरी समझमें ही गलती है! इसलिये अर्जुन अब पूर्वश्लोककी तरह उत्तेजित होकर नहीं बोलते, प्रत्युत कुछ ढिलाईसे बोलते हैं।] 'गुरुनहत्वा ৷৷. भैक्ष्यमपीह लोके'-- अब अर्जुन पहले अपने पक्षको सामने रखते हुए कहते हैं कि अगर मैं भीष्म, द्रोण आदि पूज्यजनोंके साथ युद्ध नहीं करूँगा, तो दुर्योधन भी अकेला मेरे साथ युद्ध नहीं करेगा। इस तरह युद्ध न होनेसे मेरेको राज्य नहीं मिलेगा, जिससे मेरेको दुःख पाना पड़ेगा। मेरा जीवननिर्वाह भी कठिनतासे होगा। यहाँतक कि क्षत्रियके लिये निषिद्ध जो भिक्षावृत्ति है, उसको ही जीवन-निर्वाहके लिये ग्रहण करना पड़ सकता है। परन्तु गुरुजनोंको मारनेकी अपेक्षा मैं उस कष्टदायक भिक्षा-वृत्तिको भी ग्रहण करना श्रेष्ठ मानता हूँ। 'इह लोके' कहनेका तात्पर्य है कि यद्यपि भिक्षा माँगकर खानेसे इस संसारमें मेरा अपमान-तिरस्कार होगा, लोग मेरी निन्दा करेंगे, तथापि गुरुजनोंको मारनेकी अपेक्षा भिक्षा माँगना श्रेष्ठ है। 'अपि' कहनेका तात्पर्य है कि मेरे लिये गुरुजनोंको मारना भी निषिद्ध है; और भिक्षा माँगना भी निषिद्ध है परन्तु इन दोनोंमें भी गुरुजनोंको मारना मुझे अधिक निषिद्ध दीखता है। 'हत्वार्थकामांस्तु ৷৷. रुधिरप्रदिग्धान्'-- अब अर्जुन भगवान्के वचनोंकी तरफ दृष्टि करते हुए कहते हैं कि अगर मैं आपकी आज्ञाके अनुसार युद्ध करूँ, तो युद्धमें गुरुजनोंकी हत्याके परिणाममें मैं उनके खूनसे सने हुए और जिनमें धन आदिकी कामना ही मुख्य है, ऐसे भोगोंको ही तो भोगूँगा। मेरेको भोग ही तो मिलेंगे। उन भोगोंके मिलनेसे मुक्ति थोड़े ही होगी! शान्ति थोड़े ही मिलेगी! यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि भीष्म, द्रोण आदि गुरुजन धनके द्वारा ही कौरवोंसे बँधे थे; अतः यहाँ अर्थकामान्' पदको 'गुरुन्' पदका विशेषण मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है? इसका उत्तर यह है कि 'अर्थकी कामनावाले गुरुजन'--ऐसा अर्थ करना उचित नहीं है। कारण कि पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण आदि गुरुजन धनकी कामनावाले नहीं थे। वे तो दुर्योधनके वृत्तिभोगी थे उन्होंने दुर्योधनका अन्न खाया था। अतः युद्धके समय दुर्योधनका साथ छो़ड़ना कर्तव्य न समझकर ही वे कौरवोंके पक्षमें खड़े हुए थे। दूसरी बात अर्जुनने भीष्म द्रोण आदिके लिये 'महानुभावान' पदका प्रयोग किया है। अतः ऐसे श्रेष्ठ भाववालोंको अर्थकी कामनावाले कैसे कहा जा सकता है तात्पर्य है कि जो महानुभाव हैं, वे अर्थकी कामनावाले नहीं हो सकते; और जो अर्थकी कामनावाले हैं वे महानुभाव नहीं हो सकते। अतः यहाँ 'अर्थकामान्' पद 'भोगान्' पदका ही विशेषण हो सकता है। विशेष बात भगवान्ने दूसरे-तीसरे श्लोकोंमें अर्जुनके कल्याणकी दृष्टिसे ही उन्हें कायरताको छोड़कर युद्धके लिये खड़ा होनेकी आज्ञा दी थी। परन्तु अर्जुन उलटा ही समझे अर्थात् वे समझे कि भगवान् राज्यका भोग करनेकी दृष्टिसे ही युद्धकी आज्ञा देते हैं। पहले तो अर्जुनका युद्ध न करनेका एक ही पक्ष था, जिससे वे धनुषबाण छोड़कर और शोकाविष्ट होकर रथके मध्यभागमें बैठ गये थे (1। 47)। परंतु युद्ध करनेका पक्ष तो भगवान्के कहनेसे ही हुआ है। तात्पर्य है कि अर्जुनका भाव था कि हमलोग तो धर्मको जानते हैं, पर दुर्योधन आदि धर्मको नहीं जानते, इसलिये वे धन, राज्य आदिके लोभसे युद्ध करनेके लिये तैयार खड़े हैं। अब वही बात अर्जुन यहाँ अपने लिये कहते हैं कि अगर मैं भी आपकी आज्ञाके अनुसार युद्ध करूँ, तो परिणाममें गुरुजनोंके रक्तसे सने हुए धन, राज्य आदिको ही तो प्राप्त करूँगा! इस तरह अर्जुनको युद्ध करनेमें बुराई-ही-बुराई दिखायी दे रही है। जो बुराई बुराईके रूपमें आती है, उसको मिटाना बड़ा सुगम होता है। परन्तु जो बुराई अच्छाईके रूपमें आती है, उसको मिटाना बड़ा कठिन होता है; जैसे--सीताजीके सामने रावण और हनुमान्जीके सामने कालनेमि राक्षस आये तो उनको सीताजी और हनुमान्जी पहचान नहीं सके; क्योंकि उन दोनोंका वेश साधुओंका था। अर्जुनकी मान्यतामें युद्धरूप कर्तव्य-कर्म करना बुराई है और युद्ध न करना भलाई है अर्थात् अर्जुनके मनमें धर्म (हिंसा-त्याग-) रूप भलाईके वेशमें कर्तव्य-त्यागरूप बुराई आयी है। उनको कर्तव्यत्यागरूप बुराई बुराईके रूपमें नहीं दीख रही है; क्योंकि उनके भीतर शरीरोंको लेकर मोह है। अतः इस बुराईको मिटानेमें भगवान्को भी बड़ा जोर पड़ रहा है और समय लग रहा है। आजकल समाजमें एकताके बहाने वर्ण-आश्रमकी मर्यादाको मिटानेकी कोशिश की जा रही है, तो यह बुराई एकतारूप अच्छाईके वेशमें आनेसे बुराईरूपसे नहीं दीख रही है। अतः वर्ण-आश्रमकी मर्यादा मिटनेसे परिणाममें लोगोंका कितना पतन होगा, लोगोंमें कितना आसुरभाव आयेगा--इस तरफ दृष्टि ही नहीं जाती। ऐसे ही धनके बहाने लोग झूठ, कपट, बेईमानी, ठगी, विश्वासघात आदि-आदि दोषोंको भी दोषरूपसे नहीं जानते। यहाँ अर्जुनमें धर्मके रूपमें बुराई आयी है कि हम भीष्म, द्रोण आदि महानुभावोंको कैसे मार सकते हैं? क्योंकि हम धर्मको जाननेवाले हैं। तात्पर्य है कि अर्जुनने जिसको अच्छाई माना है, वह वास्तवमें बुराई ही है; परन्तु उसमें मान्यता अच्छाईकी होनेसे वह बुराईरूपसे नहीं दीख रही है। सम्बन्ध-- भगवान्के वचनोंमें ऐसी विलक्षणता है कि वे अर्जुनके भीतर अपना प्रभाव डालते जा रहे हैं जिससे अर्जुनको अपने युद्ध न करनेके निर्णयमें अधिक सन्देह होता जा रहा है। ऐसी अवस्थाको प्राप्त हुए अर्जुन कहते हैं--

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Sri Harikrishnadas Goenka

No such translation is available. Translation starts from 2.10

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Sri Anandgiri

राज्ञां धर्मेऽपि युद्धे गुर्वादिवधे वृत्तिमात्रफलत्वं गृहीत्वा पापमारोप्य ब्रूते गुरूनिति। गुरून्भीष्मद्रोणादीन्भ्रात्रादींश्चात्र प्राप्तानहिंसित्वा महानुभावान्महामाहात्म्याञ्श्रुताध्ययनसंपन्नान् श्रेयः प्रशस्यतरं युक्तं भोक्तुमभ्यवहर्तुं भैक्षं भिक्षाणां समूहः भिक्षाशनं नृपादीनां निषिद्धमपीह लोके व्यवहारभूमौ। नहि गुर्वादिहिंसया राज्यभोगोऽपेक्ष्यते। किञ्च हत्वा गुर्वादीनर्थकामानेव भुञ्जीय न मोक्षमनुभवेयमिहैव भोगो न स्वर्गे। अर्थकामानेव विशिनष्टि भोगानिति। भुज्यन्त इति भोगास्तान्रुधिरप्रदिग्धांल्लोहितलिप्तानिवात्यन्तगर्हितान् अतोभोगान्गुरुवधादिसाध्यान्परित्यज्य भिक्षाशनमेव युक्तमित्यर्थः।

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Sri Dhanpati

एवं तर्हि राज्यालाभेन भोगाभावे भिक्षाटनं कर्तव्यं भविष्यतीत्याशङ्कामिष्टापत्त्या परिहरति गुरुनिति। गुरुन्भीष्मद्रोणादीन्महानुभावानहत्वाहिंसित्वा इहास्िमँल्लोके भैक्षमपि भिक्षया लब्धमन्नं क्षत्रियस्य निषिद्धमपि भोक्तुमशितुं श्रेयः प्रशस्यम्। गुरुहिंसावर्जनार्थस्य भिक्षाशनस्य प्रत्यवायाजनकत्वात्। गुर्वहननेन नरकाभावं महानतिप्रसिद्धोऽनुभावः प्रभावो येषामिति विशेषणेनापकीर्त्यभावं च गुणमुक्त्वा हनने दोषमाह हत्वेति। महानुभावानित्यस्यात्रापि संबन्धः। गुरुन्महानुभावान्हत्वा भोगानर्थकामानिहैव भुञ्जीय नतु परलोके इहापि रुधिरप्रदिग्धान्। अपकीर्तिव्याप्तत्वेनात्यन्तजुगुप्सितानित्यर्थः। अर्थकामानिति गुरुविशेषणम्। तथाचार्थतृष्णाकुलत्वेनैते तावद्युद्धान्न निवर्तेरन् तस्मादेतद्वधः प्रसज्येतैवेत्यर्थः। तथाचोक्तं भीष्मेणअर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित्। इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः।। इत्यपरे। केचित्तु ननुगुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः। उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधायते।। इति स्मृतेस्तेषां युद्धगर्वेणावलिप्तानामन्यायराज्यग्रहणेन शिष्यद्रोहेण च कार्याकार्यविवेकशून्यानामुत्पथनिष्ठानां च वधएव श्रेयानित्याशङ्क्याह गुरुनिति। महान् श्रुताध्ययनादिनिबन्धनः प्रभावो येषां तान्। तथाच कालकामादयोऽपि यैर्वशीकृतास्तेषां पुण्यातिशायिनां नावलिप्तत्वादिक्षुद्रपाप्मसंश्लेष इत्यर्थः। हिमहानुभावानित्येकं वा पदम्। हिमं जाड्यमपहन्तीति हिमहा आदित्योऽग्निर्वा तस्येवानुभावः सामर्थ्यं येषां तान्। तथाचातितेजस्वित्वात्तेषामवलिप्तत्वादिदोषो नास्त्येवधर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम्। तेजीयसां न दोषाय वह्नेः सर्वभुजो यथा।। इत्युक्तेरिति वर्णयन्ति तत्रैतदीयोत्थापनोक्तस्मृतौ अवलिप्तत्वादिदोषप्रयुक्तत्यागविधानेन वधानुत्त्या तच्छ्रेयस्त्वस्य दूरापास्तत्वमस्ति नवेति विद्वद्भिर्विचार्यम्। किंच यत्तु ननु पदार्थलुब्धाः सन्तो युद्धे प्रवृत्तास्तदैषां विक्रीतात्मनां कुतस्त्यं पूर्वोक्तं माहात्म्यम्। तथाचोक्तं भीष्मेण युधिष्ठिरं प्रतिअर्थस्य पुरुषो दासः इत्यादीत्याशङ्क्याहहत्वेतीत्युत्तरार्धं तैरवतारितं तत्राप्येतन्मूलकावलिप्तत्वादिदोषाणां तैरेव तदीयातिप्रसिद्धमहानुभावत्वातितेजस्वित्ववर्णनेन समाहितत्वात्पुनरीदृक्शङ्काया उत्थानमस्ति नवेति विचारणीयम्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
gurūnteachers
ahatvānot killing
hicertainly
mahāanubhāvān
śhreyaḥbetter
bhoktumto enjoy life
bhaikṣhyamby begging
apieven
iha lokein this world
hatvākilling
arthagain
kāmāndesiring
tubut
gurūnnoble elders
ihain this world
evacertainly
bhuñjīyaenjoy
bhogānpleasures
rudhirablood
pradigdhāntainted with
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.4
अर्जुन उवाच कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन

हे मधुसूदन! मैं रणभूमिमें भीष्म और द्रोणके साथ बाणोंसे युद्ध कैसे करूँ? क्योंकि हे अरिसूदन! ये दोनों ही पूजाके योग्य हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.6
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः। यानेव हत्वा न जिजीविषाम स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः

हम यह भी नहीं जानते कि हमलोगोंके लिये युद्ध करना और न करना - इन दोनोंमेंसे कौन-सा अत्यन्त श्रेष्ठ है; और हमें इसका भी पता नहीं है कि हम उन्हें जीतेंगे अथवा वे हमें जीतेंगे। जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही धृतराष्ट्रके सम्बन्धी हमारे सामने खड़े हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 5
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 5
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्

महानुभाव गुरुजनोंको न मारकर इस लोकमें मैं भिक्षाका अन्न खाना भी श्रेष्ठ समझता हूँ। क्योंकि गुरुजनोंको मारकर यहाँ रक्तसे सने हुए तथा धनकी कामनाकी मुख्यतावाले भोगोंको ही तो भोगूँगा! — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 5 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 5 का हिंदी अर्थ: "महानुभाव गुरुजनोंको न मारकर इस लोकमें मैं भिक्षाका अन्न खाना भी श्रेष्ठ समझता हूँ। क्योंकि गुरुजनोंको मारकर यहाँ रक्तसे सने हुए तथा धनकी कामनाकी मुख्यतावाले भोगोंको ही तो भोगूँगा! — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 5?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 5 translates to: "Better it is, indeed, in this world to accept alms than to slay the most noble teachers. But if I were to kill them, even in this world, all my enjoyments of wealth and fulfilled desires would be stained with their blood. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुर" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 5 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। महानुभाव गुरुजनोंको न मारकर इस लोकमें मैं भिक्षाका अन्न खाना भी श्रेष्ठ समझता हूँ। क्योंकि गुरुजनोंको मारकर यहाँ रक्तसे सने हुए तथा धनकी कामनाकी मुख्यतावाले भोगोंको ही तो भोगूँगा! — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "gurūnahatvā hi mahānubhāvān" mean in English?

"gurūnahatvā hi mahānubhāvān" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 5. Better it is, indeed, in this world to accept alms than to slay the most noble teachers. But if I were to kill them, even in this world, all my enjoyments of wealth and fulfilled desires would be stained with their blood. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.