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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 44
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते

उस पुष्पित वाणीसे जिसका अन्तःकरण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्योंकी परमात्मामें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। — VaniSagar

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TeluguIND

ఆనందం మరియు శక్తితో ముడిపడి ఉన్నవారికి, అటువంటి బోధనల ద్వారా వారి మనస్సులను ఆకర్షించేవారికి, ధ్యానం మరియు సమాధి (సూపర్‌చేతన స్థితి)పై స్థిరంగా వంగి ఉండే వారి నిర్ణీత కారణం ఏర్పడదు.

GujaratiIND

જેઓ આનંદ અને શક્તિ સાથે જોડાયેલા છે, જેમના મન આવા ઉપદેશોથી દૂર થઈ જાય છે, તેમના માટે નિશ્ચિત કારણ રચાય નથી જે સતત ધ્યાન અને સમાધિ (અતિચેતન અવસ્થા) તરફ વળેલું છે.

BengaliIND

যাঁরা আনন্দ ও শক্তির প্রতি অনুরক্ত, যাঁদের মন এই ধরনের শিক্ষার দ্বারা দূরে সরে যায়, তাঁদের নির্দিষ্ট কারণ তৈরি হয় না যা ধ্যান ও সমাধির (অতিচেতন অবস্থা) প্রতি অবিচলিত থাকে।

MalayalamIND

ആനന്ദത്തോടും ശക്തിയോടും ആഭിമുഖ്യം പുലർത്തുന്നവർക്ക്, അത്തരം പഠിപ്പിക്കലുകളാൽ മനസ്സിനെ ആകർഷിക്കുന്നവർക്ക്, ധ്യാനത്തിലും സമാധിയിലും (അതിബോധാവസ്ഥ) സ്ഥിരമായി ചായ്‌വുള്ള അവരുടെ നിർണ്ണായകമായ കാരണം രൂപപ്പെടുന്നില്ല.

SindhiIND

انهن لاءِ جيڪي لذت ۽ طاقت سان جڙيل آهن، جن جو ذهن اهڙين تعليمات سان ڪٽجي وڃي ٿو، انهن لاءِ اهو ثابتي سبب پيدا نه ٿيو آهي، جيڪو مسلسل مراقبي ۽ سماڌي (اُوپر شعوري حالت) ڏانهن مائل آهي.

NepaliIND

जो सुख र शक्तिमा आसक्त छन्, जसको मन यस्ता उपदेशले तानिएको छ, ध्यान र समाधि (अतिचेतन अवस्था) मा दृढतापूर्वक झुकेको निश्चयात्मक कारण बन्दैन।

MarathiIND

जे सुख आणि सामर्थ्याशी संलग्न आहेत, ज्यांचे मन अशा शिकवणीने दूर गेले आहे, त्यांचे निश्चित कारण तयार होत नाही जे ध्यान आणि समाधी (अतिचेतन अवस्थेला) स्थिरपणे वाकलेले असतात.

KannadaIND

ಆನಂದ ಮತ್ತು ಶಕ್ತಿಗೆ ಲಗತ್ತಿಸಿರುವವರಿಗೆ, ಅಂತಹ ಬೋಧನೆಗಳಿಂದ ಅವರ ಮನಸ್ಸನ್ನು ಸೆಳೆಯಲಾಗುತ್ತದೆ, ಧ್ಯಾನ ಮತ್ತು ಸಮಾಧಿ (ಸೂಪರ್ ಪ್ರಜ್ಞೆಯ ಸ್ಥಿತಿ) ಯಲ್ಲಿ ಸ್ಥಿರವಾಗಿ ಬಾಗಿದ ಅವರ ನಿರ್ಣಾಯಕ ಕಾರಣವು ರೂಪುಗೊಳ್ಳುವುದಿಲ್ಲ.

PunjabiIND

ਉਹਨਾਂ ਲਈ ਜੋ ਅਨੰਦ ਅਤੇ ਸ਼ਕਤੀ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਹੋਏ ਹਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਮਨ ਅਜਿਹੀਆਂ ਸਿੱਖਿਆਵਾਂ ਦੁਆਰਾ ਖਿੱਚਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਹਨਾਂ ਦਾ ਨਿਸ਼ਚਤ ਕਾਰਨ ਨਹੀਂ ਬਣਦਾ ਹੈ ਜੋ ਨਿਰੰਤਰ ਧਿਆਨ ਅਤੇ ਸਮਾਧੀ (ਅਧਿਆਤਮ ਅਵਸਥਾ) ਵੱਲ ਝੁਕਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ।

OdiaIND

ଯେଉଁମାନେ ଆନନ୍ଦ ଏବଂ ଶକ୍ତି ସହିତ ଜଡିତ, ସେମାନଙ୍କ ମନ ଏପରି ଶିକ୍ଷା ଦ୍ୱାରା ଆକର୍ଷିତ ହୁଏ, ସେମାନଙ୍କର ନିର୍ଣ୍ଣୟ କାରଣ ଗଠିତ ହୁଏ ନାହିଁ ଯାହା ଧ୍ୟାନ ଏବଂ ସମାଦୀ (ଅତ୍ୟଧିକ ଚେତନା ସ୍ଥିତି) ଉପରେ ସ୍ଥିର ହୋଇ ରହିଥାଏ |

TamilIND

இன்பம் மற்றும் அதிகாரத்தின் மீது பற்று கொண்டவர்களுக்கு, இத்தகைய போதனைகளால் மனம் கவர்ந்தவர்களுக்கு, அவர்களின் உறுதியான காரணம் உருவாகாது, அது தியானம் மற்றும் சமாதியில் (மேற்பார்வை நிலை) சீராக வளைந்திருக்கும்.

ManipuriIND

ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯁꯛꯇꯤꯒꯥ ꯃꯔꯤ ꯂꯩꯅꯕꯥ, ꯑꯁꯤꯒꯨꯝꯕꯥ ꯇꯝꯕꯤꯕꯥ ꯑꯁꯤꯅꯥ ꯃꯈꯣꯌꯒꯤ ꯋꯥꯈꯜ ꯂꯧꯁꯤꯡ ꯂꯧꯁꯤꯜꯂꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏꯁꯤꯡꯒꯤꯗꯃꯛꯇꯗꯤ ꯃꯈꯣꯌꯒꯤ ꯂꯦꯞꯄꯥ ꯂꯩꯇꯕꯥ ꯃꯔꯝ ꯑꯁꯤ ꯃꯦꯗꯤꯇꯦꯁꯟ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯁꯃꯥꯙꯤ (ꯁꯨꯄꯥꯔꯀꯟꯁꯤꯌꯦꯜ ꯁ꯭ꯇꯦꯠ)ꯗꯥ ꯂꯦꯞꯄꯥ ꯂꯩꯇꯅꯥ ꯂꯦꯞꯂꯤꯕꯥ ꯑꯁꯤ ꯁꯦꯃꯈꯤꯗꯦ꯫

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.44।। व्याख्या -- 'तयापहृतचेतसाम्'-- पूर्वश्लोकोंमें जिस पुष्पित वाणीका वर्णन किया गया है उस वाणीसे जिनका चित्त अपहृत हो गया है अर्थात् स्वर्गमें बड़ा भारी सुख है दिव्य नन्दनवन है अप्सराएँ हैं अमृत है ऐसी वाणीसे जिनका चित्त उन भोगोंकी तरफ खिंच गया है। 'भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्'-- शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध ये पाँच विषय शरीरका आराम मान और नामकी बड़ाई इनके द्वारा सुख लेनेका नाम भोग है। भोगोंके लिये पदार्थ रूपयेपैसे मकान आदिका जो संग्रह किया जाता है उसका नाम ऐश्वर्य है। इन भोग और ऐश्वर्यमें जिनकी आसक्ति है प्रियता है खिंचाव है अर्थात् इनमें जिनकी महत्त्वबुद्धि है उनको 'भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्' कहा गया है। जो भोग और ऐश्वर्यमें ही लगे रहते हैं वे आसुरी सम्पत्तिवाले होते हैं। कारण कि असु नाम प्राणोंका है और उन प्राणोंको जो बनाये रखना चाहते हैं उन प्राणपोषणपरायण लोगोंका नाम असुर है। वे शरीरकी प्रधानताको लेकर यहाँके अथवा स्वर्गके भोग भोगना चाहते हैं । 'व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते'-- जो मनुष्यजन्मका असली ध्येय है जिसके लिये मनुष्यशरीर मिला है उस परमात्माको ही प्राप्त करना है ऐसी व्यवसायात्मिका बुद्धि उन लोगोंमें नहीं होती। तात्पर्य यह है कि जो भोग भोगे जा चुके हैं जो भोग भोगे जा सकते हैं जिन भोगोंको सुन रखा है और जो भोग सुने जा सकते हैं उनके संस्कारोंके कारण बुद्धिमें जो मलिनता रहती है उस मलिनताके कारण संसारसे सर्वथा विरक्त होकर एक परमात्माकी तरफ चलना है ऐसा दृढ़ निश्चय नहीं होता। ऐसे ही संसारकी अनेक विद्याओं कलाओं आदिका जो संग्रह है उससे मैं विद्वान हूँ मैं जानकार हूँ ऐसा जो अभिमानजन्य सुखका भोग होता है उसमें आसक्त मनुष्योंका भी परमात्मप्राप्तिका एक निश्चय नहीं होता। विशेष बात परमदयालु प्रभुने कृपा करके इस मनुष्यशरीरमें एक ऐसी विलक्षण विवेकशक्ति दी है जिससे वह सुखदुःखसे ऊँचा उठ जाय अपना उद्धार कर ले सबकी सेवा करके भगवान्तकको अपने वशमें कर ले इसीमें मनुष्यशरीरकी सार्थकता है। परन्तु प्रभुप्रदत्त इस विवेकशक्तिका अनादर करके नाशवान् भोग और संग्रहमें आसक्त हो जाना पशुबुद्धि है। कारण कि पशुपक्षी भी भोगोंमें लगे रहते हैं ऐसे ही अगर मनुष्य भी भोगोंमें लगा रहे तो पशुपक्षियोंमें और मनुष्यमें अन्तर ही क्या रहा पशुपक्षी तो भोगयोनि है अतः उनके सामने कर्तव्यका प्रश्न ही नहीं है। परन्तु मनुष्यजन्म तो केवल अपने कर्तव्यका पालन करके अपना उद्धार करनेके लिये ही मिला है भोग भोगनेके लिये नहीं। इसलिये मनुष्यके सामने जो कुछ अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति आती है वह सब साधनसामग्री है भोगसामग्री नहीं। जो उसको भोगसामग्री मान लेते हैं उनकी परमात्मामें व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती। वास्तवमें सांसारिक पदार्थ परमात्माकी तरफ चलनेमें बाधा नहीं देते प्रत्युत वर्तमानमें जो भोगोंका महत्व अन्तःकरणमें बैठा हुआ है वही बाधा देता है। भोग उतना नहीं अटकाते जितना भोगोंका महत्व अटकाता है। अटकानेमें अपनी रुचि नीयतकी प्रधानता है। भोग और संग्रहकी रुचिको रखते हुए कोई परमात्माको प्राप्त करना चाहे तो परमात्माकी प्राप्ति तो दूर रही उनकी प्राप्तिका एक निश्चय भी नहीं हो सकता। कारण कि जहाँ परमात्माकी तरफ चलनेकी रुचि है वहीं भोगोंकी रुचि भी है। जबतक भोग और संग्रहमें मानबड़ाईआराममें रुचि है तबतक कोई भी एक निश्चय करके परमात्मामें नहीं लग सकता क्योंकि उसका अन्तःकरण भोगोंकी रुचिद्वारा हर लिया गया उसकी जो शक्ति थी वह भोग और संग्रहमें लग गयी। सम्बन्ध-- किसी बातको पुष्ट करना हो तो पहले उसके दोनों पक्ष सामने रखकर फिर उसको पुष्ट किया जाता है। यहाँ भगवान् निष्कामभावको पुष्ट करना चाहते हैं अतः पीछेके तीन श्लोकोंमें सकामभाववालोंका वर्णन करके अब आगेके श्लोकमें निष्काम होनेकी प्रेरणा करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

जो भोग और ऐश्वर्यमें आसक्त हैं अर्थात् भोग और ऐश्वर्य ही पुरषार्थ है ऐसे मानकर उनमें ही जिनका प्रेम हो गया है इस प्रकार जो तद्रूप हो रहे हैं तथा क्रियाभेदोंको विस्तारपूर्वक बतलानेवाली उस उपर्युक्त वाणीद्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है अर्थात् ( जिनकी ) विवेकबुद्धि आच्छादित हो रही है उनकी समाधिमें सांख्यविषयक या योगविषयक निश्चयात्मिका बुद्धि ( नहीं ठहरती )। पुरुषके भोगके लिये जिसमें सब कुछ स्थापित किया जाता है उसका नाम समाधि है। इस व्युत्पत्तिके अनुसार समाधि अन्तःकरणका नाम है उसमें बुद्धि नहीं ठहरती अर्थात् उत्पन्न ही नहीं होती।

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Sri Anandgiri

ननु कर्मकाण्डनिष्ठानां कर्मानुष्ठायिनामपि बुद्धिशुद्धिद्वारेणान्तःकरणे साध्यसाधनभूतबुद्धिद्वयसमुदायसंभवादतो मोक्षो भविष्यति नेत्याह तेषां चेति। तदात्मभूतानां तयोरेव भोगैश्वर्ययोरात्मकर्तव्यत्वेनारोपितयोरभिनिविष्टे चेतसि तादात्म्याध्यासवतां बहिर्मुखानामित्यर्थः। तथापि शास्त्रानुसारिण्या विवेकप्रज्ञया व्यवसायात्मिका बुद्धिस्तेषामुदेष्यतीत्याशङ्क्याह तयेति। ननु समाधिः संप्रज्ञातासंप्रज्ञातभेदेन द्विधोच्यते तत्र बुद्धिद्वयविधिरप्रसक्तः सन्कथं निषिध्यते तत्राह समाधीयत इति।

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Sri Dhanpati

तेषां बोगैश्वर्ययोः प्रसक्तानामतिरक्तचितानां यतस्तया वाचापहृतमाच्छादितं चेतो येषां तेषां व्यवसायात्मिका सांख्ये योगे वा या बुद्धिः सा समाधौ समाधीयते पुरुषोपभोगाय सर्वमस्मिन्नन्तःकरणं तस्मिन्न विधीयते न स्थिरीभवतीत्यर्थः। ननु अहं ब्रह्मास्मीत्यवस्थानं समाधिस्तन्निमित्तमिति चित्तैकाग्र्यं परमेश्वरैकाग्र्याभिमुखत्वं तस्मिन्वेति व्याख्यानद्वयमाचारर्यैः कुतो न प्रदर्शितमितिचेत् अहं ब्रह्मास्मीत्यवस्थानस्य परमेश्वरैकाग्र्याभिमुखत्वस्य च व्यवसायात्मिकसांख्ययोगबुद्धावन्तर्भावमभिप्रेत्येति गृहाण।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
bhogagratification
aiśhwaryaluxury
prasaktānāmwhose minds are deeply attached
tayāby that
apahṛitachetasām
vyavasāyaātmikā
buddhiḥintellect
samādhaufulfilment
nanever
vidhīyateoccurs
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.43
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्। क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति

हे पृथानन्दन ! जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.45
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्

वेद तीनों गुणोंके कार्यका ही वर्णन करनेवाले हैं; हे अर्जुन! तू तीनों गुणोंसे रहित हो जा, निर्द्वन्द्व हो जा, निरन्तर नित्य वस्तु परमात्मा में स्थित हो जा, योगक्षेमकी चाहना भी मत रख और परमात्मपरायण हो जा। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 44
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 44
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते

उस पुष्पित वाणीसे जिसका अन्तःकरण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्योंकी परमात्मामें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 44 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 44 का हिंदी अर्थ: "उस पुष्पित वाणीसे जिसका अन्तःकरण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्योंकी परमात्मामें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 44?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 44 translates to: "For those who are attached to pleasure and power, whose minds are drawn away by such teachings, their determinate reason is not formed which is steadily bent on meditation and Samadhi (superconscious state). — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 44 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। उस पुष्पित वाणीसे जिसका अन्तःकरण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्योंकी परमात्मामें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "bhogaiśwvarya-prasaktānāṁ tayāpahṛita-chetasām" mean in English?

"bhogaiśwvarya-prasaktānāṁ tayāpahṛita-chetasām" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 44. For those who are attached to pleasure and power, whose minds are drawn away by such teachings, their determinate reason is not formed which is steadily bent on meditation and Samadhi (superconscious state). — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.