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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 45
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्

वेद तीनों गुणोंके कार्यका ही वर्णन करनेवाले हैं; हे अर्जुन! तू तीनों गुणोंसे रहित हो जा, निर्द्वन्द्व हो जा, निरन्तर नित्य वस्तु परमात्मा में स्थित हो जा, योगक्षेमकी चाहना भी मत रख और परमात्मपरायण हो जा। — VaniSagar

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GujaratiIND

વેદ ત્રણ લક્ષણો સાથે વ્યવહાર કરે છે; તમે આ ત્રણ લક્ષણોથી ઉપર બનો. હે અર્જુન, તમારી જાતને વિરોધીઓની જોડીમાંથી મુક્ત કરો અને સદા સત્ત્વના ગુણમાં રહો, પ્રાપ્તિ અને સંરક્ષણથી મુક્ત થાઓ અને આત્મામાં સ્થાપિત થાઓ.

MarathiIND

वेद तीन गुणधर्मांशी संबंधित आहेत; तू या तीन गुणांच्या वर आहेस. हे अर्जुना, स्वतःला विरोधी जोडीपासून मुक्त कर आणि सत्वगुणात सदैव राहा, संपादन आणि संरक्षणापासून मुक्त हो आणि आत्म्यात स्थापित हो.

TeluguIND

వేదాలు మూడు లక్షణాలతో వ్యవహరిస్తాయి; నీవు ఈ మూడు గుణముల పైన ఉండుము. ఓ అర్జునా, వైరుధ్యాల జంటల నుండి మిమ్మల్ని మీరు విడిపించుకోండి మరియు సత్వగుణం యొక్క గుణాన్ని కలిగి ఉండండి, సముపార్జన మరియు సంరక్షణ నుండి విముక్తి పొందండి మరియు ఆత్మలో స్థిరపడండి.

PunjabiIND

ਵੇਦ ਤਿੰਨ ਗੁਣਾਂ ਨਾਲ ਸੰਬੰਧਿਤ ਹਨ; ਤੂੰ ਇਹਨਾਂ ਤਿੰਨਾਂ ਗੁਣਾਂ ਤੋਂ ਉੱਪਰ ਹੋ। ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਵਿਰੋਧੀਆਂ ਦੇ ਜੋੜਿਆਂ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਕਰੋ ਅਤੇ ਸਦਾ ਸਤਤ ਦੇ ਗੁਣਾਂ ਵਿੱਚ ਬਣੇ ਰਹੋ, ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਅਤੇ ਸੰਭਾਲ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਹੋਵੋ, ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿੱਚ ਸਥਾਪਿਤ ਹੋਵੋ।

SindhiIND

ويد ۾ ٽن صفتن جو ذڪر آهي. تون انهن ٽنهي صفتن کان مٿي آهين. اي ارجن، پاڻ کي مخالفن جي جوڙن کان آزاد ڪر ۽ سدا جي ڪيفيت ۾ رهي، حاصلات ۽ بچاءَ کان آزاد ٿي، ۽ نفس ۾ قائم ٿي.

BengaliIND

বেদ তিনটি বৈশিষ্ট্য নিয়ে কাজ করে; তুমি এই তিনটি গুণের ঊর্ধ্বে হও। হে অর্জুন, নিজেকে বিরোধী জোড়া থেকে মুক্ত করুন এবং সত্ত্বের গুণে স্থির থাকুন, অর্জন ও সংরক্ষণ থেকে মুক্ত হয়ে আত্মায় প্রতিষ্ঠিত হোন।

TamilIND

வேதங்கள் மூன்று பண்புகளைக் கையாளுகின்றன; இந்த மூன்று பண்புகளுக்கும் மேலாக நீ இரு. ஓ அர்ஜுனா, எதிரிகளின் ஜோடிகளிலிருந்து உங்களை விடுவித்து, சத்வ குணத்தில் எப்போதும் நிலைத்து, கையகப்படுத்துதல் மற்றும் பாதுகாப்பிலிருந்து விடுபட்டு, சுயத்தில் நிலைபெறுங்கள்.

MalayalamIND

വേദങ്ങൾ മൂന്ന് വിശേഷണങ്ങൾ കൈകാര്യം ചെയ്യുന്നു; ഈ മൂന്ന് ഗുണങ്ങൾക്കും മേലെയാകുക. ഹേ അർജ്ജുനാ, പരസ്പരവിരുദ്ധമായ ജോഡികളിൽ നിന്ന് സ്വയം മോചിതനാകുക, സത്വഗുണത്തിൽ എപ്പോഴും നിലനിൽക്കുക, സമ്പാദനത്തിൽ നിന്നും സംരക്ഷണത്തിൽ നിന്നും മുക്തമാകുക, സ്വയം സ്ഥാപിക്കുക.

NepaliIND

वेदहरूले तीनवटा विशेषताहरूसँग व्यवहार गर्दछ; तिमी यी तीन गुणभन्दा माथि बन। हे अर्जुन, विपरितको जोडीबाट मुक्त भई सदा सत्वगुणमा रहनुहोस्, प्राप्ति र संरक्षणबाट मुक्त भएर आत्मामा स्थापित हो।

KannadaIND

ವೇದಗಳು ಮೂರು ಗುಣಲಕ್ಷಣಗಳೊಂದಿಗೆ ವ್ಯವಹರಿಸುತ್ತವೆ; ನೀನು ಈ ಮೂರು ಗುಣಗಳ ಮೇಲಿರುವೆ. ಓ ಅರ್ಜುನಾ, ವ್ಯತಿರಿಕ್ತ ಜೋಡಿಗಳಿಂದ ನಿಮ್ಮನ್ನು ಮುಕ್ತಗೊಳಿಸಿ ಮತ್ತು ಸತ್ವದ ಗುಣದಲ್ಲಿ ಯಾವಾಗಲೂ ಉಳಿಯಿರಿ, ಸಂಪಾದನೆ ಮತ್ತು ಸಂರಕ್ಷಣೆಯಿಂದ ಮುಕ್ತರಾಗಿ ಮತ್ತು ಆತ್ಮದಲ್ಲಿ ಸ್ಥಾಪಿಸಿಕೊಳ್ಳಿ.

KonkaniIND

वेदांत तीन गुणांचो आस्पाव जाता; तूं ह्या तीन गुणां वयर राव. हे अर्जुन, विरुध्द जोड्यांपसून मुक्त आनी सदांच सत्त्वाच्या गुणांत रावून, संपादन आनी संरक्षणांतल्यान मुक्त जावन आत्म्यांत स्थापन जा.

MizoIND

Veda-ah hian mizia pathumte hi a sawi a; heng mizia pathumte chungah hian awm rawh. Aw Arjuna, inhnialna pahnih a\angin zalên la, Sattva quality-ah awm reng la, neih leh humhalh a\angin zalen la, Mahniah din nghet rawh.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.45।। व्याख्या-- 'त्रैगुण्यविषया वेदाः'-- यहाँ वेदोंसे तात्पर्य वेदोंके उस अंशसे है, जिसमें तीनों गुणोंका और तीनों गुणोँके कार्य स्वर्गादि भोग-भूमियोंका वर्णन है। यहाँ उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य वेदोंकी निन्दामें नहीं है, प्रत्युत निष्कामभावकी महिमामें है। जैसे हीरेके वर्णनके साथ-साथ काँचका वर्णन किया जाय तो उसका तात्पर्य काँचकी निन्दा करनेमें नहीं है, प्रत्युत हीरेकी महिमा बतानेमें है। ऐसे ही यहाँ निष्कामभावकी महिमा बतानेके लिये ही वेदोंके सकामभावका वर्णन आया है, निन्दाके लिये नहीं। वेद केवल तीनों गुणोंका कार्य संसारका ही वर्णन करनेवाले हैं, ऐसी बात भी नहीं है। वेदोंमें परमात्मा और उनकी प्राप्तिके साधनोंका भी वर्णन हुआ है। 'निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन'-- हे अर्जुन! तू तीनों गुणोंके कार्यरूप संसारकी इच्छाका त्याग करके असंसारी बन जा अर्थात् संसारसे ऊँचा उठ जा। 'निर्द्वन्द्वः'-- संसारसे ऊँचा उठनेके लिये राग-द्वेष आदि द्वन्द्वोंसे रहित होनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है; क्योंकि ये ही वास्तवमें मनुष्यके शत्रु हैं अर्थात् उसको संसारमें फँसानेवाले हैं (गीता 3।34) । इसलिये तू सम्पूर्ण द्वन्द्वोंसे रहित हो जा।

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Sri Harikrishnadas Goenka

जो इस प्रकार विवेकबुद्धिसे रहित हैं उन कामपरायण पुरुषोंके वेद त्रैगुण्यविषयक हैं अर्थात् तीनों गुणोंके कार्यरूप संसारको ही प्रकाशित करनेवाले हैं। परंतु हे अर्जुन तू असंसारी हो निष्कामी हो। तथा निर्द्वन्द्व हो अर्थात् सुखदुःखके हेतु जो परस्पर विरोधी ( युग्म ) पदार्थ हैं उनका नाम द्वन्द्व है उनसे रहित हो और नित्य सत्त्वस्थ हो अर्थात् सदा सत्त्वगुणके आश्रित हो। तथा निर्योगक्षेम हो। अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करनेका नाम योग है और प्राप्त वस्तुके रक्षणका नाम क्षेम है योगक्षेमको प्रधान माननेवालेकी कल्याणमार्गमें प्रवृत्ति होनी अत्यन्त कठिन है अतः तू योगक्षेमको न चाहनेवाला हो। तथा आत्मवान् हो अर्थात् ( आत्मविषयोंमें ) प्रमादरहित हो। तुझ स्वधर्मानुष्ठानमें लगे हुएके लिये यह उपदेश है।

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Sri Anandgiri

अविवेकिनामपि वेदाभ्यासवतां विवेकबुद्धिरुदेष्यतीत्याशङ्क्याह य एवमिति। तर्हि वेदार्थतया कामात्मता प्रशस्तेत्याशङ्क्याह निस्त्रैगुण्य इति। भवेति पदं निर्द्वन्द्वादिविशेषणेष्वपि प्रत्येकं संबध्यते। त्रयाणां सत्त्वादीनां गुणानां पुण्यपापव्यामिश्रकर्मतत्फलसंबन्धलक्षणः समाहारस्त्रैगुण्यमित्यङ्गीकृत्य व्याचष्टे संसार इति। वेदशब्देनात्र कर्मकाण्डमेव गृह्यते तदभ्यासवतां तदर्थानुष्ठानद्वारा संसारध्रौव्यान्न विवेकावसरोऽस्तीत्यर्थः। तर्हि संसारपरिवर्जनार्थं विवेकसिद्धये किं कर्तव्यमित्याशङ्क्याह त्वं त्विति। कथं निस्त्रैगुण्यो भवेति गुणत्रयराहित्यं विधीयते नित्यसत्त्वस्थो भवेति वाक्यशेषविरोधादित्याशङ्क्याह निष्काम इति। सप्रतिपक्षत्वं परस्परविरोधित्वं पदार्थौ शीतोष्णादिलक्षणौ। निष्कामत्वे द्वन्द्वान्निर्गतत्वं शीतोष्णादिसहिष्णुत्वं हेतुमुक्त्वा तत्रापि हेत्वपेक्षायां सदा सत्वगुणाश्रितत्वं हेतुमाह नित्येति। योगक्षेमव्यापृतचेतसो रजस्तमोभ्यामसंस्पृष्टे सत्त्वमात्रे समाश्रितत्वमशक्यमित्याशङ्क्याह तथेति। योगक्षेमयोर्जीवनहेतुतया पुरुषार्थसाधनत्वान्निर्योगक्षेमो भवेति कुतो विधिरित्याशङ्क्याह योगेति। योगक्षेमप्रधानत्वं सर्वस्य स्वारसिकमिति ततो निर्गमनमशक्यमित्याशङ्क्याह आत्मवानिति। अप्रमादो मनसो विषयपारवश्यशून्यत्वम्। अथ यथोक्तोपदेशस्य मुमुक्षुविषयत्वादर्जुनस्य मुमुक्षुत्वमिह विवक्षितमिति नेत्याह एष इति।

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Sri Dhanpati

वेदवादरतानां वेदोक्तत्रिगुणात्मकसंसार एव फलमित्याशयेनाह त्रैगुण्येति। त्रैगुण्यं संसारो विषयः प्रतिपाद्यो येषां कर्मकाण्डपराणां वेदानां तर्हि मया कथं भाव्यमित्याकाङ्क्षयामाह निस्त्रैगुण्य इति। निस्त्रैगुण्यो निष्कामो भव। हे अर्जुनेति संबोधयन्स्वनाम सार्थक कर्तुमर्हसीति ध्वनयति। निस्त्रैगुण्यभवने उपायमाह निर्द्वन्द्व इति। सुखदुःखहेतु प्रतिपक्षपदार्थो द्वन्द्वशब्दावाच्यौ तस्माद्रहितो भव। तत्रोपायमाह नित्येति। नित्यं सत्त्वे स्थितो भव। तत्राप्युपायमाह निर्योगेति। अनुपात्तस्योपादानं योगः उपात्तस्य रक्षणं क्षेमः ताभ्यां निर्गतः रजोगुणरहितो भव। आत्मवानप्रमत्तः। तमोगुणाद्विनिर्गतो भवेत्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
traiguṇya
viṣhayāḥsubject matter
vedāḥVedic scriptures
nistraiguṇyaḥ
bhavabe
arjunaArjun
nirdvandvaḥfree from dualities
nityasattva
niryogakṣhemaḥ
ātmavān
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.44
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते

उस पुष्पित वाणीसे जिसका अन्तःकरण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्योंकी परमात्मामें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.46
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके। तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः

सब तरफसे परिपूर्ण महान् जलाशयके प्राप्त होनेपर छोटे गड्ढों में भरे जल में मनुष्यका जितना प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता, वेदों और शास्त्रोंको तत्त्वसे जाननेवाले ब्रह्मज्ञानीका सम्पूर्ण वेदोंमें उतना ही प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 45
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 45
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्

वेद तीनों गुणोंके कार्यका ही वर्णन करनेवाले हैं; हे अर्जुन! तू तीनों गुणोंसे रहित हो जा, निर्द्वन्द्व हो जा, निरन्तर नित्य वस्तु परमात्मा में स्थित हो जा, योगक्षेमकी चाहना भी मत रख और परमात्मपरायण हो जा। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 45 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 45 का हिंदी अर्थ: "वेद तीनों गुणोंके कार्यका ही वर्णन करनेवाले हैं; हे अर्जुन! तू तीनों गुणोंसे रहित हो जा, निर्द्वन्द्व हो जा, निरन्तर नित्य वस्तु परमात्मा में स्थित हो जा, योगक्षेमकी चाहना भी मत रख और परमात्मपरायण हो जा। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 45?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 45 translates to: "The Vedas deal with the three attributes; be thou above these three attributes. O Arjuna, free yourself from the pairs of opposites and ever remain in the quality of Sattva, freed from acquisition and preservation, and be established in the Self. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्य" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 45 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। वेद तीनों गुणोंके कार्यका ही वर्णन करनेवाले हैं; हे अर्जुन! तू तीनों गुणोंसे रहित हो जा, निर्द्वन्द्व हो जा, निरन्तर नित्य वस्तु परमात्मा में स्थित हो जा, योगक्षेमकी चाहना भी मत रख और परमात्मपरायण हो जा। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "trai-guṇya-viṣhayā vedā nistrai-guṇyo bhavārjuna" mean in English?

"trai-guṇya-viṣhayā vedā nistrai-guṇyo bhavārjuna" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 45. The Vedas deal with the three attributes; be thou above these three attributes. O Arjuna, free yourself from the pairs of opposites and ever remain in the quality of Sattva, freed from acquisition and preservation, and be established in the Self. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.