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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 43
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्। क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति

हे पृथानन्दन ! जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है। — VaniSagar

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TeluguIND

కోరికలతో నిండిన, స్వర్గాన్ని తమ లక్ష్యంగా చేసుకుని, (అవి చివరలకు దిశానిర్దేశం చేసే మాటలు) వారి పనుల ఫలితంగా కొత్త జన్మలకు దారితీస్తాయి మరియు ఆనందం మరియు శక్తిని పొందడం కోసం నిర్దిష్ట చర్యలలో పుష్కలంగా ఉన్న వివిధ పద్ధతులను నిర్దేశిస్తాయి.

MarathiIND

इच्छांनी परिपूर्ण, स्वर्ग हे त्यांचे ध्येय आहे, (ते शेवटपर्यंत निर्देशित केलेले शब्द बोलतात) त्यांच्या कार्याच्या परिणामी नवीन जन्म घेतात आणि आनंद आणि शक्तीच्या प्राप्तीसाठी विशिष्ट कृतींमध्ये विपुल विविध पद्धती लिहून देतात.

GujaratiIND

ઇચ્છાઓથી ભરપૂર, સ્વર્ગને તેમના લક્ષ્ય તરીકે, (તેઓ એવા શબ્દો બોલે છે જે અંત તરફ નિર્દેશિત થાય છે) તેમના કાર્યોના પરિણામે નવા જન્મ તરફ દોરી જાય છે, અને આનંદ અને શક્તિની પ્રાપ્તિ માટે, ચોક્કસ ક્રિયાઓમાં ભરપૂર વિવિધ પદ્ધતિઓ સૂચવે છે.

PunjabiIND

ਇੱਛਾਵਾਂ ਨਾਲ ਭਰਪੂਰ, ਸਵਰਗ ਨੂੰ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਟੀਚੇ ਵਜੋਂ, (ਉਹ ਸ਼ਬਦ ਬੋਲਦੇ ਹਨ ਜੋ ਅੰਤ ਵੱਲ ਨਿਰਦੇਸ਼ਿਤ ਹੁੰਦੇ ਹਨ) ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਕੰਮਾਂ ਦੇ ਨਤੀਜੇ ਵਜੋਂ ਨਵੇਂ ਜਨਮਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਅਤੇ ਅਨੰਦ ਅਤੇ ਸ਼ਕਤੀ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਲਈ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਕਿਰਿਆਵਾਂ ਵਿੱਚ ਭਰਪੂਰ ਵੱਖੋ-ਵੱਖਰੇ ਢੰਗਾਂ ਦੀ ਤਜਵੀਜ਼ ਕਰਦੇ ਹਨ।

SindhiIND

خواهشن سان ڀريل، جنت کي پنهنجو مقصد سمجهن ٿا، (اهي لفظ ڳالهائين ٿا جن کي پڇاڙيءَ ڏانهن اشارو ڪيو وڃي ٿو) انهن جي ڪمن جي نتيجي ۾ نوان جنم وٺن ٿا، ۽ لذت ۽ طاقت جي حاصلات لاءِ مخصوص عملن ۾ ڀرپور نموني مختلف طريقا بيان ڪن ٿا.

MalayalamIND

ആഗ്രഹങ്ങൾ നിറഞ്ഞ, സ്വർഗ്ഗം ലക്ഷ്യമാക്കി, (അവസാനത്തിലേക്ക് നയിക്കപ്പെടുന്ന വാക്കുകൾ സംസാരിക്കുന്നു) അവരുടെ പ്രവൃത്തികളുടെ ഫലമായി പുതിയ ജന്മങ്ങളിലേക്ക് നയിക്കുന്നു, ഒപ്പം സുഖവും ശക്തിയും നേടുന്നതിന്, നിർദ്ദിഷ്ട പ്രവർത്തനങ്ങളിൽ സമൃദ്ധമായ വിവിധ രീതികൾ നിർദ്ദേശിക്കുന്നു.

TamilIND

ஆசைகள் நிறைந்தது, சொர்க்கத்தை இலக்காகக் கொண்டு, (அவர்கள் முடிவடையும் வார்த்தைகளைப் பேசுகிறார்கள்) அவர்களின் செயல்களின் விளைவாக புதிய பிறப்புகளுக்கு வழிவகுக்கும், மேலும் இன்பம் மற்றும் சக்தியை அடைவதற்காக குறிப்பிட்ட செயல்களில் நிறைந்த பல்வேறு முறைகளை பரிந்துரைக்கின்றனர்.

NepaliIND

आकांक्षाहरूले भरिएको, स्वर्गलाई उनीहरूको लक्ष्यको रूपमा, (उनीहरूले अन्त्यमा निर्देशित गरिएका शब्दहरू बोल्छन्) तिनीहरूको कर्मको फलस्वरूप नयाँ जन्म लिन्छन्, र आनन्द र शक्तिको प्राप्तिको लागि विशेष कर्महरूमा प्रशस्त विभिन्न विधिहरू लेख्छन्।

BengaliIND

আকাঙ্ক্ষায় পূর্ণ, স্বর্গকে তাদের লক্ষ্য হিসাবে, (তারা এমন শব্দ বলে যা শেষের দিকে নির্দেশ করা হয়) তাদের কাজের ফলস্বরূপ নতুন জন্মের দিকে পরিচালিত করে এবং আনন্দ ও শক্তি অর্জনের জন্য নির্দিষ্ট ক্রিয়ায় প্রচুর পরিমাণে বিভিন্ন পদ্ধতি নির্ধারণ করে।

KannadaIND

ಸಂಪೂರ್ಣ ಆಸೆಗಳು, ಸ್ವರ್ಗವನ್ನು ತಮ್ಮ ಗುರಿಯಾಗಿಟ್ಟುಕೊಂಡು, (ಅವರು ಅಂತ್ಯದ ಕಡೆಗೆ ನಿರ್ದೇಶಿಸುವ ಪದಗಳನ್ನು ಮಾತನಾಡುತ್ತಾರೆ) ತಮ್ಮ ಕಾರ್ಯಗಳ ಪರಿಣಾಮವಾಗಿ ಹೊಸ ಜನ್ಮಗಳಿಗೆ ಕಾರಣವಾಗುತ್ತಾರೆ ಮತ್ತು ಆನಂದ ಮತ್ತು ಶಕ್ತಿಯನ್ನು ಸಾಧಿಸಲು ನಿರ್ದಿಷ್ಟ ಕ್ರಿಯೆಗಳಲ್ಲಿ ಹೇರಳವಾಗಿರುವ ವಿವಿಧ ವಿಧಾನಗಳನ್ನು ಸೂಚಿಸುತ್ತಾರೆ.

OdiaIND

ଇଚ୍ଛାରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ, ସ୍ୱର୍ଗ ସହିତ ସେମାନଙ୍କର ଲକ୍ଷ୍ୟ ଭାବରେ, (ସେମାନେ ଶବ୍ଦଗୁଡିକ କୁହନ୍ତି ଯାହା ଶେଷ ଆଡକୁ ନିର୍ଦ୍ଦେଶିତ) ସେମାନଙ୍କର କାର୍ଯ୍ୟର ଫଳାଫଳ ଭାବରେ ନୂତନ ଜନ୍ମକୁ ନେଇଥାଏ, ଏବଂ ଆନନ୍ଦ ଏବଂ ଶକ୍ତି ହାସଲ ପାଇଁ ନିର୍ଦ୍ଦିଷ୍ଟ କାର୍ଯ୍ୟରେ ପ୍ରଚୁର ବିଭିନ୍ନ ପଦ୍ଧତି ନିର୍ଦେଶ ଦେଇଥାଏ |

BhojpuriIND

इच्छा से भरल, स्वर्ग के लक्ष्य बना के, (ई लोग अइसन शब्द बोलेला जवन अंत तक निर्देशित होखे) जवन अपना काम के परिणाम के रूप में नया जन्म के ओर ले जाला, आ विशिष्ट कर्म में भरपूर बिबिध तरीका निर्धारित करे ला, सुख आ शक्ति के प्राप्ति खातिर।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या-- 'कामात्मानः'-- वे कामनाओंमें इतने रचे-पचे रहते हैं कि वे कामनारूप ही बन जाते हैं। उनको अपनेमें और कामनामें भिन्नता ही नहीं दीखती। उनका तो यही भाव होता है कि कामनाके बिना आदमी जी नहीं सकता, कामनाके बिना कोई भी काम नहीं हो सकता, कामनाके बिना आदमी पत्थरकी जड हो जाता है, उसको चेतना भी नहीं रहती। ऐसे भाववाले पुरुष 'कामात्मानः' हैं। स्वयं तो नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहता है, उसमें कभी घट-बढ़ नहीं होती, पर कामना आती-जाती रहती है और घटती-बढ़ती है। स्वयं परमात्माका अंश है और कामना संसारके अंशको लेकर है। अतः स्वयं और कामना--ये दोनों सर्वथा अलग-अलग हैं। परन्तु कामनामें रचे-पचे लोगोंको अपने स्वरूपका अलग भान ही नहीं होता। 'स्वर्गपराः'-- स्वर्गमें बढ़िया-से-बढ़िया दिव्य भोग मिलते हैं, इसलिये उनके लक्ष्यमें स्वर्ग ही सर्वश्रेष्ठ होता है और वे उसकी प्राप्तिमें ही रात-दिन लगे रहते हैं। यहाँ 'स्वर्गपराः' पदसे उन मनुष्योंकी बात कही गयी है, जो वेदोंमें, शास्त्रोंमें वर्णित स्वर्गादि लोकोंमें आस्था रखनेवाले हैं। 'वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः'-- वे वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं अर्थात् वेदोंका तात्पर्य वे केवल भोगोंमें और स्वर्गकी प्राप्तिमें मानते हैं ,इसलिये वे 'वेदवादरताः' हैं। उनकी मान्यतामें यहाँके और स्वर्गके भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं अर्थात् उनकी दृष्टिमें भोगोंके सिवाय परमात्मा, तत्त्वज्ञान, मुक्ति, भगवत्प्रेम आदि कोई चीज है ही नहीं। अतः वे भोगोंमें ही रचे-पचे रहते हैं। भोग भोगना उनका मुख्य लक्ष्य रहता है। 'यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः'-- जिनमें सत्-असत्, नित्य-अनित्य, अविनाशी-विनाशीका विवेक नहीं है,ऐसे अविवेकी मनुष्य वेदोंकी जिस वाणीमें संसार और भोगोंका वर्णन है, उस पुष्पित वाणीको कहा करते हैं। यहाँ 'पुष्पिताम्' कहनेका तात्पर्य है कि भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिका वर्णन करनेवाली वाणी केवल फूल-पत्ती ही है, फल नहीं है। तृप्ति फलसे ही होती है, फूल-पत्तीकी शोभासे नहीं। वह वाणी स्थायी फल देनेवाली नहीं है। उस वाणीका जो फल--स्वर्गादिका भोग है, वह केवल देखनेमें ही सुन्दर दीखता है, उसमें स्थायीपना नहीं है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तथा वे कामात्माजिन्होंने भोगकामनाको ही अपना स्वभाव बना लिया है ऐसे भोगपरायण और स्वर्गको प्रधान माननेवाले यानी स्वर्ग ही जिनका परम पुरुषार्थ है ऐसे पुरुष जन्मरूप कर्मफलको देनेवाली ही बातें किया करते हैं। कर्मके फलका नाम कर्मफल है जन्मरूप कर्मफल जन्मकर्मफल कहलाता है उसको देनेवाली वाणी जन्मकर्मफलप्रदा कही जाती है। ऐसी वाणी कहा करते हैं। इस प्रकार भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये जो क्रियाओंके भेद हैं वे जिस वाणीमें बहुत हों अर्थात् स्वर्ग पशु पुत्र आदि अनेक पदार्थ जिस वाणीद्वारा अधिकतासे बतलाये जाते हों ऐसी बहुतसे क्रियाभेदोंको बतलानेवाली वाणीको बोलनेवाले वे मूढ़ बारंबार संसारचक्रमें भ्रमण करते हैं यह अभिप्राय है।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

प्रकृतान्प्रवक्तृ़नविवेकिनो व्यवसायात्मकबुद्धिभाक्त्वासंभवसिद्ध्यर्थं विधान्तरेण विशिनष्टि ते चेति। तेषां संसारपरिवर्तनपरिदर्शनार्थं प्रस्तुतां वाचमेव विशिनष्टि जन्मेति। ननु पुंसां कामस्वभावत्वमयुक्तं चेतनस्येच्छावतस्तदात्मत्वानुपपत्तेरिति तत्राह कामपरा इति। तत्परत्वं तत्तत्फलार्थित्वेन तत्तदुपायेषु कर्मस्वेव प्रवृत्ततया कर्मसंन्यासपूर्वकाज्ज्ञानाद्बहिर्मुखत्वम्। ननु कर्मनिष्ठानामपि परमपुरुषार्थापेक्षया मोक्षोपाये ज्ञाने भवत्याभिमुख्यमिति नेत्याह स्वर्गेति। तत्परत्वं तस्मिन्नेवासक्ततया तदतिरिक्तपुरुषार्थराहित्यनिश्चयवत्त्वम्। उच्चावचमध्यमदेहप्रभेदग्रहणं जन्मवाचो यथोक्तफलप्रदत्वमप्रामाणिकमित्याशङ्क्यानुष्ठानद्वारा तदुपपत्तिरित्याह क्रियेति। क्रियाणामनुष्ठानानां यागदानादीनां विशेषा देशकालाधिकारिप्रयुक्ताः सप्ताहानेकाहलक्षणास्ते खल्वस्यां वाचि प्राचुर्येण प्रतिभान्तीत्यर्थः। कथं यथोक्तायां वाचि क्रियाविशेषाणां बाहुल्येनावस्थानमित्याशङ्क्य प्रकाश्यत्वेनेत्येतद्विशदयति स्वर्गेति। तथापि तेषां मोक्षोपायत्वोपपत्तेस्तन्निष्ठानां मोक्षाभिमुख्यं भविष्यति नेत्याह भोगेति। यथोक्तां वाचमभिवदतां पर्यवसानं दर्शयति तद्बहुलामिति।

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Sri Dhanpati

यतः कामे आत्मान्तःकरणं येषाम् अतएव स्वर्गएव परः पुरुषार्थो येषां ते कर्मणः फलं जन्मैव कर्मफलं प्रददातीति तथा तां वेदवाचा कर्मणि प्रवृत्तिः कर्मणा जन्मलाभः नतु वेदवाचः स्वतन्त्रं जन्मादिप्रदातृत्वमस्तीत्यभिप्रेत्याचार्यैर्जन्म च तत्र कर्मं च तत्फलं च प्रददातीति न व्याख्यातम्। यतो भोगश्चैश्वर्यं च तयोर्गतिं प्राप्तिं प्रति क्रियाणां विशेषा बहुला यस्यां तां वाचं प्रवदन्तीत्यनुषङ्गः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
kāmaātmānaḥdesirous of sense gratification
svargaparāḥ
janmakarma
kriyāviśeṣa
bahulāmvarious
bhogasense enjoyment
aiśvaryaopulence
gatimprogress
pratitowards.
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.42
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः

हे पृथानन्दन ! जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.44
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते

उस पुष्पित वाणीसे जिसका अन्तःकरण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्योंकी परमात्मामें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 43
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 43
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्। क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति

हे पृथानन्दन ! जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 43 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 43 का हिंदी अर्थ: "हे पृथानन्दन ! जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 43?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 43 translates to: "Full of desires, with heaven as their goal, (they speak words that are directed to ends) leading to new births as the result of their works, and prescribe various methods abounding in specific actions, for the attainment of pleasure and power. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्। क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 43 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। हे पृथानन्दन ! जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "kāmātmānaḥ svarga-parā " mean in English?

"kāmātmānaḥ svarga-parā " is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 43. Full of desires, with heaven as their goal, (they speak words that are directed to ends) leading to new births as the result of their works, and prescribe various methods abounding in specific actions, for the attainment of pleasure and power. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.