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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 42
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः

हे पृथानन्दन ! जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है। — VaniSagar

Global Translations

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MarathiIND

अज्ञानी, वेदांच्या स्तुतीपर शब्दात आनंद घेऊन, "हे अर्जुना, दुसरे काही नाही" असे म्हणत फुलांचे भाषण करतात.

TeluguIND

బుద్ధిహీనుడు, వేదాలలోని స్తుతించే పదాలకు ఆనందాన్ని పొందుతూ, "మరేమీ లేదు, ఓ అర్జునా" అని పూలతో కూడిన ప్రసంగం చేస్తాడు.

GujaratiIND

મૂર્ખ, વેદના સ્તુત્ય શબ્દોમાં આનંદ લેતા, ફૂલી વાણી બોલે છે, "હે અર્જુન," બીજું કંઈ નથી.

KannadaIND

ಅವಿವೇಕಿಯು ವೇದಗಳ ಶ್ಲಾಘನೆಯ ಮಾತುಗಳಲ್ಲಿ ಸಂತೋಷಪಡುತ್ತಾ, "ಬೇರೆ ಏನೂ ಇಲ್ಲ, ಓ ಅರ್ಜುನ" ಎಂದು ಅರಳಿದ ಮಾತುಗಳನ್ನು ಹೇಳುತ್ತಾನೆ.

MaithiliIND

अबुद्धि लोकनि वेदक स्तुति वचन मे प्रसन्न भ' क' पुष्पमय वाणी उच्चारैत छथि, "आन किछु नहि अछि" हे अर्जुन |

ManipuriIND

ꯂꯧꯁꯤꯡ ꯂꯩꯇꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏꯁꯤꯡꯅꯥ ꯕꯦꯗꯀꯤ ꯊꯥꯒꯠꯄꯥ ꯋꯥꯍꯩꯁꯤꯡꯗꯥ ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯕꯥ ꯐꯣꯡꯗꯣꯛꯂꯗꯨꯅꯥ, "ꯑꯇꯣꯞꯄꯥ ꯀꯔꯤꯁꯨ ꯂꯩꯇꯦ" ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯐꯨꯜ ꯋꯥ ꯉꯥꯡꯏ, ꯍꯦ ꯑꯔꯖꯨꯟ |

MalayalamIND

അവിവേകികൾ വേദങ്ങളിലെ സ്തുത്യർഹമായ വാക്കുകളിൽ ആനന്ദം പൂണ്ട്, "അല്ലയോ അർജ്ജുനാ," എന്ന് പറഞ്ഞുകൊണ്ട് പുഷ്പഭാഷണം നടത്തുന്നു.

BengaliIND

মূর্খ, বেদের শ্লাঘা শব্দে আনন্দ নিয়ে ফুলের ভাষণ দিয়ে বলে, "আর কিছু নেই," হে অর্জুন।

PunjabiIND

ਮੂਰਖ, ਵੇਦਾਂ ਦੇ ਉਪਦੇਸ਼ ਭਰੇ ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਅਨੰਦ ਲੈਂਦਿਆਂ, ਫੁੱਲਾਂ ਵਾਲੀ ਬੋਲੀ ਬੋਲਦਾ ਹੈ, "ਹੇ ਅਰਜੁਨ" ਹੋਰ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਹੈ।

TamilIND

ஞானமில்லாதவர்கள், வேதங்களின் புகழ்ச்சியான வார்த்தைகளில் மகிழ்ச்சியடைந்து, "வேறொன்றுமில்லை, அர்ஜுனா" என்று மலர்ந்த பேச்சை உச்சரிக்கின்றனர்.

SindhiIND

بي عقل، ويد جي خوشنصيب لفظن مان خوشي حاصل ڪري، گلن واري تقرير ڪري ٿو، ”اي ارجن“ ٻيو ڪجهه به ناهي.

OdiaIND

ଅଜ୍ wise ାନମାନେ, ବେଦମାନଙ୍କର ଶବ୍ଦଗୁଡ଼ିକୁ ଉପଭୋଗ କରି, ଫୁଲ ବକ୍ତବ୍ୟରେ କହିଲେ, “ଆଉ କିଛି ନାହିଁ,” ହେ ଅର୍ଜୁନ |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या-- 'कामात्मानः'-- वे कामनाओंमें इतने रचे-पचे रहते हैं कि वे कामनारूप ही बन जाते हैं। उनको अपनेमें और कामनामें भिन्नता ही नहीं दीखती। उनका तो यही भाव होता है कि कामनाके बिना आदमी जी नहीं सकता, कामनाके बिना कोई भी काम नहीं हो सकता, कामनाके बिना आदमी पत्थरकी जड हो जाता है ,उसको चेतना भी नहीं रहती। ऐसे भाववाले पुरुष 'कामात्मानः' हैं। स्वयं तो नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहता है, उसमें कभी घट-बढ़ नहीं होती, पर कामना आती-जाती रहती है और घटती-बढ़ती है। स्वयं परमात्माका अंश है और कामना संसारके अंशको लेकर है। अतः स्वयं और कामना--ये दोनों सर्वथा अलग-अलग हैं। परन्तु कामनामें रचे-पचे लोगोंको अपने स्वरूपका अलग भान ही नहीं होता। 'स्वर्गपराः'-- स्वर्गमें बढ़िया-से-बढ़िया दिव्य भोग मिलते हैं, इसलिये उनके लक्ष्यमें स्वर्ग ही सर्वश्रेष्ठ होता है और वे उसकी प्राप्तिमें ही रात-दिन लगे रहते हैं। यहाँ 'स्वर्गपराः' पदसे उन मनुष्योंकी बात कही गयी है, जो वेदोंमें, शास्त्रोंमें वर्णित स्वर्गादि लोकोंमें आस्था रखनेवाले हैं। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः'-- वे वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं अर्थात् वेदोंका तात्पर्य वे केवल भोगोंमें और स्वर्गकी प्राप्तिमें मानते हैं ,इसलिये वे 'वेदवादरताः' हैं। उनकी मान्यतामें यहाँके और स्वर्गके भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं अर्थात् उनकी दृष्टिमें भोगोंके सिवाय परमात्मा, तत्त्वज्ञान, मुक्ति, भगवत्प्रेम आदि कोई चीज है ही नहीं। अतः वे भोगोंमें ही रचे-पचे रहते हैं। भोग भोगना उनका मुख्य लक्ष्य रहता है। 'यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः'-- जिनमें सत्-असत्, नित्य-अनित्य, अविनाशी-विनाशीका, विवेक नहीं है, ऐसे अविवेकी मनुष्य वेदोंकी जिस वाणीमें संसार और भोगोंका वर्णन है, उस पुष्पित वाणीको कहा करते हैं। यहाँ 'पुष्पिताम्' कहनेका तात्पर्य है कि भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिका वर्णन करनेवाली वाणी केवल फूल-पत्ती ही है, फल नहीं है। तृप्ति फलसे ही होती है, फूल-पत्तीकी शोभासे नहीं। वह वाणी स्थायी फल देनेवाली नहीं है। उस वाणीका जो फल--स्वर्गादिका भोग है, वह केवल देखनेमें ही सुन्दर दीखता है, उसमें स्थायीपना नहीं है। 'जन्मकर्मफलप्रदाम्'-- वह पुष्पित वाणी जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है; क्योंकि उसमें सांसारिक भोगोंको ही महत्व दिया गया है। उन भोगोंका राग ही आगे जन्म होनेमें कारण है (गीता 13। 21)। 'क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति'-- वह पुष्पित अर्थात् दिखाऊ शोभायुक्त वाणी भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये जिन सकाम अनुष्ठानोंका वर्णन करती है, उनमें क्रियाओंकी बहुलता रहती है अर्थात् उन अनुष्ठानोंमें अनेक तरहकी विधियाँ होती हैं, अनेक तरहकी क्रियाएँ करनी पड़ती हैं, अनेक तरहके पदार्थोंकी जरूरत पड़ती है एवं शरीर आदिमें परिश्रम भी अधिक होता है (गीता 18। 24)।

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Sri Harikrishnadas Goenka

जिनमें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं है वे इस आगे कही जानेवाली पुष्पित वृक्षोंजैसी शोभित सुननेमें ही रमणीय जिस वाणीको कहा करते हैँ। कौन कहा करते हैं अज्ञानी अर्थात् अल्पबुद्धिवाले अविवेकी जो कि बहुत अर्थवाद और फलसाधनोंको प्रकाश करनेवाले वेदवाक्योंमें रत हैं। तथा हे पार्थ जो ऐसे भी कहनेवाले हैं कि स्वर्गप्राप्ति आदि फलके साधनरूप कर्मोंसे अतिरिक्त अन्य कुछ है ही नहीं।

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Sri Anandgiri

यदि सांख्ययोगरूपैकैव प्रमाणभूता बुद्धिस्तर्हि सैव सर्वेषां चित्ते किमिति स्थिरा न भवति तत्राह येषामिति। ते यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्ति तयापहृतचेतसां कामिनाम्। कामवशान्निश्चयात्मिका बुद्धिर्न प्रायः स्थिरा भवतीत्याह ते। यामिति। इमामित्यध्ययनविध्युपात्तत्वेन प्रसिद्धत्वं कर्मकाण्डरूपाया वाचो विवक्ष्यते। वक्ष्यमाणत्वं क्रियाविशेषबहुलामित्यादौ द्रष्टव्यम्। किंशुको हि पुष्पशाली शोभमानोऽनुभूयते न पुरुषभोग्यफलभागी लक्ष्यते तथेयमपि कर्मकाण्डात्मिका श्रूयमाणदशायां रमणीया वागुपलभ्यते साध्यसाधनसंबन्धप्रतिभानान्न त्वेषा निरतिशयफलभागिनी भवति कर्मानुष्ठानफलस्यानित्यत्वादिति मत्वाह पुष्पितामिति। वाक्यत्वेन लक्ष्यतेऽर्थवत्त्वप्रतिभानाद्वस्तुतस्तु न वाक्यमर्थाभासत्वादित्याह वाक्यलक्षणामिति। प्रवक्तृ़णां वेदवाक्यतात्पर्यपरिज्ञानाभावं सूचयति अविपश्चित इति। वेदवादा वेदवाक्यानि तानि च बहूनामर्थवादानां फलानां साधनानां च विधिशेषाणां प्रकाशकानि तेषु रतिरासक्तिस्तन्निष्ठत्वं तद्वत्त्वमपि तेषां विशेषणमित्याह वेदवादेति। कर्मकाण्डनिष्ठत्वं फलं कथयति नान्यदिति। ईश्वरो वा मोक्षो वा नास्तीत्येवं वदन्तो नास्तिकाः सन्तः सम्यग्ज्ञानवन्तो न भवन्तीत्यर्थः।

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Sri Dhanpati

अव्यवसायिनां तु व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न भवति प्रतिबन्धबाहुल्यादित्याशयेनाह यामिति त्रिभिः। यामिमां वक्ष्यमाणां पुष्पितां फलाप्रदपुष्पितवृक्षवच्छोभमानां श्रवणमात्ररमणीयांअपाम सोमभमृता अभूम इत्यादिरुपां वाचं प्रवदन्ति अविपश्चितो बुद्धिरहिता वेदस्य वादेऽर्थवादेअक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति इत्येवंरुपे रताः प्रीतिमन्तोऽतएव नान्यन्मोक्षादिकं स्वर्गादन्यदस्तीति वादिनः। त्वया तु मम मतमेवाभ्युपेयमिति सूचयन्नाह हे पार्थेति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yām imāmall these
puṣhpitāmflowery
vāchamwords
pravadantispeak
avipaśhchitaḥthose with limited understanding
vedavāda
pārthaArjun, the son of Pritha
na anyatno other
astiis
itithus
vādinaḥadvocate
kāmaātmānaḥ
swargaparāḥ
janmakarma
pradāṁawarding
kriyāviśheṣha
bahulāmvarious
bhogagratification
aiśhwaryaluxury
gatimprogress
pratitoward
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.41
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्

हे कुरुनन्दन! इस समबुद्धिकी प्राप्तिके विषयमें व्यवसायात्मिका बुद्धि एक ही होती है। अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओंवाली ही होती हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.43
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्। क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति

हे पृथानन्दन ! जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 42
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 42
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः

हे पृथानन्दन ! जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 42 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 42 का हिंदी अर्थ: "हे पृथानन्दन ! जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 42?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 42 translates to: "The unwise, taking pleasure in the eulogizing words of the Vedas, utter flowery speech, saying, "There is nothing else," O Arjuna. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 42 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। हे पृथानन्दन ! जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yāmimāṁ puṣhpitāṁ vāchaṁ pravadanty-avipaśhchitaḥ" mean in English?

"yāmimāṁ puṣhpitāṁ vāchaṁ pravadanty-avipaśhchitaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 42. The unwise, taking pleasure in the eulogizing words of the Vedas, utter flowery speech, saying, "There is nothing else," O Arjuna. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.