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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 41
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्

हे कुरुनन्दन! इस समबुद्धिकी प्राप्तिके विषयमें व्यवसायात्मिका बुद्धि एक ही होती है। अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओंवाली ही होती हैं। — VaniSagar

Global Translations

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MarathiIND

येथे, हे कुरुच्या आनंदा, येथे एकच निश्चय आहे; अनेक शाखांचे आणि अंतहीन हे अनिर्णायकांचे विचार आहेत.

TeluguIND

ఇక్కడ, ఓ కురుషుల సంతోషం, ఒకే ఒక్క దృఢ సంకల్పం ఉంది; అనేక శాఖలు మరియు అంతులేనివి అనిశ్చిత ఆలోచనలు.

GujaratiIND

અહીં, હે કુરુઓના આનંદ, ત્યાં માત્ર એક જ નિશ્ચય છે; અસંખ્ય-શાખાવાળા અને અનંત એ અનિર્ણાયકના વિચારો છે.

AssameseIND

ইয়াত হে কুৰুসকলৰ আনন্দ, মাত্ৰ এটাই একক দৃঢ় সংকল্প; বহু শাখা আৰু অন্তহীন অনিৰ্ণয়ৰ চিন্তা।

BengaliIND

এখানে, হে কুরুদের আনন্দ, এখানে একটিমাত্র একক সংকল্প আছে; বহু-শাখাযুক্ত এবং অবিরাম সিদ্ধান্তহীনতার চিন্তা।

SindhiIND

هتي، اي ڪرس جي خوشي، هتي صرف هڪ واحد نقطي عزم آهي؛ ڪيتريون ئي شاخون ۽ لامتناڪ سوچون آهن جيڪي اڻ کٽ آهن.

KannadaIND

ಇಲ್ಲಿ, ಓ ಕುರುಗಳ ಸಂತೋಷ, ಒಂದೇ ಒಂದು ಬಿಂದುಗಳ ನಿರ್ಣಯವಿದೆ; ಅನೇಕ ಕವಲೊಡೆಯುವ ಮತ್ತು ಅಂತ್ಯವಿಲ್ಲದ ಅನಿರ್ದಿಷ್ಟ ಆಲೋಚನೆಗಳು.

NepaliIND

यहाँ, हे कुरुहरूको आनन्द, त्यहाँ एउटा मात्रै एकल निश्चय छ; धेरै-शाखा र अन्तहीन अनिर्णय को विचार हो।

TamilIND

இங்கே, ஓ குருக்களின் மகிழ்ச்சியே, ஒரே ஒரு ஒற்றை முனை உறுதி உள்ளது; பல-கிளைகள் மற்றும் முடிவில்லாதவை உறுதியற்றவர்களின் எண்ணங்கள்.

MalayalamIND

ഹേ കുരുക്കളുടെ സന്തോഷമേ, ഇവിടെ ഒരൊറ്റ ദൃഢനിശ്ചയം മാത്രമേയുള്ളൂ; പല ശാഖകളുള്ളതും അനന്തമായതുമായ ചിന്തകൾ അനിശ്ചിതത്വത്തിലാണ്.

PunjabiIND

ਇੱਥੇ, ਹੇ ਕੁਰੂਆਂ ਦੇ ਅਨੰਦ, ਇੱਥੇ ਕੇਵਲ ਇੱਕ ਹੀ ਬਿੰਦੂ ਵਾਲਾ ਨਿਸ਼ਚਾ ਹੈ; ਅਨੇਕ-ਸ਼ਾਖਾਵਾਂ ਅਤੇ ਬੇਅੰਤ ਦੁਵਿਧਾਜਨਕ ਦੇ ਵਿਚਾਰ ਹਨ।

MaithiliIND

एतय हे कुरुक आनन्द, एकेटा एकल निश्चय अछि; अनेक शाखा आ अंतहीन अनिर्णयकारीक विचार अछि ।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.41।। व्याख्या-- 'व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन'-- कर्मयोगी साधकका ध्येय (लक्ष्य) जिस समताको प्राप्त करना रहता है, वह समता परमात्माका स्वरूप है। उस परमात्मस्वरूप समताकी प्राप्तिके लिये अन्तःकरणकी समता साधन है, अन्तःकरणकी समतामें संसारका राग बाधक है। उस रागको हटानेका अथवा परमात्मतत्त्वको प्राप्त करनेका जो एक निश्चय है, उसका नाम है--व्यवसायात्मिका बुद्धि। व्यवसायात्मिका बुद्धि एक क्यों होती है? कारण कि इसमें सांसारिक वस्तु, पदार्थ आदिकी कामनाका त्याग होता है। यह त्याग एक हीहोता है, चाहे धनकी कामनाका त्याग करें चाहे मान-बड़ाईकी कामनाका त्याग करें। परन्तु ग्रहण करनेमें अनेक चीजें होती है क्योंकि एकएक चीज अनेक तरहकी होती है; जैसे--एक ही मिठाई अनेक तरहकी होती है। अतः इन चीजोँकी कामनाएं भी अनेक, अनन्त होती हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

जो यह बुद्धि सांख्यके विषयमें कही गयी है और जो योगके विषयमें अब कही जानेवाली है वह हे कुरुनन्दन इस कल्याणमार्गमें व्यवसायात्मिका निश्चय स्वभाववाली बुद्धि एक ही है यानि यथार्थ प्रमाणजनित होनेके कारण अन्य विपरीत बुद्धियोंके शाखाभेदोंकी बाधक है। जो इतर ( दूसरी ) बुद्धियाँ हैं जिनके शाखाभेदके विस्तारसे संसार अनन्त अपार और अनुपरत होता है अर्थात् निरन्तर अत्यन्त विस्तृत होता है उन अनन्त भेदोंवाली बुद्धियोंका प्रमाणजनित विवेकबुद्धिके बलसे अन्त हो जानेपर संसारका भी अन्त हो जाता है। परंतु जो अव्यवसायी हैं जो प्रमाणजनित विवेकबुद्धिसे रहित हैं उनकी वे बुद्धियाँ बहुत शाखा अर्थात् बहुत भेदोंवाली और प्रतिशाखाभेदसे अनन्त होती हैं।

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Sri Anandgiri

ननु बुद्धिद्वयातिरिक्तानि बुद्ध्यन्तराण्यपि काणादादिशास्त्रप्रसिद्धानि विद्यन्ते। तथाच कथं बुद्धिद्वयमेव भगवतोपदिष्टमिति तत्राह येयमिति। सैवैका प्रमाणभूता बुद्धिरित्याह व्यवसायात्मिकेति। बुद्ध्यन्तराण्यविवेकमूलान्यप्रमाणानीत्याह बहुशाखा हीति। व्यवसायात्मिकाया बुद्धेः श्रेयोमार्गे प्रवृत्ताया विवक्षितं फलमाह इतरेति। प्रकृतबुद्धिद्वयापेक्षयेतरा विपरीताश्चाप्रमाणजनिताः स्वकपोलकल्पिता या बुद्धयस्तासां शाखाभेदो यः संसारहेतुस्तस्य बाधिकेति यावत्। तत्र हेतुः सम्यगिति। निर्दोषवेदवाक्यसमुत्थत्वादुक्तमुपायोपेयभूतं बुद्धिद्वयं साक्षात्पारम्पर्याभ्यां संसारहेतुबाधकमित्यर्थः। उत्तरार्धं व्याचष्टे याः पुनरिति। प्रकृतबुद्धिद्वयापेक्षयार्थान्तरत्वमितरत्वम्। तासामनर्थहेतुत्वं दर्शयति यासामिति। अप्रामाणिकबुद्धीनां प्रसक्तानुप्रसक्त्या जायमानानामतीव बुद्धिपरिणामविशेषाः शाखाभेदास्तेषां प्रचारः प्रवृत्तिस्तद्वशादित्येतत् अनन्तत्वं सम्यग्ज्ञानमन्तरेण निवृत्तिविरहितत्वम् अपरत्वं कार्यस्यैव सतो वस्तुभूतकारणविरहितत्वम्। अनुपरतत्वं स्फोरयति नित्येति। कथं तर्हि तन्निवृत्त्या पुरुषार्थपरिसमाप्तिस्तत्राह प्रमाणेति। अन्वयव्यतिरेकाख्येनानुमानेनागमेन च पदार्थपरिशोधनपरिनिष्पन्ना विवेकात्मिका या बुद्धिस्तां निमित्तीकृत्य समुत्पन्नसम्यग्बोधानुरोधात्प्रकृता विपरीतबुद्धयो व्यावर्तन्ते तास्वसंख्यातासु व्यावृत्तासु सतीषु निरालम्बनतया संसारोऽपि स्थातुमशक्नुवन्नुपरतो भवतीत्यर्थः। याः पुनरित्युपक्रान्तास्तत्त्वज्ञानापनोद्याः संसारास्पदीभूता विपरीतबुद्धीरनुक्रामति ता बुद्धय इति। बुद्धीनां वृक्षस्येव कुतो बहुशाखित्वं तत्राह बहुभेदा इत्येतदिति। एकैकां बुद्धिं प्रति शाखाभेदोऽवान्तरविशेषस्तेन बुद्धीनामसंख्यत्वं प्रख्यातमित्याह प्रतिशाखेति। बुद्धीनामानन्त्यप्रसिद्धिप्रद्योतनार्थो हिशब्दः। सम्यग्ज्ञानवतां यथोक्तबुद्धिभेदभाक्त्वमप्रसिद्धमित्याशङ्क्य प्रत्याह केषामित्यादिना।

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Sri Dhanpati

इह मोक्षमार्गे व्यवसायात्मिका निश्चयात्मिकोपायोपेयबुद्धिरेक सभ्यक्प्रमाणजनितत्वादितविपरीतबुद्धिशाखाभेदस्य बाधिका। येतु व्यवसायात्मिका परमेश्वरभक्त्यैव तरिष्यामिति निश्चयात्मिकेति वर्णयन्ति तद्बुद्धेः स्वरुपं निरुपितं प्रमाणजनितत्वादितिवदद्भिर्भाष्यकृद्भिः सा दृढेत्युक्तमिति न विरोधः। अव्यवसायिनां प्रमाणजनितविवेकबुद्धिरहितानां कामिनां बुद्धयो बहुशाखाः बह्व्योऽनुपरतसंसारप्रदाः शाखा यासां ताः प्रतिशाखाभेदेन ह्यनन्ताश्च कामनानामानन्त्यात्। यत्तु नन्वेवं सांख्ययोगयोर्महाभयात्राणहेतुत्वं तुल्यं चेत्कोऽनयोर्विशेष इत्याशङ्क्य सांख्यानां पातशङ्का नास्ति योगिनां तु यावद्विदेहकैवल्यं पातशङ्कास्तीत्याह व्यवसायात्मिकेति तच्चिन्त्यम्। योगस्तवनपरस्य ग्रन्थस्य तन्निन्दापरत्वेनोत्यापनस्यानुचितत्वात् कामात्मान इत्यादिना सकामस्य। निन्दाप्रतीतेः स्पष्टत्वाच्च। तव तूत्तमवंशोद्भवस्य व्यवसायात्मिकैव बुद्धिर्युक्तेति सूचयन्नाह कुरुनन्दनेति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
vyavasāyaātmikā
buddhiḥintellect
ekāsingle
ihaon this path
kurunandana
bahuśhākhāḥ
hiindeed
anantāḥendless
chaalso
buddhayaḥintellect
avyavasāyināmof the irresolute
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Bhagavad Gita · 2.40
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्

मनुष्यलोकमें इस समबुद्धिरूप धर्मके आरम्भका नाश नहीं होता, इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान (जन्म-मरणरूप) महान् भयसे रक्षा कर लेता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.42
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः

हे पृथानन्दन ! जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 41
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 41
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्

हे कुरुनन्दन! इस समबुद्धिकी प्राप्तिके विषयमें व्यवसायात्मिका बुद्धि एक ही होती है। अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओंवाली ही होती हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 41 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 41 का हिंदी अर्थ: "हे कुरुनन्दन! इस समबुद्धिकी प्राप्तिके विषयमें व्यवसायात्मिका बुद्धि एक ही होती है। अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओंवाली ही होती हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 41?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 41 translates to: "Here, O joy of the Kurus, there is only one single-pointed determination; many-branched and endless are the thoughts of the indecisive. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 41 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। हे कुरुनन्दन! इस समबुद्धिकी प्राप्तिके विषयमें व्यवसायात्मिका बुद्धि एक ही होती है। अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओंवाली ही होती हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "vyavasāyātmikā buddhir ekeha kuru-nandana" mean in English?

"vyavasāyātmikā buddhir ekeha kuru-nandana" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 41. Here, O joy of the Kurus, there is only one single-pointed determination; many-branched and endless are the thoughts of the indecisive. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.