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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 27
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि

क्योंकि पैदा हुएकी जरूर मृत्यु होगी और मरे हुएका जरूर जन्म होगा। इस (जन्म-मरण-रूप परिवर्तन के प्रवाह) का परिहार अर्थात् निवारण नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar

Global Translations

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GujaratiIND

જન્મેલા માટે, મૃત્યુ નિશ્ચિત છે, અને મૃત્યુ પામેલા માટે, જન્મ નિશ્ચિત છે; તેથી, તમારે અનિવાર્ય પર શોક ન કરવો જોઈએ.

TeluguIND

పుట్టినవాడికి చావు ఖాయం, చనిపోయినవాడికి పుట్టుక నిశ్చయం; అందువల్ల, మీరు అనివార్యమైన వాటిపై దుఃఖించకూడదు.

MarathiIND

जन्माला आलेला मृत्यू निश्चित आहे आणि मृतांचा जन्म निश्चित आहे; म्हणून, आपण अपरिहार्य गोष्टीबद्दल दु: ख करू नये.

MaithiliIND

जन्मल के लेल मृत्यु निश्चित अछि आ मृतक के लेल जन्म निश्चित अछि; तेँ अनिवार्यता पर शोक नहि करबाक चाही।

DogriIND

पैदा होए दे लेई मौत पक्की ऐ, ते मरे दे लेई जन्म पक्की ऐ; इस आस् ते तुसेंगी लाजमी चीजें दा दुख नेई होना चाईदा।

TamilIND

பிறந்தவருக்கு இறப்பு நிச்சயம், இறந்தவர்களுக்கு பிறப்பு நிச்சயம்; எனவே, தவிர்க்க முடியாதது பற்றி நீங்கள் வருத்தப்படக்கூடாது.

OdiaIND

ଜନ୍ମ ପାଇଁ ମୃତ୍ୟୁ ନିଶ୍ଚିତ, ଏବଂ ମୃତମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଜନ୍ମ ନିଶ୍ଚିତ; ତେଣୁ, ତୁମେ ଅପରିହାର୍ଯ୍ୟ ପାଇଁ ଦୁ ieve ଖ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ |

BengaliIND

জন্মের জন্য মৃত্যু সুনিশ্চিত এবং মৃতদের জন্য জন্ম নিশ্চিত; অতএব, আপনি অনিবার্য উপর শোক করা উচিত নয়.

MizoIND

Piang tan chuan thihna a chiang a, mitthi tan chuan pian hi a chiang a; chuvangin, pumpelh theih loh chu i lungngai tur a ni lo.

ManipuriIND

ꯄꯣꯀꯄꯥ ꯃꯤꯁꯤꯡꯒꯤꯗꯃꯛ ꯁꯤꯕꯥ ꯁꯣꯌꯗꯅꯥ ꯂꯩ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯁꯤꯔꯕꯥ ꯃꯤꯁꯤꯡꯒꯤꯗꯃꯛ ꯄꯣꯀꯄꯥ ꯁꯣꯌꯗꯅꯥ ꯂꯩ; ꯃꯔꯝ ꯑꯗꯨꯅꯥ ꯇꯉꯥꯏꯐꯗꯕꯥ ꯊꯧꯗꯣꯛ ꯑꯗꯨꯗꯥ ꯅꯍꯥꯛꯅꯥ ꯋꯥꯈꯜ ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯇꯕꯥ ꯐꯥꯑꯣꯔꯣꯏꯗꯕꯅꯤ꯫

NepaliIND

जन्मेकाहरूका लागि मृत्यु निश्चित छ, र मरेकाहरूका लागि जन्म निश्चित छ। त्यसकारण, तपाईंले अपरिहार्य कुरामा शोक गर्नु हुँदैन।

KannadaIND

ಹುಟ್ಟಿದವನಿಗೆ ಸಾವು ನಿಶ್ಚಿತ, ಸತ್ತವನಿಗೆ ಹುಟ್ಟು ನಿಶ್ಚಿತ; ಆದ್ದರಿಂದ, ನೀವು ಅನಿವಾರ್ಯದ ಬಗ್ಗೆ ದುಃಖಿಸಬಾರದು.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.27।। व्याख्या-- 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च'-- पूर्वश्लोकके अनुसार अगर शरीरीको नित्य जन्मने और मरनेवाला भी मान लिया जाय, तो भी वह शोकका विषय नहीं हो सकता। कारण कि जिसका जन्म हो गया है, वह जरूर मरेगा और जो मर गया है, वह जरूर जन्मेगा। 'तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि'-- इसलिये कोई भी इस जन्म-मृत्युरूप प्रवाहका परिहार (निवारण) नहीं कर सकता; क्योंकि इसमें किसीका किञ्चिन्मात्र भी वश नहीं चलता। यह जन्म-मृत्युरूप प्रवाह तो अनादिकालसे चला आ रहा है और अनन्तकालतक चलता रहेगा। इस दृष्टिसे तुम्हारे लिये शोक करना उचित नहीं है। ये धृतराष्ट्रके पुत्र जन्में हैं, तो जरूर मरेंगे। तुम्हारे पास ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे तुम उनको बचा सको। जो मर जायेंगे, वे जरूर जन्मेंगे। उनको भी तुम रोक नहीं सकते। फिर शोक किस बातका?

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

ऐसा होनेसे जिसने जन्म लिया है उसका मरण ध्रुव निश्चित है और जो मर गया है उसका जन्म ध्रुव निश्चित है इसलिये यह जन्ममरणरूप भाव अपरिहार्य है अर्थात् किसी प्रकार भी इसका प्रतिकार नहीं किया जा सकता इस अपरिहार्य विषयके निमित्त तुझे शोक करना उचित नहीं।

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Sri Anandgiri

तयोरवश्यंभावित्वे सत्यनु शोकस्याकर्तव्यत्वे हेत्वन्तरमाह तथाचेति।

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Sri Dhanpati

अस्मिन्पक्षे शोकाभावं स्फुटयति जातस्येति। नन्वात्मन आभूतसंप्लवस्थायित्वपक्षेनित्यत्वपक्षे च दृष्टादृष्टदुःखसंभवात्तद्भयेन शोचामीत्यत आहेति तु यथाश्रुततमूलाननुगुणत्वादाचार्यैर्नावतरितं तस्मादपरिहार्येऽवश्यंभाविनि जन्ममरणलक्षणेऽर्थे यत्त्वेवं अदृष्टनिमित्तेऽपि शोके तस्मादपरिहार्येऽर्थे इत्येवोत्तरम्। युद्धाख्यं हि कर्मक्षत्रियस्यापरिहार्यमित्यादि तदुपेक्ष्यम् प्रकरणविरोधात् जन्ममरणलक्षणस्यार्थस्य ध्रुवताया एव पूर्वार्धे प्रस्तुतत्वात्। यत्तु अथवा आत्मनित्यत्वपक्ष एव श्लोकद्वयमर्जुनस्य परमास्तिकस्य वेदबाह्यमताभ्युपगमासंभवात्। अक्षरयोजना तु नित्यश्चासौ देहेन्द्रियसंबन्धवशाज्जातश्चेति नित्यजातस्तमेनमात्मानं नित्यमपि सन्तं जातं चेन्मन्यसे तथा नित्यमपि सन्तं मृतं चेन्मन्यसे तथापि त्वं नामुशोचितुमर्हसि इति प्रतिज्ञाय हेतुमाह जातस्य हीत्यादिना। मृत्युः शरीरादिविच्छेदः तत्संयोगो जन्म। भाष्यमप्यस्मिन्पक्षे योजनीयमिति तद्विचार्यम्। समासैकदेशस्य क्रियायामन्वयायोगात् प्रयोजनशून्यक्लिष्टकल्पनाया अन्याय्यत्वाच्च। ननूक्तमेवार्जुनस्य परमास्तिकस्य वेदबाह्यताभ्युपगमासंभवरुपं प्रयोजनमितिचेन्न। भगवतैवाभ्युपगभ्य कैमुत्यन्यायः प्रदर्शित इत्युक्तत्वात्। तथाच परमास्तिकं श्रीरामचन्द्रं प्रति भगवतो वसिष्ठस्य वचनंत्वं चेदबभूविथ पुरा तथेदानीं भविष्यसि। अद्य चेह स्थितोऽसीति ज्ञातवानसि निश्चयम् तदानन्तरगानन्यान्प्राणादीन्निकटस्थितान्। बन्धूनतीतान्सुबहून्कस्मात्त्वं नानुशोचसि पूर्वमन्यस्तथेदानीं बभूविथ भविष्यसि। यदि राम तथापि त्वं सद्रूपः किं विमुह्यसि पुरा भूत्वाथ भूत्वा च भूयश्चेन्न भविष्यसि। तथापि क्षीणसंसारः किमर्थमनुशोचसि तस्मान्न दुःखिता युक्ता प्राकृते जागते भ्रमे। तथैव मुदिता युक्ता युक्तं कार्यानुवर्तनम् इति। विवृतं चेदं टीकाकारैः। एवमात्मनोऽसङ्गत्वाद्वितीयत्वदर्शने शोकसंभव उक्तः। इदानीमस्त्वासङगी तथापि स किं नित्य उत क्षणिक उत प्रागभाववद्धटादिवद्वा कालान्तरेण नश्वरः। सर्वेष्वपि पक्षेषु बन्धुशोको न युक्त इति प्रौढ्या समाधित्सुराद्ये कल्पे तावदाह त्वं चेदिति। इति यदि निश्चयं ज्ञातवानसि बन्धून्प्राणादीनिवेत्यध्याहारः विनिगमनाविरहात्सर्वशोकाशक्तेः क्वापि शोको न युक्त इति भावः द्वितीयेऽप्याह पूर्वमिति। इदानीमन्यः अग्रेऽप्यन्यः क्षणिकमात्मानं यदि जानासि तथापि किं सद्रूपमालम्ब्य विमुह्यसि द्वितीयक्षणे शोच्यस्य शोचितुश्चासत्त्वेन शोकावसराभावादित्यर्थः तृतीयेऽप्याह पुरेति। तथाप्यात्मनाशादेव क्षीणसंसारः यदात्मनो जन्मादिसङ्गित्वेन शोको न युक्तस्तदा किंवाच्यमसङ्गोदासीनकूटस्थस्वप्रकाशपूर्णानन्दैकरसत्वे स न युक्त इत्याशयेनोपसंहरति तस्मादिति। मुदिता सहजसंतोषवृत्तिः इति। यत्तु भाष्यमपीत्यादि तदपि न। आत्मनो नित्यत्वमभ्युपगम्येदमुच्यत इति भाष्यस्यास्मिन्पक्षे योजनाया अशक्यत्वात् नित्यत्वच्छेदेऽभ्युपगम्येति न संगच्छते नित्यत्वस्य स्वसिद्धान्तत्वात्। देहादिसंबन्धेनानित्यत्वमिति शेषपूरणे तु जातत्वादिकमभ्युपगम्येति वक्तव्यं स्यात्। अथचेत्यभ्युपगमार्थः। एनं प्रकृतमात्मानं नित्यजातं लोकप्रसिद्य्धा प्रत्येनकशरीरोत्पत्तिं जातो जात इति वा मन्यसे तथा प्रतिताद्विनाशं नित्यं वा मन्यसे मृतो मृत इति भाष्यस्य जातादौ नित्यशब्दान्वयप्रतिपादनपरस्योक्तपक्षे योजयितुमशक्यत्वाच्चेति दिक्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
jātasyafor one who has been born
hifor
dhruvaḥcertain
mṛityuḥdeath
dhruvamcertain
janmabirth
mṛitasyafor the dead
chaand
tasmāttherefore
aparihārye arthein this inevitable situation
nanot
tvamyou
śhochitumlament
arhasibefitting
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.26
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्। तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि

हे महाबाहो ! अगर तुम इस देहीको नित्य पैदा होनेवाला अथवा नित्य मरनेवाला भी मानो, तो भी तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.28
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना

हे भारत ! सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद अप्रकट हो जायँगे, केवल बीचमें ही प्रकट दीखते हैं। अतः इसमें शोक करनेकी बात ही क्या है? — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 27
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 27
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि

क्योंकि पैदा हुएकी जरूर मृत्यु होगी और मरे हुएका जरूर जन्म होगा। इस (जन्म-मरण-रूप परिवर्तन के प्रवाह) का परिहार अर्थात् निवारण नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 27 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 27 का हिंदी अर्थ: "क्योंकि पैदा हुएकी जरूर मृत्यु होगी और मरे हुएका जरूर जन्म होगा। इस (जन्म-मरण-रूप परिवर्तन के प्रवाह) का परिहार अर्थात् निवारण नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 27?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 27 translates to: "For the born, death is certain, and for the dead, birth is certain; therefore, you should not grieve over the inevitable. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचित" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 27 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। क्योंकि पैदा हुएकी जरूर मृत्यु होगी और मरे हुएका जरूर जन्म होगा। इस (जन्म-मरण-रूप परिवर्तन के प्रवाह) का परिहार अर्थात् निवारण नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "jātasya hi dhruvo mṛityur dhruvaṁ janma mṛitasya cha" mean in English?

"jātasya hi dhruvo mṛityur dhruvaṁ janma mṛitasya cha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 27. For the born, death is certain, and for the dead, birth is certain; therefore, you should not grieve over the inevitable. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.