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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 26
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्। तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि

हे महाबाहो ! अगर तुम इस देहीको नित्य पैदा होनेवाला अथवा नित्य मरनेवाला भी मानो, तो भी तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

కానీ నీవు దానిని నిరంతరం పుట్టి, చచ్చిపోతున్నట్లు భావించినా, ఓ పరాక్రమవంతుడా, నీవు దుఃఖించకూడదు.

GujaratiIND

પણ જો તમે તેને નિરંતર જન્મ અને નિરંતર મૃત્યુ સમાન માનતા હો, તો પણ, હે પરાક્રમી, તમારે શોક ન કરવો જોઈએ.

MarathiIND

पण जरी तू सतत जन्म घेत असशील आणि सतत मरत असशील, तरीसुद्धा, हे पराक्रमी, तू दुःखी होऊ नये.

MalayalamIND

പക്ഷേ, അത് നിരന്തരം ജനിക്കുന്നതും മരിക്കുന്നതും ആണെന്ന് നീ വിചാരിച്ചാലും, ഹേ ബലവാനായ, നീ ദുഃഖിക്കേണ്ടതില്ല.

BengaliIND

কিন্তু আপনি যদি এটাকে নিরন্তর জন্ম এবং ক্রমাগত মৃত্যু বলে মনে করেন, তবুও, হে পরাক্রমশালী, আপনার দুঃখ করা উচিত নয়।

KannadaIND

ಆದರೆ ಅದು ನಿರಂತರವಾಗಿ ಹುಟ್ಟಿ ಸಾಯುತ್ತಿದೆ ಎಂದು ನೀನು ಭಾವಿಸಿದರೂ ಸಹ, ಹೇ ಪರಾಕ್ರಮಿಯೇ, ನೀನು ದುಃಖಿಸಬಾರದು.

NepaliIND

तर यदि तिमी यसलाई निरन्तर जन्मन्छ र निरन्तर मर्दै छ भन्ने सोच्दछौ भने पनि, हे पराक्रमी, तिमीले शोक गर्नु हुँदैन।

PunjabiIND

ਪਰ ਜੇ ਤੂੰ ਇਸ ਨੂੰ ਸਦਾ ਜੰਮਣਾ ਅਤੇ ਸਦਾ ਮਰਨ ਵਾਲਾ ਸਮਝਦਾ ਹੈਂ, ਤਦ ਵੀ, ਹੇ ਬਲਵੰਤ, ਤੈਨੂੰ ਉਦਾਸ ਨਹੀਂ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ।

SindhiIND

پر پوءِ به جيڪڏهن تون ان کي مسلسل ڄمڻ ۽ مسلسل مرڻ وانگر سمجهين ٿو، تڏهن به، اي طاقتور هٿياربند، توکي غم نه ڪرڻ گهرجي.

TamilIND

ஆனால், அது தொடர்ந்து பிறப்பதாகவும், தொடர்ந்து இறந்துகொண்டிருப்பதாகவும் நீ நினைத்தாலும் கூட, ஓ வலிமையான கரங்களை உடையவனே, நீ துக்கப்படவேண்டாம்.

MaithiliIND

मुदा जँ अहाँ एकरा निरंतर जन्म लैत आ निरंतर मरैत बुझैत छी तखनो हे महाबाहु, अहाँ केँ शोक नहि करबाक चाही।

DogriIND

पर जेकर तुस इसगी लगातार पैदा होने आह्ला ते लगातार मरने आह्ला समझदे ओ तां बी, हे पराक्रमी, तुसेंगी दुखी नेईं होना चाहिदा।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या-- 'अथ चैनं ৷৷. शोचितुमर्हसि'-- भगवान् यहाँ पक्षान्तररमें 'अथ च' और 'मन्यसे' पद देकर कहते हैं कि यद्यपि सिद्धान्तकी और सच्ची बात यही है कि देही किसी भी कालमें जन्मने-मरनेवाला नहीं है (गीता 2। 20), तथापि अगर तुम सिद्धान्तसे बिलकुल विरुद्ध बात भी मान लो कि देही नित्य जन्मनेवाला और नित्य मरनेवाला है, तो भी तुम्हें शोक नहीं होना चाहिये। कारण कि जो जन्मेगा, वह मरेगा ही और जो मरेगा, वह जन्मेगा ही--इस नियमको कोई टाल नहीं सकता। अगर बीजको पृथ्वीमें बो दिया जाय, तो वह फूलकर अङ्कुर दे देता है और वही अङ्कुर क्रमशः बढ़कर वृक्षरूप हो जाता है। इसमें सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाय कि क्या वह बीज एक क्षण भी एकरूपसे रहा? पृथ्वीमें वह पहले अपने कठोररूपको छोड़कर कोमलरूपमें हो गया, फिर कोमल-रूपको छोड़कर अङ्कुररूपमें हो गया, इसके बाद अङ्कुरूपको छोड़कर वृक्षरूपमें हो गया और अन्तमें आयु समाप्त होनेपर वह सूख गया। इस तरह बीज एक क्षण भी एकरूपसे नहीं रहा, प्रत्युत प्रतिक्षण बदलता रहा। अगर बीज एक क्षण भी एकरूपसे रहता, तो वृक्षके सूखनेतककी क्रिया कैसे होती? उसने पहले रूपको छोड़ा--यह उसका मरना हुआ, और दूसरे रूपको धारण किया-- यह उसका जन्मना हुआ। इस तरह वह प्रतिक्षण ही जन्मता-मरता रहा। बीजकी ही तरह यह शरीर है। बहुत सूक्ष्मरूपसे वीर्यका जन्तु रजके साथ मिला। वह बढ़ते-बढ़ते बच्चेके रूपमें हो गया और फिर जन्म गया। जन्मके बाद वह बढ़ा, फिर घटा और अन्तमें मर गया। इस तरह शरीर एक क्षण भी एकरूपसे न रहकर बदलता रहा अर्थात् प्रतिक्षण जन्मता-मरता रहा। भगवान् कहते हैं कि अगर तुम शरीरकी तरह शरीरीको भी नित्य जन्मने-मरनेवाला मान लो, तो भी यह शोकका विषय नहीं हो सकता।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

औपचारिक रूपसे आत्माकी अनित्यता स्वीकार करके यह कहते हैं अथ च ये दोनों अव्यय औपचारिक स्वीकृतिके बोधक हैं। यदि तू इस आत्माको सदा जन्मनेवाला अर्थात् लोकप्रसिद्धिके अनुसार अनेक शरीरोंकी प्रत्येक उत्पत्तिके साथसाथ उत्पन्न हुआ माने तथा उनके प्रत्येक विनाशके साथसाथ सदा नष्ट हुआ माने। तो भी अर्थात् ऐसे नित्य जन्मने और नित्य मरनेवाले आत्माके निमित्त भी हे महाबाहो तुझे इस प्रकार शोक करना उचित नहीं है क्योंकि जन्मनेवालेका मरण और मरनेवालेका जन्म यह दोनों अवश्य ही होनेवाले हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

आत्मनो नित्यत्वस्य प्रागेव सिद्धत्वादुत्तरश्लोकानुपपत्तिरित्याशङ्क्याह आत्मन इति। अनित्यत्वमिति च्छेदः शाक्यानां लोकायतानां वा मतमिदमा परामृश्यते। श्रोतुरर्जुनस्य पूर्वोक्तमात्मयाथात्म्यं श्रुत्वापि तस्मिन्निर्धारणासिद्धेर्द्वयोर्मतयोरन्यतरमताभ्युपगमः शङ्कितस्तदर्थो निपातद्वयप्रयोग इत्याह अथ चेति। प्रकृतस्यात्मनो नित्यत्वादिलक्षणस्य पुनःपुनर्जातत्वाभिमानो मानाभावादसंभवीत्याह लोकेति। नित्यजातत्वाभिनिवेशे पौनःपुन्येन मृतत्वाभिनिवेशो व्याहतः स्यादित्याशङ्क्याह तथेति। परकीयमतमनुभाषितमभ्युपेत्यअहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् इत्यादेस्तदीयशोकस्य निरवकाशत्वमित्याह तथापीति। एवमर्जुनस्य दृश्यमानमनुशोकप्रकारं दर्शयित्वा तस्य कर्तुमयोग्यत्वे हेतुमाह जन्मवत इति। जन्मवतो नाशो नाशवतश्च जन्मेत्येताववश्यंभाविनौ मिथो व्याप्ताविति योजना।

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Scripture Scholar

Sri Dhanpati

प्रौढ्या आत्मनो नित्यत्वं वेदबाह्यवादिसिद्धान्तमभ्युपेत्यापि शोकमपाकरोति अथेति। अथशब्दः पक्षान्तराभ्युपगमार्थः। एनं लोकदृष्ट्या प्रत्यनेकशरीरोत्पत्तिं जातो जात इति मन्यसे तथातद्विनाशं नित्यं वा मन्यसे। उपलक्ष्णमेतद्भाष्यं नास्तिकोक्तपक्षान्तराणामपि। यद्वा इतरेषां मतानामत्रोपपादनमविवक्षितं प्रयोजनाभावात् अतस्थूलमताभ्युपगमेऽपि शोको न कार्यः किमुत वैदिकमताङ्गीकार इति फलितार्थस्य विवक्षित्वात्। महाबाहो इति संबोधयन् शोकमकृत्वा बाह्वोर्महत्त्वं सार्थकं कुर्विति सूचयति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
athaif, however
chaand
enamthis soul
nityajātam
nityamalways
or
manyaseyou think
mṛitamdead
tathā apieven then
tvamyou
mahābāho
nanot
evamlike this
śhochitumgrieve
arhasibefitting
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.25
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते। तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि

यह देही प्रत्यक्ष नहीं दीखता, यह चिन्तनका विषय नहीं है और यह निर्विकार कहा जाता है। अतः इस देहीको ऐसा जानकर शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.27
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि

क्योंकि पैदा हुएकी जरूर मृत्यु होगी और मरे हुएका जरूर जन्म होगा। इस (जन्म-मरण-रूप परिवर्तन के प्रवाह) का परिहार अर्थात् निवारण नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 26
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 26
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्। तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि

हे महाबाहो ! अगर तुम इस देहीको नित्य पैदा होनेवाला अथवा नित्य मरनेवाला भी मानो, तो भी तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ: "हे महाबाहो ! अगर तुम इस देहीको नित्य पैदा होनेवाला अथवा नित्य मरनेवाला भी मानो, तो भी तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 26?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 26 translates to: "But even if thou thinkest of It as constantly being born and constantly dying, even then, O mighty-armed one, thou shouldst not grieve. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्। तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 26 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। हे महाबाहो ! अगर तुम इस देहीको नित्य पैदा होनेवाला अथवा नित्य मरनेवाला भी मानो, तो भी तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "atha chainaṁ nitya-jātaṁ nityaṁ vā manyase mṛitam" mean in English?

"atha chainaṁ nitya-jātaṁ nityaṁ vā manyase mṛitam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 26. But even if thou thinkest of It as constantly being born and constantly dying, even then, O mighty-armed one, thou shouldst not grieve. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.