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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 25
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते। तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि

यह देही प्रत्यक्ष नहीं दीखता, यह चिन्तनका विषय नहीं है और यह निर्विकार कहा जाता है। अतः इस देहीको ऐसा जानकर शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar

Global Translations

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MarathiIND

हा आत्मा अप्रकट, अकल्पनीय आणि अपरिवर्तनीय आहे असे म्हटले जाते. म्हणून, हे असे आहे हे जाणून, आपण दु: ख करू नये.

TeluguIND

ఈ నేనే అవ్యక్తమైనది, ఊహించలేనిది మరియు మార్చలేనిది అని చెప్పబడింది. అందుచేత ఇది అలా అని తెలిసి దుఃఖించకూడదు.

GujaratiIND

આ સ્વયં અપ્રગટ, અકલ્પ્ય અને અપરિવર્તનશીલ હોવાનું કહેવાય છે. તેથી, આ હોવાનું જાણીને, તમારે શોક ન કરવો જોઈએ.

NepaliIND

यो आत्मलाई अप्रकट, अकल्पनीय र अपरिवर्तनीय भनिन्छ। तसर्थ, यो थाहा पाएर, तपाईंले शोक गर्नु हुँदैन।

PunjabiIND

ਇਸ ਸਵੈ ਨੂੰ ਅਪ੍ਰਗਟ, ਅਸੰਭਵ, ਅਤੇ ਅਟੱਲ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ, ਇਹ ਜਾਣ ਕੇ, ਤੁਹਾਨੂੰ ਸੋਗ ਨਹੀਂ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ।

TamilIND

இந்த சுயம் வெளிப்படுத்தப்படாதது, சிந்திக்க முடியாதது மற்றும் மாற்ற முடியாதது என்று கூறப்படுகிறது. ஆதலால், இது அப்படியென்று அறிந்து, துக்கப்படக்கூடாது.

MalayalamIND

ഈ ആത്മാവ് പ്രകടിപ്പിക്കപ്പെടാത്തതും അചിന്തനീയവും മാറ്റമില്ലാത്തതും ആണെന്ന് പറയപ്പെടുന്നു. അതിനാൽ, ഇത് അങ്ങനെയാണെന്ന് അറിഞ്ഞുകൊണ്ട് നിങ്ങൾ ദുഃഖിക്കേണ്ടതില്ല.

BengaliIND

এই আত্মাকে অব্যক্ত, অচিন্তনীয় এবং অপরিবর্তনীয় বলা হয়। অতএব, এটি এমন হতে জেনে আপনার দুঃখ করা উচিত নয়।

MaithiliIND

ई आत्म अव्यक्त, अकल्पनीय आ अपरिवर्तनीय कहल जाइत अछि | तेँ ई बात ई जानि अहाँ केँ शोक नहि करबाक चाही।

SindhiIND

هن نفس کي چئبو آهي غير ظاھر، ناقابل تصور ۽ ناقابل تبديلي. تنهن ڪري، اهو ڄاڻڻ ائين آهي، توهان کي غمگين نه ٿيڻ گهرجي.

AssameseIND

এই আত্মাক অপ্ৰকাশিত, অকল্পনীয় আৰু অপৰিৱৰ্তিত বুলি কোৱা হয়। গতিকে এই কথা জানিও শোক কৰা উচিত নহয়।

BhojpuriIND

एह आत्म के अप्रकट, अकल्पनीय आ अपरिवर्तनीय कहल जाला। एह से ई जान के रउरा दुख ना होखे के चाहीं.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.25।। व्याख्या-- 'अव्यक्तोऽयम्'-- जैसे शरीर-संसार स्थूल-रूपसे देखनेमें आता है, वैसे यह शरीरी स्थूलरूपसे देखनेमें आनेवाला नहीं है; क्योंकि यह स्थूल सृष्टिसे रहित है। 'अचिन्त्योऽयम्'-- मन, बुद्धि आदि देखनेमें तो नहीं आते पर चिन्तनमें आते, ही हैं अर्थात् ये सभी चिन्तनके विषय हैं। परन्तु यह देही चिन्तनका भी विषय नहीं है; क्योंकि यह सूक्ष्म सृष्टिसे रहित है। 'अविकार्योऽयमुच्यते'-- यह देही विकार-रहित कहा जाता है अर्थात् इसमें कभी किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता। सबका कारण प्रकृति है उस कारणभूत प्रकृतिमें भी विकृति होती है। परन्तु इस देहीमें किसी प्रकारकी विकृति नहीं होती; क्योंकि यह कारण सृष्टिसे रहित है। यहाँ चौबीसवें-पचीसवें श्लोकोंमें अच्छेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य, अशोष्य, अचल, अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकार्य इन आठ विशेषणोंके द्वारा इस देहीका निषेधमुखसे और नित्य सर्वगत स्थाणु और सनातन--इन चार विशेषणोंकेद्वारा इस देहीका विधिमुखसे वर्णन किया गया है। परन्तु वास्तवमें इसका वर्णन हो नहीं सकता क्योंकि यह वाणीका विषय नहीं है। जिससे वाणी आदि प्रकाशित होते हैं उस देहीको वे सब प्रकाशित कैसे कर सकते हैं अतः इस देहीका ऐसा अनुभव करना ही इसका वर्णन करना है। 'तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि'-- इसलिये इस देहीको अच्छेद्य, अशोष्य, नित्य, सनातन, अविकार्य आदि जान लें अर्थात् ऐसा अनुभव कर लें तो फिर शोक हो ही नहीं सकता।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तथा यह आत्मा बुद्धि आदि सब करणोंका विषय नहीं होनेके कारण व्यक्त नहीं होता ( जाना नहीं जा सकता ) इसलिये अव्यक्त है। इसीलिये यह अचिन्त्य है क्योंकि जो पदार्थ इन्द्रियगोचर होता है वही चिन्तनका विषय होता है। यह आत्मा इन्द्रियगोचर न होनेसे अचिन्त्य है। यह आत्मा अविकारी है अर्थात् जैसे दहीके जावन आदिसे दूध विकारी हो जाता है वैसे यह नहीं होता। तथा अवयवरहित ( निराकार ) होनेके कारण भी आत्मा अविक्रिय है क्योंकि कोई भी अवयवरहित ( निराकार ) पदार्थ विकारवान् नहीं देखा गया। अतः विकाररहित होनेके कारण यह आत्मा अविकारी कहा जाता है। सुतरां इस आत्माको उपर्युक्त प्रकारसे समझकर तुझे यह शोक नहीं करना चाहिये कि मैं इनका मारनेवाला हूँ मुझसे ये मारे जाते हैं इत्यादि।

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Sri Anandgiri

त्वंपदार्थपरिशोधनस्य प्रकृतत्वात्तत्रैव हेत्वन्तरमाह किञ्चेति। आत्मनो नित्यत्वादिलक्षणस्य तथैवं प्रथा किमिति न भवति तत्राह अव्यक्त इति। मा तर्हि प्रत्यक्षत्वं भूदनुमेयत्वं तु तस्य किं न स्यादित्याशङ्क्याह अतएवेति। तदेव प्रपञ्चयति यद्धीति। अतीन्द्रियत्वेऽपि सामान्यतो दृष्टविषयत्वं भविष्यतीत्याशङ्क्य कूटस्थेनात्मना व्याप्तिलिङ्गाभावान्मैवमित्याह अविकार्य इति। अविकार्यत्वे व्यतिरेकदृष्टान्तमाह यथेति। किं चात्मा न विक्रियते निरवयवद्रव्यत्वाद्धटादिवदिति व्यतिरेक्यनुमानमाह निरवयवत्वाच्चेति। निरवयवत्वेऽपि विक्रियावत्त्वे का क्षतिरित्याशङ्क्याह नहीति। सावयवस्यैव विक्रियावत्त्वदर्शनाद् विक्रियावत्त्वे निरवयवत्वानुपपत्तिरित्यर्थः। यद्धि सावयवं सक्रियं क्षीरादि तद्दध्यादिना विकारमापद्यते नचात्मनः श्रुतिप्रमितनिरवयवत्वस्य सावयवत्वमतोऽविक्रियत्वान्नायं विकार्यो भवितुमलमिति फलितमाह अविक्रियत्वादिति। आत्मयाथात्म्योपदेशमशोच्यानन्वशोचस्त्वमित्युपक्रम्य व्याख्यातमुपसंहरति तस्मादिति। अव्यक्तत्वाचिन्त्यत्वाविकार्यत्वनित्यत्वसर्वगतत्वादिरूपो यस्मादात्मा निर्धारितस्तस्मात्तथैव ज्ञातुमुचितस्तज्ज्ञानस्य फलवत्त्वादित्यर्थः। प्रतिषेध्यमनुशोकमेवाभिनयति हन्ताहमिति।

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Sri Dhanpati

किंच सर्वकरणागोचरत्वान्न व्यज्यत इत्यव्यक्तः। अयं प्रत्यक्षातीतः प्रत्यक्षागोचरत्वात् अचिन्त्योऽनुमानागम्यः कार्यलिङ्गकानुमानगम्योऽपि न भवतीत्याह। अविकार्यः विकारं न प्राप्नोतीत्यर्थः। एतेन देहत्रयातिरिक्तोऽप्यर्थाद्बोधित इति ज्ञेयम्। यत्त्वविकार्यःकर्मेन्द्रियाणामप्यगोचर इति तच्चिन्त्यम्। अव्यक्त इत्यनेनैव तस्य संग्रहात्। अन्यथा सामान्यतो दृष्टानुमानागोचरत्वालाभापत्तेश्च। उच्यतेनावेदविन्मनुते तं बृहन्तम्यतो वाच निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह इत्यादिश्रुतिभिः। तस्मादेवं यथोक्तप्रकारेण एनमात्मानं ज्ञात्वाऽहं हन्ता मयैवैते हन्यन्त इति शोचितुं नार्हसि।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
avyaktaḥunmanifested
ayamthis soul
achintyaḥinconceivable
ayamthis soul
avikāryaḥunchangeable
ayamthis soul
uchyateis said
tasmāttherefore
evamthus
viditvāhaving known
enamthis soul
nanot
anuśhochitumto grieve
arhasibefitting
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.24
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः

यह शरीरी काटा नहीं जा सकता, यह जलाया नहीं जा सकता, यह गीला नहीं किया जा सकता और यह सुखाया भी नहीं जा सकता। कारण कि यह नित्य रहनेवाला सबमें परिपूर्ण, अचल, स्थिर स्वभाववाला और अनादि है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.26
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्। तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि

हे महाबाहो ! अगर तुम इस देहीको नित्य पैदा होनेवाला अथवा नित्य मरनेवाला भी मानो, तो भी तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 25
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 25
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते। तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि

यह देही प्रत्यक्ष नहीं दीखता, यह चिन्तनका विषय नहीं है और यह निर्विकार कहा जाता है। अतः इस देहीको ऐसा जानकर शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 25 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 25 का हिंदी अर्थ: "यह देही प्रत्यक्ष नहीं दीखता, यह चिन्तनका विषय नहीं है और यह निर्विकार कहा जाता है। अतः इस देहीको ऐसा जानकर शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 25?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 25 translates to: "This Self is said to be unmanifested, unthinkable, and unchangeable. Therefore, knowing this to be so, you should not grieve. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते। तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 25 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। यह देही प्रत्यक्ष नहीं दीखता, यह चिन्तनका विषय नहीं है और यह निर्विकार कहा जाता है। अतः इस देहीको ऐसा जानकर शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "avyakto ’yam achintyo ’yam avikāryo ’yam uchyate" mean in English?

"avyakto ’yam achintyo ’yam avikāryo ’yam uchyate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 25. This Self is said to be unmanifested, unthinkable, and unchangeable. Therefore, knowing this to be so, you should not grieve. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.