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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 24
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः

यह शरीरी काटा नहीं जा सकता, यह जलाया नहीं जा सकता, यह गीला नहीं किया जा सकता और यह सुखाया भी नहीं जा सकता। कारण कि यह नित्य रहनेवाला सबमें परिपूर्ण, अचल, स्थिर स्वभाववाला और अनादि है। — VaniSagar

Global Translations

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MarathiIND

या आत्म्याला कापता येत नाही, जाळता येत नाही, ओले करता येत नाही किंवा वाळवता येत नाही; ते शाश्वत, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल आणि प्राचीन आहे.

TeluguIND

ఈ ఆత్మను కత్తిరించలేము, కాల్చలేము, తడి చేయకూడదు లేదా ఎండబెట్టకూడదు; అది శాశ్వతమైనది, సర్వవ్యాప్తమైనది, స్థిరమైనది, కదలనిది మరియు పురాతనమైనది.

GujaratiIND

આ આત્માને કાપી શકાતો નથી, બાળી શકાતો નથી, ભીનો કરી શકાતો નથી કે સુકાઈ શકાતો નથી; તે શાશ્વત, સર્વવ્યાપી, સ્થિર, સ્થાવર અને પ્રાચીન છે.

BhojpuriIND

एह आत्म के ना काटल जा सकेला, ना जरावल जा सकेला, ना भींजल जा सकेला, ना सुखावल जा सकेला; ई शाश्वत, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल आ प्राचीन बा।

ManipuriIND

ꯃꯁꯤꯒꯤ ꯁꯦꯜꯐ ꯑꯁꯤ ꯀꯀꯊꯕꯥ, ꯃꯩ ꯊꯥꯗꯣꯀꯄꯥ, ꯇꯔꯨ ꯇꯅꯥꯅꯕꯥ, ꯅꯠꯔꯒꯥ ꯁꯨꯡꯕꯥ ꯌꯥꯔꯣꯏ; ꯃꯁꯤ ꯂꯣꯝꯕꯥ ꯅꯥꯏꯗꯕꯥ, ꯄꯨꯝꯅꯃꯛꯇꯥ ꯌꯧꯕꯥ ꯉꯝꯕꯥ, ꯇꯪꯗꯨ ꯂꯩꯇꯥꯕꯥ, ꯆꯠꯄꯥ ꯉꯃꯗꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯔꯤꯕꯥ ꯑꯃꯅꯤ꯫

TamilIND

இந்த சுயத்தை வெட்டவோ, எரிக்கவோ, நனைக்கவோ, உலர்த்தவோ முடியாது; அது நித்தியமானது, எங்கும் நிறைந்தது, நிலையானது, அசையாது மற்றும் பழமையானது.

MalayalamIND

ഈ ആത്മാവിനെ മുറിക്കാനോ കത്തിക്കാനോ നനയ്ക്കാനോ ഉണക്കാനോ കഴിയില്ല; അത് ശാശ്വതവും സർവവ്യാപിയും സുസ്ഥിരവും അചഞ്ചലവും പുരാതനവുമാണ്.

NepaliIND

यो आत्मलाई काट्न, जलाउन, भिजाउन वा सुकाउन सकिँदैन; यो शाश्वत, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल र प्राचीन छ।

OdiaIND

ଏହି ସେଲ୍ଫ କଟା, ପୋଡି, ଓଦା କିମ୍ବା ଶୁଖାଯାଇପାରିବ ନାହିଁ; ଏହା ଅନନ୍ତ, ସର୍ବବ୍ୟାପୀ, ସ୍ଥିର, ଅସ୍ଥାୟୀ ଏବଂ ପ୍ରାଚୀନ |

BengaliIND

এই আত্মাকে কাটা যায় না, পোড়ানো যায় না, ভেজা যায় না, শুকানো যায় না; এটি চিরন্তন, সর্বব্যাপী, স্থিতিশীল, স্থাবর এবং প্রাচীন।

PunjabiIND

ਇਸ ਆਤਮ ਨੂੰ ਕੱਟਿਆ, ਸਾੜਿਆ, ਗਿੱਲਾ ਜਾਂ ਸੁੱਕਿਆ ਨਹੀਂ ਜਾ ਸਕਦਾ; ਇਹ ਸਦੀਵੀ, ਸਰਬ-ਵਿਆਪਕ, ਸਥਿਰ, ਅਚੱਲ, ਅਤੇ ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਹੈ।

KannadaIND

ಈ ಆತ್ಮವನ್ನು ಕತ್ತರಿಸಲಾಗುವುದಿಲ್ಲ, ಸುಡಲಾಗುವುದಿಲ್ಲ, ತೇವಗೊಳಿಸಲಾಗುವುದಿಲ್ಲ ಅಥವಾ ಒಣಗಿಸಲಾಗುವುದಿಲ್ಲ; ಅದು ಶಾಶ್ವತ, ಸರ್ವವ್ಯಾಪಿ, ಸ್ಥಿರ, ಅಚಲ ಮತ್ತು ಪ್ರಾಚೀನ.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या-- [शस्त्र आदि इस शरीरीमें विकार क्यों नहीं करते यह बात इस श्लोकमें कहते हैं।] 'अच्छेद्योऽयम्'-- शस्त्र इस शरीरीका छेदन नहीं कर सकते। इसका मतलब यह नहीं है कि शस्त्रोंका अभाव है या शस्त्र चलानेवाला अयोग्य है प्रत्युत छेदनरूपी क्रिया शरीरीमें प्रविष्ट ही नहीं हो सकती यह छेदन होनेके योग्य ही नहीं है। शस्त्रके सिवाय मन्त्र शाप आदिसे भी इस शरीरीका छेदन नहीं हो सकता। जैसे याज्ञवल्क्यके प्रश्नका उत्तर न दे सकनेके कारण उनके शापसे शाकल्यका मस्तक कटकर गिर गया (बृहदारण्यक0)। इस प्रकार देह तो मन्त्रोंसे वाणीसे कट सकता है पर देही सर्वथा अछेद्य है। 'अदाह्योऽयम्'-- यह शरीरी अदाह्य है क्योंकि इसमें जलनेकी योग्यता ही नहीं है। अग्निके सिवाय मन्त्र शाप आदिसे भी यह देही जल नहीं सकता। जैसे दमयन्तीके शाप देनेसे व्याध बिना अग्निके जलकर भस्म हो गया। इस प्रकार अग्नि शाप आदिसे वही जल सकता है जो जलनेयोग्य होता है। इस देहीमें तो दहनक्रियाका प्रवेश ही नहीं हो सकता। 'अक्लेद्यः'-- यह देही गीला होनेयोग्य नहीं है अर्थात् इसमें गीला होनेकी योग्यता ही नहीं है। जलसे एवं मन्त्र शाप ओषधि आदिसे यह गीला नहीं हो सकता। जैसे सुननेमें आता है कि मालकोश रागके गाये जानेसे पत्थर भी गीला हो जाता है चन्द्रमाको देखनेसे चन्द्रकान्तमणि गीली हो जाती है। परन्तु यह देही रागरागिनी आदिसे गीली होनेवाली वस्तु नहीं है। 'अशोष्यः'-- यह देही अशोष्य है। वायुसे इसका शोषण हो जाय यह ऐसी वस्तु नहीं है क्योंकि इसमें शोषणक्रियाका प्रवेश ही नहीं होता। वायुसे तथा मन्त्र शाप ओषधि आदिसे यह देही सूख नहीं सकता। जैसे अगस्त्य ऋषि समुद्रका शोषण कर गये ऐसे इस देहीका कोई अपनी शक्तिसे शोषण नहीं कर सकता। 'एव च'-- अर्जुन नाशकी सम्भावनाको लेकर शोक कर रहे थे। इसलिये शरीरीको अच्छेद्य अदाह्य अक्लेद्य और अशोष्य कहकर भगवान् 'एव च' पदोंसे विशेष जोर देकर कहते हैं कि यह शरीरी तो ऐसा ही है। इसमें किसी भी क्रियाका प्रवेश नहीं होता। अतः यह शरीरी शोक करनेयोग्य है ही नहीं। 'नित्यः'-- यह देही नित्यनिरन्तर रहनेवाला है। यह किसी कालमें नहीं था और किसी कालमें नहीं रहेगा ऐसी बात नहीं है किन्तु यह सब कालमें नित्यनिरन्तर ज्योंकात्यों रहनेवाला है। 'सर्वगतः'-- यह देही सब कालमें ज्योंकात्यों ही रहता है तो यह किसी देशमें रहता होगा इसके उत्तरमें कहते हैं कि यह देही सम्पूर्ण व्यक्ति वस्तु शरीर आदिमें एकरूपसे विराजमान है। 'अचलः'-- यह सर्वगत है तो यह कहीं आताजाता भी होगा इसपर कहते हैं कि यह देही स्थिर स्वभाववाला है अर्थात् इसमें कभी यहाँ और कभी वहाँ इस प्रकार आनेजानेकी क्रिया नहीं है। 'स्थाणुः'-- यह स्थिर स्वभाववाला है कहीं आताजाता नहीं यह बात ठीक है पर इसमें कम्पन तो होता होगा जैसे वृक्ष एक जगह ही रहता है कहीं भी आताजाता नहीं पर वह एक जगह रहता हुआ ही हिलता है ऐसे ही इस देहीमें भी हिलनेकी क्रिया होती होगी इसके उत्तरमें कहते हैं कि यह देही स्थाणु है अर्थात् इसमें हिलनेकी क्रिया नहीं है। 'सनातनः'-- यह देही अचल है स्थाणु है यह बात तो ठीक है पर यह कभी पैदा भी होता होगा इसपर कहते हैं कि यह सनातन है अनादि है सदासे है। यह किसी समय नहीं था ऐसा सम्भव ही नहीं है। 'विशेष बात' यह संसार अनित्य है एक क्षण भी स्थिर रहनेवाला नहीं है। परन्तु जो सदा रहनेवाला है जिसमें कभी किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता उस देहीकी तरफ लक्ष्य करानेमें 'नित्यः'पदका तात्पर्य है। देखने सुनने पढ़ने समझनेमें जो कुछ प्राकृत संसार आता है उसमें जो सब जगह परिपूर्ण तत्त्व है उसकी तरफ लक्ष्य करानेमें 'सर्वगतः' पदका तात्पर्य है। संसारमात्रमें जो कुछ वस्तु व्यक्ति पदार्थ आदि हैं वे सबकेसब चलायमान हैं। उन चलायमान वस्तु व्यक्ति पदार्थ आदिमें जो अपने स्वरूपसे कभी चलायमान (विचलित) नहीं होता उस तत्त्वकी तरफ लक्ष्य करानेमें 'अचलः' पदका तात्पर्य है। प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारमें प्रतिक्षण क्रिया होती रहती है परिवर्तन होता रहता है। ऐसे परिवर्तनशील संसारमें जो क्रियारहित परिवर्तनरहित स्थायी स्वभाववाला तत्त्व है उसकी तरफ लक्ष्य करानेमें 'स्थाणुः' पदका तात्पर्य है। मात्र प्राकृत पदार्थ उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं तथा ये पहले भी नहीं थे और पीछे भी नहीं रहेंगे। परन्तु जो न उत्पन्न होता है और न नष्ट ही होता है तथा जो पहले भी था और पीछे भी हरदम रहेगा उस तत्त्व(देही)की तरफ लक्ष्य करानेमें 'सनातनः' पदका तात्पर्य है। उपर्युक्त पाँचों विशेषणोंका तात्पर्य है कि शरीरसंसारके साथ तादात्म्य होनेपर भी और शरीरशरीरीभावका अलगअलग अनुभव न होनेपर भी शरीरी नित्यनिरन्तर एकरस एकरूप रहता है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

ऐसा होनेके कारण ( यह आत्मा न कटनेवाला न जलनेवाला न गलनेवाला और न सूखनेवाला है )। आपसमें एक दूसरेका नाश कर देनेवाले पञ्चभूत इस आत्माका नाश करनेके लिये समर्थ नहीं है। इसलिये यह नित्य है। नित्य होनेसे सर्वगत है। सर्वव्यापी होनेसे स्थाणु है अर्थात् स्थाणु ( ठूँठ ) की भाँति स्थिर है। स्थिर होनेसे यह आत्मा अचल है और इसीलिये सनातन है अर्थात् किसी कारणसे नया उत्पन्न नहीं हुआ है। पुराना है। इन श्लोकोंमें पुनरुक्तिके दोषका आरोप नहीं करना चाहिये क्योकि न जायते म्रियते वा इस एक श्लोकके द्वारा ही आत्माकी नित्यता और निर्विकारता तो कही गयी फिर आत्माके विषयमें जो भी कुछ कहा जाय वह इस श्लोकके अर्थसे अतिरिक्त नहीं है। कोई शब्दसे पुनरुक्त है और कोई अर्थसे ( पुनरुक्त है )। परंतु आत्मतत्त्व बड़ा दुर्बोध है सहज ही समझमें आनेवाला नहीं है इसलिये बारंबार प्रसंग उपस्थित करके दूसरेदूसरे शब्दोंसे भगवान् वासुदेव उसी तत्त्वका निरूपण करते हैं यह सोचकर कि किसी भी तरह वह अव्यक्त तत्त्व इन संसारी पुरुषोंके बुद्धिगोचर होकर संसारकी निवृत्तिका कारण हो।

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Sri Anandgiri

पृथिव्यादिभूतप्रयुक्तच्छेदनाद्यर्थक्रियाभावे योग्यताभावं कारणमाह यत इति। पूर्वार्धमुत्तरार्धे हेतुत्वेन योजयति यस्मादिति। नित्यत्वादीनामन्योन्यं हेतुहेतुमद्भावं सूचयति नित्यत्वादित्यादिना। नच नित्यत्वं परमाणुषु व्यभिचारादसाधकं सर्वगतत्वस्येति वाच्यम्। तेषामेवाप्रामाणिकत्वेन व्यभिचारानवतारात्। न च सर्वगतत्वेऽपि विक्रियाशक्तिमत्त्वमात्मनोऽस्तीति युक्तं विभुत्वेनाभिमते नभसि तदनुपलम्भात्। न च विक्रियाशक्तिमत्त्वे स्थैर्यमास्थातुं शक्यं तथाविधस्य मृदादेरस्थिरत्वदर्शनादित्याशयेनाह स्थिरत्वादिति। स्वतो नित्यत्वेऽपि कारणान्नाशसंभवादुत्पत्तिरपि संभावितेति कुतश्चिरंतनत्वमित्याशङ्क्याह न कारणादिति। आत्मनोऽविक्रियत्वस्य न जायते म्रियते वेत्यादिना साधितत्वात्तस्यैव पुनःपुनरभिधाने पुनरुक्तिरित्याशङ्क्याह नैतेषामिति। अनाशङ्कनीयस्य चोद्यस्य प्रसङ्गं दर्शयति यत इति। अतो वेदाविनाशिनमित्यादौ शङ्क्यते पौनरुक्त्यमिति विशेषः। कथं तत्र पौनरुक्त्याशङ्का समुन्मिषति तत्राह तत्रेति। वेदाविनाशिनमित्यादिश्लोकः सप्तम्या परामृश्यते श्लोकशब्देन न जायते म्रियते वेत्यादिरुच्यते। नन्विह श्लोके जन्ममरणाद्यभावोऽभिलक्ष्यते वेदेत्यादौ पुनरपक्षयाद्यभावो विवक्ष्यते तत्र कथमर्थातिरेकाभावमादाय पौनरुक्त्यं चोद्यते तत्राह किञ्चिदिति। कथं तर्हि पौनरुक्त्यं न चोदनीयमिति मन्यसे तत्राह दुर्बोधत्वादिति। पुनःपुनर्विधानभेदेन वस्तु निरूपयतो भगवतोऽभिप्रायमाह कथं न्विति।

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Sri Dhanpati

फलितमाह अच्छेद्य इति। एवकारस्य सर्वत्र संबन्धः। यस्मादन्योन्यनाशहेतूनि भूतान्यात्मानं नाशयितुं नोत्सहन्ते तस्मान्नित्यः परमाणुनित्यत्वे प्रमाणाभावान्न तन्नातिप्रसङ्गः। अतएव सर्वगतः तत एव सर्वगताकाशवत्स्थाणुरिव स्थिर इत्यर्थः। तत एवाचलः अतएवायमात्मा सनातनश्चिरंतनः न कुतश्चित्कारणान्निष्पन्न इतीदं भाष्यमुपलक्षणं यथेष्टहेतुहेतुमद्भावस्यापि। तथाचोत्पाद्याप्यविकार्यसंस्कार्यरुपाणां क्रियाफलामा क्रमेण नित्य इत्यादिविशेषचतुष्टयेन निराकरणं हेतुहेतुमद्भावविपर्ययश्च न कुतश्चित्कारणान्निष्पन्न इति भाष्यात् तस्योपलक्षणार्थत्वाच्च सिध्यत इति न कोऽपि विरोधः। यत्तु तथाच श्रुतयः आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यःवृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकःनिष्कलं निष्क्रियं शान्तम् इत्याद्याः।यः पृथिव्यां तिष्ठन्पृथिव्या अन्तरो योऽप्सु तिष्ठन्नद्य्भोन्तरो यस्तेजसि तिष्ठंस्तेजसोन्तरो यो वायौ तिष्ठन्वायोरन्तरः इत्याद्याश्च श्रुतयः सर्वगतस्य सर्वान्तर्यामितया तदविषयत्वं दर्शयन्ति। यो हि शस्त्रादौ न तिष्ठति तं शस्त्रादयश्छिन्दन्ति अयंतु शस्त्रादीनां सत्तास्फूर्तिप्रदत्वेन तत्प्रेरकस्तदन्तर्यामी अतः कथमेनं शस्त्रादीनि स्वव्यापारविषयीकुर्युरित्यभिप्राय इति केचिद्वर्णयन्ति। तत्रेदं वक्तव्यम् त्वंपदशोधनप्रकरणे तत्पदवाच्यान्तर्यामिप्रतिपादकश्रुत्युदाहरणमयुक्तम्।गतासूनगतासून इत्युपक्रमःदेहिनोऽस्मिन्अन्तवन्त इमे देहावासांसि जीर्णानि इत्यादिर्मध्यनिर्देशःदेही नित्यम् इत्युपसंहारः इत्येवंरुपतात्पर्यलिङ्गैस्त्वंपदनिरुपणप्रतीतेः स्पष्टत्वात्। आद्यषट्कुं त्वंपदशोधनपरमिति सर्वैः स्वेन च तथैव स्थापितत्वाच्च। अभेदस्तु नियम्यनियामकभावाभावविनिर्मुक्तयोः शुद्धचैतन्ययोर्वास्तवः। औपाधिकस्तु भेद एव। तथाच भाष्यंअविद्याप्रत्युपस्थाषितकार्यकरणोपाधिनिमित्तोऽयं शारीरान्तर्यामिणोर्भेदव्यपदेशो न पारमार्थिकः इति। एवंच येन शुद्धेन शुद्धस्यास्याभेदः स्य नियामकत्वाभावात् नान्तर्यामिश्रुत्युदाहरणं प्रकृत उपयुक्तम्। तथाचौपापाधिकभेदप्रतिपादकनि भगवतो वादरायणस्य सूत्राणिअन्तर्याभ्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात्नच स्मार्तमतद्धर्माभिलापात्शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते इतिय इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतान्यन्तरो यमयति इत्युपक्रम्य श्रुयतेयः पृथिव्यां तिष्टन्पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयति इत्यादि। अत्राधिदैवतमधिलोकमधिवेदमधियज्ञमधिभूतमध्यात्मं च कश्चिदन्तरवस्थितो यमयितान्तर्यामीति श्रुयते सोऽधिदैवाद्यभिमानी कश्चिद्देवतात्मा स्यात् प्राप्ताणिमार्यैश्वर्यः कश्चिद्योगी वा स्यात् अर्थान्तरं किंचिद्वा स्यादितिप्राप्ते राद्धान्तः। योऽन्तर्याभ्यधिदैवादिषु श्रुयते स परमात्मैव स्यान्नान्यः। कुतः। तद्धर्मव्यपदेशात्तस्य परमात्मनो धर्माणमस्यां श्रुतौ व्यपदेशात्। नच स्मार्तं प्रधानमन्तर्यामिशब्दप्रतिपाद्यं भवितुमर्हति। कस्मात् अतद्धर्माभिलापाद्रष्टत्वादीनामप्रधानधर्माणां कथनात्। ननु शारीरोऽस्त्वत्वत आह शारीर इति। पूर्वसूत्रान्नेत्यनुर्वर्तते। शारीरश्च नान्तर्यामी स्यात्। हि यस्मादुभयेऽपि काण्वा माध्यन्दिनाश्चान्तर्यामिणो भेदेनैनं शारीरं पृथिव्यादिवदधिष्ठाननत्वेन नियम्यत्वेन चाधीयते यो विज्ञाने तिष्ठन्नति काण्वाः आत्मनि तिष्ठन्निति माध्यन्दिनाः तस्माच्छारीरादन्य आत्मान्तर्यामीति सिद्धम्। यत्तुयो हि शस्त्रादौ तिष्ठति न तं शस्त्रादयश्िछन्दन्ति इति तदपि न शस्त्रादौ स्थितस्यापि लोहादेस्तैश्छेदस्योपलब्धेः। तस्मात्सर्वज्ञैर्भाष्यकारैरुक्तो निरवयवत्वहेतुरेव समीचीन इति दिक्। न जायत इति श्लोकेनोक्तस्याप्यात्मज्ञानस्य दृष्टफलस्य व्रीह्यवहननस्यावृत्तिवद्दृष्टफलत्वाद्दुर्बोधत्वाच्च पुनः पुनः प्रसङ्गमापाद्य शब्दान्तरेण तदेव वस्तु निरुप्यते भगवता करुणानिधीना श्रीकृष्णेन कथंचिदपि संसारनिमग्नानां मुमुक्षूणां बुद्धिगोचरतामापन्नं स्पष्टतत्त्वं सत् संसारनिवृत्तये स्यादित्यभिप्रायवता इति न पौनरुक्त्यम्। तथाच भगवतो व्यासस्य सूत्रंआवृत्तिरसकृदुपदेशात् इति। अस्यार्थःआत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यःतमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्णःसोऽन्वेष्टव्यः स विजज्ञासितव्यः इत्यादि श्रुयते तत्र संशयः किं सकृत्प्रत्ययः कर्तव्य आहोस्विदावृत्त्येति। किं तावत्प्राप्तं सकृत्प्रत्ययः स्यात्प्रयाजादिवत् तावता शास्त्रस्य कृतार्थत्वात् अश्रूयमाणायामप्यावृत्तौ क्रियमाणायामशास्त्राथः कृतो भवेत्। नन्वसकृदुपदेशा उदाहृताः श्रोतव्य इत्यादयः। एवमपि यावच्छब्दमावर्तयेत् सकृच्छ्रवणमित्यादिनातिरिक्तमित्येवं प्राप्ते ब्रूमः। प्रत्ययावृत्तिः कर्तव्या। कुतः असकृदुपदेशात्। श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य इत्येवंजातीयको ह्यसकृदुपदेशः प्रत्ययावृत्तिं सूचयति। ननूक्तं यावच्छब्दमेवावर्तयेन्नाधिकमिति न। दर्शनपर्यवसानत्वादेतेषाम्। दर्शनपर्यवसानानि हि श्रवणादीन्यावर्त्यमानानि दृष्टार्थानिं भवन्ति यथावघातादीनि तन्दुलनिष्पत्तिपर्यवसानानि तद्वदिति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
achchhedyaḥunbreakable
ayamthis soul
adāhyaḥincombustible
ayamthis soul
akledyaḥcannot be dampened
aśhoṣhyaḥcannot be dried
evaindeed
chaand
nityaḥeverlasting
sarvagataḥ
sthāṇuḥunalterable
achalaḥimmutable
ayamthis soul
sanātanaḥprimordial
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Bhagavad Gita · 2.23
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः

शस्त्र इस शरीरीको काट नहीं सकते, अग्नि इसको जला नहीं सकती, जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.25
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते। तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि

यह देही प्रत्यक्ष नहीं दीखता, यह चिन्तनका विषय नहीं है और यह निर्विकार कहा जाता है। अतः इस देहीको ऐसा जानकर शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 24
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 24
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः

यह शरीरी काटा नहीं जा सकता, यह जलाया नहीं जा सकता, यह गीला नहीं किया जा सकता और यह सुखाया भी नहीं जा सकता। कारण कि यह नित्य रहनेवाला सबमें परिपूर्ण, अचल, स्थिर स्वभाववाला और अनादि है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 24 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 24 का हिंदी अर्थ: "यह शरीरी काटा नहीं जा सकता, यह जलाया नहीं जा सकता, यह गीला नहीं किया जा सकता और यह सुखाया भी नहीं जा सकता। कारण कि यह नित्य रहनेवाला सबमें परिपूर्ण, अचल, स्थिर स्वभाववाला और अनादि है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 24?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 24 translates to: "This Self cannot be cut, burned, wetted, nor dried up; it is eternal, all-pervasive, stable, immovable, and ancient. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 24 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। यह शरीरी काटा नहीं जा सकता, यह जलाया नहीं जा सकता, यह गीला नहीं किया जा सकता और यह सुखाया भी नहीं जा सकता। कारण कि यह नित्य रहनेवाला सबमें परिपूर्ण, अचल, स्थिर स्वभाववाला और अनादि है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "achchhedyo ’yam adāhyo ’yam akledyo ’śhoṣhya eva cha" mean in English?

"achchhedyo ’yam adāhyo ’yam akledyo ’śhoṣhya eva cha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 24. This Self cannot be cut, burned, wetted, nor dried up; it is eternal, all-pervasive, stable, immovable, and ancient. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.