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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 23
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः

शस्त्र इस शरीरीको काट नहीं सकते, अग्नि इसको जला नहीं सकती, जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TeluguIND

ఆయుధాలు దానిని కత్తిరించలేవు, అగ్ని దానిని కాల్చలేవు, నీరు దానిని తడి చేయదు, గాలి దానిని ఆరబెట్టదు.

MarathiIND

शस्त्रे तो कापू शकत नाही, अग्नी जाळू शकत नाही, पाणी भिजवू शकत नाही, वारा सुकवू शकत नाही.

GujaratiIND

શસ્ત્રો તેને કાપી શકતું નથી, અગ્નિ તેને બાળી શકતું નથી, પાણી તેને ભીનું કરી શકતું નથી, પવન તેને સૂકવી શકતો નથી.

PunjabiIND

ਹਥਿਆਰ ਇਸਨੂੰ ਕੱਟ ਨਹੀਂ ਸਕਦੇ, ਅੱਗ ਇਸਨੂੰ ਸਾੜ ਨਹੀਂ ਸਕਦੀ, ਪਾਣੀ ਇਸਨੂੰ ਗਿੱਲਾ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦਾ, ਹਵਾ ਇਸਨੂੰ ਸੁੱਕ ਨਹੀਂ ਸਕਦੀ।

KannadaIND

ಆಯುಧಗಳು ಅದನ್ನು ಕತ್ತರಿಸುವುದಿಲ್ಲ, ಬೆಂಕಿ ಅದನ್ನು ಸುಡುವುದಿಲ್ಲ, ನೀರು ಅದನ್ನು ತೇವಗೊಳಿಸುವುದಿಲ್ಲ, ಗಾಳಿ ಅದನ್ನು ಒಣಗಿಸುವುದಿಲ್ಲ.

TamilIND

ஆயுதங்களால் அதை வெட்ட முடியாது, நெருப்பால் எரிக்க முடியாது, தண்ணீரால் நனைக்க முடியாது, காற்று காய வைக்க முடியாது.

MalayalamIND

ആയുധങ്ങൾക്ക് അതിനെ മുറിക്കാൻ കഴിയില്ല, തീ കത്തിക്കാൻ കഴിയില്ല, വെള്ളത്തിന് നനയ്ക്കാൻ കഴിയില്ല, കാറ്റിന് അതിനെ ഉണക്കാൻ കഴിയില്ല.

BengaliIND

অস্ত্র তা কাটতে পারে না, আগুন পোড়াতে পারে না, জল ভিজতে পারে না, বাতাস শুকাতে পারে না।

MizoIND

Hriamhrei hian a tikeh thei lo va, meiin a kang thei lo va, tuiin a hnim thei lo va, thliin a vawt thei lo.

AssameseIND

অস্ত্ৰই কাটিব নোৱাৰে, জুইয়ে জ্বলাব নোৱাৰে, পানীয়ে তিয়াই তিতিব নোৱাৰে, বতাহে শুকুৱাব নোৱাৰে।

ManipuriIND

ꯈꯨꯠꯂꯥꯌꯅꯥ ꯃꯗꯨ ꯀꯀꯊꯕꯥ ꯉꯃꯗꯦ, ꯃꯩꯅꯥ ꯃꯩꯅꯥ ꯆꯥꯀꯄꯥ ꯉꯃꯗꯦ, ꯏꯁꯤꯡꯅꯥ ꯇꯔꯨ-ꯇꯅꯥꯅꯕꯥ ꯉꯃꯗꯦ, ꯅꯨꯡꯁꯤꯠꯅꯥ ꯁꯨꯡꯕꯥ ꯉꯃꯗꯦ꯫

DogriIND

हथियार नेईं कट सकदे, अग्ग नेईं जला सकदा, पानी गीली नेईं करी सकदा, हवा नेईं सुक्की सकदा।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या --'नैनं छिन्दन्ति शास्त्राणि'-- इस शरीरीको शस्त्र नहीं काट सकते; क्योंकि ये प्राकृत शस्त्र वहाँतक पहुँच ही नहीं सकते। जितने भी शस्त्र हैं, वे सभी पृथ्वी-तत्त्वसे उत्पन्न होते हैं। यह पृथ्वी-तत्त्व इस शरीरीमें किसी तरहका कोई विकार नहीं पैदा कर सकता। इतना ही नहीं, पृथ्वी-तत्त्व इस शरीरीतक पहुँच ही नहीं सकता, फिर विकृति करनेकी बात तो दूर ही रही! 'नैनं दहति पावकः'-- अग्नि इस शरीरीको जला नहीं सकती; क्योंकि अग्नि वहाँतक पहुँच ही नहीं सकती। जब वहाँतक पहुँच ही नहीं सकती, तब उसके द्वारा जलाना कैसे सम्भव हो सकता है? तात्पर्य है कि अग्नि-तत्त्व इस शरीरीमें कभी किसी तरहका विकार उत्पन्न कर ही नहीं सकता। 'न चैनं क्लेदयन्त्यापः'-- जल इसको गीला नहीं कर सकता; क्योंकि जल वहाँतक पहुँच ही नहीं सकता। तात्पर्य है कि जल-तत्त्व इस शरीरीमें किसी प्रकारका विकार पैदा नहीं कर सकता। 'न शोषयति मारुतः'-- वायु इसको सुखा नहीं सकती अर्थात वायुमें इस शरीरीको सुखानेकी सामर्थ्य नहीं है; क्योंकि वायु वहाँतक पहुँचती ही नहीं। तात्पर्य है कि वायु-तत्त्व इस शरीरीमें किसी तरहकी विकृति पैदा नहीं कर सकता। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश--ये पाँच महाभूत कहलाते हैं। भगवान्ने इनमेंसे चार ही महाभूतोंकी बात कही है कि ये पृथ्वी, जल, तेज और वायु इस शरीरीमें किसी तरहकी विकृति नहीं कर सकते; परन्तु पाँचवें महाभूत आकाशकी कोई चर्चा ही नहीं की है। इसका कारण यह है कि आकाशमें कोई भी क्रिया करनेकी शक्ति नहीं है। क्रिया (विकृति) करनेकी शक्ति तो इन चार महाभूतोंमें ही है। आकाश तो इन सबको अवकाशमात्र देता है। पृथ्वी, जल, तेज और वायु--ये चारों तत्त्व आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं, पर वे अपने कारणभूत आकाशमें भी किसी तरहका विकार पैदा नहीं कर सकते अर्थात् पृथ्वी आकाशका छेदन नहीं कर सकती, जल गीला नहीं कर सकता, अग्नि जला नहीं सकती और वायु सुखा नहीं सकती। जब ये चारों तत्त्व अपने कारणभूत आकाशको, आकाशके कारणभूत महत्तत्त्वको और महत्तत्त्वके कारणभूत प्रकृतिको भी कोई क्षति नहीं पहुँचा सकते, तब प्रकृतिसे सर्वथा अतीत शरीरीतक ये पहुँच ही कैसे सकते हैं? इन गुणयुक्त पदार्थोंकी उस निर्गुण-तत्त्वमें पहुँच ही कैसे हो सकती है? नहीं हो सकती (गीता 13। 31)। शरीरी नित्य-तत्त्व है। पृथ्वी आदि चारों तत्त्वोंको इसीसे सत्ता-स्फूर्ति मिलती है। अतः जिससे इन तत्त्वोंको सत्ता-स्फूर्ति मिलती है, उसको ये कैसे विकृत कर सकते है यह शरीरी सर्वव्यापक है और पृथ्वी आदि चारों तत्त्व व्याप्य हैं अर्थात् शरीरीके अन्तर्गत हैं। अतः व्याप्य वस्तु व्यापकको कैसे नुकसान पहुँचा सकती है उसको नुकसान पहुँचाना सम्भव ही नहीं है। यहाँ युद्धका प्रसङ्ग है। 'ये सब सम्बन्धी मर जायँगे'--इस बातको लेकर अर्जुन शोक कर रहे हैं। अतः भगवान् कहते हैं कि ये कैसे मर जायँगे? क्योंकि वहाँतक अस्त्र-शस्त्रोंकी क्रिया पहुँचती ही नहीं अर्थात् शस्त्रके द्वारा शरीर कट जानेपर भी शरीरी नहीं कटता, अग्न्यस्त्रके द्वारा शरीर जल जानेपर शरीरी नहीं जलता, वरुणास्त्रके द्वारा शरीर गल जानेपर भी शरीरी नहीं गलता और वायव्यास्त्रके द्वारा शरीर सूख जानेपर भी शरीरी नहीं सूखता। तात्पर्य है कि अस्त्र-शस्त्रोंके द्वारा शरीर मर जानेपर भी शरीरी नहीं मरता, प्रत्युत ज्यों-का-त्यों निर्विकार रहता है। अतः इसको लेकर शोक करना तेरी बिलकुल ही बेसमझी है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

आत्मा सदा निर्विकार किस कारणसे है सो कहते हैं इस उपर्युक्त आत्माको शस्त्र नहीं काटते अभिप्राय यह कि अवयवरहित होनेके कारण तलवार आदि शस्त्र इसके अङ्गोंके टुकड़े नहीं कर सकते। वैसे ही अग्नि इसको जला नहीं सकता अर्थात् अग्नि भी इसको भस्मीभूत नहीं कर सकता। जल इसको भिगो नहीं सकता क्योंकि सावयव वस्तुको ही भिगोकर उसके अङ्गोंको पृथक्पृथक् कर देनेमें जलकी सामर्थ्य है। निरवयव आत्मामें ऐसा होना सम्भव नहीं। उसी तरह वायु आर्द्र द्रव्यका गीलापन शोषण करके उसको नष्ट करता है अतः वह वायु भी इस स्वस्वरूप आत्माका शोषण नहीं कर सकता।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

पृथिव्यादिभूतचतुष्टयप्रयुक्तविक्रियाभाक्त्वादात्मनोऽसिद्धमविक्रियत्वमिति शङ्कते कस्मादिति। यतो न भूतान्यात्मानं गोचरयितुमर्हन्त्यतो युक्तमाकाशवत्तस्याविक्रियत्वमित्याह आहेत्यादिना।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

तस्याविक्रियत्वं प्रकारान्तरेण पुनराह नैनमित्यादिना। नच क्लेदयन्ति विश्लिष्टावयवं न कुर्वन्ति। निरवयवत्वं हेतुः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
nanot
enamthis soul
chhindantishred
śhastrāṇiweapons
nanor
enamthis soul
dahatiburns
pāvakaḥfire
nanot
chaand
enamthis soul
kledayantimoisten
āpaḥwater
nanor
śhoṣhayatidry
mārutaḥwind
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.22
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही

मनुष्य जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता है, ऐसे ही देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंमें चला जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.24
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः

यह शरीरी काटा नहीं जा सकता, यह जलाया नहीं जा सकता, यह गीला नहीं किया जा सकता और यह सुखाया भी नहीं जा सकता। कारण कि यह नित्य रहनेवाला सबमें परिपूर्ण, अचल, स्थिर स्वभाववाला और अनादि है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 23
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 23
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः

शस्त्र इस शरीरीको काट नहीं सकते, अग्नि इसको जला नहीं सकती, जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 23 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 23 का हिंदी अर्थ: "शस्त्र इस शरीरीको काट नहीं सकते, अग्नि इसको जला नहीं सकती, जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 23?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 23 translates to: "Weapons cannot cut it, fire cannot burn it, water cannot wet it, wind cannot dry it. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 23 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। शस्त्र इस शरीरीको काट नहीं सकते, अग्नि इसको जला नहीं सकती, जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "nainaṁ chhindanti śhastrāṇi nainaṁ dahati pāvakaḥ" mean in English?

"nainaṁ chhindanti śhastrāṇi nainaṁ dahati pāvakaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 23. Weapons cannot cut it, fire cannot burn it, water cannot wet it, wind cannot dry it. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.