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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 22
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही

मनुष्य जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता है, ऐसे ही देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंमें चला जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

మనిషి చిరిగిన బట్టలను విసర్జించి కొత్తవాటిని ధరించినట్లుగా, మూర్తీభవించిన నేనే అరిగిపోయిన శరీరాలను విడిచిపెట్టి, కొత్తవిగా ఉన్న ఇతరులలోకి ప్రవేశిస్తాడు.

MarathiIND

ज्याप्रमाणे मनुष्य जीर्ण झालेले कपडे घालतो आणि नवीन घालतो, त्याचप्रमाणे मूर्तस्वरूप देखील जीर्ण झालेल्या शरीरांना टाकून देतो आणि नवीन असलेल्या इतरांमध्ये प्रवेश करतो.

GujaratiIND

જેમ માણસ ઘસાઈ ગયેલા કપડાં ઉતારે છે અને નવા પહેરે છે, તેવી જ રીતે મૂર્તિમંત સ્વ પણ ઘસાઈ ગયેલા શરીરને કાઢી નાખે છે અને નવા હોય તેવા અન્ય લોકોમાં પ્રવેશ કરે છે.

KannadaIND

ಮನುಷ್ಯನು ಹಳಸಿದ ಬಟ್ಟೆಗಳನ್ನು ಎಸೆದು ಹೊಸದನ್ನು ಧರಿಸುವಂತೆಯೇ, ಸಾಕಾರಗೊಂಡ ಆತ್ಮವು ಸಹ ಸವೆದ ದೇಹಗಳನ್ನು ತ್ಯಜಿಸಿ ಹೊಸ ಇತರರನ್ನು ಪ್ರವೇಶಿಸುತ್ತದೆ.

MalayalamIND

ഒരു മനുഷ്യൻ ജീർണിച്ച വസ്ത്രങ്ങൾ ഉപേക്ഷിച്ച് പുതിയവ ധരിക്കുന്നതുപോലെ, മൂർത്തീഭാവമുള്ള ഞാൻ ജീർണിച്ച ശരീരങ്ങൾ ഉപേക്ഷിച്ച് പുതിയവയിലേക്ക് പ്രവേശിക്കുന്നു.

TamilIND

ஒரு மனிதன் தேய்ந்து போன ஆடைகளை எறிந்துவிட்டு புதிய ஆடைகளை அணிவது போல, உருவான சுயமும் தேய்ந்த உடல்களை எறிந்துவிட்டு புதியதாக இருக்கும் மற்றவர்களுக்குள் நுழைகிறது.

BengaliIND

একজন মানুষ যেমন জীর্ণ বস্ত্র ত্যাগ করে এবং নতুন পরিধান করে, তেমনি মূর্ত আত্মাও জীর্ণ শরীর ত্যাগ করে এবং নতুনদের মধ্যে প্রবেশ করে।

PunjabiIND

ਜਿਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮਨੁੱਖ ਫਟੇ ਹੋਏ ਕੱਪੜਿਆਂ ਨੂੰ ਲਾਹ ਕੇ ਨਵੇਂ ਪਹਿਨਦਾ ਹੈ, ਉਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਹੀ ਸਰੂਪ ਵਾਲਾ ਆਤਮ ਵੀ ਖਰਾਬ ਹੋਏ ਸਰੀਰਾਂ ਨੂੰ ਉਤਾਰ ਦਿੰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਨਵੇਂ ਸਰੀਰਾਂ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਵੇਸ਼ ਕਰਦਾ ਹੈ।

OdiaIND

ଯେପରି ଜଣେ ବ୍ୟକ୍ତି ଚିର ହୋଇଯାଇଥିବା ପୋଷାକ ଛାଡି ନୂଆ ପୋଷାକ ପିନ୍ଧନ୍ତି, ସେହିପରି ସନ୍ନିବେଶିତ ସେଲ୍ଫ ମଧ୍ୟ ପୁରୁଣା ଶରୀରକୁ ଛାଡି ନୂଆରେ ପ୍ରବେଶ କରୁଥିବା ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ପ୍ରବେଶ କରେ |

NepaliIND

जसरी मानिसले जीर्ण लुगा फुकालेर नयाँ लुगा लगाउँछ, त्यसैगरी स्वयंले पनि जीर्ण शरीरलाई फ्याँकिदिन्छ र अरूलाई नयाँमा प्रवेश गर्छ।

SindhiIND

جهڙيءَ طرح انسان پراڻا ڪپڙا لاهي نوان نوان ڪپڙا پائي ٿو، تيئن خود به مجسم ٿيل جسم ڦاٽل جسمن کي ڪڍي ٿو ۽ ٻين ۾ داخل ٿئي ٿو جيڪي نوان آهن.

MizoIND

Mihringin thawmhnaw chhe tawhte a paih chhuak a, a thar a ha ang bawkin, taksa nei Mahni pawhin taksa chhe tawhte chu paih chhuakin, mi dang tharah a lut a ni.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.22।। व्याख्या-- 'वासांसि जीर्णानि ৷৷. संयाति नवानि देही'-- इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें सूत्ररूपसे कहा गया था कि देहान्तरकी प्राप्तिके विषयमें धीर पुरुष शोक नहीं करते। अब उसी बातको उदाहरण देकर स्पष्टरूपसे कह रहे हैं कि जैसे पुराने कपड़ोंके परिवर्तनपर मनुष्यको शोक नहीं होता, ऐसे ही शरीरोंके परिवर्तनपर भी शोक नहीं होना चाहिये। कपड़े मनुष्य ही बदलते हैं, पशु-पक्षी नहीं; अतः यहाँ कपड़े बदलनेके उदाहरणमें 'नरः' पद दिया है। यह 'नरः' पद मनुष्ययोनिका वाचक है और इसमें स्त्री-पुरुष, बालक-बालिकाएँ, जवान-बूढ़े आदि सभी आ जाते हैं। जैसे मनुष्य पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़ोंको धारण करता है, ऐसे ही यह देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंको धारण करता है। पुराना शरीर छोड़नेको 'मरना' कह देते हैं, और नया शरीर धारण करनेको 'जन्मना' कह देते हैं। जबतक प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रहता है, तबतक यह देही पुराने शरीरोंको छोड़कर कर्मोंके अनुसार या अन्तकालीन चिन्तनके अनुसार नये-नये शरीरोंको प्राप्त होता रहता है। यहाँ 'शरीराणि' पदमें बहुवचन देनेका तात्पर्य है कि जबतक शरीरीको अपने वास्तविक स्वरूपका यथार्थ बोध नहीं होता, तबतक यह शरीरी अनन्तकालतक शरीर धारण करता ही रहता है। आजतक इसने कितने शरीर धारण किये हैं, इसकी गिनती भी सम्भव नहीं है। इस बातको लक्ष्यमें रखकर 'शरीराणि' पदमें बहुवचनका प्रयोग किया गया है तथा सम्पूर्ण जीवोंका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ 'देही' पद आया है। यहाँ श्लोकके पूर्वार्धमें तो जीर्ण कपड़ोंकी बात कही है और उत्तरार्धमें जीर्ण शरीरोंकी। जीर्ण कपड़ोंका दृष्टान्त शरीरोंमें कैसे लागू होगा? कारण कि शरीर तो बच्चों और जवानोंके भी मर जाते हैं। केवल बूढ़ोंके जीर्ण शरीर मर जाते हों, यह बात तो है नहीं! इसका उत्तर यह है कि शरीर तो आयु समाप्त होनेपर ही मरता है और आयु समाप्त होना ही शरीरका जीर्ण होना है । शरीर चाहे बच्चोंका हो, चाहे जवानोंका हो, चाहे वृद्धोंका हो, आयु समाप्त होनेपर वे सभी जीर्ण ही कहलायेंगे। इस श्लोकमें भगवान्ने 'यथा' और 'तथा' पद देकर कहा है कि जैसे मनुष्य पुराने कपड़ोंको छोड़कर नये कपड़े धारण कर लेता है, वैसे ही यह देही पुराने शरीरोंको छोड़कर नये शरीरोंमें चला जाता है। यहाँ एक शंका होती है। जैसे कुमार, युवा और वृद्ध अवस्थाएँ अपने-आप होती हैं, वैसे ही देहान्तरकी प्राप्ति अपने-आप होती है (2। 13) यहाँ तो 'यथा' (जैसे) और 'तथा' (वैसे) घट जाते हैं। परन्तु (इस श्लोकमें) पुराने कपड़ोंको छोड़नेमें और नये कपड़े धारण करनेमें तो मनुष्यकी स्वतन्त्रता है, पर पुराने शरीरोंको छोड़नेमें और नये शरीर धारण करनेमें देहीकी स्वतन्त्रता नहीं है। इसलिये यहाँ 'यथा' और 'तथा' कैसे घटेंगे? इसका समाधान है कि यहाँ भगवान्का तात्पर्य स्वतन्त्रता-परतन्त्रताकी बात कहनेमें नहीं हैं, प्रत्युत शरीरके वियोगसे होनेवाले शोकको मिटानेमें है। जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर नये कपडे धारण करनेपर भी धारण करनेवाला (मनुष्य) वही रहता है, वैसे ही पुराने शरीरोंको छोड़कर नये शरीरोंमें चले जानेपर भी देही ज्यों-का-त्यों निर्लिप्तरूपसे रहता है; अतः शोक करनेकी कोई बात है ही नहीं। इस दृष्टिसे यह दृष्टान्त ठीक ही है। दूसरी शंका यह होती है कि पुराने कपड़े छोड़नेमें और नये कपड़े धारण करनेमें तो सुख होता है, पर पुराने शरीर छोड़नेमें और नये शरीर धारण करनेमें दुःख होता है। अतः यहाँ 'यथा' और 'तथा' कैसे घटेंगे? इसका समाधान .यह है कि शरीरोंके मरनेका जो दुःख होता है, वह मरनेसे नहीं होता, प्रत्युत जीनेकी इच्छासे होता है। 'मैं जीता रहूँ'--ऐसी जीनेकी इच्छा भीतरमें रहती है और मरना पड़ता है तब दुःख होता है। तात्पर्य यह हुआ कि जब मनुष्य शरीरके साथ एकात्मता कर लेता है, तब वह शरीरके मरनेसे अपना मरना मान लेता है और दुःखी होता है। परन्तु जो शरीरके साथ अपनी एकात्मता नहीं मानता, उसको मरनेमें दुःख नहीं होता, प्रत्युत आनन्द होता है! जैसे, मनुष्य कपड़ोंके साथ अपनी एकात्मता नहीं मानता, तो कपड़ोंको बदलनेमें उसको दुःख नहीं होता। कारण कि वहाँ उसका यह विवेक स्पष्टतया जाग्रत् रहता है कि कपड़े अलग है और मैं अलग हूँ। परन्तु वही कपड़ोंका बदलना अगर छोटे बच्चेका किया जाय, तो वह पुराने कपड़े उतारनेमें और नये कपड़े धारण करनेमें भी रोता है। उसका यह दुःख केवल मूर्खतासे, नासमझीसे होता है। इस मूर्खताको मिटानेके लिये ही भगवान्ने यहाँ 'यथा' और 'तथा' पद देकर कपड़ोंका दृष्टान्त दिया है। यहाँ भगवान्ने कपड़ोंके धारण करनेमें तो 'गृह्णाति' (धारण करता है) क्रिया दी, पर शरीरोंके धारण करनेमें संयाति (जाता है) क्रिया दी, ऐसा क्रियाभेद भगवान्ने क्यों किया? लौकिक दृष्टिसे बेसमझीके कारण ऐसा दीखता है कि मनुष्य अपनी जगह रहता हुआ ही कपड़ोंको धारण करता है और देहान्तरकी प्राप्तिमें देहीको उन-उन देहोंमें जाना पड़ता है। इस लौकिक दृष्टिको लेकर ही भगवान्ने क्रियाभेद किया है। 'विशेष बात' गीतामें 'येन सर्वमिदं ततम्' (2। 17), 'नित्यः सर्वगतः स्थाणुः' (2। 24) आदि पदोंसे देहीको सर्वत्र व्याप्त, नित्य, सर्वगत और स्थिर स्वभाववाला बताया तथा 'संयाति नवानि देही' (2। 22) 'शरीरं यदवाप्नोति' (15। 8) आदि पदोंसे देहीको दूसरे शरीरोंमें जानेकी बात कही गयी है। अतः जो सर्वगत है, सर्वत्र व्याप्त है, उसका जाना-आना कैसे? क्योंकि जो जिस देशमें न हो, उस देशमें चला जाय, तो इसको 'जाना' कहते हैं; और जो दूसरे देशमें है, वह इस देशमें आ जाय, तो इसको 'आना' कहते हैं। परन्तु देहीके विषयमें तो ये दोनों ही बातें नहीं घटतीं! इसका समाधान यह है कि जैसे किसीकी बाल्यावस्थासे युवावस्था हो जाती है तो वह कहता है कि 'मैं जवान हो गया हूँ'। परन्तु वास्तवमें वह स्वयं जवान नहीं हुआ है, प्रत्युत उसका शरीर जवान हुआ है। इसलिये बाल्यावस्थामें जो वह था, युवावस्थामें भी वह था ,युवावस्थामें भी वह वही है। परन्तु शरीरसे तादात्म्य माननेके कारण वह शरीरके परिवर्तनको अपनेमें आरोपित कर लेता है। ऐसे ही आना-जाना वास्तवमें शरीरका धर्म है, पर शरीरके साथ तादात्म्य होनेसे वह अपनेमें आना-जाना मान लेता है। अतः वास्तवमें देहीका कहीं भी आना-जाना नहीं होता केवल शरीरोंके तादात्म्यके कारण उसका आना-जाना प्रतीत होता है। अब यह प्रश्न होता है कि अनादिकालसे जो जन्म-मरण चला आ रहा है, उसमें कारण क्या है? कर्मोंकी दृष्टिसे तो शुभाशुभ कर्मोंका फल भोगनेके लिये जन्म-मरण होता है, ज्ञानकी दृष्टिसे अज्ञानके कारण जन्म-मरण होता है और भक्तिकी दृष्टिसे भगवान्की विमुखताके कारण जन्म-मरण होता है। इन तीनोंमें भी मुख्य कारण है कि भगवान्ने जीवको जो स्वतन्त्रता दी है, उसका दुरुपयोग करनेसे ही जन्म-मरण हो रहा है। अब वह जन्म-मरण मिटे कैसे? मिली हुई स्वतन्त्रताका सदुपयोग करनेसे जन्म-मरण मिट जायगा। तात्पर्य है कि अपने स्वार्थके लिये कर्म करनेसे जन्म-मरण हुआ है; अतः अपने स्वार्थका त्याग करके दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे जन्म-मरण मिट जायगा। अपनी जानकारीका अनादर करनेसे जन्म-मरण हुआ है; अतः अपनी जानकारीका आदर करनेसे जन्म-मरण मिट जायगा। भगवान्से विमुख होनेसे जन्म-मरण हुआ है; अतः भगवान्के सम्मुख होनेसे जन्म-मरण मिट जायगा। सम्बन्ध-- पहले दृष्टान्तरूपसे शरीरीकी निर्विकारताका वर्णन करके अब आगेके तीन श्लोकोंमें उसीका प्रकारान्तरसे वर्णन करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

अब हम प्रकृत विषय वर्णन करेंगे। यहाँ ( प्रकरणमें ) आत्माके अविनाशित्वकी प्रतिज्ञा की गयी है वह किसके सदृश है सो कहा जाता है जैसे जगत्में मनुष्य पुरानेजीर्ण वस्त्रोंको त्याग कर अन्य नवीन वस्त्रोंको ग्रहण करते हैं वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरको छोड़कर अन्यान्य नवीन शरीरोंको प्राप्त करता है। अभिप्राय यह कि ( पुराने वस्त्रोंको छोड़कर नये धारण करनेवाले ) पुरुषकी भाँति जीवात्मा सदा निर्विकार ही रहता है।

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Sri Anandgiri

आत्मनोऽविक्रियत्वेन कर्मासंभवं प्रतिपाद्याविक्रियत्वहेतुसमर्थनार्थमेवोत्तरग्रन्थमवतारयति प्रकृतं त्विति। किं तत्प्रकृतमिति शङ्कमानं प्रत्याह तत्रेति। अविनाशित्वमित्युपलक्षणमविक्रियत्वमित्यर्थः। तदेव दृष्टान्तेन स्पष्टयितुमुत्तरश्लोकमुत्थापयति तदित्यादिना। आत्मनः स्वतो विक्रियाभावेऽपि पुरातनदेहत्यागे नूतनदेहोपादाने च विक्रियावत्त्वध्रौव्यादविक्रियत्वमसिद्धमिति चेत्तत्राह वासांसीति। शरीराणि जीर्णानि वयोहानिं गतानि वलीपलितादिसंगतानीत्यर्थः। वाससां पुरातनानां परित्यागे नवानां चोपादाने त्यागोपादानकर्तृभूतलौकिकपुरुषस्याप्यविकारित्वेनैकरूपत्ववदात्मनो देहत्यागोपादानयोरविरुद्धमविक्रियत्वमिति वाक्यार्थमाह पुरुषवदिति।

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Sri Dhanpati

नन्वात्मनः पुरातनदेहत्यागे नवीनदेहोपादाने च सति विक्रियावत्त्वध्रौव्यादविक्रियत्वमसिद्धमित्याशङ्कां दृष्टान्तेन परिहरति वासांसीति। यथा लोके जीर्णानि दुर्बलतां गतानि वस्त्राणि नरः पुरुषः परित्यज्यापराण्यन्यानि नवान्युपादत्ते तद्वदेव देह्यात्मा जीर्णानि शरीराणि विहायान्यानि नवानि संगच्छति। जीर्णानीत्यादिविशेषणत्रयेण वस्त्राणां शरीराणां च जीर्णत्वादिमत्त्वेऽपि तदुपादानत्यागकर्त्रोः पुरुषदेहिनोस्तत्त्वाभावबोधकेन तयोरविक्रियत्वं कथितम्। तथाच पुरुषवदविक्रिय एवात्मेत्यर्थः। यत्तु केचित् नन्वेवमात्मनोऽविनाशित्वेऽपि देहानां विनाशित्वाद्युद्धस्य तन्नाशकत्वात्कथं भीष्मादिदेहानामनेकसुकृतसाधकानां मया युद्धेन विनाशः कार्य इत्याशङ्कायां उत्तरं वासांसीति। यथा निकृष्टानि वस्त्राणि विहाय नवान्युत्कृष्टानि जनो गृह्णाति तथा वयसा तपसा च कृशानि भीष्मादिशरीराणि विहायान्यानि देवादिशरीराणि सर्वोत्कृष्टानि संयाति देही प्रकृष्टधर्मानुष्ठाता देहवान्भीष्मादिरित्यर्थः। तथाचात्यन्तमुपकारके युद्धेऽपकारकत्वभ्रमं मा कार्षीरिति। तच्चिन्त्यम्। प्रकरणविरोधस्य विशेष्याध्याहारदोषस्य च स्पष्टत्वात् जीर्णानिति विशेषणात् नवीनादिसाधारणशरीरनाशनिमित्तस्य युद्धस्यात्यन्तोपकारकताया मूलादसिद्धेश्च उक्तरीत्या पराणीति पदस्य सार्थकत्वेन जीर्णानि विहाय नवानि गृह्णाति विक्रियाशून्य एव नरो यथेत्येतावतैव निर्वाहे अपराणीति विशेषणमुत्कर्षातिशयख्यापनार्थमिति वर्णनं त्वयुक्तमिति दिक्। अतएवानेन दृष्टान्तेनाविकृत्वप्रतिपादनमात्मनः क्रियत इति प्राचां व्याख्यानमतिस्पष्टमिति कटाक्षोऽपि परास्तः। आत्माविक्रियत्वप्रतिपादकपूर्वोत्तरप्रकरणानुसारिमूलादतिस्पष्टतया प्रतीयमानस्य भाष्योक्तव्याख्यानस्यैव सभ्यक्त्वात्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
vāsānsigarments
jīrṇāniworn
yathāas
vihāyasheds
navāninew
gṛihṇātiaccepts
naraḥa person
aparāṇiothers
tathālikewise
śharīrāṇibodies
vihāyacasting off
jirṇāniworn
anyāniother
sanyātienters
navāninew
dehīthe embodied soul
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.21
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्। कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्

हे पृथानन्दन! जो मनुष्य इस शरीरीको अविनाशी, नित्य, जन्मरहित और अव्यय जानता है, वह कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये? — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.23
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः

शस्त्र इस शरीरीको काट नहीं सकते, अग्नि इसको जला नहीं सकती, जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 22
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 22
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही

मनुष्य जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता है, ऐसे ही देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंमें चला जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 22 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 22 का हिंदी अर्थ: "मनुष्य जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता है, ऐसे ही देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंमें चला जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 22?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 22 translates to: "Just as a man casts off worn-out clothes and puts on new ones, so too the embodied Self casts off worn-out bodies and enters others that are new. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 22 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। मनुष्य जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता है, ऐसे ही देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंमें चला जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "vāsānsi jīrṇāni yathā vihāya" mean in English?

"vāsānsi jīrṇāni yathā vihāya" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 22. Just as a man casts off worn-out clothes and puts on new ones, so too the embodied Self casts off worn-out bodies and enters others that are new. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.