
“हे पृथानन्दन! जो मनुष्य इस शरीरीको अविनाशी, नित्य, जन्मरहित और अव्यय जानता है, वह कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये? — VaniSagar”
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నాశనము లేనిది, శాశ్వతమైనది, జన్మలేనిది మరియు తరగనిది అని ఎవరికి తెలుసు, ఓ అర్జునా, ఆ వ్యక్తి ఎలా సంహరించగలడు లేదా చంపబడతాడు?
जो अविनाशी, शाश्वत, अजन्मा आणि अविनाशी आहे हे जाणतो, तो अर्जुना, वध कसा करू शकतो किंवा वध कसा करू शकतो?
જે તેને અવિનાશી, અનાદિ, અજન્મા અને અખૂટ જાણે છે, તે વ્યક્તિ, હે અર્જુન, કેવી રીતે સંહાર કરી શકે અથવા માર્યા ગયા?
जे एकरा के अविनाशी, शाश्वत, अजन्मा, आ अक्षय के रूप में जानत बा, ऊ व्यक्ति कइसे ह अर्जुन, भा हत्या के कारण बन सकेला?
जे एकरा अविनाशी, शाश्वत, अजन्मा, आ अक्षय बुझैत अछि, ओ व्यक्ति कोना हतत, हे अर्जुन, वा वधक कारण बनत?
जो इसे अविनाशी, शाश्वत, अजन्म, अविनाशी जानदा है, ओह व्यक्ति किवें मार सकदा है, हे अर्जुन, या वध कर सकदा है?
अविनाशी, शाश्वत, अजन्म आनी अक्षय अशें कोणाक कळटा, तो मनीस कसो अर्जुन कसो मारतलो वा वध करपाक कारण जावं येता?
যিয়ে ইয়াক অবিনাশী, অনন্ত, অজন্ম, আৰু অক্ষয় বুলি জানে, সেই ব্যক্তিয়ে কেনেকৈ বধ কৰিব, হে অৰ্জুন, বা বধ কৰিব?
அழியாதது, நித்தியமானது, பிறக்காதது மற்றும் அழியாதது என்று அறிந்தவர், அர்ஜுனா, அந்த நபர் எப்படிக் கொல்ல முடியும் அல்லது கொல்லப்படுவார்?
അത് നശിക്കാത്തതും, ശാശ്വതവും, ജനിക്കാത്തതും, അക്ഷയവുമാണെന്ന് ആർക്കറിയാം, ഹേ അർജുനാ, ആ വ്യക്തിക്ക് എങ്ങനെ കൊല്ലാൻ കഴിയും, അല്ലെങ്കിൽ വധിക്കപ്പെടാൻ കാരണമാകും?
ꯃꯁꯤꯕꯨ ꯃꯥꯡꯍꯟ ꯇꯥꯀꯍꯅꯕꯥ ꯉꯃꯗꯕꯥ, ꯂꯣꯝꯕꯥ ꯅꯥꯏꯗꯕꯥ, ꯄꯣꯀꯄꯥ ꯉꯃꯗꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯂꯣꯏꯕꯥ ꯅꯥꯏꯗꯕꯥ ꯍꯥꯌꯕꯁꯤ ꯀꯅꯥꯒꯨꯝꯕꯥ ꯑꯃꯅꯥ ꯈꯉꯂꯕꯗꯤ, ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯗꯨꯅꯥ ꯀꯔꯝꯅꯥ ꯍꯥꯠꯀꯅꯤ, ꯍꯦ ꯑꯔꯖꯨꯟ, ꯅꯠꯔꯒꯥ ꯍꯥꯠꯄꯥ ꯉꯃꯍꯅꯒꯅꯤ?
যে ব্যক্তি ইহাকে অবিনশ্বর, অনাদি, অজাত, অক্ষয় বলিয়া জানে, সেই ব্যক্তি কীভাবে বধ করিতে পারে, হে অর্জুন, বধ করিতে পারে?
Sacred Commentaries
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Swami Ramsukhdas
2.21।। व्याख्या-- वेदाविनाशिनम् ৷৷. घातयति हन्ति कम्-- इस शरीरीका कभी नाश नहीं होता इसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता इसका कभी जन्म नहीं होता और इसमें कभी किसी तरहकी कोई कमी नहीं आती ऐसा जो ठीक अनुभव कर लेता है वह पुरुष कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये अर्थात् दूसरोंको मारने और मरवानेमें उस पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। वह किसी क्रियाका न तो कर्ता बन सकता है और न कारयिता बन सकता है। यहाँ भगवान्ने शरीरीको अविनाशी नित्य अज और अव्यय कहकर उसमें छहों विकारोंका निषेध किया है जैसे अविनाशी कहकर मृत्युरूप विकारका नित्य कहकर अवस्थान्तर होना और बढ़नारूप विकारका अज कहकर जन्म होना और जन्मके बाद होनेवाली सत्तारूप विकारका तथा अव्यय कहकर क्षयरूप विकारका निषेध किया गया है। शरीरीमें किसी भी क्रियासे किञ्चिन्मात्र भी कोई विकार नहीं होता। अगर भगवान्को न हन्यते हन्यमाने शरीरे और कं घातयति हन्ति कम् इन पदोंमें शरीरीके कर्ता और कर्म बननेका ही निषेध करना था तो फिर यहाँ करनेनकरनेकी बात न कहकर मरनेमारनेकी बात क्यों कही इसका उत्तर है कि युद्धका प्रसङ्ग होनेसे यहाँ यह कहना जरूरी है कि शरीरी युद्धमें मारनेवाला नहीं बनता क्योंकि इसमें
Sri Harikrishnadas Goenka
य एनं वेत्ति हन्तारम् इस मन्त्रसे आत्मा हननक्रियाका कर्ता और कर्म नहीं है यह प्रतिज्ञा करके तथा न जायते इस मन्त्रसे आत्माकी निर्विकारताके हेतुको बतलाकर अब प्रतिज्ञापूर्वक कहे हुए अर्थका उपसंहार करते हैं पूर्व मन्त्रमें कहे हुए लक्षणोंसे युक्त इस आत्माको जो अविनाशी अन्तिम भावविकाररूप मरणसे रहित नित्य रोगादिजनित दुर्बलता क्षीणता आदि विकारोंसे रहित अज जन्मरहित और अव्यय अपक्षयरूप विकारसे रहित जानता है। वह आत्मतत्त्वका ज्ञाताअधिकारी पुरुष कैसे ( किसको ) मारता है और कैसे ( किसको ) मरवाता है अर्थात् वह कैसे तो हननरूप क्रिया कर सकता और कैसे किसी मारनेवालेको नियुक्त कर सकता है अभिप्राय यह कि वह न किसीको किसी प्रकार भी मारता है और न किसीको किसी प्रकार भी मरवाता है। इन दोनों बातोंमे किम् और कथम् शब्द आक्षेपके बोधक हैं क्योंकि प्रश्नके अर्थमें यहाँ इनका प्रयोग सम्भव नहीं। निर्विकारतारूप हेतुका तात्पर्य सभी कर्मोंका प्रतिषेध करनेमें समान है इससे इस प्रकरणका अर्थ भगवान्को यही इष्ट है कि आत्मवेत्ता किसी भी कर्मका करने करवानेवाला नहीं होता। अकेली हननक्रियाके विषयमें आक्षेप करना उदाहरणके रूपमें है। पू0 कर्म न हो सकनेमें कौनसे खास हेतुको देखकर ज्ञानीके लिये भगवान् कथं स पुरुषः इस कथनसे कर्मविषयक आक्षेप करते हैं उ0 पहले ही कह आये हैं कि आत्माकी निर्विकारता ही ( ज्ञानीकर्तृक ) सम्पूर्ण कर्मोंके न होनेका खास हेतु है। पू0 कहा है सही परंतु अविक्रिय आत्मासे उसको जाननेवाला भिन्न है इसलिये ( यह ऊपर बतलाया हुआ ) खास कारण उपयुक्त नहीं है क्योंकि स्थाणुको अविक्रिय जाननेवालेसे कर्म नहीं होते ऐसा नहीं ऐसी शङ्का करें तो उ0 यह कहना ठीक नहीं क्योंकि आत्मा स्वयं ही जाननेवाला है। देह आदि संघातमें ( जड होनेके कारण ) ज्ञातापन नहीं हो सकता इसलिये अन्तमें देहादि संघातसे भिन्न आत्मा ही अविक्रिय ठहरता है और वही जाननेवाला है। ऐसे उस ज्ञानीसे कर्म होना असम्भव है अतः कथं स पुरुष यह आक्षेप उचित ही है। जैसे ( वास्तवमें ) निर्विकार होनेपर भी आत्मा बुद्धिवृत्ति और आत्माका भेदज्ञान न रहनेके कारण अविद्याके सम्बन्धसे बुद्धि आदि इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण किये हुए शब्दादि विषयोंका ग्रहण करनेवाला मान लिया जाता है। ऐसे ही आत्मअनात्मविषयक विवेकज्ञानरूप जो बुद्धिवृत्ति है जिसे विद्या कहते हैं वह यद्यपि असत्रूप है तो भी उसके सम्बन्धसे वास्तव में जो अविकारी है ऐसा आत्मा ही विद्वान् कहा जाता है। ज्ञानीके लिये सभी कर्म असम्भव बतलाये हैं इस कारण भगवान्का यह निश्चय समझा जाता है कि शास्त्रद्वारा जिन कर्मोंका विधान किया गया है वे सब अज्ञानियोंके लिये ही विहित हैं। पू0 विद्या भी अज्ञानीके लिये ही विहित है क्योंकि जिसने विद्याको जान लिया उसके लिये पिसेको पीसनेकी भाँति विद्याका विधान व्यर्थ है। अतः अज्ञानीके लिये कर्म कहे गये हैं ज्ञानीके लिये नहीं इस प्रकार विभाग करना नहीं बन सकता। उ0 यह कहना ठीक नहीं क्योंकि कर्तव्यके भाव और अभावसे भिन्नता सिद्ध होती है अभिप्राय यह कि अग्निहोत्रादि कर्मोंका विधान करनेवाले विधिवाक्योंके अर्थको जान लेनेके बाद अनेक साधन और उपसंहारके सहित अमुक अग्निहोत्रादि कर्म अनुष्ठान करनेके योग्य है मैं कर्ता हूँ मेरा अमुक कर्तव्य है इस प्रकार जाननेवाले अज्ञानीके लिये जैसे कर्तव्य बना रहता है वैसे न जायते इत्यादि आत्मस्वरूपका विधान करनेवाले वाक्योंके अर्थको जान लेनेके बाद उस ज्ञानीके लिये कुछ कर्तव्य शेष नहीं रहता। क्योंकि ( ज्ञानीको ) मैं न कर्ता हूँ न भोक्ता हूँ इत्यादि जो आत्माके एकत्व और अकर्तृत्व आदिविषयक ज्ञान है इससे अतिरिक्त अन्य किसी प्रकारका भी ज्ञान नहीं होता। इस प्रकार यह ( ज्ञानी और अज्ञानीके कर्तव्यका ) विभाग सिद्ध होता है। जो अपनेको ऐसा समझता है कि मैं कर्ता हूँ उसकी यह बुद्धि अवश्य ही होगी कि मेरा अमुक कर्तव्य है उस बुद्धिकी अपेक्षासे वह कर्मोंका अधिकारी होता है इसीसे उसके लिये कर्म हैं। और उभौ तौ न विजानीतः इस वचनके अनुसार वही अज्ञानी है। क्योंकि पूर्वोक्त विशेषणोंद्वारा वर्णित ज्ञानीके लिये तो कथं स पुरुषः इस प्रकार कर्मोंका निषेध करनेवाले वचन हैं। सुतरां ( यह सिद्ध हुआ कि ) आत्माको निर्विकार जाननेवाले विशिष्ट विद्वान्का और मुमुक्षुका भी सर्वकर्मसंन्यासमें ही अधिकार है। इसीलिये भगवान् नारायण ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् इस कथनसे सांख्ययोगी ज्ञानियों और कर्मी अज्ञानियोंका विभाग करके अलगअलग दो निष्ठा ग्रहण करवाते हैं। ऐसे ही अपने पुत्रसे भगवान् वेदव्यासजी कहते हैं कि ये दो मार्ग हैं इत्यादि तथा यह भी कहते हैं कि पहले क्रियामार्ग और पीछे संन्यास। इसी विभागको बारंबार भगवान् दिखलायेंगे। जैसे अहंकारसे मोहित हुआ अज्ञानी मैं कर्ता हूँ ऐसे मानता है तत्त्ववेत्ता मैं नहीं करता ऐसे मानता है तथा सब कर्मोंका मनसे त्यागकर रहता है इत्यादि। इस विषयमें कितने ही अपनेको पण्डित समझनेवाले कहते हैं कि जन्मादि छः भावविकारोंसे रहित निर्विकार अकर्ता एक आत्मा मैं ही हूँ ऐसा ज्ञान किसीको होता ही नहीं कि जिसके होनेसे सर्वकर्मोंके संन्यासका उपदेश किया जा सके। यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि ( ऐसा मान लेनेसे ) न जायते इत्यादि शास्त्रका उपदेश व्यर्थ होगा। उनसे यह पूछना चाहिये कि जैसे शास्त्रोपदेशकी सामर्थ्यसे कर्म करनेवाले मनुष्यको धर्मके अस्तित्वका ज्ञान और देहान्तरकी प्राप्तिका ज्ञान होता है उसी तरह उसी पुरुषको शास्त्रसे आत्माकी विर्विकारता अकर्तृत्व और एकत्व आदिका विज्ञान क्यों नहीं हो सकता यदि वे कहें कि ( मनबुद्धि आदि ) करणोंसे आत्मा अगोचर है इस कारण ( उसका ज्ञान नहीं हो सकता )। तो यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि मनके द्वारा उस आत्माको देखना चाहिये यह श्रुति है अतः शास्त्र और आचार्यके उपदेशद्वारा एवं शम दम आदि साधनोंद्वारा शुद्ध किया हुआ मन आत्मदर्शनमें करण ( साधन ) है। इस प्रकार उस ज्ञानप्राप्तिके विषयमें अनुमान और आगमप्रमाणोंके रहते हुए भी यह कहना कि ज्ञान नहीं होता साहसमात्र है। यह तो मान ही लेना चाहिये कि उत्पन्न हुआ ज्ञान अपनेसे विपरीत अज्ञानको अवश्य नष्ट कर देता है। वह अज्ञान मैं मारनेवाला हूँ मैं मारा गया हूँ ऐसे मारनेवाले दोनों नहीं जानते इन वचनोंद्वारा पहले दिखलाया ही था फिर यहाँ भी यह बात दिखायी गयी है कि आत्मामें हननक्रियाका कर्तृत्व कर्मत्व और हेतुकर्तृत्व अज्ञानजनति है। आत्मा निर्विकार होनेके कारण कर्तृत्व आदि भावोंका अविद्यामूलक होना सभी क्रियाओंमे समान है। क्योंकि विकारवान् ही ( स्वयं ) कर्ता ( बनकर ) अपने कर्मरूप दूसरेको कर्ममें नियुक्त करता है कि तू अमुक कर्म कर। सुतरां ज्ञानीका कर्मोंमें अधिकार नहीं है यह दिखानेके लिये भगवान् वेदाविनाशिनम् कथं स पुरुषः इत्यादि वाक्योंसे सभी क्रियाओंमें समान भावसे विद्वान्के कर्ता और प्रयोजक कर्ता होनेका प्रतिषेध करते हैं। ज्ञानीका अधिकार किसमें है यह तो ज्ञानयोगेन सांख्यानाम् इत्यादि वचनोंद्वारा पहले ही बतलाया जा चुका है वैसे ही फिर भी सर्वकर्माणि मनसा इत्यादि वाक्योंसे सर्व कर्मोंका संन्यास ( भगवान् ) कहेंगे। पू0 ( उक्त श्लोकमें ) मनसा यह शब्द है इसलिये मानसिक कर्मोंका ही त्याग बतलाया है शरीर और वाणीसम्बन्धी कर्मोंका नहीं। उ0 यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि सर्व कर्मोंको छोड़कर इस प्रकार कर्मोंके साथ सर्व विशेषण है। पू0 यदि मनसम्बन्धी सर्व कर्मोंका त्याग मान लिया जाय तो उ0 ठीक नहीं। क्योंकि वाणी और शरीरकी क्रिया मनोव्यापारपूर्वक ही होती है। मनोव्यापारके अभावमें उनकी क्रिया बन नहीं सकती। पू0 शास्त्रविहित कायिकवाचिक कर्मोंके कारणरूप मानसिक कर्मोंके सिवा अन्य सब कर्मोंका मनसे संन्यास करना चाहिये यह मान लिया जाय तो उ0 ठीक नहीं। क्योंकि न करता हुआ और न करवाता हुआ यह विशेषण साथमें है ( इसलिये तीनों तरह कर्मोंका संन्यास सिद्ध होता है। ) पू0 यह भगवान्द्वारा कहा हुआ सर्व कर्मोंका संन्यास तो मुमूर्षु के लिये है जीते हुएके लिये नहीं यह माना जाय तो उ0 ठीक नहीं। क्योंकि ऐसा मान लेनेसे नौ द्वारवाले शरीररूप पुरमें आत्मा रहता है इस विशेषणकी उपयोगिता नहीं रहती। कारण जो सर्वकर्मसंन्यास करके मर चुका है उसका न करते हुए और न करवाते हुए उस शरीरमें रहना सम्भव नहीं। पू0 उक्त वाक्यमें शरीरमें कर्मोंको रखकर इस तरह सम्बन्ध है शरीरमें रहता है इस प्रकार सम्बन्ध नहीं है ऐसा मानें तो उ0 ठीक नहीं है। क्योंकि सभी जगह आत्माको निर्विकार माना गया है। तथा आसन क्रियाको आधारकी अपेक्षा है और संन्यास को उसकी अपेक्षा नहीं है एवं स पूर्वक न्यास शब्दका अर्थ यहाँ त्यागना। है निक्षेप ( रख देना ) नहीं। सुतरां गीताशास्त्रमें आत्मज्ञानीका संन्यासमें ही अधिकार है कर्मोंमें नहीं। यही बात आगे चलकर आत्मज्ञानके प्रकरणमें हम जगहजगह दिखलायेंगे।
Sri Anandgiri
पूर्वश्लोकार्थस्यैवोत्तरत्रापि प्रतिभानात् पौनरुक्त्यमाशङक्य वृत्तानुवादपूर्वकमुत्तरश्लोकमवतारयति य एनमित्यादिना। कर्तृत्वाद्यभिमानविरोधादद्वैतकूटस्थात्मनिश्चयसामर्थ्यात्प्राप्तं विदुषः संन्यासं विद्यापरिपाकार्थमभ्यनुजानाति वेदेति। पदद्वयस्य पूर्वमेव पौनरुक्त्यपरिहारेऽपि प्रकारान्तरेणापौनरुक्त्यमाह अविनाशिनमित्यादिना। प्रश्नेऽपि संभवति किमिति नञुल्लेखेन व्याख्यायते तत्राह उभयत्रेति। उत्तरत्र प्रतिवचनादर्शनान्नात्र प्रश्नः संभवतीत्यर्थः। विवक्षितं प्रकरणार्थं निगमयति हेत्वर्थस्येति। अविक्रियत्वं हेत्वर्थस्तस्य विदुषः सर्वकर्मनिषेधे समानत्वादिति यावत्। यदि विदुषः सर्वकर्मनिषेधोऽभिमतस्तर्हि किमिति हन्त्यर्थ एवाक्षिप्यते तत्राह हन्तेरिति। उक्तं हेतुमाक्षेप्तुं पृच्छति विदुष इति। अभिप्रायमप्रतिपद्यमानो हेतुविशेषं पूर्वोक्तं स्मारयति नन्विति। उक्तमङ्गीकृत्याक्षिपति सत्यमिति। विदुषो विज्ञानात्मनो ब्रह्मणश्च वेद्यस्य विरुद्धधर्मत्वेन दहनतुहिनवद्भिन्नत्वाद्विदुषः सर्वकर्मत्यागेनासौ कारणविशेषः स्यादित्याह अन्यत्वादिति। अविक्रियत्वादिति च्छेदः। तथापि कूटस्थमविक्रियं ब्रह्म प्रतिपद्यमानस्य कुतो विक्रिया संभवेद्ब्रह्मप्रतिपत्तिविरोधादित्याशङ्क्याह नहीति। अयमात्मा ब्रह्म इत्यादिश्रुत्या समाधत्ते न विदुष इति। किञ्च विद्वत्ता विशिष्टस्य वा केवलस्य वा। नाद्यः। विशिष्टस्य विद्वत्तायां विशेषणस्यापि तत्प्रसङ्गान्न च विशेषणीभूतसंघातस्याचेतनत्वाद्विद्वत्ता युक्तेत्याह न देहादीति। द्वितीये तु जीवब्रह्मविभागासिद्धिरित्याह असंहत इति। किञ्च प्रामाणिकविरुद्धधर्मवत्त्वस्यासिद्धत्वात्प्रातिभासिकस्य च बिम्बप्रतिबिम्बयोरनैकान्त्याद्भेदानुमानायोगाज्जीवब्रह्मणोरभेदसिद्धिरित्यभिप्रेत्य फलितमाह इति तस्येति। नन्वविक्रियस्य ब्रह्मस्वरूपतया सर्वकर्मासंभवे विदुषो विद्वत्तापि कथं संभवति नहि ब्रह्मणोऽविक्रियस्य विद्यालक्षणा विक्रिया स्वक्रिया भवितुमर्हति तत्राह यथेति। अदृष्टेन्द्रियादिसहकृतमन्तःकरणं प्रदीपप्रभावद्विषयपर्यन्तं परिणतं बुद्धिवृत्तिरुच्यते। तत्र प्रतिबिम्बितं चैतन्यमभिव्यञ्जकबुद्धिवृत्त्यविवेकाद्विषयज्ञानमिति व्यवह्रियते। तेनात्मोपलब्धा कल्प्यते। तच्चाविद्याप्रयुक्तमिथ्यासंबन्धनिबन्धनं तथैवाध्यासिकसंबन्धेन ब्रह्मात्मैक्याभिव्यञ्जकवाक्योत्थबुद्धिवृत्तिद्वारा विद्वानात्मा व्यपदिश्यते नच मिथ्यासंबन्धेन पारमार्थिकाविक्रियत्वविहतिरस्तीत्यर्थः। अहं ब्रह्मेति बुद्धिवृत्तेर्मोक्षावस्थायामपि भावादात्मनः सविशेषत्वमाशङ्क्य तस्या यावदुपाधिसत्त्वमेवेत्याह असत्येति। ननु कूटस्थस्यात्मनो मिथ्याविद्यावत्त्वेऽपि तस्य कर्माधिकारनिवृत्तौ कस्य कर्माणि विधीयन्ते नहि निरधिकाराणां तेषां विधिरित्याशङ्क्याह विदुष इति। कर्माण्यविदुषो विहितानीति विशेषमाक्षिपति नन्विति। कर्मविधानमविदुषो विदुषश्च विद्याविधानमिति विभागे का हानिरित्याशङ्क्याह विदितेति। विद्याया विदितत्वं लब्धत्वम्। कर्मविधिरविदुषो विदुषो विद्याविधिरिति विभागासंभवे फलितमाह तत्रेति। धर्मज्ञानानन्तरमनुष्ठेयस्य भावात् ब्रह्मज्ञानोत्तरकालं च तदभावाद् ब्रह्मज्ञानहीनस्यैव कर्मविधिरिति समाधत्ते नानुष्ठेयस्येति। विशेषोपपत्तिमेव प्रपञ्चयति अग्निहोत्रादीति। ननु देहादिव्यतिरिक्तात्मज्ञानं विना पारलौकिकेषु कर्मसु प्रवृत्तेरनुपपत्तेस्तथाविधज्ञानवता कर्मानुष्ठेयमिति चेत्तत्राह कर्ताहमिति। आत्मनि कर्ता भोक्तेत्येवं विज्ञानवत्त्वेऽपि ब्रह्मज्ञानविहीनत्वेनाविदुषोऽनुष्ठेयं कर्मेत्यर्थः। देहादिव्यतिरेकज्ञानवद्ब्रह्मज्ञानमपि ज्ञानत्वाविशेषात् कर्मप्रवृत्तावुपकरिष्यतीत्याशङ्क्याह नत्विति। अनुष्ठेयविरोधित्वादविक्रियात्मज्ञानस्येति शेषः। ननु ब्रह्मात्मैकत्वज्ञानादुत्तरकालमपि कर्ताहमित्यादिज्ञानोत्पत्तौ कर्मविधिः सावकाशः स्यादिति नेत्याह नाहमिति। कारणाभावादिति शेषः। कर्तृत्वादिज्ञानमन्यदित्युक्तम्। अनुष्ठानाननुष्ठानयोरुक्तविशेषादविदुषोऽनुष्ठानं विदुषो नेत्युपसंहरति इत्येष इति। नन्वात्मविदो न चेदनुष्ठेयं किंचिदस्ति कथं तर्हि विद्वान्यजेतेत्यादिशास्त्रात्तं प्रति कर्माणि विधीयन्ते तत्राह यः पुनरिति। आत्मनि कर्तृत्वादिज्ञानापेक्षया कर्मस्वधिकृतत्वज्ञाने तथाविधं पुरुषं प्रति कर्माणि विधीयन्ते। स च प्राचीनवचनादविद्वानेवेति निश्चीयते। न खल्वकर्तृत्वादिज्ञानवतस्तद्विपरीतकर्तृत्वादिज्ञानद्वारा कर्मसु प्रवृत्तिरित्यर्थः। कर्मासंभवे ब्रह्मविदो हेत्वन्तरमाह विशेषितस्येति। वेदाविनाशिनम् इत्यादिनेति शेषः। यद्यपि विदुषो नास्ति कर्म तथापि विविदिषोः स्यादित्याशङ्क्याह तस्मादिति। विद्यया विरुद्धत्वादिष्यमाणमोक्षप्रतिपक्षत्वाच्च कर्मणामित्यर्थः। यद्यपि मुमुक्षोराश्रमकर्माण्यपेक्षितानि तथापि विद्यातत्फलाभ्यामविरुद्धान्येव तान्यभ्युपगतान्यन्यथा विविदिषासंन्यासविधिविरोधादित्यभिप्रेत्योक्तेऽर्थे भगवतोऽनुमतिमाह अतएवेति। विदुषो विविदिषोश्च संन्यासेऽधिकारोऽविदुषस्तु कर्मणीति विभागस्येष्टत्वादित्यर्थः। अधिकारिभेदेन निष्ठाद्वयं भगवता वेदव्यासेनापि दर्शितमित्याह तथाचेति। अध्ययनविधिना स्वाध्यायपाठे त्रैवर्णिकस्य प्रवृत्त्यनन्तरं तत्र क्रियामार्गो ज्ञानमार्गश्चेति द्वौ मार्गावधिकारिभेदेनावेदितावित्यर्थः। आदिशब्दाद्यत्र वेदाः प्रतिष्ठिताः इत्यादि गृह्यते। उक्तयोर्मार्गयोस्तुल्यतां परिहर्तुमुदाहरणान्तरमाह तथेति। बुद्धिशुद्धिद्वारा कर्मतत्फलयोर्वैराग्योदयात्पूर्वं कर्ममार्गो विहितो विरक्तस्य पुनः संन्यासपूर्वको ज्ञानमार्गो दर्शितः। स चेतरस्मादतिशयशालीति श्रुतिमित्यर्थः। उक्ते विभागे पुनरपि वाक्यशेषानुकूल्यमादर्शयति एवमेवेति। अहंकारविमूढात्मेत्यस्य व्याख्यानं अतत्त्वविदिति। तत्त्ववित्त्विति श्लोकमवतार्य तात्पर्यार्थं संगृह्णाति नाहमिति। पूर्वेण क्रियापदेनेतिशब्दः संबध्यते। विरक्तमधिकृत्य वाक्यान्तरं पठति तथाचेति। आदिशब्दस्तस्यैव श्लोकस्य शेषसंग्रहार्थः। अविक्रियात्मज्ञानात्कर्मसंन्यासे दर्शिते मीमांसकमतमुत्थापयति तत्रेति। आत्मनो ज्ञानक्रियाशक्त्याधारत्वेनाविक्रियत्वाभावादविक्रियात्मज्ञानं संन्यासकारणीभूतं न संभवतीत्यर्थः। यथोक्तज्ञानाभावो विषयाभावाद्वा मानाभावाद्वेति विकल्प्याद्यं दूषयति नेत्यादिना। न तावदविक्रियात्माभावो न जायते म्रियते वेत्यादिशास्त्रस्याप्तवाक्यतया प्रमाणस्यान्तरेण कारणमानर्थक्यायोगादित्यर्थः। द्वितीयं प्रत्याह यथाचेति। पारलौकिककर्मविधिसामर्थ्यसिद्धं विज्ञानमुदाहरति कर्तुश्चेति। कर्मकाण्डादज्ञाते धर्मादौ विज्ञानोत्पत्तिवज्ज्ञानकाण्डादज्ञाते ब्रह्मात्मनि विज्ञानोत्पत्तिरविरुद्धा प्रमाणत्वाविशेषादित्यर्थः। ज्ञानस्य मनःसंयोगजन्यत्वादात्मनश्च श्रुत्या मनोगोचरत्वनिरासान्नात्मज्ञाने साधनमस्तीति शङ्कते करणेति। श्रुतिमाश्रित्य परिहरति न। मनसेति। तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थमनोवृत्त्यैव शास्त्राचार्योपदेशमनुसृत्य द्रष्टव्यं तत्त्वमिति श्रूयते स्वरूपेण स्वप्रकाशमपि ब्रह्मात्मवस्तु वाक्योत्थबुद्धिवृत्त्यभिव्यक्तं सविकल्पकव्यवहारालम्बनं भवतीति मनोगोचरत्वोपचारादसिद्धं करणागोचरत्वमित्यर्थः। कथं तर्हि ब्रह्मात्मनो मनोविषयत्वनिषेधश्रुतिरित्याशङ्क्यासंस्कृतमनोवृत्त्यविषयत्वविषया सेति मन्वानः सन्नाह शास्त्रेति। सत्यपि श्रुत्यादौ तदनुग्राहकाभावान्नास्माकमविक्रियात्मकज्ञानमुत्पत्तुमर्हतीत्याशङ्क्याह तथेति। तस्याविक्रियस्यात्मनोऽधिगत्यर्थं विमतो विकारो नात्मधर्मो विकारत्वादुभयाभिमतविकारवदित्यनुमाने पूर्वोक्तश्रुतिस्मृतिरूपागमे च सत्येव तस्मिन्नोत्पद्यते ज्ञानमिति वचः साहसमात्रं सत्येव माने मेयं न भातीतिवदित्यर्थः। ननु यथोक्तं ज्ञानमुत्पन्नमपि हानायोपादानाय वा न भवतीति कुतोऽस्य फलवत्त्वं तत्राह ज्ञानं चेति। अवश्यमिति। प्रकाशप्रवृत्तेस्तमोनिवृत्तिव्यतिरेकेणानुपपत्तिवदात्माज्ञाननिवृत्तिमन्तरेणात्मज्ञानोत्पत्तेरनुपपत्तेरित्यर्थः। नन्वज्ञानस्य ज्ञानप्रागभावत्वात्तन्निवृत्तिरेव ज्ञानं नतु तन्निवर्तकमिति तत्राह तच्चेति। कथं पुनर्भगवतापि ज्ञानाभावातिरिक्तमज्ञानं दर्शितमित्याशङ्क्याह अत्रचेति। विमतं ज्ञानाभावो न भवत्युपादानत्वान्मृदादिवदिति भावः। ननु हननक्रियाया न हिंस्यादिति निषिद्धत्वात् तत्कर्तृत्वादेरज्ञानकृतत्वेऽपि विहितक्रियाकर्तृत्वादेर्न तथात्वमिति नेत्याह तच्चेति। न तावदात्मनि कर्तृत्वादि नित्यम् अमुक्तिप्रसङ्गान्न चानित्यमपि निरुपादानं भावकार्यस्योपादाननियमान्न चानात्मा तदुपादानमात्मनि तत्प्रतिभानान्न चात्मैव तदुपादानं कूटस्थस्य तस्याविद्यां विना तदयोगादित्याह अविक्रियत्वादिति। कर्तृत्वाभावेऽपि कारयितृत्वं स्यादित्याशङ्क्याह विक्रियावानिति। आत्मनि कर्तृत्वादिप्रतिभानस्यानाद्यनिर्वाच्यमज्ञानमुपादानं तन्निवृत्तिश्च तत्त्वज्ञानादित्युक्तम् इदानीं कर्तृत्वकारयितृत्वयोरविद्याकृतत्वे भगवतोऽनुमतिं दर्शयति तदेतदिति। विदुषो यदि कर्माधिकाराभावो भगवतोऽभिमतस्तर्हि कुत्र तस्य जीवतोऽधिकारः स्यादिति पृच्छति क्व पुनरिति। ज्ञाननिष्ठायामित्युक्तं स्मारयति उक्तमिति। तदङ्गभूते सर्वकर्मसंन्यासे च तस्याधिकारोऽस्तीत्याह तथेति। वक्ष्यमाणे वाक्ये सर्वकर्मसंन्यासो न प्रतिभाति मानसानामेव कर्मणां विशेषणवशात्त्यागावगमादिति शङ्कते नन्विति। विशेषणान्तरमाश्रित्य दूषयति न सर्वेति। मनसेतिविशेषणान्मानसेष्वेव कर्मसु सर्वशब्दः संकुचितः स्यादिति शङ्कते मानसानामिति। सर्वात्मना मनोव्यापारत्यागे व्यापारान्तराणामनुपपत्तेः सर्वकर्मसंन्यासः सिध्यतीति परिहरति नेत्यादिना। मानसेष्वपि कर्मसु संन्यासे संकोचान्न वागादिव्यापारानुपपत्तिरिति शङ्कते शास्त्रीयाणामिति। अन्यानीति। अशास्त्रीयवाक्कायकर्मकारणान्यशास्त्रीयाणि मानसानि तानि च सर्वाणि कर्माणीत्यर्थः। वाक्यशेषमादाय दूषयति न। नैवेति। नहि विवेकबुद्ध्या सर्वाणि कर्माण्यशास्त्रीयाणि संन्यस्य तिष्ठतीति युक्तं नैव कुर्वन्नित्यादिविशेषणस्य विवेकबुद्धेश्च त्यागहेतोस्तुल्यत्वादित्यर्थः। भगवदभिमतसर्वकर्मसंन्यासस्यावस्थाविशेषे संकोचं दर्शयन्नाशङ्कते मरिष्यत इति। संन्यासो जीवदवस्थायामेवात्र विवक्षित इत्यत्र लिङ्गं दर्शयन्नुत्तरमाह न। नवेति। अनुपपत्तिमेव स्फोरयति नहीति। अन्वयविशेषान्वाख्यानेन लिङ्गासिद्धिं चोदयति अकुर्वत इति। विवेकवशादशेषाण्यपि धर्माणि देहे यथोक्ते निक्षिप्याकुर्वन्नकारयंश्च विद्वानवतिष्ठते। तथाच देहे कर्माणि संन्यस्याकुर्वतोऽकारयतश्च सुखमासनमिति संबन्धसंभवाद् विशेषणस्य सति देहे कर्मत्यागविषयत्वाभावाज्जीवतः सर्वकर्मत्यागो नास्तीत्यर्थः। अथवा कुर्वत इत्यादि पूर्वत्रैव संबन्धनीयम् लिङ्गासिद्धिचोद्यं तु देहे संन्यस्येत्यारभ्योन्नेयम्। आत्मनः सर्वत्राविक्रियत्वनिर्धारणाद्देहसंबन्धमन्तरेण कर्तृत्वकारयितृत्वाप्राप्तेरप्राप्तप्रतिषेधप्रसङ्गपरिहारार्थमस्मदुक्त एव संबन्धः साधीयानिति समाधत्ते न सर्वत्रेति। श्रुतिषु स्मृतिषु चेत्यर्थः। किञ्च संबन्धस्याकाङ्क्षासंनिधियोग्यताधीनत्वादाकाङ्क्षावशादस्मदभिमतसंबन्धसिद्धिरित्याह आसनेति। भवदिष्टस्तु संबन्धो न सिध्यत्याकाङ्क्षाभावादित्याह तदनपेक्षत्वाच्चेति। संन्यासशब्दस्य निक्षेपार्थत्वात्तस्य चाधिकरणसापेक्षत्वादस्मदिष्टसंबन्धसिद्धिरित्याशङ्क्याह संपूर्वस्त्विति। अन्यथोपसर्गवैयर्थ्यादित्यर्थः। मनसा विवेकविज्ञानेन सर्वकर्माणि परित्यज्यास्ते देहे विद्वानित्यस्यैव संबन्धस्य साधुत्वं मत्वोपसंहरति तस्मादिति। सर्वव्यापारोपरमात्मनः संन्यासस्याविक्रियात्मज्ञानाविरोधित्वात् प्रयोजकज्ञानवतो वैधे संन्यासेऽधिकारः सम्यग्ज्ञानवतस्त्ववैधे स्वाभाविके फलात्मनीति विभागमभ्युपेत्योक्तेऽर्थे वाक्यशेषानुगुण्यं दर्शयति इति तत्र तत्रेति।
Sri Dhanpati
नायं हन्ति न हन्ति न हन्यते इति मन्त्रकृतां प्रतिज्ञां न जायत इति मन्त्रेणात्मनो विक्रियत्वकथनपरेणोपपाद्य स्वयमुपसंहरति वेदेति। एतेन न हन्ति न हन्यत इति प्रतिज्ञाय न हन्यत इत्युपपादितम्। इदानीं न हन्तीत्युपपादयतीति परास्तम्। कस्मादयमात्मा हननक्रियायाः कर्ता कर्म च न भवति अविक्रियत्वादित्याह द्वितीयेन मन्त्रेणेति स्वपूर्वग्रन्थविरोधादन्यथा मन्त्रे न्यूनतापत्तेश्च। एतेन नायं हन्ति न हन्यत इत्युक्तं तत्र न हन्यत इत्येतदुपपादयति न जायत इति न हन्तीत्येतदुपपादयति वेदेतीत्यपि परास्तम्। एनं पूर्वमन्त्रेणोक्तस्वरुपविनाशिनमन्त्यविकाररहितं नित्यमविपरिणामिनम्। अव्ययमपक्षयरहितं तत्र हेतुरजं जन्मरहितत्वात्सर्वविकारशून्यं यो वेद जानाति सोऽविक्रियः स्वात्मदर्शी विद्वान्कं कथं घातयति हन्तारं प्रयोजयति तथा कं हन्ति न कथंचित्कंचिदपीत्यर्थः। तथा त्वमपि विद्वान्भूत्वा स्वयं हननकर्ता शिखण्ड्यादिप्रयोजकश्चेति कर्तृत्वकारयितृत्वे स्वस्मिन्माऽध्यारोपयेत्याशयः। ननु न विनष्टुं शीलमस्य तमविनाशिनमन्त्यविकाररहितं तत्र हेतुरव्ययं न विद्यते व्ययोऽवयवापचयो गुणापचयो वा यस्य तमव्ययं अवयवापचयेन गुणापचयेन वा विनाशदर्शनात्तदुभयरहितस्य न विनाश संभवतीत्यर्थः। ननु जन्यत्वे विनाशित्वमनुमास्यामहे नेत्याह अजमिति। न जायत इत्यजमाद्यविकाररहितं तत्र हेतुर्नित्यं सर्वदा विद्यामानं प्रागविद्यमानस्य हि जन्म दृष्टं नतु सर्वदा रत इत्यभिप्रायः। अथवाऽविनाशिनमबाध्यं सत्यमिति यावत्। नित्यं सर्वव्यापकं तत्र हेतुरजमव्ययं जन्मविनाशशून्यं जायमानस्य विनश्यतश्च सर्वव्यापकत्वसत्यत्वयोरयोगात्। यद्वा विनष्टुमदर्शनं गन्तुं शीलमस्येति विनाशि रज्जूरगतुल्यमुपाधित्रयं स्थूलसूक्ष्मकारणशरीराख्यं ततोऽन्यमविनाशिनम्। अतएव नित्यं नाशहीनं। तत्र हेतुः अजं। जन्मवान्हि अनित्यः अयं त्वजत्वान्नित्यश्चेत्यर्थः। ननु विनाशिनः स्वकार्यापेक्षयान्यत्वमजत्वं नित्यत्वं च सांख्याभिमते प्रधाने तार्किकाभिमते नभसि चास्त्यत उक्तमव्ययमिति। न व्येति पूर्वावस्थां न त्यजतीत्यव्ययम्। परिणामि प्रधानं तुचलं गुणवृत्तम् इति न्यायेन गुणसाभ्यावस्थायामपि परिणममानमेव सर्वदास्तीति तेषामभ्युपगमात्। आकाशस्यापितस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः इत्युत्पत्तिश्रवणादन्तवत्त्वभावादेव नाव्ययत्वमित्येवमाचार्यैः कुतो न व्याख्यातमिति चेत् सर्वविक्रियाशून्यमेनं यो वेदेति प्रकृतानुसारिवाक्यार्थस्यर्जुमार्गेण सभ्यक्संभवे क्लिष्टकल्पनाया अन्याय्यत्वमभिप्रत्येति गृहाण। तथाच एनं नित्यमविनाशिनं सदैव नाशरहितं नत्वाकाशादिवद्य्ववहारदशायां नाशरहितं अतएवाजं जन्मरहितं नित्यम्। अविनाशिनो जन्यत्वायोगात् एतएवाव्ययं सदैकरसं यो वेदेत्यर्थः। यद्वा एनं नित्यं तत्र हेतुविनाशिनम्। अविनाशित्वे हेतुरजमव्ययमपक्षयरहितम्। यद्वा एनमविनाशिनमजमव्ययं यो नित्यं सदैव वेदेत्यर्थः। अथवा वेद आ विनाशिनमिति छेदः। अज्ञानेंनावृतत्वादासमन्ताददर्शनं गतमेनं यो नित्यं सच्चिदानन्दात्मना सदैव सन्तं अज्ञानावृतत्वाद्रज्जुशकलवत्तस्यासत्त्वाभावात्। तथा ज्ञानेन जातः क्षीण इति प्रतीयमानमप्यजं अवययं यो वेदेत्यादि यत्किंचित्कल्पनस्य बालैप्यस्मदादिभिः सुकरत्वेन मार्गप्रदर्शकानां सर्वज्ञानां भाष्यकृतामुक्तकल्पनाकरणप्रयुक्ता न्यूनता न प्रदर्शनीयेति ध्येयम्। यत्त्वर्जुनो हि स्वस्मिन्कर्तृत्वं भगवति च कारयितृत्वमध्यस्य हिंसानिमित्तं दोषमुभयत्राप्याशशङ्के भगवानपि विदिताभिप्रायो हन्ति घातयतीति तदुभयमाचिक्षेप। आत्मनि कर्तृत्वं मयि च कारयितृत्वामारोप्य प्रत्यवायशङ्कां मा कार्षीरित्यभिप्राय इति कैश्चिदुक्तं तन्न। आत्मज्ञानरहितस्य हिंसानिबन्धनपापभयात् स्वधर्माद्युद्धान्निवृत्तस्यार्जुनस्यात्मस्वरुपतदुपायभूतधर्मबोधनपरेण गीताशास्त्रेण सर्वेणापि बोधनं भगवता क्रियत इति स्पष्टप्रतिपत्त्या आशशङ्के। शङ्का मा कार्षीरित्यस्य निरर्थकत्वात् य इति मन्त्रोत्थापकाया अस्याः शङ्काया असंभवस्य तत्रैवोक्तत्वाच्च। हननक्रियानिषेधः क्रियामात्रनिषेधस्योपलक्षणार्थः। असंहतस्यात्मस्वरुपस्य विदुषः कर्मासंभवात्प्रबलप्रारब्धवशाद्वाधितानुवृत्त्या। कर्मसंभवेऽपि तस्य कर्तृत्वाभिमानाभावेन कर्मणां फलाजनकत्वाद्वस्तुगत्या तेषासंभवस्य सुवचत्वात्। तस्मात्फलाभिसंधिकर्तृत्वाभिमानपूर्वको ज्ञस्य कर्मणि मुख्योऽधिकारः। ननु विद्यायामप्यविदुष एवाधिकारः। तथाच भाष्यंतमेतमविद्याख्यमात्मानात्मनोरितरेतराध्यासं पुरस्कृत्य सर्वे प्रमाणप्रेमयव्यवहारा लौकिका वैदिकाश्च प्रवृत्ताः सर्वाणि च शास्त्राणि विधिप्रतिषेधमोक्षपराणि कथं पुनरविद्यावद्विषयाणि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि शास्त्राणि चेति। उच्यते देहेन्द्रियादिष्वहंममाभिमानहीनस्य प्रमातृत्वानुपपत्तौ प्रमाणप्रवृत्त्यनुपपत्तेरित्यादि। अयमर्थः प्रमातृत्वं हि प्रमां प्रति कर्तृत्वं तच्च स्वातन्त्रयं स्वातन्त्रयं च इतरकारकाप्रयोज्यस्य प्रमातुः समस्तकारकप्रयोक्तृत्वं तदनेन प्रमाणं प्रयोजनीयं नच स्वव्यापारमन्तरेण करणं प्रयोक्तुं शक्यते इति। नहि कूटस्थनित्यश्चिदात्मा परिणामी स्वतो व्यापारवान्भवितुमर्हति तस्माद्य्वा पारवद्वुद्य्धादितादात्म्याध्यासाद्य्वापारवत्तया प्रमाणमधिष्कतुमर्हितीति भवत्यविद्यावत्पुरुषविषयत्वमविद्यावत्पुरुषाश्रयत्वं प्रमाणानामिति चेत्सत्यम्। तथापि कर्मनियोगार्थबोधानन्तरमहं कर्ता ममेदं कर्तव्यमित्येवंप्रकारज्ञानवतोऽनेकसाधनोपसंहारपूर्वकं यथाकर्मानुष्ठेयं न तथा न जायत इत्यादावात्मस्वरुपविध्यर्थज्ञानान्तरं किंचिदनुष्ठेयं भवति किंतु नाहं कर्ता न भोक्तेत्यादिज्ञानद्वयात्मैकत्वाकर्तृत्वाभोक्तृत्वज्ञानादन्यत्किंचिदनुष्ठेयं भवतीत्येष विशेष इति स्पष्टं चेदं भाष्ये।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| veda | knows |
| avināśhinam | imperishable |
| nityam | eternal |
| yaḥ | who |
| enam | this |
| ajam | unborn |
| avyayam | immutable |
| katham | how |
| saḥ | that |
| puruṣhaḥ | person |
| pārtha | Parth |
| kam | whom |
| ghātayati | causes to be killed |
| hanti | kills |
| kam | whom |
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यह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता। — VaniSagar
मनुष्य जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता है, ऐसे ही देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंमें चला जाता है। — VaniSagar
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“हे पृथानन्दन! जो मनुष्य इस शरीरीको अविनाशी, नित्य, जन्मरहित और अव्यय जानता है, वह कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये? — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 21 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 21 का हिंदी अर्थ: "हे पृथानन्दन! जो मनुष्य इस शरीरीको अविनाशी, नित्य, जन्मरहित और अव्यय जानता है, वह कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये? — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 21?
Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 21 translates to: "Whoever knows it to be indestructible, eternal, unborn, and inexhaustible, how can that person slay, O Arjuna, or cause to be slain? — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्। कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 21 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। हे पृथानन्दन! जो मनुष्य इस शरीरीको अविनाशी, नित्य, जन्मरहित और अव्यय जानता है, वह कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये? — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "vedāvināśhinaṁ nityaṁ ya enam ajam avyayam" mean in English?
"vedāvināśhinaṁ nityaṁ ya enam ajam avyayam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 21. Whoever knows it to be indestructible, eternal, unborn, and inexhaustible, how can that person slay, O Arjuna, or cause to be slain? — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.