Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 20
न जायते म्रियते वा कदाचि न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे

यह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

MarathiIND

तो जन्म घेत नाही, मरत नाही; झाल्यानंतर, ते पुन्हा होणे थांबत नाही; अजन्मा, शाश्वत, अपरिवर्तनीय आणि प्राचीन, शरीर मारले जाते तेव्हा ते मारले जात नाही.

TeluguIND

అది పుట్టదు, చనిపోదు; అయిన తర్వాత, అది మళ్లీ నిలిచిపోదు; పుట్టనిది, శాశ్వతమైనది, మార్పులేనిది మరియు పురాతనమైనది, శరీరం చంపబడినప్పుడు అది చంపబడదు.

GujaratiIND

તે જન્મતો નથી, કે તે ક્યારેય મૃત્યુ પામતો નથી; કર્યા પછી, તે ફરીથી થવાનું બંધ કરતું નથી; અજાત, શાશ્વત, પરિવર્તનહીન અને પ્રાચીન, જ્યારે શરીરને મારી નાખવામાં આવે છે ત્યારે તેની હત્યા કરવામાં આવતી નથી.

TamilIND

அது பிறப்பதும் இல்லை, இறப்பதும் இல்லை; இருந்த பிறகு, அது மீண்டும் நிற்காது; பிறக்காதது, நித்தியமானது, மாறாதது மற்றும் பழமையானது, உடலைக் கொல்லும்போது அது கொல்லப்படுவதில்லை.

BengaliIND

এর জন্ম হয় না, মৃত্যুও হয় না; থাকার পরে, এটি আবার হওয়া বন্ধ করে না; অজাত, চিরন্তন, পরিবর্তনহীন এবং প্রাচীন, মৃতদেহকে হত্যা করলে তা হত্যা করা হয় না।

PunjabiIND

ਇਹ ਨਾ ਜੰਮਦਾ ਹੈ, ਨਾ ਕਦੇ ਮਰਦਾ ਹੈ; ਹੋਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਇਹ ਦੁਬਾਰਾ ਨਹੀਂ ਰੁਕਦਾ; ਅਣਜੰਮੇ, ਸਦੀਵੀ, ਪਰਿਵਰਤਨ ਰਹਿਤ, ਅਤੇ ਪ੍ਰਾਚੀਨ, ਜਦੋਂ ਸਰੀਰ ਨੂੰ ਮਾਰਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਇਹ ਮਾਰਿਆ ਨਹੀਂ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

SindhiIND

نه ڄمندو آهي، نه ڪڏهن مرندو آهي. ٿيڻ کان پوء، اهو ٻيهر نه ٿيندو؛ اڻڄاتل، ابدي، بي بدل، ۽ قديم، اهو نه ماريو ويندو آهي جڏهن لاش کي ماريو وڃي.

KannadaIND

ಅದು ಹುಟ್ಟುವುದೂ ಇಲ್ಲ, ಸಾಯುವುದೂ ಇಲ್ಲ; ಆದ ನಂತರ, ಅದು ಮತ್ತೆ ನಿಲ್ಲುವುದಿಲ್ಲ; ಜನ್ಮವಿಲ್ಲದ, ಶಾಶ್ವತ, ಬದಲಾಗದ ಮತ್ತು ಪ್ರಾಚೀನ, ದೇಹವನ್ನು ಕೊಲ್ಲುವಾಗ ಅದು ಕೊಲ್ಲಲ್ಪಡುವುದಿಲ್ಲ.

MalayalamIND

അത് ജനിക്കുന്നില്ല, മരിക്കുന്നില്ല; ഉണ്ടായതിന് ശേഷവും അത് ഇല്ലാതാകുന്നില്ല; ജനിക്കാത്ത, ശാശ്വതമായ, മാറ്റമില്ലാത്ത, പുരാതനമായ, ശരീരം കൊല്ലപ്പെടുമ്പോൾ അത് കൊല്ലപ്പെടുന്നില്ല.

NepaliIND

न यो जन्मन्छ, न यो कहिल्यै मर्छ; भइसकेपछि, यो फेरि बन्द हुँदैन; अजन्मा, शाश्वत, अपरिवर्तनीय र पुरातन, यो शरीर मारिएपछि मारिएको छैन।

MaithiliIND

जन्म नहि होइत अछि, आ ने कहियो मरि जाइत अछि; भेलाक बाद फेरसँ रहब नहि छोड़ैत अछि; अजन्मा, शाश्वत, अपरिवर्तनीय, आ प्राचीन, शरीरक हत्या भेला पर नहि मारल जाइत अछि |

AssameseIND

জন্ম নহয়, কেতিয়াও মৃত্যুও নহয়; হোৱাৰ পিছত আকৌ হোৱাটো বন্ধ নহয়; অজাত, চিৰন্তন, অপৰিৱৰ্তিত আৰু প্ৰাচীন, শৰীৰক হত্যা কৰিলে ইয়াক হত্যা কৰা নহয়।

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.20।। व्याख्या --[शरीरमें छः विकार होते हैं--उत्पन्न होना, सत्तावाला दीखना, बदलना, बढ़ना, घटना और नष्ट होना । यह शरीरी इन छहों विकारोंसे रहित है--यही बात भगवान् इस श्लोकमें बता रहे हैं] । 'न जायते म्रियते वा कदाचिन्न'-- जैसे शरीर उत्पन्न होता है, ऐसे यह शरीरी कभी भी, किसी भी समयमें उत्पन्न नहीं होता। यह तो सदासे ही है। भगवान्ने इस शरीरीको अपना अंश बताते हुए इसको 'सनातन' कहा है 'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः' (15। 7)।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

आत्मा निर्विकार कैसे है इसपर दूसरा मन्त्र ( इस प्रकार है ) यह आत्मा उत्पन्न नहीं होता अर्थात् उत्पत्तिरूप वस्तुविकार आत्मामें नहीं होता और यह मरता भी नहीं। वा शब्द यहाँ च के अर्थमें है। मरता भी नहीं इस कथनसे विनाशरूप अन्तिम विकारका प्रतिषेध किया जाता है। कदाचित् शब्द सभी विकारोंके प्रतिषेधके साथ सम्बन्ध रखता है। जैसे यह आत्मा न कभी जन्मता है न कभी मरता है इत्यादि। जिससे कि यह आत्मा उत्पन्न होकर अर्थात् उत्पत्तिरूप विकारका अनुभव करके फिर अभावको प्राप्त होनेवाला नहीं है इसलिये मरता नहीं क्योंकि जो उत्पन्न होकर फिर नहीं रहता वह मरता है इस प्रकार लोकमें कहा जाता है। वा शब्दसे और न शब्दसे यह भी पाया जाता है कि यह आत्मा शरीरकी भाँति पहले न होकर फिर होनेवाला नहीं है इसलिये यह जन्मता नहीं क्योंकि जो न होकर फिर होता है वहीं जन्मता है यह कहा जाता है। आत्मा ऐसा नहीं है इसलिये नहीं जन्मता। ऐसा होनेके कारण आत्मा अज है और मरता नहीं इसलिये नित्य है। यद्यपि आदि और अन्तके दो विकारोंके प्रतिषेधसे ( बीचके ) सभी विकारोंका प्रतिषेध हो जाता है तो भी बीचमें होनेवाले विकारोंका भी उनउन विकारोंके प्रतिषेधार्थक खासखास शब्दोंद्वारा प्रतिषेध करना उचित है। इसलिये ऊपर न कहे हुए जो यौवनादि सब विकार हैं उनका भी जिस प्रकार प्रतिषेध हो ऐसे भावको शाश्वत इत्यादि शब्दोंसे कहते हैं सदा रहनेवालेका नाम शाश्वत है शाश्वत शब्दसे अपक्षय ( क्षय होना ) रूप विकारका प्रतिषेध किया जाता है क्योंकि आत्मा अवयवरहित है इस कारण स्वरूपसे उसका क्षय नहीं होता और निर्गुण होनेके कारण गुणोंके क्षयसे भी उसका क्षय नहीं होता। पुराण इस शब्दसे अपक्षयके विपरीत जो वृद्धिरूप विकार है उसका भी प्रतिषेध किया जाता है। जो पदार्थ किसी अवयवकी उत्पत्तिसे पुष्ट होता है। वह बढ़ता है नया हुआ है ऐसे कहा जाता है परंतु यह आत्मा तो अवयवरहित होनेके कारण पहले भी नया था अतः पुराण है अर्थात् बढ़ता नहीं। तथा शरीरका नाश होनेपर यानी विपरीत परिणामको प्राप्त हो जानेपर भी आत्मा नष्ट नहीं होता अर्थात् दुर्बलतादि अवस्थाको प्राप्त नहीं होता। यहाँ हन्ति क्रियाका अर्थ पुनरुक्तिदोषसे बचनेके लिये विपरीत परिणाम समझना चाहिये इसलिये यह अर्थ हुआ कि आत्मा अपने स्वरूपसे बदलता नहीं। इस मन्त्रमें लौकिक वस्तुओंमें होनेवाले छः भावविकारोंका आत्मामें अभाव दिखलाया जाता है। आत्मा सब प्रकारके विकारोंसे रहित है यह इस मन्त्रका वाक्यार्थ है। ऐसा होनेके कारण वे दोनों ही ( आत्मस्वरूपको ) नहीं जानते। इस प्रकार पूर्व मन्त्रसे इसका सम्बन्ध है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

तदेव साधयितुं न जायते म्रियते वा विपश्चिदित्यादिमन्त्रान्तरमवतारयति कथमिति। सर्वविक्रियाराहित्यप्रदर्शनेन हेतुं विशदयन्मन्त्रमेव पठति न जायत इति। जन्ममरणविक्रियाद्वयप्रतिषेधं साधयति नायमिति। अयमात्मा भूत्वा नाभविता न वा भूत्वा भूयो भवितेति योजना। न केवलं विक्रियाद्वयमेवात्र निषिध्यते किंतु सर्वमेव विक्रियाजातमित्याह अज इति। वाच्यमर्थमुक्त्वा विवक्षितमर्थमाह जनिलक्षणेति। विकल्पार्थत्वं व्यावर्तयति वेति। निष्पन्नमर्थं निर्दिशति नेत्यादिना। संबन्धमेवाभिनयति न कदाचिदिति। अन्त्यविक्रियाभावे हेतुत्वेन नायमित्यादि व्याचष्टे यस्मादिति। उक्तमेव व्यनक्ति यो हीति। आत्मनि तु भूत्वा पुनर्भवनाभावान्नास्ति मृत्युरित्यर्थः। आत्मनो जन्माभावेऽपि हेतुरिहैव विवक्षित इत्याह वाशब्दादिति। अभूत्वेति च्छेदः। देहवदिति व्यतिरेकोदाहरणम्। उक्तमेवार्थं साधयति यो हीति। जन्माभावे तत्पूर्विकास्तित्वविक्रियापि नात्मनोऽस्तीत्याह यस्मादिति। प्राणवियोगादात्मनो मृतेरभावे सावशेषनाशाभाववन्निरवशेषनाशाभावोऽपि सिध्यतीत्याह यस्मादिति। ननुजन्मनाशयोर्निषेधे तदन्तर्गतानां विक्रियान्तराणामपि निषेधसिद्धेस्तन्निषेधार्थं न पृथक्प्रयतितव्यमिति तत्राह यद्यपीति। स्वशब्दैः मध्यवर्तिविक्रियानिषेधवाचकैरिति यावत्। आर्थिकेऽपि निषेधे निषेधस्य सिद्धतया शाब्दो निषेधो न पृथगर्थवानित्याशङ्क्याह अनुक्तानामिति। नित्यशब्देन शाश्वतशब्दस्य पौनरुक्त्यं परिहरन्व्याकरोति शाश्वत इत्यादिना। अपक्षयो हि स्वरूपेण वा स्याद्गुणापचयतो वेति विकल्प्य क्रमेण दूषयति नेत्यादिना। पुराणपदस्यागतार्थत्वं कथयति अपक्षयेति। तदेव स्फुटयति यो हीति। न म्रियते वेत्यनेन चतुर्थपादस्य पौनरुक्त्यमाशङ्क्य व्याचष्टे तथेत्यादिना। ननु हिंसार्थो हन्तिः श्रूयते तत्कथं विपरिणामो निषिध्यते तत्राह हन्तिरिति। हिंसार्थत्वसंभवे किमित्यर्थान्तरं हन्तेरिष्यते तत्राह अपुनरुक्तताया इति। हिंसार्थत्वे मृतिनिषेधेन पौनरुक्त्यं स्यात्तन्निषेधार्थं विपरिणामार्थत्वमेष्टव्यमित्यर्थः। पूर्वावस्थात्यागेनावस्थान्तरापत्तिर्विपरिणामस्तदर्थश्चेदत्र हन्तिरिष्यते तदा निष्पन्नमर्थमाह नेति। न जायत इत्यादिमन्त्रार्थमुपसंहरति अस्मिन्निति। षण्णां विकाराणामात्मनि प्रतिषेधे फलितमाह सर्वेति। आत्मनः सर्वविक्रियाराहित्येऽपि किमायातमित्याशङ्क्याह यस्मादिति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

जायतेऽस्ति वर्धते विपरिणमतेऽपक्षीयते विनश्यति इति यास्कोक्तान्षड्भावविकारानात्मनि निराकुर्वंस्तस्याविक्रियत्वं साधयति नेति। कदाचित्पदं सर्वविक्रियाप्रतिषेधैः पदैः संबन्धनीयम्। न कदाचिज्जायते यतोऽयमात्मा न भूत्वा भूयः पुनर्भविता न यस्माच्च भूत्वा भवनक्रियामनुभूय भूयोऽभविताऽभावं गन्ता वा न तस्मान्न कदाचिन्म्रियते च। वाशब्दश्चार्थे। यद्वा अयं ना पुरुषो भूत्वा पुनर्भविता न अस्ति विक्रिययोग्यो नच भवतीत्यर्थः। अस्मिन्पक्षे द्वितीयोऽपि वाशब्दश्चार्थे। उक्तरीत्या ना अयमिति च्छेते पूर्वनकारस्य म्रियते इत्यनेन संबन्धः। न अयमिति च्छेदे त्वस्येति बोध्यम्। भाष्यकृद्भिस्तु सुगमत्वादयमर्थस्त्यक्तः। यतो न जायतेऽतोऽजः यतो न म्रियतेऽतो नित्यः। ये त्वन्ये अस्तु तर्हि क्षणिकविज्ञानधारारुपः तस्य विज्ञानवादिभिरजत्वनित्यत्वाभ्युपगमादित्याशङ्क्याह भूत्वा भविता वा न भूय इति। अयमित्यनुवर्तते। अयं भूत्वा भूयो भविता न भूयोऽसकृद्भूत्वा भवितेति भवनक्रियाद्वयस्य क्त्वाप्रत्ययोक्तसमानकर्तृत्वधारैव साभिप्रायेण भूत्वैव भविता नतु भूत्वा स्थित्वा विनश्यति तार्किकाणां हि विज्ञानं उत्पत्तिस्थितिनाशक्षणव्यापित्वात् त्रिक्षणावस्थायिविज्ञानवादिनां तु पूर्वस्य नाशक्षण एवोत्तरस्योत्पत्तिक्षणः सएव तस्य स्थितिक्षण श्चेति क्षणिकत्वाद्विज्ञानानां भवनक्रियाद्वयस्याव्यवधानाद्भूत्वा भवितेत्युक्तम्। तादृशोऽप्ययं नेत्यादिवर्णयन्ति तैर्विकारनिषेधोपक्रमादिविरोधस्य परिहारः प्रदर्शनीयः। एतेनाज्ञत्वान्न जायते नित्यत्वान्न म्रियते इत्यपि प्रत्युक्तम्। नायं भूत्वेत्यादेर्हेतुत्वस्य भाष्यकारैः प्रदर्शितत्वेन न जायत इत्यादेरेव हेतुत्वौचित्यात्। एवं जन्मनाशास्तित्वरुपविकारत्रयं निराकृत्यावशिष्टान्विकारान्निराकरोति शाश्वत इत्यादिना। शश्वद्भवः शाश्वत इत्यनेनापक्षयस्य निरवयवत्वान्निर्गुणत्वात्। पुराप्यभिनवः पुराण इत्यनेन वृद्धिरुपस्य हन्यमाने विपरिणम्यमाने शरीरे न हन्यते न विपरिणभ्यत इत्यनेन विपरिणाभस्य विकारस्य प्रतिषेधः। तथाच भाष्यम्हन्तिरत्र विपरिणामार्थो द्रष्टव्योऽपुनरुक्तातायै। अस्मिन्श्लोके षट्भावविकारा लौकिकवस्तुविक्रिया आत्मनि प्रतिषिध्यन्ते। सर्वप्रकारविक्रियारहित आत्मेति वाक्यार्थः। यस्मादेवं तस्मादुभौ तौ न विजानीत इति पूर्वेण संबन्ध इति। एतेनास्तित्वपरिणामौ जन्मविनाशान्तर्भूतत्वात्पृथङ्न निषिद्धौ यस्मादेतत्सर्वविकारशून्य आत्मा तस्माच्छरीरे हन्यमाने तत्संबद्धोऽपि केनाप्युपायेन न हन्यते न हन्तुं शक्यते इत्युपसंहार इति प्रत्युक्तम्। आद्यन्तविकारयोर्निषेधे मध्यतनानां निषेधे सिद्धेऽपि तेषामुपादानमवस्थान्तरक्रियान्तरोपलक्षणार्थम्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
na jāyateis not born
mriyatedies
or
kadāchitat any time
nanot
ayamthis
bhūtvāhaving once existed
bhavitāwill be
or
nanot
bhūyaḥfurther
ajaḥunborn
nityaḥeternal
śhāśhvataḥimmortal
ayamthis
purāṇaḥthe ancient
na hanyateis not destroyed
hanyamāneis destroyed
śharīrewhen the body
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.19
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते

जो मनुष्य इस अविनाशी शरीरीको मारनेवाला मानता है और जो मनुष्य इसको मरा मानता है, वे दोनों ही इसको नहीं जानते; क्योंकि यह न मारता है और न मारा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.21
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्। कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्

हे पृथानन्दन! जो मनुष्य इस शरीरीको अविनाशी, नित्य, जन्मरहित और अव्यय जानता है, वह कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये? — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 20
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 20
न जायते म्रियते वा कदाचि न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे

यह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ: "यह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 20?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 20 translates to: "It is not born, nor does it ever die; after having been, it again does not cease to be; unborn, eternal, changeless, and ancient, it is not killed when the body is killed. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"न जायते म्रियते वा कदाचि न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पु" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 20 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। यह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "na jāyate mriyate vā kadāchin" mean in English?

"na jāyate mriyate vā kadāchin" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 20. It is not born, nor does it ever die; after having been, it again does not cease to be; unborn, eternal, changeless, and ancient, it is not killed when the body is killed. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.