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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 19
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते

जो मनुष्य इस अविनाशी शरीरीको मारनेवाला मानता है और जो मनुष्य इसको मरा मानता है, वे दोनों ही इसको नहीं जानते; क्योंकि यह न मारता है और न मारा जाता है। — VaniSagar

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TeluguIND

నేనే సంహారకుడిగా భావించేవాడు మరియు చంపబడ్డాడని భావించేవాడు, ఇద్దరికీ తెలియదు. అది చంపబడదు, చంపబడదు.

MarathiIND

जो स्वतःला मारक मानतो आणि जो त्याला मारला जातो असे समजतो, ते दोघांनाही कळत नाही. तो मारत नाही, मारला जात नाही.

GujaratiIND

જે આત્મને હત્યા કરનાર માને છે અને જે માને છે કે તે માર્યો ગયો છે, તે બંનેમાંથી કોઈ જાણતું નથી. તે મારતું નથી, મારતું નથી.

BengaliIND

যে নফসকে হত্যাকারী মনে করে এবং যে এটিকে নিহত মনে করে, তারা কেউই জানে না। এটি হত্যা করে না, এটি হত্যাও নয়।

MalayalamIND

സ്വയം കൊല്ലുന്നവനും അത് കൊല്ലപ്പെട്ടുവെന്ന് കരുതുന്നവനും അറിയില്ല. അത് കൊല്ലുന്നില്ല, കൊല്ലപ്പെടുന്നില്ല.

PunjabiIND

ਜੋ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਕਾਤਲ ਸਮਝਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਜੋ ਇਸ ਨੂੰ ਮਾਰਿਆ ਹੋਇਆ ਸਮਝਦਾ ਹੈ, ਦੋਹਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦਾ। ਇਹ ਨਾ ਮਾਰਦਾ ਹੈ, ਨਾ ਮਾਰਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

SindhiIND

جيڪو پاڻ کي قاتل سمجهي ٿو ۽ جيڪو سمجهي ٿو ته ان کي مقتول آهي، انهن مان ڪنهن کي به خبر ناهي. اهو نه ماريندو آهي ۽ نه ئي قتل ٿيندو آهي.

KannadaIND

ಆತ್ಮವನ್ನು ಸಂಹಾರಕನೆಂದು ತೆಗೆದುಕೊಳ್ಳುವವನು ಮತ್ತು ಅದನ್ನು ಕೊಲ್ಲುತ್ತಾನೆ ಎಂದು ಭಾವಿಸುವವನು, ಇಬ್ಬರಿಗೂ ತಿಳಿದಿಲ್ಲ. ಅದು ಕೊಲ್ಲುವುದಿಲ್ಲ, ಕೊಲ್ಲುವುದೂ ಇಲ್ಲ.

BhojpuriIND

जे आत्म के हत्यारा मान लेला आ जे ओकरा के मारल समझेला, ऊ दुनु में से केहू के पता ना चलेला। ना मारेला, ना मारल जाला।

AssameseIND

যিয়ে আত্মাক বধক বুলি লয় আৰু যিয়ে ইয়াক বধ বুলি ভাবে, তেওঁ দুয়োৰে কোনোৱেই নাজানে। ই বধ নকৰে, বধও নহয়।

TamilIND

தன்னைக் கொல்பவன் என்று எடுத்துக் கொள்பவனும், அது கொல்லப்பட்டதாக நினைப்பவனும், இருவருக்குமே தெரியாது. அது கொல்லப்படவும் இல்லை, கொல்லப்படவும் இல்லை.

MaithiliIND

जे आत्म के वधक मानैत अछि आ जे ओकरा मारल बुझैत अछि, ओकरा दुनू मे सँ कियो नहि जनैत अछि । नै मारै छै, नै मारै छै।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.19।। व्याख्या-- 'य एनं वेत्ति हन्तारम्'-- जो इस शरीरीको मारनेवाला मानता है; वह ठीक नहीं जानता। कारण कि शरीरीमें कर्तापन नहीं है। जैसे कोई भी कारीगर कैसा ही चतुर क्यों न हो, पर किसी औजारके बिना वह कार्य नहीं कर सकता, ऐसे ही यह शरीरी शरीरके बिना स्वयं कुछ भी नहीं कर सकता। अतः तेरहवें अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि सब प्रकारकी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं--ऐसा जो अनुभव करता है, वह शरीरीके अकर्तापनका अनुभव करता है (13। 29)। तात्पर्य यह हुआ है कि शरीरमें कर्तापन नहीं है, पर यह शरीरके साथ तादात्म्य करके, सम्बन्ध जोड़कर शरीरसे होनेवाले क्रियाओंमें अपनेको कर्ता मान लेता है। अगर यह शरीरके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े, तो यह किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं है। 'यश्चैनं मन्यते हतम्'-- जो इसको मरा मानता है, वह भी ठीक नहीं जानता। जैसे यह शरीरी मारनेवाला नहीं है, ऐसे ही यह मरनेवाला भी नहीं है; क्योंकि इसमें कभी कोई विकृति नहीं आती। जिसमें विकृति आती है, परिवर्तन होता है अर्थात् जो उत्पत्ति-विनाशशील होता है, वही मर सकता है। 'उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते'-- वे दोनों ही नहीं जानते अर्थात् जो इस शरीरीको मारनेवाला मानता है, वह भी ठीक नहीं जानता और जो इसको मरनेवाला मानता है वह भी ठीक नहीं जानता। यहाँ प्रश्न होता है कि जो इस शरीरीको मारनेवाला और मरनेवाला दोनों मानता है, क्या वह ठीक जानता है? इसका उत्तर है कि वह भी ठीक नहीं जानता। कारण कि यह शरीरी वास्तवमें ऐसा नहीं है। यह नाश करनेवाला भी नहीं है और नष्ट होनेवाला भी नहीं है। यह निर्विकाररूपसे नित्यनिरन्तर ज्यों-का-त्यों रहनेवाला है। अतः इस शरीरीको लेकर शोक नहीं करना चाहिये। अर्जुनके सामने युद्धका प्रसंग होनेसे ही यहाँ शरीरीको मरने-मारनेकी क्रियासे रहित बताया गया है। वास्तवमें यह सम्पूर्ण क्रियाओंसे रहित है। सम्बन्ध -- यह शरीरी मरनेवाला क्यों नहीं है इसके उत्तरमें कहते हैं

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Sri Harikrishnadas Goenka

जो तू मानता है कि मेरेद्वारा युद्धमें भीष्मादि मारे जायँगे मैं ही उनका मारनेवाला हूँ यह तेरी बुद्धि ( भावना ) सर्वथा मिथ्या है। कैसे जिसका वर्णन ऊपरसे आ रहा है इस आत्माको जो मारनेवाला समझता है अर्थात् हननक्रियाका कर्ता मानता है और जो दूसरा ( कोई ) इस आत्माको देहके नाशसे मैं नष्ट हो गया ऐसे नष्ट हुआ मानता है अर्थात् हननक्रियाका कर्म मानता है। वे दोनों ही अहंप्रत्ययके विषयभूत आत्माको अविवेकके कारण नहीं जानते। अभिप्राय यह कि जो शरीरके मरनेसे आत्माको मैं मारनेवाला हूँ मैं मारा गया हूँ इस प्रकार जानते हैं वे दोनों ही आत्मस्वरूपसे अनभिज्ञ हैं। क्योंकि यह आत्मा विकाररहित होनेके कारण न तो किसीको मारता है और न मारा जाता है अर्थात् न तो हननक्रियाका कर्ता होता है और न कर्म होता है।

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Sri Anandgiri

अविनाशि तु तद्विद्धि इत्यत्र पूर्वार्धेन तत्पदार्थसमर्थनमुत्तरार्धेन निरीश्वरवादस्य परिणामवादस्य वा निराकरणमात्मनि जन्मादिप्रतिभानस्यौपचारिकत्वप्रदर्शनार्थमन्तवन्त इत्यादि वचनमिति केचित्। अस्तु नामायमपि पन्थाः। पूर्वोक्तस्य गीताशास्त्रार्थस्योत्प्रेक्षामात्रमूलत्वं निराकर्तुं मन्त्रद्वयं भगवानानीतवानिति श्लोकद्वयस्य संगतिं दर्शयति शोकमोहादीति। तत्र प्रथममन्त्रस्य संगतिमाह यत्त्विति। प्रत्यक्षनिबन्धनत्वादमुष्या बुद्धेर्मृषात्वमयुक्तमित्याक्षिपति कथमिति। प्रत्यक्षस्याज्ञानप्रसूतत्वेनाभासत्वात्तत्कृता बुद्धिर्न प्रमेति परिहरति य एनमिति। हन्ता चेन्मन्यते हन्तुम् इत्याद्यामृचमर्थतो दर्शयित्वा व्याचष्टे य एनमिति। हन्तारं हतं वात्मानं मन्यमानस्य कथमज्ञानमित्याशङ्क्याह हन्ताहमिति। हन्तृत्वादिज्ञानमज्ञानमित्यत्र हेतुमाह यस्मादिति। आत्मनो हननं प्रति कर्तृत्वकर्मत्वयोरभावे हेतुं दर्शयति अविक्रियत्वादिति।

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Sri Dhanpati

अहमेतेषां हन्ता मयैते हन्यन्त इत्यर्जुनबुद्धेर्मृषात्वबोधनाय ऋचावुदाहरति य इति। युत्तु नन्वेवमशोच्यानित्यादिना बन्धुविच्छेदनिबन्धने शोकेऽपनीतेऽपि तद्वधकर्तृत्वनिबन्धनपापस्य नास्ति प्रतीकारः शोकाविषयेऽपि द्वेष्यब्राह्मणवधे पापस्य सत्त्वात्। अतः कर्तुर्मम प्रेरकस्य तव च हिंसानिमित्तपापापत्तेरयुक्तमिदं वचनं तस्मादित्यादीत्याशङ्कां काठकपठितयर्चा परिहरति य इति तद्विचार्यम्। ऋषि हन्त्रादेः पापं न जायते इति परिहारस्यानुक्तेः वधनिबन्धनबन्धुविच्छेदस्यात्मनित्यवप्रतिपादकपूर्वग्रन्थेन नाशाभावोक्त्या प्रतिषिद्धत्वेन तन्निबन्धनपापस्यापि निवारितत्वाच्छङ्काया अनुत्थानात्। यस्मादेवं प्रागुक्तन्यायेन नित्यो विभुरसंसारी सर्वदैकरुपश्चात्मा तस्मात्तन्नाशशङ्क्या स्वधर्मे युद्धे प्राक्प्रवृत्तस्य तव तस्मादुपरतिर्न युक्तेति स्वपूर्वोक्तिविरोधात् द्वेष्यब्राह्मणवधे शोकाभावे द्वेष्यत्वस्य हेतोः पापासाधकत्वेन दृष्टान्तस्य वैषम्यात् संघातवधनिबन्धनपापाभावस्याग्रिमग्रन्थेन क्षत्रधर्मबोधकेन वक्ष्यमाणत्वाच्च। नत्वेवाद्येकोनविंशतिश्लोकैरशोच्यानन्वशोचस्त्वमित्यतस्य विवरणं क्रियतेस्वधर्ममपि चावेक्ष्य इत्यष्टभिः श्लोकैःप्रज्ञावादांश्च भाषस इत्यस्य मोहद्वयस्य पृथग्प्रयत्ननिराकर्तव्यत्वादिति स्वपूर्वग्रन्थविरोधाच्चेत्यास्तां तावत्। य एनमात्मानं हननक्रियायाः कर्तारं यश्च तस्याः कर्म जानाति तौ द्वौ देहात्मबुद्धिमत्त्वेन भ्रान्तौ न विजानीतः। यतोऽयमात्मा देहभिन्नोऽविक्रियत्वाद्धननक्रियायाः कर्ता ततएव कर्म च न भवतीत्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yaḥone who
enamthis
vettiknows
hantāramthe slayer
yaḥone who
chaand
enamthis
manyatethinks
hatamslain
ubhauboth
tauthey
nanot
vijānītaḥin knowledge
naneither
ayamthis
hantislays
nanor
hanyateis killed
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.18
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत

अविनाशी, अप्रमेय और नित्य रहनेवाले इस शरीरी के ये देह अन्तवाले कहे गये हैं। इसलिये हे अर्जुन! तुम युद्ध करो। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.20
न जायते म्रियते वा कदाचि न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे

यह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 19
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 19
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते

जो मनुष्य इस अविनाशी शरीरीको मारनेवाला मानता है और जो मनुष्य इसको मरा मानता है, वे दोनों ही इसको नहीं जानते; क्योंकि यह न मारता है और न मारा जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 19 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 19 का हिंदी अर्थ: "जो मनुष्य इस अविनाशी शरीरीको मारनेवाला मानता है और जो मनुष्य इसको मरा मानता है, वे दोनों ही इसको नहीं जानते; क्योंकि यह न मारता है और न मारा जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 19?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 19 translates to: "He who takes the Self to be the slayer and he who thinks it is slain, neither of them knows. It does not slay, nor is it slain. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 19 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। जो मनुष्य इस अविनाशी शरीरीको मारनेवाला मानता है और जो मनुष्य इसको मरा मानता है, वे दोनों ही इसको नहीं जानते; क्योंकि यह न मारता है और न मारा जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "ya enaṁ vetti hantāraṁ yaśh chainaṁ manyate hatam" mean in English?

"ya enaṁ vetti hantāraṁ yaśh chainaṁ manyate hatam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 19. He who takes the Self to be the slayer and he who thinks it is slain, neither of them knows. It does not slay, nor is it slain. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.