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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 18
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत

अविनाशी, अप्रमेय और नित्य रहनेवाले इस शरीरी के ये देह अन्तवाले कहे गये हैं। इसलिये हे अर्जुन! तुम युद्ध करो। — VaniSagar

Global Translations

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GujaratiIND

મૂર્તિમંત સ્વના આ શરીરો, જે શાશ્વત, અવિનાશી અને અમાપ છે, તેનો અંત કહેવાય છે. માટે હે અર્જુન, લડ.

TeluguIND

శాశ్వతమైన, నాశనం చేయలేని మరియు అపరిమితమైన ఈ మూర్తీభవించిన నేనే యొక్క ఈ శరీరాలకు ముగింపు ఉందని చెప్పబడింది. కాబట్టి, ఓ అర్జునా, పోరాడు.

MarathiIND

शाश्वत, अविनाशी आणि अथांग असलेल्या या मूर्तस्वरूपाच्या देहांचा अंत आहे असे म्हणतात. म्हणून हे अर्जुना, युद्ध कर.

MalayalamIND

ശാശ്വതവും, നാശമില്ലാത്തതും, അളവറ്റതും ആയ, മൂർത്തീഭാവമുള്ള ഈ ആത്മശരീരങ്ങൾക്ക് അവസാനമുണ്ടെന്ന് പറയപ്പെടുന്നു. അതുകൊണ്ട് അർജ്ജുനാ, യുദ്ധം ചെയ്യുക.

BengaliIND

মূর্ত আত্মার এই দেহগুলি, যা চিরন্তন, অবিনশ্বর এবং অপরিমেয়, তাদের শেষ বলা হয়। অতএব হে অর্জুন যুদ্ধ কর।

SindhiIND

انهن جسمن جو مجسمو خود، جيڪي ابدي، ناقابل تباهي ۽ بيشمار آهن، انهن کي چئبو آهي ختم ٿيڻ. تنهن ڪري، اي ارجن، وڙهندي.

PunjabiIND

ਇਹ ਸਰੂਪ ਆਤਮਾਂ ਦੇ ਸਰੀਰ, ਜੋ ਅਨਾਦਿ, ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਅਤੇ ਅਥਾਹ ਹਨ, ਨੂੰ ਅੰਤ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਲੜ।

TamilIND

நித்தியமான, அழியாத, அளவிட முடியாத உருவான சுயத்தின் இந்த உடல்களுக்கு முடிவு இருப்பதாக கூறப்படுகிறது. எனவே, போரிடு, ஓ அர்ஜுனா.

NepaliIND

शाश्वत, अविनाशी र अथाह छन्, यी मूर्त आत्माका शरीरहरूको अन्त्य भनिन्छ। त्यसैले हे अर्जुन लड।

OdiaIND

ସନ୍ନିବେଶିତ ଆତ୍ମର ଏହି ଶରୀରଗୁଡ଼ିକ, ଯାହା ଅନନ୍ତ, ଅବିସ୍ମରଣୀୟ ଏବଂ ଅମୂଲ୍ୟ, ସେମାନଙ୍କର ସମାପ୍ତ ହେବ ବୋଲି କୁହାଯାଏ | ତେଣୁ, ଅର୍ଜୁନ, ଯୁଦ୍ଧ କର |

MaithiliIND

सनातन, अविनाशी आ अप्रमेय शरीरक एहि शरीर सभक अंत कहल जाइत अछि | तेँ लड़ू हे अर्जुन।

BhojpuriIND

मूर्त आत्म के एह शरीरन के जवन शाश्वत, अविनाशी आ अथाह होला, के अंत कहल जाला। एही से लड़ाई करऽ हे अर्जुन।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.18।। व्याख्या -- 'अनाशिनः'-- किसी कालमें, किसी कारणसे कभी किञ्चिन्मात्र भी जिसमें परिवर्तन नहीं होता, जिसकी क्षति नहीं होती, जिसका अभाव नहीं होता, उसका नाम 'अनाशी' अर्थात् अविनाशी है। 'अप्रमेयस्य'-- जो प्रमा-(प्रमाण-)का विषय नहीं है अर्थात् जो अन्तःकरण और इन्द्रियोंका विषय नहीं है, उसको 'अप्रमेय' कहते हैं। जिसमें अन्तःकरण और इन्द्रियाँ प्रमाण नहीं होतीं, उसमें शास्त्र और सन्त-महापुरुष ही प्रमाण होते हैं, शास्त्र और सन्त-महापुरुष उन्हींके लिये प्रमाण होते हैं, जो श्रद्धालु हैं। जिसकी जिस शास्त्र और सन्तमें श्रद्धा होती है, वह उसी शास्त्र और सन्तके वचनोंको मानता है। इसलिये यह तत्त्व केवल श्रद्धाका विषय है, प्रमाणका विषय नहीं। शास्त्र और सन्त किसीको बाध्य नहीं करते कि तुम हमारेमें श्रद्धा करो। श्रद्धा करने अथवा न करनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है। अगर वह शास्त्र और सन्तके वचनोंमें श्रद्धा करेगा, तो यह तत्त्व उसकी श्रद्धाका विषय है; और अगर वह श्रद्धा नहीं करेगा, तो यह तत्त्व उसकी श्रद्धाका विषय नहीं है। 'नित्यस्य'-- यह नित्य-निरन्तर रहनेवाला है। किसी कालमें यह न रहता हो--ऐसी बात नहीं है अर्थात् यह सब कालमें सदा ही रहता है। 'अन्तवन्त इमे देहा उक्ताः शरीरिणः'-- इस अविनाशी, अप्रमेय और नित्य शरीरीके सम्पूर्ण संसारमें जितने भी शरीर हैं, वे सभी अन्तवाले कहे गये हैं। अन्तवाले कहनेका तात्पर्य है कि इनका प्रतिक्षण अन्त हो रहा है। इनमें अन्तके सिवाय और कुछ है ही नहीं, केवल अन्त-ही-अन्त है। उपर्युक्त पदोंमें शरीरीके लिये तो एकवचन दिया है और शरीरोंके लिये बहुवचन दिया है। इसका एक कारण तो यह है कि प्रत्येक प्राणीके स्थूल, सूक्ष्म और कारण--ये तीन शरीर होते हैं। दूसरा कारण यह है कि संसारके सम्पूर्ण शरीरोंमें एक ही शरीरी व्याप्त है। आगे चौबीसवें श्लोकमें भी इसको 'सर्वगतः' पदसे सबमें व्यापक बतायेंगे। यह शरीरी तो अविनाशी है और इसके कहे जानेवाले सम्पूर्ण शरीर नाशवान् हैं। जैसे अविनाशीका कोई विनाश नहीं कर सकता, ऐसे ही नाशवान्को कोई अविनाशी नहीं बना सकता। नाशवान्का तो विनाशीपना ही नित्य रहेगा अर्थात् उसका तो नाश ही होगा। विशेष बात यहाँ 'अन्तवन्त इमे देहाः' कहनेका तात्पर्य है कि ये जो देह देखनेमें आते हैं, ये सब-के-सब नाशवान् हैं। पर ये देह किसके हैं? 'नित्यस्य', 'अनाशिनः'-- ये देह नित्यके हैं, अविनाशीके हैं। तात्पर्य है कि नित्य-तत्त्वने, जिसका कभी नाश नहीं होता, इनको अपना मान रखा है। अपना माननेका अर्थ है कि अपनेको शरीरमें रख दिया और शरीरको अपनेमें रख लिया। अपनेको शरीरमें रखनेसे 'अहंता' अर्थात् 'मैं'-पन पैदा हो गया और शरीरको अपनेमें रखनेसे ममता अर्थात् मेरापन पैदा हो गया। यह स्वयं जिन-जिन चीजोंमें अपनेको रखता चला जाता है, उन-उन चीजोंमें 'मैं'-पन होता ही चला जाता है; जैसे--अपनेको धनमें रख दिया तो 'मैं धनी हूँ'; अपनेको राज्यमें रख दिया तो 'मैं राजा हूँ'; अपनेको विद्यामें रख दिया तो 'मैं विद्वान् हूँ'; अपनेको बुद्धिमें रख दिया तो 'मैं बुद्धिमान् हूँ'; अपनेको सिद्धियों में ख दिया तो 'मैं सिद्ध हूँ'; अपनेको शरीरमें रख दिया तो 'मैं शरीर हूँ'; आदि-आदि। यह स्वयं जिन-जिन चीजोंको अपनेमें रखता चला जाता है, उन-उन चीजोंमें 'मेरा'-पन होता ही चला जाता है; जैसे--कुटुम्बको अपनेमें रख लिया तो 'कुटुम्ब मेरा है'; धनको अपनेमें रख लिया तो 'धन मेरा है'; बुद्धिको अपनेमें रख लिया तो ;बुद्धि मेरी है'; शरीरको अपनेमें रख लिया तो 'शरीर मेरा है'; आदि-आदि। जडताके साथ 'मैं' और 'मेरा'-पन होनेसे ही मात्र विकार पैदा होते हैं। तात्पर्य है कि शरीर और मैं (स्वयं)--दोनों अलग-अलग हैं, इस विवेकको महत्त्व न देनेसे ही मात्र विकार पैदा होते हैं। परन्तु जो इस विवेकको आदर देते हैं महत्व देते हैं वे पण्डित होते हैं। ऐसे पण्डितलोग कभी शोक नहीं करते; क्योंकि सत् सत् ही है और असत् असत् ही है--इसका उनको ठीक अनुभव हो जाता है। 'तस्मात् युध्यस्व'-- भगवान् अर्जुनके लिये आज्ञा देते हैं कि सत्-असत् को ठीक समझकर तुम युद्ध करो अर्थात् प्राप्त कर्तव्यका पालन करो। तात्पर्य है कि शरीर तो अन्तवाला है और शरीरी अविनाशी है। इन दोनों--शरीर--शरीरीकी दृष्टिसे शोक बन ही नहीं सकता। अतः शोकका त्याग करके युद्ध करो। विशेष बात यहाँ सत्रहवें और अठारहवें--इन दोनों श्लोकोंमें विशेषतासे सत्तत्त्वका ही विवेचन हुआ है। कारण कि इस पूरे प्रकरणमें भगवान्का लक्ष्य सत्का बोध करानेमें ही है। सत्का बोध हो जानेसे असत्की निवृत्ति स्वतः हो जाती है। फिर किसी प्रकारका किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता। इस प्रकार सत्का अनुभव करके निःसंदिग्ध होकर कर्तव्यका पालन करना चाहिये। इस विवेचनसे यह बात सिद्ध होती है कि सांख्ययोग एवं कर्मयोगमें किसी विशेष वर्ण और आश्रमकी आवश्यकता नहीं है। अपने कल्याणके लिये चाहे सांख्ययोगका अनुष्ठान करे, चाहे कर्मयोगका अनुष्ठान करे, इसमें मनुष्यकी पूर्ण स्वतन्त्रता है। परन्तु व्यावहारिक काम करनेमें वर्ण और आश्रमके अनुसार शास्त्रीय विधानकी परम आवश्यकता है, तभी तो यहाँ सांख्ययोगके अनुसार सत्-असत् को विवेचन करते हुए भगवान् युद्ध करनेकी अर्थात् कर्तव्य-कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं। आगे तेरहवें अध्यायमें जहाँ ज्ञानके साधनोंका वर्णन किया गया है, वहाँ भी 'असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु'-- (13। 9) कहकर पुत्र, स्त्री, घर आदिकी आसक्तिका निषेध किया है। अगर संन्यासी ही सांख्य-योगके अधिकारी होते तो पुत्र, स्त्री, घर आदिमें आसक्ति-रहित होनेके लिये कहनेकी आवश्यकता ही नहीं थी; क्योंकि संन्यासीके पुत्र-स्त्री आदि होते ही नहीं। इस तरह गीतापर विचार करनेसे सांख्ययोग एवं कर्मयोग--दोनों परमात्मप्राप्तिके स्वतन्त्र साधन सिद्ध हो जाते हैं। ये किसी वर्ण और आश्रमपर किञ्चिन्मात्र भी अवलम्बित नहीं हैं। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकतक शरीरीको अविनाशी जाननेवालोंकी बात कही। अब उसी बातको अन्वय और व्यतिरेकरीतिसे दृढ़ करनेके लिये जो शरीरीको अविनाशी नहीं जानते उनकी बात आगेके श्लोकमें कहते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तो फिर वह असत् पदार्थ क्या है जो अपनी सत्ताको छो़ड़ देता है ( जिसकी स्थिति बदल जाती है ) इसपर कहते हैं जिनका अन्त होता है विनाश होता है वे सब अन्तवाले हैं। जैसे मृगतृष्णादिमें रहनेवाली जलविषयक सत्बुद्धि प्रमाणद्वारा निरूपण की जानेके बाद विच्छिन्न हो जाती है वही उसका अन्त है वैसे ही ये सब शरीर अन्तवान् हैं तथा स्वप्न और मायाके शरीरादिकी भाँति भी ये सब शरीर अन्तवाले हैं। इसलिये इस अविनाशी अप्रमेय शरीरधारी नित्य आत्माके ये सब शरीर विवेकी पुरुषोंद्वारा अन्तवाले कहे गये हैं। यह अभिप्राय है। नित्य और अविनाशी यह कहना पुनरुक्ति नहीं है क्योंकि संसारमें नित्यत्वके और नाशके दोदो भेद प्रसिद्ध हैं। जैसे शरीर जलकर भस्मीभूत हुआ अदृश्य होकर भी नष्ट हो गया कहलाता है और रोगादिसे युक्त हुआ विपरीत परिणामको प्राप्त होकर विद्यमान रहता हुआ भी नष्ट हो गया कहलाता है। अतः अविनाशी और नित्य इन दो विशेषणोंका यह अभिप्राय है कि इस आत्माका दोनों प्रकारके ही नाशसे सम्बन्ध नहीं है। ऐसे नहीं कहा जाता तो आत्माका नित्यत्व भी पृथ्वी आदि भूतोंके सदृश होता। परंतु ऐसा नहीं होना चाहिये इसलिये इसको अविनाशी और नित्य कहा है। प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे जिसका स्वरूप निश्चित नहीं किया जा सके वह अप्रमेय है। पू0 जब कि शास्त्रद्वारा आत्माका स्वरूप निश्चित किया जाता है तब प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उसका जान लेना तो पहले ही सिद्ध हो चुका ( फिर वह अप्रमेय कैसे है ) । उ0 यह कहना ठीक नहीं क्योंकि आत्मा स्वतः सिद्ध है। प्रमातारूप आत्माके सिद्ध होनेके बाद ही जिज्ञासुकी प्रमाणविषयक खोज ( शुरू ) होती है। क्योंकि मै अमुक हूँ इस प्रकार पहले अपनेको बिना जाने ही अन्य जाननेयोग्य पदार्थको जाननेके लिये कोई प्रवृत्त नहीं होता। तथा अपना आपा किसीसे भी अप्रत्यक्ष ( अज्ञात ) नहीं होता है। शास्त्र जो कि अन्तिम प्रमाण है वह आत्मामें किये हुए अनात्मपदार्थोंके अध्यारोपको दूर करनेमात्रसे ही आत्माके विषयमें प्रमाणरूप होता है अज्ञात वस्तुका ज्ञान करवानेके निमित्तसे नहीं। ऐसे ही श्रुति भी कहती है कि जो साक्षात् अपरोक्ष है वही ब्रह्म है जो आत्मा सबके हृदयमें व्याप्त है इत्यादि। जिससे कि आत्मा इस प्रकार नित्य और निर्विकार सिद्ध हो चुका है इसलिये तू युद्ध कर अर्थात् युद्धसे उपराम न हो। यहाँ ( उपर्युक्त कथनसे ) युद्धकी कर्तव्यताका विधान नहीं है क्योंकि युद्धमें प्रवृत्त हुआ ही वह ( अर्जुन ) शोकमोहसे प्रतिबद्ध होकर चुप हो गया था उसके कर्तव्यके प्रतिबन्धमात्रको भगवान् हटाते हैं। इसलिये युद्ध कर यह कहना अनुमोदनमात्र है विधि ( आज्ञा ) नहीं है। गीताशास्त्र संसारके कारणरूप शोकमोह आदिको निवृत्त करनेवाला है प्रवर्तक नहीं है। इस अर्थकी साक्षिभूत दो ऋचाओंको भगवान् उद्धृत करते हैं।

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Sri Anandgiri

सदसतोरनन्तरप्रकृतयोः स्वरूपाव्यभिचारित्वेन परमार्थतया सन्निर्धारितम्। इदानीमसन्निर्दिधारयिषया पृच्छति किं पुनरिति। असदसदेवेति निर्धारितत्वात् प्रश्नस्य निरवकाशत्वमाशङ्क्य शून्यं व्यावर्त्य विवक्षितमसन्निर्धारयितुं तस्य सावकाशत्वमाह यत्स्वात्मेति। देहादेरनात्मवर्गस्य प्रकृतासच्छब्दविषयतेत्याह उच्यत इति। तेषां स्वातन्त्र्यं व्युदस्यति नित्यस्येति। आकाशादिव्यावृत्त्यर्थं विशिनष्टि शरीरिण इति। परिणामिनित्यत्वं व्यवच्छिनत्ति अनाशिन इति। तस्य प्रत्यक्षाद्यविषयत्वमाह अप्रमेयस्येति। देहादेरवस्तुत्वादात्मनश्चैकरूपत्वाद् युद्धे स्वधर्मे प्रवृत्तस्यापि तव न हिंसादिदोषसंभावनेत्याह तस्मादिति। ननु देहादिषु सद्बुद्धेरनुवृत्तेस्तस्या विच्छेदाभावात्कथमन्तवत्त्वं तेषामिष्यते तत्राह यथेति। तथेमे देहाः सद्बुद्धिभाजोऽपि प्रमाणतो निरूपणायामवसाने विच्छेदादन्तवन्तो भवन्तीति शेषः। देहत्वादिना च जाग्रद्देहादेरन्तवत्त्वं संप्रतिपन्नवदनुमातुं शक्यमित्याह स्वप्नेति। शरीरादेरन्तवत्त्वेऽपि प्रवाहरूपेणात्मनस्तत्संबन्धस्यानन्तवत्त्वमाशङ्क्याह नित्यस्येति। प्रवाहस्य प्रवाहिव्यतिरेकेणानिरूपणान्न तदात्मनः देहाद्यभावे संबन्धसिद्धिरित्यभिसंधायोक्तं विवेकिभिरिति। पदद्वयस्यैकार्थत्वमाशङ्क्य निरस्यति नित्यस्येत्यादिना। नित्यत्वस्य द्वैविध्यसिद्ध्यर्थं नाशद्वैविध्यं प्रतिज्ञातं प्रकटयति यथेत्यादिना। नाशस्य निरवशेषत्वेन सावशेषत्वेन च सिद्धे द्वैविध्ये फलितमाह तत्रेति। विशेषणाभ्यां कूटस्थनित्यत्वमात्मनोविवक्षितमित्यर्थः। अन्यतरविशेषणमात्रोपादाने परिणामिनित्यत्वमात्मनः शङ्क्येतेत्यनिष्टापत्तिमाशङ्क्याह अन्यथेति। औपनिषदत्वविशेषणमाश्रित्याप्रमेयत्वमाक्षिपति नन्विति। इतश्चात्मनो नाप्रमेयत्वमित्याह प्रत्यक्षादिनेति। तेन चागमप्रवृत्त्यपेक्षया पूर्वावस्थायामात्मैव परिच्छिद्यते तस्मिन्नेवाज्ञातत्वसंभवाद् अज्ञातज्ञापकं प्रमाणमिति च प्रमाणलक्षणादित्यर्थः। एतदप्रमेयमित्यादिश्रुतिमनुसृत्य परिहरति नेत्यादिना। कथं मानमनपेक्ष्यात्मनः सिद्धत्वमित्याशङ्क्योक्तं विवृणोति सिद्धे हीति। प्रमित्सोः प्रमेयमिति शेषः। तदेव व्यतिरेकमुखेन विशदयति नहीति। आत्मनः सर्वलोकप्रसिद्धत्वाच्च तस्मिन्न प्रमाणमन्वेषणीयमित्याह नह्यात्मेति। प्रत्यक्षादेरनात्मविषयत्वात्तत्र चाज्ञातताया व्यवहारे संभवात्तत्प्रामाण्यस्य च व्यावहारिकत्वाद्विशिष्टे तत्प्रवृत्तावपि केवले तदप्रवृत्तेः यद्यपि नात्मनि तत्प्रामाण्यं तथापि तद्धितश्रुत्या शास्त्रस्य तत्र प्रवृत्तिरवश्यंभाविनीत्याशङ्क्याह शास्त्रं त्विति। शास्त्रेण प्रत्यग्भूते ब्रह्मणि प्रतिपादिते प्रमात्रादिविभागस्यव्यावृत्तत्वाद्युक्तमस्यान्त्यत्वमपौरुषेयतया निर्दोषत्वाच्चास्य प्रामाण्यमित्यर्थः। तथापि कथमस्य प्रत्यगात्मनि प्रामाण्यं तस्य स्वतःसिद्धत्वेनाविषयत्वादज्ञातज्ञापनायोगादित्याशङक्य स्वतो भानेऽपि प्रतीचो मनुष्योऽहं कर्ताहमित्यादिना मनुष्यत्वकर्तृत्वादीनामतद्धर्माणामध्यारोपणेनात्मनि प्रतीयमानत्वात्तन्मात्रनिवर्तकत्वेनात्मनो विषयत्वमनापद्यैव शास्त्रं प्रामाण्यं प्रतिपद्यते सिद्धंतु निवर्तकत्वादिति न्यायादित्याह अतद्धर्मेति। घटादाविव स्फुरणातिशयजनकत्वेन किमित्यात्मनि शास्त्रप्रामाण्यं नेष्टमित्याशङ्क्य जडत्वाजडत्वाभ्यां विशेषादिति मत्वाह नत्विति। ब्रह्मात्मनो मानापेक्षामन्तरेण स्वतः स्फुरणे प्रमाणमाह तथाचेति। साक्षादन्यापेक्षामन्तरेणापरोक्षादपरोक्षस्फुरणात्मकं यद्ब्रह्म न च तस्यात्मनोऽर्थान्तरत्वं सर्वाभ्यन्तरत्वेन सर्ववस्तुसारत्वात्तमात्मानं व्याचक्ष्वेति योजना। अप्रमेयत्वेनाविनाशित्वं प्रतिपाद्य फलितं निगमयति यस्मादिति। स्वधर्मनिवृत्तिहेतुनिषेधे तात्पर्यं दर्शयति युद्धादिति। आत्मनो नित्यत्वादिस्वरूपमुपपाद्य युद्धकर्तव्यत्वविधानाज्ज्ञानकर्मसमुच्चयोऽत्र भातीत्याशङ्क्याह नहीति। युध्यस्वेति वचनात्तत्कर्तव्यत्वविधिरस्तीत्याशङ्क्याह युद्ध इति। कथं तर्हि कथं भीष्ममहमित्याद्यर्जुनस्य युद्धोपरमपरं वचनमिति तत्राह शोकेति। यदि स्वतो युद्धे प्रवृत्तिस्तर्हि भगवद्वचनस्य का गतिरित्याशङ्क्याह तस्येति। भगवद्वचनस्य प्रतिबन्धनिवर्तकत्वे सत्यर्जुनप्रवृत्तेः स्वाभाविकत्वे फलितमाह तस्मादिति।

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Sri Dhanpati

किंपुनस्तदसदित्याकाङ्क्षायामाह अन्तवन्त इति। ननु स्फुरणरुपस्य सतः कथमविनाशित्वं तस्य देहधर्मत्वाद्देहस्य चानुक्षणविनाशित्वादिति भूतचैतन्यवादिनस्तान्निराकुर्वन्नासतो विद्यते भावः इत्येतद्विवृणोति इति तु नत्वेत्यादिना देहात्मविवेकस्योक्तत्वमभिप्रेत्याचार्यैर्नावतारितम्। अन्तस्तत्त्वज्ञाने बाधो येषां विद्यते तेऽन्तवन्तः। यथा शुत्त्यादिज्ञानेन शुक्तिरुप्यादयो बाध्यास्तथा इमे भ्रान्त्या प्रतीयमाना देहाः स्थूलादयो नित्यस्याबाध्यस्याध्यासिकसंबन्धेन कारणादिशरीरवतः देहा इति सकारणस्य शीतादेरप्युपलक्षणम्। देहानेकत्वाद्बहुवचनम्। पृथिव्यादिवद्य्वाव हारिकनित्यत्वमाशङ्क्याह अनाशिन इति। परमार्थनित्यस्य विद्वद्भिरुक्ताः अप्रमेयस्य रुपादिरहितत्वात् व्याप्तिग्रहाभावात् सदृशस्यान्यस्यानिरुपणात्प्रवृत्तिनिमित्ताभावात् तेन विनानुपपद्यमानस्याभावात् अभावत्वाभावात् प्रत्यक्षादिभिरपरिच्छेद्यस्य अथवाऽज्ञाते हि वस्तुनि प्रमाणान्वेषणा भवति ज्ञातश्चात्मा देहाद्भिन्नः सर्वैः प्राणिभिः योऽहं बाल्ये पितरावन्वभूवं स एव नप्तृ़ननुभवामीत्यनुसंधानदर्शनात्। स्वप्ने देवादिशरीरमास्थाय तदुचितान्भोगान्भुक्त्वा प्रबुद्धो मनुष्यदेहं प्राप्य मनुष्य एवाहं नतु देव इति देवशरीरे बाध्यमानेऽप्यहमास्पदस्यात्मनोऽबाध्यमानत्वाच्च योगमाहात्म्येन सिंहादिशरीरमेदेऽप्यात्मनोऽभेदेन ज्ञातत्वाच्च। तथा इन्द्रियेभ्योऽपि भिन्न आत्मा सर्वैर्ज्ञायते योऽहमद्राक्षं स एवेदानीं श्रृणोमीत्यहमालम्बनस्य प्रत्यभिज्ञानात्। बुद्धिमनोभ्यामपि भिन्नः तयोः करणत्वेन कर्तृत्वाश्रयत्वायोगात्। अहं कृश इत्यादिप्रत्ययस्तु प्रेमास्पदे पुत्रादौ विकलेऽहमेव विकल इत्यादिप्रत्ययवदुपपद्यते। तस्मादात्मनोऽज्ञातत्वान्न प्रमाणपरिच्छेद्यता। ननु कथं शास्त्रस्य प्रत्यगात्मनि प्रामाण्यम्। तस्य स्वतःसिद्धस्य ज्ञातत्वेनाविषयत्वादितिचेत्सत्यम्। तथापि शास्त्रस्यात्माध्यस्तसमूलकर्तृत्वाद्यनात्मधर्मनिरासकत्वेन प्रामाण्यमुपपद्यते। तथाच भाष्यम्नहि पूर्वमित्थमहमित्यात्मानं प्रमाय पश्चात्प्रमेयपरिच्छेदाय प्रवर्तते। नह्यात्मा नाम कस्यचित्तदप्रसिद्धो भवति। शास्त्रं त्वन्त्यं प्रमाणम्। अतद्धर्माध्यारोपणमात्रनिवर्तकत्वेन प्राणाण्यमात्मनः प्रतिपद्यते नत्वज्ञातार्थज्ञापकत्वेन। तथाच श्रुतिःयस्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्य य आत्मा इति। यस्मादात्मा नित्यः केनापि क्वचिदपि कदापि न नश्यति देहाश्चनित्यत्वान्नश्यन्त्येव तस्माद्धे भारत भरतवंशोद्भव त्वं युध्यस्व स्वधर्मं युद्धं मा त्याक्षीरित्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
antavantaḥ
imethese
dehāḥmaterial bodies
nityasyaeternally
uktāḥare said
śharīriṇaḥof the embodied soul
anāśhinaḥindestructible
aprameyasyaimmeasurable
tasmāttherefore
yudhyasvafight
bhāratadescendant of Bharat, Arjun
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Bhagavad Gita · 2.17
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्। विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति

अविनाशी तो उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। इस अविनाशीका विनाश कोई भी नहीं कर सकता। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.19
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते

जो मनुष्य इस अविनाशी शरीरीको मारनेवाला मानता है और जो मनुष्य इसको मरा मानता है, वे दोनों ही इसको नहीं जानते; क्योंकि यह न मारता है और न मारा जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ: "अविनाशी, अप्रमेय और नित्य रहनेवाले इस शरीरी के ये देह अन्तवाले कहे गये हैं। इसलिये हे अर्जुन! तुम युद्ध करो। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 18?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 18 translates to: "These bodies of the embodied Self, which are eternal, indestructible, and immeasurable, are said to have an end. Therefore, fight, O Arjuna. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 18 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। अविनाशी, अप्रमेय और नित्य रहनेवाले इस शरीरी के ये देह अन्तवाले कहे गये हैं। इसलिये हे अर्जुन! तुम युद्ध करो। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śharīriṇaḥ" mean in English?

"antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śharīriṇaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 18. These bodies of the embodied Self, which are eternal, indestructible, and immeasurable, are said to have an end. Therefore, fight, O Arjuna. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.