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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 17
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्। विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति

अविनाशी तो उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। इस अविनाशीका विनाश कोई भी नहीं कर सकता। — VaniSagar

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MarathiIND

हे अविनाशी असणे जाणून घ्या, ज्याद्वारे हे सर्व व्यापलेले आहे. अविनाशी त्याचा नाश कोणीच करू शकत नाही.

TeluguIND

అవినాశి అని తెలుసుకో, దీని ద్వారా ఇవన్నీ వ్యాపించి ఉన్నాయి. ఆ నాశనానికి ఎవరూ కారణం కాలేరు.

GujaratiIND

અવિનાશી બનવું તે જાણો, જેનાથી આ બધું વ્યાપેલું છે. અવિનાશી તેનો વિનાશ કોઈ કરી શકતું નથી.

KannadaIND

ಅವಿನಾಶಿ ಎಂದು ತಿಳಿಯಿರಿ, ಯಾವುದರಿಂದ ಇದೆಲ್ಲವೂ ವ್ಯಾಪಿಸಿದೆ. ಅದರ ನಾಶವನ್ನು ಯಾರೂ ಉಂಟುಮಾಡಲಾರರು, ಅವಿನಾಶಿ.

TamilIND

அழியாதது என்பதை அறிந்து கொள்ளுங்கள், இதன் மூலம் இவை அனைத்தும் வியாபித்துள்ளன. அழிவில்லாத அந்த அழிவை யாராலும் ஏற்படுத்த முடியாது.

BengaliIND

জেনে রেখো যে অবিনশ্বর, যার দ্বারা এই সব ব্যাপ্ত। কেউ তার বিনাশ ঘটাতে পারে না, সেই অবিনশ্বর।

NepaliIND

अविनाशी हुन जान, जसद्वारा यो सबै व्याप्त छ। त्यसको विनाश कसैले गर्न सक्दैन, अविनाशी।

MalayalamIND

ഇവയെല്ലാം വ്യാപിച്ചുകിടക്കുന്ന അവിനാശിയാണെന്ന് അറിയുക. നശ്വരമായ അതിൻ്റെ നാശം ആർക്കും ഉണ്ടാക്കാൻ കഴിയില്ല.

PunjabiIND

ਉਸ ਨੂੰ ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਜਾਣਨਾ, ਜਿਸ ਦੁਆਰਾ ਇਹ ਸਭ ਵਿਆਪਕ ਹੈ। ਉਸ ਅਬਿਨਾਸੀ ਦਾ ਕੋਈ ਨਾਸ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦਾ।

SindhiIND

ڄاڻو ته اڻ کٽ ٿيڻ، جنهن سان هي سڀ پکڙيل آهي. ان جي تباهي ڪير به نه ٿو ڪري سگهي، غير فاني.

MizoIND

Chu chu tihchhiat theih loh, chu chuan heng zawng zawng hi a tuam vek tih hria ang che. Chu, Imperishable tihchhiatna chu tumahin an thlen thei lo.

ManipuriIND

ꯃꯗꯨ ꯃꯥꯡꯍꯟ ꯇꯥꯀꯍꯅꯕꯥ ꯉꯃꯗꯕꯥ ꯑꯣꯏꯅꯥ ꯈꯉꯕꯤꯌꯨ, ꯃꯁꯤꯅꯥ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛ ꯑꯁꯤ ꯊꯨꯒꯥꯏꯔꯤ꯫ ꯀꯅꯥꯒꯨꯝꯕꯥ ꯑꯃꯠꯇꯅꯥ ꯃꯗꯨꯒꯤ ꯃꯥꯡꯍꯟ ꯇꯥꯀꯍꯅꯕꯥ ꯉꯃꯗꯦ, ꯏꯝꯄꯦꯔꯦꯁꯅꯦꯜ꯫

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या-- 'अविनाशि तु तद्विद्धि'-- पूर्वश्लोकमें जो सत्-असत् की बात कही थी, उसमेंसे पहले 'सत्' की व्याख्या करनेके लिये यहाँ 'तु' पद आया है। 'उस अविनाशी तत्त्वको तू समझ'--ऐसा कहकर भगवान्ने उस तत्वको परोक्ष बताया है। परोक्ष बतानेमें तात्पर्य है कि इदंतासे दीखनेवाले इस सम्पूर्ण संसारमें वह परोक्ष तत्त्व ही व्याप्त है, परिपूर्ण है। वास्तवमें जो परिपूर्ण है, वही 'है' और जो सामने संसार दीख रहा है, यह 'नहीं' है। यहाँ 'तत्' पदसे सत्त-त्त्वको परोक्षरीतिसे कहनेका तात्पर्य यह नहीं है कि वह तत्त्व बहुत दूर है; किन्तु वह इन्द्रियों और अन्तःकरणका विषय नहीं है, इसलिये उसको परोक्षरीतिसे कहा गया है। 'येन सर्वमिदं ततम् (टिप्पणी प'0 57.1)--जिसको परोक्ष कहा है उसीका वर्णन करते हैं कि यह सब-का-सब संसार उस नित्य-तत्त्वसे व्याप्त है। जैसे सोनेसे बने हुए गहनोंमें सोना, लोहेसे बने हुए अस्त्र-शस्त्रोंमें लोहा, मिट्टीसे बने हुए बर्तनोंमें मिट्टी और जलसे बनी हुई बर्फमें जल ही व्याप्त (परिपूर्ण) है, ऐसे ही संसारमें वह सत्त-त्त्व ही व्याप्त है। अतः वास्तवमें इस संसारमें वह सत्त-त्त्व ही जाननेयोग्य है। 'विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति'--यह शरीरी अव्यय अर्थात् अविनाशी है। इस अविनाशीका कोई विनाश कर ही नहीं सकता। परन्तु शरीर विनाशी है-- क्योंकि वह नित्य-निरन्तर विनाशकी तरफ जा रहा है। अतः इस विनाशीके विनाशको कोई रोक ही नहीं सकता। तू सोचता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा तो ये नहीं मरेंगे, पर वास्तवमें तेरे युद्ध करनेसे अथवा न करनेसे इस अविनाशी और विनाशी तत्त्वमें कुछ फरक नहीं पड़ेगा अर्थात् अविनाशी तो रहेगा ही और विनाशीका नाश होगा ही। यहाँ 'अस्य' पदसे सत्त-त्त्वको इदंतासे कहनेका तात्पर्य है कि प्रतिक्षण बदलनेवाले शरीरोंमें जो सत्ता दीखती है, वह इसी सत्त-त्त्वकी ही है। 'मेरा शरीर है और मैं शरीरधारी हूँ'--ऐसा जो अपनी सत्ताका ज्ञान है, उसीको लक्ष्य करके भगवान्ने यहाँ 'अस्य' पद दिया है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तो जो निस्सन्देह सत् है और सदैव रहता है वह क्या है इसपर कहा जाता है नष्ट न होना जिसका स्वभाव है वह अविनाशी है। तु शब्द असत्से सत्की विशेषता दिखानेके लिये है। उसको तू ( अविनाशी ) जान समझ किसको जिस सत् शब्दवाच्य ब्रह्मसे यह आकाशसहित सम्पूर्ण विश्व आकाशसे घटादिके सदृश व्याप्त है। इस अव्ययका अर्थात् जिसका व्यय नहीं होता जो घटताबढ़ता नहीं उसे अव्यय कहते हैं उसका विनाशअभाव ( करनेके लिये कोई भी समर्थ नहीं है )। क्योंकि यह सत् नामक ब्रह्म अवयवरहित होनेके कारण देहादिकी तरह अपने स्वरूपसे नष्ट नहीं होता अर्थात् इसका व्यय नहीं होता। तथा इसका कोई निजी पदार्थ नहीं होनेके कारण निजी पदार्थोंके नाशसे भी इसका नाश नहीं होता जैसे देवदत्त अपने धनकी हानिसे हानिवाला होता है ऐसे ब्रह्म नहीं होता। इसलिये कहते हैं कि इस अविनाशी ब्रह्मका विनाश करनेके लिये कोई भी समर्थ नहीं है। कोई भी अर्थात् ईश्वर भी अपने आपका नाश नहीं कर सकता। क्योंकि आत्मा ही स्वयं ब्रह्म है और अपने आपमें क्रियाका विरोध है।

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Sri Dhanpati

किं तत्सदित्याकाङ्क्षायामाह अविनाशि त्विति। न विनष्टुं शीलमस्येति तत् जानीहि। तुशब्दोऽसतो व्यावृत्त्यर्थः। किं येनेदं सर्वं व्याप्तं निरवयवत्वात् स्वरुपेण देहादिवत् आत्मीयाभावात् धनादिहान्या देवदत्तवच्च न व्येतीत्यव्ययं तस्यास्याव्ययस्य ब्रह्मणः स्वस्वरुपस्य विनाशमभावं बाधं न कश्चित् ईश्वरोऽपि कर्तुमर्हति शक्नोति। स्वात्मनि क्रियाविरोधात्। ननु नन्वेतादृशस्य सतो ज्ञानाद्भेदेपरिच्छिन्नत्वापत्तेर्ज्ञानात्मकत्वसभ्युपेयं तच्चानाध्यासिकं अन्यथा जडत्वापत्तेः। तथा चानाध्यासिकज्ञानरुपस्य सतो धात्वर्थत्वादुत्पत्तिविनाशवत्त्वं घटज्ञानमुत्पन्नं घटज्ञानं नष्टमिति प्रतीतेश्च। एवं चाहं घटं जानामीति प्रतीतेस्तस्य साश्रयत्वं सविषयत्वं चेति देशकालवस्तुपरिच्छिन्नत्वास्फुरणस्य कथं तद्रूपस्य सतो देशकालवस्तुपरिच्छिन्नशून्यत्वमित्याशङक्याह अविनाशि। त्रिविधपरिच्छेदशून्यं तु एव तत्सद्रूपं स्फुरणं विद्धि। किं तत्। येनेदं सर्वं ततं रज्जुशकलेनेव सर्पधारादि स्वस्मिन्समावेशितं यस्माद्विनाशं परिच्छेदमव्ययस्यापरिच्छिन्नस्यास्य कोऽप्याश्रयो वा विषयो वा इन्द्रियसंनिकर्षादिरुपो हेतुर्वा न कर्तुमर्हतीति। भाष्यकृद्भिः कुतो न व्याख्यातमितिचेन्मूलाक्षरैरुक्तशङ्कोत्तरस्य घटादिज्ञानस्य व्यावृत्त्यात्मकस्यात्मन्यध्यस्तत्वेऽपि तस्य स्वप्रकाशत्वान्न जडत्वं व्यावृत्त्योदेरुत्पत्त्यादिमत्त्वेऽपि तस्य न तत्त्वमित्येवमादिरुपस्याप्रतीतेः उत्तरत्रान्तवन्त इमे देहा इत्यस्य स्थानेऽन्तवत्य इमा वृत्तय इति वक्तव्यत्वापत्तेः। एतेषां नाशो भविष्यतीत्यर्जुनस्य भ्रमनिराकरणायात्मसंसृष्टदेहाद्यसत्यत्वप्रतिपादनस्यावश्यकत्वेनाश्रयत्वेत्यादेरार्थिकत्वाच्चेति गृहाण। किंच शुक्त्यध्यस्तरजतज्ञानस्य कल्पितत्वत्सदव्यस्तघटादिज्ञानस्याप्यध्यस्तत्वेन कल्पितत्वस्य सद्बुद्धिरसद्बुद्धिरित्यादिभाष्येण प्रदर्शितत्वादुक्तशङ्कानुत्थानमित्यभिप्रेत्याचार्यैरेवं न व्याख्यातमिति दिक्।

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Sri Neelkanth

यस्याभावो नास्ति तस्य सतः सत्त्वे किं मानमित्याशङ्क्याह अविनाशीति। तच्छब्देन प्रकृतं सत् परामृश्यते। येन सता इदं सर्वं वियदादि ततं व्याप्तम्। घटः सन्पटः सन्निति सर्वस्य सदभेदानुभवात्। यथा घटो मृत् शरावो मृदिति घटादीनां मृदभेदानुभवान्मृदुपादानकत्वं तद्वत्सर्वस्यापि सदुपादानकत्वं बोध्यम्। ननु मृद्वत्सदपि किं विकारवद्भवतीत्याशङ्क्याह अविनाशीति। तत् सत् अविनाशि विद्धि। अयमर्थः पूर्वावस्थापरित्यागोऽत्र विनाशः। मृद्धि पिण्डाकारतां त्यक्त्वा घटीभवति अतः सा विनाशशीला। विकारधाराश्रयत्वात्। ब्रह्म तु न तथा किं तर्हि रज्जुवत्स्वयमविनश्यदेव कार्याकारं भवति। स्वकीये च सत्तास्फुरणे कार्येऽर्पयति। अतोऽविनाशि। तथा च श्रुतयःअजायमानो बहुधा विजायतेजात एव न जायते को न्वेनं जनयेत्पुनः। अजायमानः जन्माख्यं विकारमलभमानोऽपि विजायते वियदादिरूपेणाविर्भवति। तथा लोकदृष्ट्या जातो घटादिः परमार्थदृष्ट्या न जायते। परिणाम्युपादानस्याभावात्। मृदादेस्तु स्वाप्नमृदादिवत्तुच्छत्वात्। अत एनं घटादिं को नु जनयेन्न कोऽपि। कुतस्तर्हि भासत इति चेत् रज्जूरगादिवदिति दत्तोत्तरमेतत्। तथाप्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम्तस्य भासा सर्वमिदं विभाति इति सतः सत्यत्वेन प्राणोपलक्षितस्य प्रपञ्चस्य सत्यत्वं सतो भानमेव प्रपञ्चस्य भानमिति। तथा च प्रपञ्चगते सत्तास्फूर्ति सतः सत्त्वे प्रमाणमित्यर्थः। श्रुतिश्चअन्नेन सोम्य शुङ्गेनापोमूलमन्विच्छ अद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः इति सतो जगदुपादानत्वं कार्यलिङ्गेन द्रढयति। सतोऽविनाशित्वं च विनाशहेत्वभावादित्याह विनाशमिति। न व्येति नापक्षीयत इत्यव्ययम्। एतेन सर्वविकारशून्यस्य विनाशो नास्तीत्यर्थः। अपक्षयो हि जन्मादिविकारवत् एव भवतीति स एवात्र सर्वविकारोपलक्षणतया बोध्यः। न कश्चिदित्यनेन तदन्यस्य विनाशहेतोरभावो दर्शितः।द्वितीयाद्वै भयं भवति इति श्रुतेः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
avināśhiindestructible
tuindeed
tatthat
viddhiknow
yenaby whom
sarvamentire
idamthis
tatampervaded
vināśhamdestruction
avyayasyaof the imperishable
asyaof it
na kaśhchitno one
kartumto cause
arhatiis able
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.16
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः

असत् का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है, तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने इन दोनोंका ही अन्त अर्थात् तत्त्व देखा है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.18
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत

अविनाशी, अप्रमेय और नित्य रहनेवाले इस शरीरी के ये देह अन्तवाले कहे गये हैं। इसलिये हे अर्जुन! तुम युद्ध करो। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 17
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 17
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्। विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति

अविनाशी तो उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। इस अविनाशीका विनाश कोई भी नहीं कर सकता। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 17 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 17 का हिंदी अर्थ: "अविनाशी तो उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। इस अविनाशीका विनाश कोई भी नहीं कर सकता। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 17?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 17 translates to: "Know that to be indestructible, by which all this is pervaded. No one can cause the destruction of that, the Imperishable. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्। विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 17 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। अविनाशी तो उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। इस अविनाशीका विनाश कोई भी नहीं कर सकता। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "avināśhi tu tadviddhi yena sarvam idaṁ tatam" mean in English?

"avināśhi tu tadviddhi yena sarvam idaṁ tatam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 17. Know that to be indestructible, by which all this is pervaded. No one can cause the destruction of that, the Imperishable. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.