
“असत् का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है, तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने इन दोनोंका ही अन्त अर्थात् तत्त्व देखा है। — VaniSagar”
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अवास्तव नाही आहे; वास्तविकतेचे कोणतेही अस्तित्व नाही; दोघांबद्दलचे सत्य सत्याच्या जाणकारांनी (किंवा साराचे द्रष्टे) पाहिले आहे.
అవాస్తవానికి ఉనికి లేదు; అసలు లేనిది లేదు; రెండింటి గురించిన సత్యాన్ని సత్యం తెలిసినవారు (లేదా సారాంశాన్ని చూసేవారు) చూశారు.
અવાસ્તવિકનું કોઈ અસ્તિત્વ નથી; વાસ્તવિકનું કોઈ અસ્તિત્વ નથી; બંને વિશેનું સત્ય સત્યના જાણકારો (અથવા સારનાં દ્રષ્ટાઓ) દ્વારા જોવામાં આવ્યું છે.
உண்மைக்கு புறம்பாக இருப்பு இல்லை; உண்மையானது இல்லாதது இல்லை; இரண்டையும் பற்றிய உண்மை உண்மையை அறிந்தவர்கள் (அல்லது சாரத்தைப் பார்ப்பவர்கள்) பார்த்திருக்கிறார்கள்.
ಅವಾಸ್ತವಕ್ಕೆ ಅಸ್ತಿತ್ವವಿಲ್ಲ; ನೈಜತೆಯಿಲ್ಲದಿರುವುದು ಇಲ್ಲ; ಎರಡರ ಸತ್ಯವನ್ನು ಸತ್ಯದ ಬಲ್ಲವರು (ಅಥವಾ ಸಾರವನ್ನು ನೋಡುವವರು) ನೋಡಿದ್ದಾರೆ.
ਅਸਲ ਦਾ ਕੋਈ ਜੀਵ ਨਹੀਂ ਹੈ; ਅਸਲੀ ਦਾ ਕੋਈ ਗੈਰ-ਹੋਣ ਨਹੀਂ ਹੈ; ਦੋਵਾਂ ਬਾਰੇ ਸੱਚਾਈ ਨੂੰ ਸੱਚ ਦੇ ਜਾਣਨ ਵਾਲਿਆਂ (ਜਾਂ ਸਾਰ ਦੇ ਦਰਸ਼ਕ) ਦੁਆਰਾ ਦੇਖਿਆ ਗਿਆ ਹੈ।
অবাস্তব কোন সত্তা নেই; বাস্তবের কোন অস্তিত্ব নেই; উভয় সম্পর্কে সত্য সত্যের জ্ঞাতারা (বা সারাংশের দ্রষ্টা) দ্বারা দেখা গেছে।
അയഥാർത്ഥത്തിന് അസ്തിത്വമില്ല; യഥാർത്ഥമായത് ഇല്ല; രണ്ടിനെയും കുറിച്ചുള്ള സത്യം സത്യത്തെ അറിയുന്നവർ (അല്ലെങ്കിൽ സത്ത ദർശിക്കുന്നവർ) കണ്ടിട്ടുണ്ട്.
غير حقيقي جو ڪوبه وجود ناهي. حقيقي جو ڪو به وجود نه آهي. ٻنهي بابت سچائي کي سچ جي ڄاڻندڙن (يا جوهر جي ڏسندڙن) ڏٺو آهي.
असत्यको कुनै अस्तित्व छैन; त्यहाँ वास्तविकको कुनै गैर अस्तित्व छैन; दुबैको बारेमा सत्यलाई सत्यका जानकारहरूले (वा सारको द्रष्टाहरू) द्वारा देखेका छन्।
অবাস্তৱৰ কোনো সত্তা নাই; বাস্তৱৰ কোনো অসত্তা নাই; দুয়োটাৰে সত্য সত্যৰ জ্ঞানীসকলে (বা সত্তাৰ দৰ্শকে) দেখিছে।
ꯑꯅꯔꯤꯑꯦꯂꯒꯤ ꯑꯣꯏꯕꯥ ꯖꯤꯕ ꯑꯃꯠꯇꯥ ꯂꯩꯇꯦ; ꯑꯁꯦꯡꯕꯥ ꯑꯗꯨꯒꯤ ꯅꯟ-ꯕꯤꯌꯤꯡ ꯑꯃꯠꯇꯥ ꯂꯩꯇꯦ; ꯑꯅꯤꯃꯛꯀꯤ ꯃꯇꯥꯡꯗꯥ ꯑꯆꯨꯝꯕꯥ ꯑꯗꯨ ꯑꯆꯨꯝꯕꯥ ꯈꯉꯕꯁꯤꯡꯅꯥ (ꯅꯠꯔꯒꯥ ꯇꯁꯦꯡꯕꯥ ꯑꯗꯨ ꯌꯦꯡꯂꯤꯕꯁꯤꯡꯅꯥ) ꯎꯈ꯭ꯔꯦ꯫
Sacred Commentaries
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Swami Ramsukhdas
2.16।। व्याख्या -- 'नासतो विद्यते भावः'-- शरीर उत्पत्तिके पहले भी नहीं था मरनेके बाद भी नहीं रहेगा और वर्तमानमें भी इसका क्षणप्रतिक्षण अभाव हो रहा है। तात्पर्य है कि यह शरीर भूत भविष्य और वर्तमान इन तीनों कालोंमें कभी भावरूपसे नहीं रहता। अतः यह असत् है। इसी तरहसे इस संसारका भी भाव नहीं है यह भी असत् है। यह शरीर तो संसारका एक छोटासानमूना है इसलिये शरीरके परिवर्तनसे संसारमात्रके परिवर्तनका अनुभव होता है कि इस संसारका पहले भी अभाव था और पीछे भी अभाव होगा तथा वर्तमानमें भी अभाव हो रहा है। संसारमात्र कालरूपी अग्निमें लकड़ीकी तरह निरन्तर जल रहा है। लकड़ीके जलनेपर तो कोयला और राख बची रहती है पर संसारको कालरूपी अग्नि ऐसी विलक्षण रीतिसे जलाती है कि कोयला अथवा राख कुछ भी बाकी नहीं रहता। वह संसारका अभावहीअभाव कर देती है। इसलिये कहा गया है कि असत्की सत्ता नहीं है। 'नाभावो विद्यते सतः'-- जो सत् वस्तु है उसका अभाव नहीं होता अर्थात् जब देह उत्पन्न नहीं हुआ था तब भी देही था देह नष्ट होनेपर भी देही रहेगा और वर्तमानमें देहके परिवर्तनशील होनेपर भी देही उसमें ज्योंकात्यों ही रहता है। इसी रीतिसे जब संसार उत्पन्न नहीं हुआ था उस समय भी परमात्मतत्त्व था संसारका अभाव होनेपर भी परमात्मतत्त्व रहेगा और वर्तमानमें संसारके परिवर्तनशील होनेपर भी परमात्मतत्त्व उसमें ज्योंकात्यों ही है। मार्मिक बात संसारको हम एक ही बार देख सकते हैं दूसरी बार नहीं। कारण कि संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील है अतः एक क्षण पहले वस्तु जैसी थी दूसरे क्षणमें वह वैसी नहीं रहती जैसे सिनेमा देखते समय परदेपर दृश्य स्थिर दीखता है पर वास्तवमें उसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। मशीनपर फिल्म तेजीसे घूमनेके कारण वह परिवर्तन इतनी तेजीसे होता है कि उसे हमारी आँखें नहीं पकड़ पातीं । इससे भी अधिक मार्मिक बात यह है कि वास्तवमें संसार एक बार भी नहीं दीखता। कारण कि शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि जिन करणोंसे हम संसारको देखते हैं अनुभव करते हैं वे करण भी संसारके ही हैं। अतः वास्तवमें संसारसे ही संसार दीखता है। जो शरीरसंसारसे सर्वथा सम्बन्धरहित है उस स्वरूपसे संसार कभी दीखता ही नहीं तात्पर्य यह है कि स्वरूपमें संसारकी प्रतीति नहीं है। संसारके सम्बन्धसे ही संसारकी प्रतीति होती है। इससे सिद्ध हुआ कि स्वरूपका संसारसे कोई सम्बन्ध है ही नहीं। दूसरी बात संसार (शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि) की सहायताके बिना चेतनस्वरूप कुछ कर ही नहीं सकता। इससे सिद्ध हुआ कि मात्र क्रिया संसारमें ही है स्वरूपमें नहीं। स्वरूपका क्रियासे कोई सम्बन्ध है ही नहीं। संसारका स्वरूप है क्रिया और पदार्थ। जब स्वरूपका न तो क्रियासे और न पदार्थसे ही कोई सम्बन्ध है तब यह सिद्ध हो गया कि शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धिसहित सम्पूर्ण संसारका अभाव है। केवल परमात्मतत्त्वका ही भाव (सत्ता) है जो निर्लिप्तरूपसे सबका प्रकाशक और आधार है। 'उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः'-- इन दोनोंके अर्थात् सत्असत् देहीदेहके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंने इनका तत्त्व देखा है इनका निचोड़ निकाला है कि केवल एक सत्तत्त्व ही विद्यमान है। असत् वस्तुका तत्त्व भी सत् है और सत् वस्तुका तत्त्व भी सत् है अर्थात् दोनोंका तत्त्व एक सत् ही है दोनोंका तत्त्व भावरूपसे एक ही है। अतः सत् और असत् इन दोनोंके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंके द्वारा जाननेमें आनेवाला एक सत्तत्त्व ही है। असत्की जो सत्ता प्रतीत होती है वह सत्ता भी वास्तवमें सत्की ही है। सत्की सत्तासे ही असत् सत्तावान् प्रतीत होता है। इसी सत्को 'परा प्रकृति' (गीता 7। 5) 'क्षेत्रज्ञ' (गीता 13। 12) 'पुरुष' (गीता 13। 19) और 'अक्ष' (गीता 15। 16) कहा गया है तथा असत्को 'अपरा प्रकृति क्षेत्र प्रकृति' और 'क्षर' कहा गया है। अर्जुन भी शरीरोंको लेकर शोक कर रहे हैं कि युद्ध करनेसे ये सब मर जायँगे। इसपर भगवान् कहते हैं कि क्या युद्ध न करनेसे ये नहीं मरेंगे असत् तो मरेगा ही और निरन्तर मर ही रहा है। परन्तु इसमें जो सत्रूपसे है उसका कभी अभाव नहीं होगा। इसलिये शोक करना तुम्हारी बेसमझी ही है। ग्यारहवें श्लोकमें आया है कि जो मर गये हैं और जो जी रहे हैं उन दोनोंके लिये पण्डितजन शोक नहीं करते। बारहवेंतेरहवें श्लोकोंमें देहीकी नित्यताका वर्णन है उसमें 'धीर' शब्द आया है। चौदहवेंपंद्रहवें श्लोकोंमें संसारकी अनित्यताका वर्णन आया है तो उसमें भी 'धीर' शब्द आया है। ऐसे ही यहाँ (सोलहवें श्लोकमें) सत्असत्का विवेचन आया है तो इसमें 'तत्त्वदर्शी' शब्द आया है। इन श्लोकोंमें 'पण्डित धीर' और 'तत्त्वदर्शी' पद देनेका तात्पर्य है कि जो विवेकी होते हैं समझदार होते हैं उनको शोक नहीं होता। अगर शोक होता है तो वे विवेकी नहीं हैं समझदार नहीं हैं। सम्बन्ध-- सत् और असत् क्या है इसको आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।
Sri Harikrishnadas Goenka
इसलिये भी शोक और मोह न करके शीतोष्णादिको सहन करना उचित है जिससे कि वास्तवमें अविद्यमान शीतोष्णादिका और उनके कारणोंका भावहोनापन अर्थात् अस्तित्व है ही नहीं क्योंकि प्रमाणोंद्वारा निरूपण किये जानेपर शीतोष्णादि और उनके कारण कोई पदार्थ ही नहीं ठहरते क्योंकि वे शीतोष्णादि सब विकार हैं और विकार सदा बदलता रहता है। जैसे चक्षुद्वारा निरूपण किया जानेपर घटादिका आकार मिट्टीको छोड़कर और कुछ भी उपलब्ध नहीं होता इसलिये असत् है वैसे ही सभी विकार कारणके सिवा उपलब्ध न होनेसे असत् हैं। क्योंकि उत्पत्तिसे पूर्व और नाशके पश्चात् उन सबकी उपलब्धि नहीं है। पू0 मिट्टी आदि कारणकी और उसके भी कारणकी अपने कारणसे पृथक् उपलब्धि नहीं होनेसे उनका अभाव सिद्ध हुआ फिर इसी तरह उसका भी अभाव सिद्ध होनेसे सबके अभावका प्रसङ्ग आ जाता है। उ0 यह कहना ठीक नहीं क्योंकि सर्वत्र सत्बुद्धि और असत्बुद्धि ऐसी दो बुद्धियाँ उपलब्ध होती हैं। जिस पदार्थको विषय करनेवाली बुद्धि बदलती नहीं वह पदार्थ सत् है और जिसको विषय करनेवाली बुद्धि बदलती हो वह असत् है। इस प्रकार सत् और असत्का विभाग बुद्धिके अधीन है। सभी जगह समानाधिकरणमें ( एक ही अधिष्ठानमें ) सबको दो बुद्धियाँ उपलब्ध होती हैं। नील कमलके सदृश नहीं किन्तु घड़ा है कपड़ा है हाथी है इस तरह सब जगह दोदो बुद्धियाँ उपलब्ध होती हैं। उन दोनों बुद्धियोंसे घटादिको विषय करनेवाली बुद्धि बदलती है यह पहले दिखलाया जा चुका है परंतु सत्बुद्धि बदलती नहीं। अतः घटादि बुद्धिका विषय ( घटादि ) असत् है क्योंकि उसमें व्यभिचार ( परिवर्तन ) होता है। परंतु सत्बुद्धिका विषय ( अस्तित्व ) असत् नहीं है क्योंकि उसमें व्यभिचार ( परिवर्तन ) नहीं होता। पू0 घटका नाश हो जानेपर घटविषयक बुद्धिके नष्ट होते ही सत् बुद्धि भी तो नष्ट हो जाती है। उ0 यह कहना ठीक नहीं क्योंकि वस्त्रादि अन्य वस्तुओंमें भी सत्बुद्धि देखी जाती है। वह सत्बुद्धि केवल विशेषणको ही विषय करनेवाली है। पू0 सत्बुद्धिकी तरह घटबुद्धि भी तो दूसरे घटमें दीखती है। उ0 यह ठीक नहीं क्योंकि वस्त्रादिमें नहीं दीखती। पू0 घटका नाश हो जानेपर उसमें सत्बुद्धि भी तो नही दीखती। उ0 यह ठीक नहीं क्योंकि ( वहाँ ) घटरूप विशेष्यका अभाव है। सत्बुद्धि विशेषणको विषय करनेवाली है अतः जब घटरूप विशेष्यका अभाव हो गया तब बिना विशेष्यके विशेषणकी अनुपपत्ति होनसे वह ( सत्बुद्धि ) किसको विषय करे पर विषयका अभाव होनेसे सत्बुद्धिका अभाव नहीं होता। पू0 घटादि विशेष्यका अभाव होनेसे एकाधिकरणता ( दोनों बुद्धियोंका एक अधिष्ठानमें होना ) युक्तियुक्त नहीं होती। उ0 यह ठीक नहीं क्योंकि मृगतृष्णिकादिमें अधिष्ठानसे अतिरिक्त अन्य वस्तुका ( जलका ) अभाव है तो भी यह जल है ऐसी बुद्धि होनेसे समानाधिकरणता देखी जाती है। इसलिये असत् जो शरीरादि एवं शीतोष्णादि द्वन्द्व और उनके कारण हैं उनका किसीका भी भाव अस्तित्व नहीं है। वैसे ही सत् जो आत्मतत्व है उसका अभाव अर्थात् अविद्यमानता नहीं है क्योंकि वह सर्वत्र अटल है यह पहले कह आये हैं। इस प्रकार सत्आत्मा और असत्अनात्मा इन दोनोंका ही यह निर्णय तत्त्वदर्शियोंद्वारा देखा गया है अर्थात् प्रत्यक्ष किया जा चुका है कि सत् सत् ही है और असत् असत् ही है। तत् यह सर्वनाम है और सर्व ब्रह्म ही है। अतः उसका नाम तत् है उसके भावको अर्थात् ब्रह्मके यथार्थ स्वरूपको तत्त्व कहते हैं उस तत्त्वको देखना जिनका स्वभाव है वै तत्त्वदर्शी हैं उनके द्वारा उपर्युक्त निर्णय देखा गया है। तू भी तत्त्वदर्शी पुरुषोंकी बुद्धिका आश्रय लेकर शोक और मोहको छोड़कर तथा नियत और अनियतरूप शीतोष्णादि द्वन्द्वोंको इस प्रकार मनमें समझकर कि ये सब विकार है ये वास्तवमें न होते हुए ही मृगतृष्णाके जलकी भाँति मिथ्या प्रतीत हो रहे हैं ( इनको ) सहन कर। यह अभिप्राय है।
Sri Anandgiri
अधिकारिविशेषणे तितिक्षुत्वे हेत्वन्तरपरत्वेनोत्तरश्लोकमवतारयति इतश्चेति। इतःशब्दार्थमेव स्फुटयति यस्मादिति। यतः शीतादेः शोकादिहेतोरनात्मनो नास्ति वस्तुत्वं वस्तुनश्चात्मनो निर्विकारत्वेनैकरूपत्वमतो मुमुक्षोर्विशेषणं तितिक्षुत्वं युक्तमित्याह नेत्यादिना। कार्यस्यासत्त्वेऽपि कारणस्य सत्त्वे नात्यन्तासत्त्वासिद्धिरित्याशङ्क्य विशिनष्टि सकारणस्येति। नासत इत्युपादाय पुनर्नकारानुकर्षणमन्वयार्थम्। असतः शून्यस्यास्तित्वप्रसङ्गाभावादप्रसक्तप्रतिषेधप्रसक्तिरित्याशङ्क्याह नहीति। विमतमतात्त्विकमप्रामाणिकत्वाद्रज्जुसर्पवत् नहि धर्मिग्राहकस्य प्रत्यक्षादेस्तत्त्वावेदकं प्रामाण्यं कल्प्यते विषयस्य दुर्निरूपत्वादतोऽनिर्वाच्यं द्वैतमित्यर्थः। कथं पुनरध्यक्षादिविषयस्य शीतोष्णादिद्वैतस्य दुर्निरूपत्वेनानिर्वाच्यत्वं तत्राह विकारो हीति। ततश्च विमतं मिथ्या आगमापायित्वात्संप्रतिपन्नवदिति फलितमाह विकारश्चेति। वाचारम्भणश्रुतेर्द्वैतमिथ्यात्वेऽनुग्राहकत्वं दर्शयितुं चकारः। किञ्च कार्यं कारणाद्भिन्नमभिन्नं वेति विकल्प्याद्यं दूषयति यथेति। निरूप्यमाणमन्तर्बहिश्चेति शेषः। विमतं कारणान्न तत्त्वतो भिद्यते कार्यत्वाद्धटवदित्यर्थः। इतोऽपि कारणाद्भेदेन नास्ति कार्यम्आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा इति न्यायादित्याह जन्मेति। यदि कार्यं कारणादभिन्नं तदा तस्य भेदेनासत्त्वे पूर्वस्मादविषयः। तादात्म्येनावस्थानं तु न युक्तं तस्यापि कारणव्यतिरेकेणाभावात्। कार्यकारणविभागविधुरे वस्तुनि कार्यकारणपरम्पराया विभ्रमत्वादित्यभिप्रेत्याह मृदादीति। कार्यकारणविभागविहीनं वस्त्वेव नास्तीति मन्वानश्चोदयति तदसत्त्व इति। अनुवृत्तव्यावृत्तबुद्धिद्वयदर्शनादनुवृत्ते च व्यावृत्तानां कल्पितत्वादकल्पितं सर्वभेदकल्पनाधिष्ठानमकार्यकारणं वस्तु सिध्यतीति परिहरति न सर्वत्रेति। संप्रति सतो वस्तुत्वे प्रमाणमनुमानमुपन्यस्यति यद्विषयेति। यद्व्यावृत्तेष्वनुवृत्तं तत्सत् यथा सर्पधारादिष्वनुगतोरज्ज्वादेरिदमंशः। विमतं सत्यमव्यभिचारित्वात्संप्रतिपन्नवदित्यर्थः। व्यावृत्तस्य कल्पितत्वे प्रमाणमाह यद्विषयेत्यादिना। यद्व्यावृत्तं तन्मिथ्या यथा सर्पधारादि विमतं मिथ्या व्यभिचारित्वात्संप्रतिपन्नवदित्यर्थः इत्यनुमानद्वयमनुसृत्य सतोऽकल्पितत्वमसतश्च कल्पितत्वं स्थितमिति शेषः। ननु नेदमनुमानद्वयमुपपद्यते समस्तद्वैतवैतथ्यवादिनो विभागाभावादनुमानादिव्यवहारानुपपत्तेस्तत्राह सदसदिति। उक्ते विभागे बुद्धिद्वयाधीने स्थिते सत्यनुमानादिव्यवहारो निर्वहति प्रातिभासिकविभागेन वियोगात्परमार्थस्यैव तद्धेतुत्वे केवलव्यतिरेकाभावादित्यर्थः। कुतः सदसद्विभागस्य बुद्धिद्वयाधीनत्वं बुद्धिविभागस्यापि तत्राभावात्तत्राह सर्वत्रेति। व्यवहारभूमिः सप्तम्यर्थः। बुद्धिविभागस्यापि कल्पितस्यैव बोध्यविभागप्रतिभासहेतुतेति भावः। बुद्धिद्वयमनुरुध्य सदसद्विभागो सतः सामान्यरूपतया विशेषाकाङ्क्षायां सामान्यविशेषे द्वे वस्तुनी वस्तुभूते स्यातामिति चेत्तत्राह समानाधिकरण इति। पदयोः सामानाधिकरण्यं बुद्ध्योरुपचर्यते सोऽयमिति सामानाधिकरण्यवद्धटः सन्नित्यादि सामानाधिकरण्यमेकवस्तुनिष्ठं वस्तुभेदे घटपटयोरिव तदयोगादित्यर्थः। नीलमुत्पलमितिवद्धर्मधर्मिविषयतया सामानाधिकरण्यस्य सुवचत्वान्न वस्त्वैक्यविषयत्वमिति चेन्नेत्याह न नीलेति। नहि सामान्यविशेषयोर्भेदेऽभेदे च तद्भावो भेदाभेदौ च विरुद्धावतो जातिव्यक्त्योः सामानाधिकरण्यं नीलोत्पलयोरिव न गौणं किंतु व्यावृत्तमनुवृत्ते कल्पितमित्येकनिष्ठमित्यर्थः। सामान्यविशेषयोरुक्तन्यायं गुणगुण्यादावतिदिशति एवमिति। तुल्यौ हि तत्रापि विकल्पदोषाविति भावः। सामानाधिकरण्यानुपपत्त्या द्वे वस्तुनी सामान्यविशेषाविति पक्षं प्रतिक्षिप्य विशेषाएव वस्तूनीति पक्षं प्रतिक्षिपति तयोरिति। बुद्धिव्यभिचाराद्बोध्यव्यभिचारोऽपि कथं व्यावृत्तानां विशेषाणामवस्तुत्वमित्याशङ्क्याह तथाचेति। विकारो हि स इत्यादाविति शेषः। न चैकं वस्तु सामान्यविशेषात्मकमेकस्य द्वैरूप्यविरोधादित्यभिप्रेत्य सामान्यमेकमेव वस्तु तद्बुद्धेरव्यभिचाराद् बोधस्यापि सतस्तथात्वादित्याह नत्विति। व्यभिचरतीति पूर्वेण संबन्धः। विशेषाणां व्यभिचारित्वे सतश्चाव्यभिचारित्वे फलितमुपसंहरति तस्मादिति। असत्त्वं कल्पितत्वम्। तच्छब्दार्थमेव स्फोरयति व्यभिचारादिति। सद्बुद्धिविषयस्य सतोऽकल्पितत्वे तच्छब्दोपात्तमेव हेतुमाह अव्यभिचारादिति। सद्बुद्धिव्यभिचारद्वारा बोध्यस्यापि व्यभिचारात्तदव्यभिचारित्वहेतोरसिद्धिरिति शङ्कते घटे विनष्ट इति। सद्बुद्धेर्घटमात्रबुद्धिवद्धटविषयत्वाभावान्न घटनाशे व्यभिचारोऽस्तीति परिहरति न पटादाविति। सद्बुद्धेरघटविषयत्वे निरालम्बनत्वायोगाद् विषयान्तरं वक्तव्यमित्याशङ्क्याह विशेषणेति। सतोऽकल्पितत्वहेतोरव्यभिचारित्वस्यासिद्धिमुद्धृत्य विशेषाणां कल्पितत्वहेतोर्व्यभिचारित्वस्यासिद्धिं शङ्कते सदिति। यथा सद्बुद्धिर्घटे नष्टे पटादौ दृष्टत्वादव्यभिचारिणी अव्यभिचारः सतो दर्शितस्तथा घटबुद्धिरपि घटे नष्टे घटान्तरे दृष्टेत्यव्यभिचाराद्धटे व्यभिचारासिद्धौ विशेषान्तरेष्वपि कल्पितत्वहेतोर्व्यभिचारो न सिध्यतीत्यर्थः। घटबुद्धेर्घटान्तरे दृष्टत्वेऽपि पटादावदृष्टत्वेन व्यभिचारात् पटादिविशेषेष्वपि व्यभिचारित्वसिद्धिरित्युत्तरमाह पटादाविति। विशेषाणामेवं व्यभिचारित्वे सतोऽपि तदुपपत्तेरव्यभिचारित्वहेतुसिद्धितादवस्थ्यमिति शङ्कते सद्बुद्धिरिति। घटादिनाशदेशे तदुपरक्ताकारेण सत्त्वाभानेऽपि नासत्त्वं घटाद्यभावाधिष्ठानतया भानादित्याह न विशेष्येति। यथा सर्वगता जातिरित्यत्र खण्डमुण्डादिव्यक्त्यभावदेशे गोत्वं व्यञ्जकाभावान्न व्यज्यते न गोत्वाभावात् तथा सत्त्वमपि घटादिनाशे व्यञ्जकाभावान्न भाति न स्वरूपाभावादित्युक्तमेव प्रपञ्चयति सदित्यादिना। सप्रतियोगिकविशेषणत्वव्यभिचारेऽपि स्वरूपाव्यभिचाराद्युक्तं सतः सत्त्वमिति भावः। द्वयोः सतोरेव विशेषणविशेष्यत्वदर्शनाद्धटसतोरपि विशेषणविशेष्यत्वे द्वयोः सत्त्वध्रौव्याद्धटादिविकल्पितत्वानुमानं सामानाधिकरण्यधीबाधितमिति चोदयति एकेति। अनुभवमनुसृत्य बाधितविषयत्वमुक्तानुमानस्य निरस्यति नेत्यादिना। घटादेः सति कल्पितत्वानुमानस्य दोषराहित्ये फलितमुपसंहरति तस्मादिति। प्रथमपादव्याख्यानपरिसमाप्तावितिशब्दः। ननु नेदं व्याख्यानं भाष्यकाराभिप्रेतं सर्वद्वैतशून्यत्वविवक्षायां शास्त्रतद्भाष्यविरोधात्केनापि पुनर्दुर्विदग्धेन स्वमनीषिकयोत्प्रेक्षितमेतदिति चेत् मैवम् किमिदं द्वैतप्रपञ्चस्य शून्यत्वं किं तुच्छत्वं किं सद्विलक्षणत्वं नाद्योऽनभ्युपगमात् द्वितीयानभ्युपगमे तु तवैव शास्त्रविरोधो भाष्यविरोधश्च सर्वं हि शास्त्रं तद्भाष्यं च द्वैतस्य सत्यत्वानधिकरणत्वसाधनेनाद्वैतसत्यत्वे पर्यवसितमिति त्रैविद्यवृद्धैस्तत्र तत्र प्रतिष्ठापितं तथा च प्रक्षेपाशङ्कासंप्रदायपरिचयाभावादिति द्रष्टव्यम्। अनात्मजातस्य कल्पितत्वेनावस्तुत्वप्रतिपादनपरतया प्रथमपादं व्याख्याय द्वितीयपादमात्मनः सर्वकल्पनाधिष्ठानस्याकल्पितत्वेन वस्तुत्वप्रसाधनपरतया व्याकरोति तथेति। नन्वात्मनः सदात्मनो विशेषेषु विनाशिषु तदुपरक्तस्य विनाशः स्यादित्याशङ्क्य विशिष्टनाशेऽपि स्वरूपानाशस्योक्तत्वान्मैवमित्याह सर्वत्रेति। ननु कदाचिदसदेव पुनः सत्त्वमापद्यते प्रागसतो घटस्य जन्मना सत्त्वाभ्युपगमात् स च कदाचिदसत्त्वं प्रतिपद्यते स्थितिकाले सतो घटस्य पुनर्नाशेनासत्त्वाङ्गीकारादेवं सदसतोरव्यवस्थितत्वाविशेषादुभयोरपि हेयत्वमुपादेयत्वं वा तुल्यं स्यादिति तत्राह एवमिति। तुशब्दो दृष्टशब्देन संबध्यमानो दृष्टिमवधारयति। नहि प्रागसतो घटस्य सत्त्वमसत्त्वे स्थिते सत्त्वप्राप्तिविरोधादसत्त्वनिवृत्तिश्च सत्त्वप्राप्त्या चेत्प्राप्तमितरेतराश्रयत्वमन्तरेणैव सत्त्वापत्तिमसत्त्वनिवृत्तावसत्त्वमनवकाशि भवेत्। एतेन सतोऽसत्त्वापत्तिरपि प्रतिनीतेति भावः। कथं तर्हि सतोऽसत्त्वमसतश्च सत्त्वं प्रतिभातीत्याशङ्क्य तत्त्वदर्शनाभावादित्याह तत्त्वेति। तस्य भावस्तत्त्वं नच तच्छब्देन परामर्शयोग्यं किंचिदस्ति। प्रकृतं प्रतिनियतमित्याशङ्क्य व्याचष्टे तदित्यादिना। ननु सदसतोरन्यथात्वं केचित्प्रतिपद्यन्ते केचित्तु तयोरुक्तनिर्णयमनुसृत्य तथात्वमेवाभिगच्छन्ति तत्र केषां मतमेषितव्यमिति तत्राह त्वमपीति।
Sri Dhanpati
शीतोष्णादेः प्रतीयमानत्वेऽपि बाध्यत्वेन मिथ्यात्वात् तद्विपर्ययेणात्मनः सत्यत्वाच्च शोकमोहावकृत्वा शीतोष्णादिसहनं युक्तमित्याह नेति। असतो विचारेण बाध्यत्वात्पूर्वमप्यविद्यमानस्य शीतादेः सकारणस्य प्रत्यक्षादिप्रमाणैर्निरुप्यमाणस्यापि भावः परमार्थसत्ता न विद्यते। एतेनासतः शून्यस्य नरविषाणतुल्यस्यास्तित्वप्रसङ्गभावादप्रसक्तप्रतिषेध इति प्रयुक्तम्। विमतं शीतादि अतात्त्विकमप्रामाणिकत्वात् शुक्तिरुप्यवत्। धर्मिग्राहकस्य प्रत्यक्षादेस्तात्त्विकप्रामाण्याबोधकत्वदर्शनात् तद्विषयस्य शीतादेरनिर्वाच्यस्यासतो भ्रान्तैर्लोकैः प्रत्यक्षादिभिरुपलभ्यमानत्वात् सत्त्वेन गृहीतस्य भावस्तात्त्विकत्वं नास्तीत्यर्थः। ननु क्वचित्प्रत्यक्षादेस्तात्त्विकप्रामाण्यावेदकत्वदर्शनात्तद्विषयस्य शीतादिद्वैतस्य दुर्निरुपर्त्वेनानिर्वचनीयत्वं न शक्यते वक्तुम्। वेदैकदेशस्य क्रियार्थत्वे ब्रह्मबोधकवेदस्यापि क्रियार्थत्वं यथा। यथावा श्रोत्रादीन्द्रियै रुपानुपलब्ध्या चक्षुषापि तन्नोपलभ्यत इतिचेन्न। शीतादिद्वैतस्य विकारस्यागमापायित्वेनासत्त्वनिर्धारणात्। तथाचायं प्रयोगः विमतमसत् आगमापायित्वाद्रज्जूरगवदिति। तथाचवाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् इत्यादिश्रुत्यापि विकारस्य मिथ्यात्वं बोधितम्। किंच कार्यं कारणान्न भिद्यते कुण्डलादिसंस्थानस्य चक्षुरादिनिरुप्यमाणस्य कनकादिव्यतिरेकेणानुपलब्धेः। ततश्चायं प्रयोगः विमतं न कारणाद्वस्तुतो भिन्नं कार्यत्वात् कुण्डलादिवदिति।आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा इति न्यायात् कार्यस्य जन्मप्रध्वंसाभ्यां प्रागूर्ध्वं चानुपलब्धेः कारणादव्यतिरेकाच्च। सर्वः शीतादिविकारोऽसत् कारणव्यतिरेकेणानुपलब्धेः कुण्डलादिवदिति सर्वस्यापि कारणस्य स्वस्वकारणाध्वतिरेकेणानुपलभ्यमानस्य कार्यकारणपरम्पराभ्रमाधिष्ठाने कल्पितत्वं सिध्यति। ननु कार्यकारणविभागविहीनस्य वस्तुनोऽभावात्कार्यकारणपरम्पराया असत्त्वे सर्वाभावप्रसङ्ग इतिचेन्न। सर्वत्रानुवृत्तव्यावृत्तसदनद्वुद्धिद्वयोपलब्ध्यानुवृत्ते च व्यावृत्तानां कल्पित्वात् अकल्पितस्य सर्वभेदविकल्पाधिष्ठानस्याकार्यकारणस्य वस्तुनः सिद्धेः। तथाच यद्यद्य्वावृत्तेष्वनुवृत्तं तत्तत्परमार्थसत् यथा रजतादिधारास्वनुगतः शुक्त्यादेरिदमंशः विमतं सत् अव्यभिचारित्वादिदमंशवत् यद्य्वावृत्तं तन्मिथ्या यथा रजतादिधारा विमतं मिथ्या व्याभिचारित्वात् रजतादिधारावत् इत्यनुमानद्वयेन सतोऽकल्पितत्वमसतः कल्पितत्वं च सिद्धम्। ननु नेदमनुमानद्वयमुपपद्यते सर्वमिथ्यात्ववादिनो विभागाभावादनुमानादिव्यवहारानुपपत्तेरिति चेन्न सदसद्विभागस्य बुद्य्धायत्तत्वात् बुद्धिद्वयाधीने विभागे स्थिते सत्यनुमानादिव्यवहारोपपत्तेः। नन्वद्वैतवादिनस्तव बुद्धिद्वयाभावात्तदधीनः सदसद्विभागः कथं सेत्स्यतीति श्वेत् सर्वत्र व्यवहारदशायां कल्पितस्य सदसद्विभागस्य हेतुभूतबुद्धिद्वयस्य सर्वैरुपलभ्यमानत्वात्। नन्वेवमपि सतः सामान्यरुपतया विशेषाकाङ्क्षायां सामान्यविशेषरुपे द्वे वस्तुनी स्यातामितिचेन्न। सोऽयमित्यादि सामानाधिकरण्यवद्धटः सन्नित्यादिसामानाधिकरण्यस्यैकवस्तुनिष्ठत्वाद्वस्तुभेदे घटपटयोरिव तदयोगात्। ननूक्तसामानाधिकरण्यस्यैकवस्तुनिष्ठत्वं न वाच्यं नीलमुत्पलमितिवद्धर्मधर्मिविषयतया तस्य सुवचत्वादितिचेन्न। नीलोत्पलमिति सामानाधिकरण्यस्य धर्मधर्मिविषयस्य गौणत्वात्। तदपेक्षयानुवृत्ते व्यावृत्तं कल्पितमिति ऐक्यनिष्ठस्यैव मुख्यस्यौचित्यात्। तथाच सन् घटः सन् पटः सन्हस्ती सन्नश्चः सन् गोरित्येवं बुद्धिद्वयमुपलभ्यते ततोश्च बुद्य्धोर्घटादिबुद्धिर्व्यभिचरति घटादेर्विकारस्य व्यभिचारित्वं पूर्वं दर्शितं नतु सद्बुद्धिर्व्यभिचरति घटे नष्टेऽपि पटादौ तद्दर्शनात्। एतेन घटे नष्टे घटबुद्धौ व्यभिचरन्त्यां सद्बुद्धिरपि व्यभिचरतीति प्रत्युक्तम्। तस्माद्धटादिबुद्धिविषयोऽसत् व्यभिचारात् रज्जूरगवत् सद्बुद्धिविषयस्तु नासत् अव्यभिचारादिदमंशवत्। ननु यथा घटे विनष्टे सद्बुद्धिः पटादौ दृश्टते तथा घटबुद्धिरपि घटान्तर इतिचेन्न। घटबुद्धेः पटादावदर्शनात्। ननु नष्टे घटे सद्बुद्धिरपि तत्र न दृश्यत इति चेन्न। यतो घटादिनाशे व्यक्तिनाशे जातेरिव विशेष्यस्य विशेषणीभूतसत्ताभिव्यञ्जकस्याभावात् सद्बुद्धेरप्यदर्शनं नतु तस्या विषयस्य सत्ताया अभावाददर्शनम्। ननु द्वयोः सतोरेव नीलोत्पलयोर्विशेषविशेष्यत्वदर्शनात् सद्धटयोरपि विशेषणविशेष्यत्वाभ्युपगमे द्वयोः सत्त्वावश्यंभावाद्धटादिकल्पितत्वानुमानं सामानाधिकरण्यबुद्धिबाधितं घटादेः कल्पित्वाभ्युपगमे तस्याभावेन समानाधिकरणत्वस्यायुक्तत्वादिति चेन्न। यतः सामानाधिकरण्यबुद्धिः पदार्थद्वयभानमपेक्षते न द्वयोः सत्त्वम्। मरीच्यादावन्यतरस्याभावेऽपि सदिदमुदकमिति सामानाधिकरण्यदर्शनात्। तस्माद्देहादेः शीतोष्णादेर्द्वन्द्वस्य च सकारणस्य सत्त्वेन कल्पितस्य वस्तुतोऽसतो भावः परमार्थसत्ता न विद्यते। जन्मध्वंसाभ्यां प्रागूर्ध्वं च वस्त्वन्तरे देशान्तरे चानुपलब्धेः। तथा परमार्थसतः अविनाशिनोऽबाध्यस्यात्मनोऽतत्त्वविद्भिरज्ञातत्वादविद्यमानकल्पस्याभावोऽविद्यमानत्वं परमार्थतोऽसत्ता न संभवति सर्वत्राव्यभिचारात् त्रिविधपरिच्छेदशून्यत्वात्। इत्थं भाष्यकृद्भिः सदसतोः साध्यत्वं परिच्छिन्नापरिच्छिन्नत्वयोर्हेतुत्वं च बोधितम्। कैश्चित्तु परिच्छिन्नस्यासतः शीतादेः प्रपञ्चस्य भावः सत्ता पारमार्थिकत्वं स्वान्यूनसत्ताकतादृशपरिच्छेदशून्यत्वं न विद्यते सतः सर्वत्रानुस्यूतसन्मात्रस्याभावः परिच्छिन्नत्वं न विद्यते इति व्याख्यातम्। परिच्छिन्नत्वं च त्रिविधं तत्रात्यन्ताभावप्रतियोगित्वलक्षणं देशतः परिच्छिन्नत्वं ध्वंसप्रतियोगित्वलक्षणं कालतः परिच्छिन्नत्वं अन्योन्याभावप्रतियोगित्वलक्षणं वस्तुतः परिच्छिन्नत्वम्। नन्वात्मनोऽप्याकाशवत्क्वाप्यसमवेतत्वात्समवायसंबन्धेनात्यन्ताभावप्रतियोगित्वं तस्मिन्नतिव्याप्तं आकाशादेश्च यावन्मूर्तसंयोगित्वनियमात्संयोगसंबन्धेन तस्मिन्नव्याप्तं च अमूर्तनिष्ठेतिविशेषणदाने त्वात्मन्यतिव्याप्तिस्तदवस्था सर्वसंबन्धित्वाभावविवक्षायां सर्वसंबन्धशून्ये परमात्मन्यतिव्याप्तिः। सर्वसंबन्धिन्यज्ञानेऽव्याप्तिश्च। ध्वंसप्रतियोगित्वमप्याकाशादावव्याप्तं तेषां परैर्नित्यत्वाभ्युपगमात् अन्योन्याभावप्रतियोगित्वं चात्मनि व्यभितारि तस्य जडनिष्ठान्योन्याभावप्रतियोगित्वादन्यथास्य जडत्वापत्तेरितिचेन्न। अत्यन्तभावेऽन्योन्याभावे च प्रतियोगिसमसत्ताकत्वविशेषणेनात्मन्यतिव्याप्तिवारणात् अज्ञानाकाशादौ स्वस्वसमानसत्ताकान्योन्याभावात्यन्ताभावप्रतियोगित्वसत्त्नेनाव्यप्त्यभवात्। अविद्याकाशादेर्व्यावहारिकस्य पारमार्थिकाभावपक्षे स्वान्यूनसत्ताकेतिविशेषणं देयम्। अतएव प्रातिभासिकरजतादेर्व्यावहारिकाभावप्रतियोगित्वेऽपि न साधनवैकल्यम्। ध्वंसप्रतियोगित्वं च नाकाशादावव्याप्तम्तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश संभूतः इति श्रुतिसिद्धत्वेन तस्यानुमतत्वात्।आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः इत्यत्रात्मनिदर्शनत्वं तु स्वसमानकालीनसर्वगतत्वेनाभूतसंपल्वस्थायित्वेन चेति द्रष्टव्यम् इति तत्रोदाहृतव्याख्यासत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इति श्रुतौ ब्रह्मणोऽपरिच्छिन्नत्वबोधकस्यानन्तपदस्य पृथङ्निर्देशात् ब्रह्म सत्यमपरिच्छिन्नत्वात् जगदसत्यं परिच्छिन्नत्वादित्यनुमानद्वये हेतुत्वेनोभयोर्निर्देशादप्रसिद्धार्थकल्पनात्मकेन हेतुसाध्ययोरैक्यापत्तिरुपेण च दोषेण ग्रस्ता यदि भाष्यानुरोधेन योजयितुं शक्या तर्हि निर्दुष्टेति दिक्। ननु सर्वेषामेव कुतो न निर्णय इत्याशङ्क्य सर्वेषां तत्त्वदर्शित्वाभावात्तत्त्वदर्शिनां त्वस्त्येन निर्णय इत्याह उभयोरिति। उभयोरात्मानात्मनोः सदसतोरपि दृष्टोन्तः सत्सदैवासदसदेवेति निर्णयस्तत्त्व दर्शिभिर्ब्रह्मविद्भिः। तस्मात्त्वमपि तेषां दृष्टिमवलम्ब्य शोकमोहौ हित्वा शीतादींस्तितिक्षस्वेत्याशयः।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| na | no |
| asataḥ | of the temporary |
| vidyate | there is |
| bhāvaḥ | is |
| na | no |
| abhāvaḥ | cessation |
| vidyate | is |
| sataḥ | of the eternal |
| ubhayoḥ | of the two |
| api | also |
| dṛiṣhṭaḥ | observed |
| antaḥ | conclusion |
| tu | verily |
| anayoḥ | of these |
| tattva | of the truth |
| darśhibhiḥ | by the seers |
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कारण कि हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! सुख-दुःखमें सम रहनेवाले जिस धीर मनुष्यको ये मात्रास्पर्श (पदार्थ) व्यथित (सुखी-दुःखी) नहीं कर पाते, वह अमर होनेमें समर्थ हो जाता है अर्थात् वह अमर हो जाता है। — VaniSagar
अविनाशी तो उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। इस अविनाशीका विनाश कोई भी नहीं कर सकता। — VaniSagar
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“असत् का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है, तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने इन दोनोंका ही अन्त अर्थात् तत्त्व देखा है। — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ: "असत् का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है, तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने इन दोनोंका ही अन्त अर्थात् तत्त्व देखा है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 16?
Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 16 translates to: "The unreal has no being; there is no non-being of the real; the truth about both has been seen by the knowers of the truth (or the seers of the essence). — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 16 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। असत् का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है, तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने इन दोनोंका ही अन्त अर्थात् तत्त्व देखा है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ" mean in English?
"nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 16. The unreal has no being; there is no non-being of the real; the truth about both has been seen by the knowers of the truth (or the seers of the essence). — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.