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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 15
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते

कारण कि हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! सुख-दुःखमें सम रहनेवाले जिस धीर मनुष्यको ये मात्रास्पर्श (पदार्थ) व्यथित (सुखी-दुःखी) नहीं कर पाते, वह अमर होनेमें समर्थ हो जाता है अर्थात् वह अमर हो जाता है। — VaniSagar

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TeluguIND

ఆ దృఢమైన మనిషి, ఈ బాధలు ఖచ్చితంగా ఉండవు, ఓ మనుష్యులలో ప్రధానుడా, ఎవరికి సుఖం మరియు బాధలు ఒకేలా ఉంటాయో, అతను అమరత్వాన్ని పొందటానికి తగినవాడు.

MarathiIND

तो खंबीर माणूस, ज्याच्यावर हे दु:ख निश्चितपणे होत नाही, हे माणसांमधील प्रमुख, ज्याच्यासाठी सुख आणि दुःख समान आहेत, तो अमरत्व प्राप्त करण्यासाठी योग्य आहे.

GujaratiIND

તે મક્કમ માણસ, જેના પર આ દુ:ખો ચોક્કસપણે નથી આવતા, હે માણસોમાંના મુખ્ય, જેમના માટે આનંદ અને પીડા સમાન છે, તે અમરત્વ પ્રાપ્ત કરવા માટે યોગ્ય છે.

PunjabiIND

ਉਹ ਦ੍ਰਿੜ ਮਨੁੱਖ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਇਹ ਦੁੱਖ ਨਿਸ਼ਚਤ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦੇ, ਹੇ ਮਨੁੱਖਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਸਰਦਾਰ, ਜਿਸ ਲਈ ਖੁਸ਼ੀ ਅਤੇ ਦੁੱਖ ਇੱਕੋ ਜਿਹੇ ਹਨ, ਅਮਰਤਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨ ਦੇ ਯੋਗ ਹੈ।

KannadaIND

ಆ ದೃಢ ಮನುಷ್ಯ, ಈ ದುಃಖಗಳು ಖಂಡಿತವಾಗಿ ಇರುವುದಿಲ್ಲ, ಓ ಮನುಷ್ಯರಲ್ಲಿ ಮುಖ್ಯಸ್ಥನೇ, ಯಾರಿಗೆ ಸಂತೋಷ ಮತ್ತು ನೋವು ಒಂದೇ ಆಗಿರುತ್ತದೆ, ಅವನು ಅಮರತ್ವವನ್ನು ಪಡೆಯಲು ಯೋಗ್ಯನಾಗಿದ್ದಾನೆ.

TamilIND

மனிதர்களில் முதன்மையானவரே, இந்த துன்பங்கள் நிச்சயமாக இல்லாத அந்த உறுதியான மனிதன், இன்பமும் துன்பமும் ஒரே மாதிரியாக இருப்பவனே, அழியாமையைப் பெறுவதற்குத் தகுதியானவன்.

SindhiIND

اھو پختو ماڻھو، جنھن کي ھي مصيبتون نه ٿيون اچن، اي ماڻھن مان سردار، جنھن لاءِ خوشيون ۽ ڏک ھڪ جھڙا آھن، اھو امرت حاصل ڪرڻ جي لائق آھي.

BengaliIND

সেই দৃঢ় ব্যক্তি, যাঁর কাছে নিশ্চয়ই এই দুঃখ-দুর্দশা নেই, হে মানুষের মধ্যে প্রধান, যাঁর কাছে আনন্দ ও বেদনা একই, তিনি অমরত্ব লাভের উপযুক্ত৷

MalayalamIND

മനുഷ്യരിൽ പ്രധാനി, സുഖദുഃഖങ്ങൾ ഒരുപോലെയുള്ളവനേ, ഈ കഷ്ടതകൾ തീർച്ചയായും ചെയ്യാത്ത ഉറച്ച മനുഷ്യൻ അമർത്യത പ്രാപിക്കാൻ യോഗ്യനാണ്.

NepaliIND

त्यो दृढ मानिस, जसलाई यी दु:खहरूले पक्कै पनि गर्दैनन्, हे मानिसहरूमाझका प्रमुख, जसका लागि सुख र पीडा समान छन्, अमरत्व प्राप्त गर्न योग्य छ।

KonkaniIND

तो घट्ट मनीस, जाका हीं दुख्खां नक्कीच करिनात, हे मनशां मदलो मुखेल, जाका सुख आनी वेदना एकूच आसतात, तो अमरत्व मेळोवपाक योग्य आसा.

MizoIND

Chu mi nghet tak, heng hrehawmnate hian a tih loh tak chu, Aw mihring zinga hotu ber, nawmna leh hrehawmna inang, thih theih lohna chang turin a tling a ni.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या-- 'पुरुषर्षभ'-- मनुष्य प्रायः परिस्थितियोंको बदलनेका ही विचार करता है, जो कभी बदली नहीं जा सकतीं और जिनको बदलना सम्भव ही नहीं। युद्धरूपी परिस्थितिके प्राप्त होनेपर अर्जुनने उसको बदलनेका विचार न करके अपने कल्याणका विचार कर लिया है। यह कल्याणका विचार करना ही मनुष्योंमें उनकी श्रेष्ठता है। 'समदुःखसुखं धीरम्'-- धीर मनुष्य सुखदुःखमें सम होता है। अन्तःकरणकी वृत्तिसे ही सुख और दुःख ये दोनों अलगअलग दीखते हैं। सुख-दुःखके भोगनेमें पुरुष (चेतन) हेतु है और वह हेतु बनता है प्रकृतिमें स्थित होनेसे (गीता 13। 2021)। जब वह अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है तब सुख-दुःखको भोगनेवाला कोई नहीं रहता। अतः अपने-आपमें स्थित होनेसे वह सुख-दुःखमें स्वाभाविक ही सम हो जाता है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

शीतउष्णादि सहन करनेवालेको क्या ( लाभ ) होता है सो सुन सुखदुःखको समान समझनेवाले अर्थात् जिसकी दृष्टिमें सुखदुःख समान हैं सुखदुःखकी प्राप्तिमें जो हर्षविषादसे रहित रहता है ऐसे जिस धीर बुद्धिमान् पुरुषको ये उपर्युक्त शीतोष्णादि व्यथा नहीं पहँचा सकते अर्थात् नित्य आत्मदर्शनसे विचलित नहीं कर सकते। वह नित्य आत्मदर्शननिष्ठ और शीतोष्णादि द्वन्द्वोंको सहन करनेवाला पुरुष मृत्युसे अतीत हो जानेके लिये यानी मोक्षके लिये समर्थ होता है।

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Sri Anandgiri

अधिकारिविशेषणं तितिक्षुत्वं नोपयुक्तं केवलस्य तस्य पुमर्थाहेतुत्वादिति शङ्कते शीतेति। विवेकवैराग्यादिसहितं तन्मोक्षहेतुज्ञानद्वारा तदर्थमिति परिहरति श्रृण्विति। तितिक्षमाणस्य विवक्षितं लाभमुपलम्भयति यं हीति। हर्षविषादरहितमित्यत्र शमादिसाधनसंपन्नत्वमुच्यते धीमन्तमिति। नित्यानित्यविवेकभागित्वमेतच्चोभयं वैराग्यादेरुपलक्षणम्। नित्यात्मदर्शनं त्वमर्थज्ञानं साधनचतुष्टयवन्तमधिकारिणमनूद्य त्वंपदार्थज्ञानवतस्तस्य मोक्षौपयिकवाक्यार्थज्ञानयोग्यतामाह स नित्येति।

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Sri Dhanpati

तितिक्षायाः फलमाह यमिति। समे सुखदुःखे यस्य तं धीरं धीमन्तं नित्यात्मज्ञानवन्तं नित्यात्मज्ञानादेते शीतोष्णादयो न चालयन्ति यद्यप्येते मात्रास्पर्शा इति वक्तुमुचितं तथापि शीतादिकमदत्त्वा न व्यथयन्ति इत्यतो भाष्यकृद्भिरेतच्छब्देन शीतादीनामेव परामर्शः कृतः। स साधनचतुष्टसंपन्नो नित्यात्मदर्शननिष्ठोऽमृतत्वाय मोक्षाय समर्थो भवति। पुरुषं न व्यथयन्ति त्वं तु पुरुषर्षभ इति सूचयन्नाह पुरुषर्षभेति। अत्र केचिद्वर्णयन्ति। नन्वात्मनो नित्यत्वे विभुत्वे च न विवदामः। प्रतिदेहमेकत्वं तु न सहामहे। तथाहिबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाख्यनवविशेषगुणवन्तः प्रतिदेहं भिन्ना एव नित्या विभवश्चात्मानः इति वैशेषिका मन्यन्ते। इममेव पक्षं तार्किकमीमांसकादयोऽपि प्रतिपन्नाः। सांख्यास्तु विप्रतिपद्यमाना अप्यात्मनो गुणवत्त्वे प्रतिदेहं भेदे न विप्रतिपद्यन्ते। अन्यथा सुखदुःखादिसंकरप्रसङ्गात्। तथाच भीष्मादिभिन्नस्य मम नित्यत्वे विभुत्वेऽपि सुखदुःखादियोगि त्वात् भीष्मादिबन्धुदेहविच्छेदे सुखवियोगो दुःखसंयोगश्च स्यादिति कथं शोकमोहौ नानुचितावित्यर्जुनाभिप्रायमाशङ्क्य लिङ्गशरीरविवेकमाह मात्रेति। मात्रास्पर्शा उत्पत्तिविनाशवतोऽन्तःकरणस्यैव शीतादिद्वारा सुखदुःखदा नतु नित्यस्य विभोरात्मनः। तथाचान्तःकरणभेदान्न सांख्योक्तः संकरप्रसङ्गः। वैशेषिकादयश्च भ्रान्त्यैवात्मनो विकारित्वं भेदं चाङ्गीकृतवन्त इत्यर्थः। अन्तःकरणस्यानित्यत्वाद्दृश्यत्वाञ्च नित्यदृग्रूपत्वात्त्वत्तो भिन्नस्य सुखादिजनका ये मात्रास्पर्शास्तेऽप्यनित्यास्तांस्तितिक्षस्व नैते मम किंचित्करा इति विवेकेनोपेक्षस्व। दुःखितादात्म्येनात्मानं दुःखिनं मा ज्ञासीरित्यर्थः। नन्वन्तःकरणस्य सुखाद्याश्रयत्वे तस्यैव कर्तृत्वादिना चेतनत्वमभ्युपेयम्। तथाच तद्य्वतिरिक्ते तद्भासके भोक्तरि मानाभावान्नाममात्रे विवादः स्यात्तदभ्युपगमे च बन्धमोक्षयोर्वैयधिकरण्यापत्तिः अन्तःकरणस्य सुखाद्याश्रयत्वेन बद्धत्वात् आत्मनश्च तद्य्वतिरिक्तस्य मुक्तत्वादित्याशङ्कामर्जुनस्यापनेतुमाह यमिति। यं स्वप्रकाशत्वेन स्वतएव प्रसिद्धं पुरुषं पूर्णत्वेन पुरि शयानं समे सुखदुःखे अनात्मधर्मतया भास्यतया च यस्य तं धीरं धियं प्रेरयतीति व्युत्पत्त्या चिदाभासद्वारा धीतादात्म्याध्यासेन धीप्रेरकं धीसाक्षिणमित्यर्थः। एतेन बन्धप्रसक्तिर्दर्शिता। एते सुखदुःखदा मात्रास्पर्शा यस्मान्न व्यथयन्ति परमार्थतो न विकुर्वन्ति स पुरुषोऽमृतत्वाय मोक्षाय योग्यो भवतीत्यर्थः। अतः सर्वधर्मासंसर्गिणोऽप्यात्मन उपाधिवशात्तत्संसर्गित्वप्रतिभासो बन्धः स्वरुपज्ञानेन स्वरुपाज्ञानतत्कार्यबुद्य्धाद्युपाधिनिवृत्त्या तन्निमित्तनिखिलभ्रमनिवृत्तौ निर्मृष्टनिखिलभास्योपरागतया शुद्धस्य स्वप्रकाशपरमानन्दतया पूर्णस्यात्मनः स्वतएव कैवल्यं मोक्ष इति न बन्धमोक्षयोर्वैयधिकरण्यापत्तिः। अतएव नाममात्रे विवाद इत्यपास्तम्। भास्यभासकयोरेकत्वानुपपत्तेः। पुरुषर्षभेति संबोधयन्स्वप्रकाशचैतन्यरुपत्वेन पुरुषत्वं परमानन्दरुपत्वेनात्मन ऋषभत्वं सर्वद्वैतापेक्षया श्रेष्ठत्वमजानन्नेव शोचसि। अतः स्वरुपज्ञानादेव तव शोकनिवृत्तिः सुकरातरति शोकमात्मवित् इति श्रुतेरिति सूचयतीति। अत्रेदमवधेयम् शोतोष्णद्वारा सुखदुःखदा इत्यसंगतम्। सर्वेषां मात्रास्पर्शानां सुखादिदातृत्वे शीतोष्णयोर्द्वारत्वाभावात्। शीतोष्णग्रहणं त्रिविधसुखदुःखोपलक्षणार्थं शीतमुष्णं च कदाचित्सुखं कदाचिद्दुःखं सुखदुःखे तु न कदाचिद्विपरीते इति तयोः पृथङ्निर्देश इति स्वपरग्रन्थविरोधाच्च। शीतोष्णद्वारा सुखदुःखदा इत्यस्य शीतोष्णद्वारा साक्षाच्च सुखदुःखदा इत्यर्थ इति यदि कश्चिद्ब्रूयात्तर्हि भाष्य एवास्यार्थस्यान्तर्भावः। तस्मात् शीतं चोष्णं च सुखं च दुखं च प्रयच्छन्तीति भाष्यकृध्वाख्यानमेवर्जु। एतेनागमापायिनोऽन्तःकरणस्येत्यपास्तम्। वाक्यार्थस्य सत्यपि सभ्यक्संभवे विशेष्याध्याहारानौचित्यात्। तितिक्षस्वेति वाक्यशेषस्य मुख्यार्थत्यागापत्तेश्च। एतेनोत्तरश्लोकव्याख्यानमप्यपास्तम्। यं पुरुषमित्येतावतैव निर्वाहे समे इत्यादिविशेषणद्वयस्यानर्थक्यापत्तेश्च। बन्धप्रसक्तिरपि पुरिषु तादात्म्याध्यासं कृत्वा शेत इत्यर्थकेन पुरुषशब्देनैव लभ्यते। एतेन सुखादेः क्षेत्रधर्मत्वस्य वक्ष्यमाणत्वाच्चास्य व्याख्यानस्याकरणे भाष्यकृतां न्यूनता न शङ्कनीया। एवमन्येषामपि मूलतद्भाष्यवहिर्भूताः कल्पनाः सभ्यग्विचार्य निराकर्तव्याः। अस्माभिस्तु विस्तरभयान्नोद्धाठ्य निराक्रियन्ते।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yamwhom
hiverily
nanot
vyathayantidistressed
etethese
puruṣhamperson
puruṣhaṛiṣhabha
samaequipoised
duḥkhadistress
sukhamhappiness
dhīramsteady
saḥthat person
amṛitatvāyafor liberation
kalpatebecomes eligible
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.14
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत

हे कुन्तीनन्दन! इन्द्रियोंके जो विषय (जड पदार्थ) हैं, वो तो शीत (अनुकूलता) और उष्ण (प्रतिकूलता) - के द्वारा सुख और दुःख देनेवाले हैं तथा आने-जानेवाले और अनित्य हैं। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! उनको तुम सहन करो। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.16
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः

असत् का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है, तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने इन दोनोंका ही अन्त अर्थात् तत्त्व देखा है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 15
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 15
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते

कारण कि हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! सुख-दुःखमें सम रहनेवाले जिस धीर मनुष्यको ये मात्रास्पर्श (पदार्थ) व्यथित (सुखी-दुःखी) नहीं कर पाते, वह अमर होनेमें समर्थ हो जाता है अर्थात् वह अमर हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ: "कारण कि हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! सुख-दुःखमें सम रहनेवाले जिस धीर मनुष्यको ये मात्रास्पर्श (पदार्थ) व्यथित (सुखी-दुःखी) नहीं कर पाते, वह अमर होनेमें समर्थ हो जाता है अर्थात् वह अमर हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 15?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 15 translates to: "That firm man, whom surely these afflictions do not, O chief among men, to whom pleasure and pain are the same, is fit for attaining immortality. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 15 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। कारण कि हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! सुख-दुःखमें सम रहनेवाले जिस धीर मनुष्यको ये मात्रास्पर्श (पदार्थ) व्यथित (सुखी-दुःखी) नहीं कर पाते, वह अमर होनेमें समर्थ हो जाता है अर्थात् वह अमर हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yaṁ hi na vyathayantyete puruṣhaṁ puruṣharṣhabha" mean in English?

"yaṁ hi na vyathayantyete puruṣhaṁ puruṣharṣhabha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 15. That firm man, whom surely these afflictions do not, O chief among men, to whom pleasure and pain are the same, is fit for attaining immortality. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.