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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 2
श्री भगवानुवाच कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन

श्रीभगवान् बोले - हे अर्जुन! इस विषम अवसरपर तुम्हें यह कायरता कहाँसे प्राप्त हुई, जिसका कि श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते, जो स्वर्गको देनेवाली नहीं है और कीर्ति करनेवाली भी नहीं है। — VaniSagar

Global Translations

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KannadaIND

, "ಅರ್ಜುನಾ, ನಿನಗೆ ಅಯೋಗ್ಯವಾದ, ಅವಮಾನಕರವಾದ ಮತ್ತು ಸ್ವರ್ಗದ ದ್ವಾರಗಳನ್ನು ಮುಚ್ಚುವ ಈ ನಿರುತ್ಸಾಹವು ನಿನಗೆ ಎಲ್ಲಿಂದ ಬಂತು?

MaithiliIND

, "ई खतरनाक संकट अहाँ पर कतय सँ आयल अछि, ई उदासी जे अहाँक लेल अयोग्य अछि, अपमानजनक अछि, आ जे अहाँ पर स्वर्गक द्वार बन्न क' देत, हे अर्जुन?

AssameseIND

, "আপোনাৰ ওপৰত এই বিপদজনক সংকট, এই বিষণ্ণতা যি তোমাৰ অযোগ্য, লজ্জাজনক, আৰু যি তোমাৰ ওপৰত স্বৰ্গৰ দুৱাৰ বন্ধ কৰিব, হে অৰ্জুন?

MarathiIND

, "हे अर्जुना, तुझ्यावर ही संकटे कोठून आली आहेत, हे निराशा जे तुझ्यासाठी अयोग्य आहे, अपमानास्पद आहे आणि जे तुझ्यावर स्वर्गाचे दरवाजे बंद करेल?

BengaliIND

, "কোথা থেকে তোমার উপর এই বিপজ্জনক জলাবদ্ধতা এসেছে, এই বিষণ্ণতা যা তোমার অযোগ্য, অপমানজনক এবং যা তোমার উপর স্বর্গের দরজা বন্ধ করে দেবে, হে অর্জুন?

OdiaIND

, "ଏହି ବିପଦପୂର୍ଣ୍ଣ ଅବସ୍ଥା ଆପଣଙ୍କଠାରୁ କେଉଁଠାରୁ ଆସିଛି, ଏହି ଅବହେଳା ଯାହା ଆପଣଙ୍କ ପାଇଁ ଅଯୋଗ୍ୟ, ଅପମାନଜନକ ଏବଂ କେଉଁଟି ଆପଣଙ୍କ ଉପରେ ସ୍ୱର୍ଗର ଦ୍ୱାର ବନ୍ଦ କରିବ, ହେ ଅର୍ଜୁନ?

TamilIND

, "அர்ஜுனா, உனக்குத் தகுதியற்ற, இழிவான, சொர்க்கத்தின் வாயில்களை மூடும் இந்த அவலநிலை உனக்கு எங்கிருந்து வந்தது?

GujaratiIND

હે અર્જુન, "આ ભયંકર સંકટ તમારા પર ક્યાંથી આવ્યું છે, આ નિરાશા જે તમારા માટે અયોગ્ય છે, અપમાનજનક છે અને જે તમારા પર સ્વર્ગના દરવાજા બંધ કરી દેશે?

NepaliIND

“हे अर्जुन, तिमीमाथि यो खतरनाक संकट, तिमीलाई अयोग्य, अपमानजनक र स्वर्गका ढोकाहरू बन्द गर्ने यो निराशा तिमीमाथि कहाँबाट आयो ?

TeluguIND

, "ఓ అర్జునా, నీకు ఈ విపత్కర సందిగ్ధత ఎక్కడ నుండి వచ్చింది?

MizoIND

, "Khati a\ang hian he harsatna hlauhawm tak hi i chungah a lo thleng a, he lungngaihna hi i tana tling lo, mualphothlak tak, i chunga van kawngkhar kharsaktu tur hi, Aw Arjuna?

BhojpuriIND

, "ई खतरनाक संकट तोहरा पर कहाँ से आइल बा, ई उदासी जवन तोहरा लायक नइखे, बेइज्जती करे वाला बा, आ जवन तोहरा पर स्वर्ग के फाटक बंद कर दी, हे अर्जुन?

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.2।। व्याख्या--'अर्जुन'-- यह सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि तुम स्वच्छ, निर्मल अन्तःकरणवाले हो। अतः तुम्हारे स्वभावमें कालुष्य--कायरताका आना बिलकुल विरुद्ध बात है। फिर यह तुम्हारेमें कैसे आ गयी? 'कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्'-- भगवान् आश्चर्य प्रकट करते हुए अर्जुनसे कहते हैं कि ऐसे युद्धके मौकेपर तो तुम्हारेमें शूरवीरता, उत्साह आना चाहिये था, पर इस बेमौकेपर तुम्हारेमें यह कायरता कहाँसे आ गयी! आश्चर्य दो तरहसे होता है--अपने न जाननेके कारण और दूसरेको चेतानेके लिए। भगवान्का यहाँ जो

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Sri Harikrishnadas Goenka

No such translation is available. Translation starts from 2.10

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Sri Anandgiri

किं तद्वाक्यमित्यपेक्षायामाह श्रीभगवानिति। कुतो हेतोस्त्वा त्वां सर्वक्षत्रियप्रवरं कश्मलं मलिनं शिष्टगर्हितं युद्धात्पराङ्मुखत्वं विषमे समयस्थाने समुपस्थितं प्राप्तं अनार्यैः शास्त्रार्थमविद्वद्भिर्जुष्टं सेवितमस्वर्ग्यं स्वर्गानर्हं प्रत्यवायकारणमिह चाकीर्तिकरमयशस्करमर्जुननाम्ना प्रख्यातस्य तव नैतद्युक्तमित्यर्थः।

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Sri Dhanpati

किं तद्वाक्यमित्यत आह श्रीभगवानिति। कुतो हेतोः त्वा त्वां शूरशिरोमणिमिदं स्वधर्मभूताद्युद्धात्पराङभुखत्वं कश्मलं मलिनं विषमेऽसमये समुपस्थितं संप्राप्तम्। यतोऽनार्यैर्दुष्टैर्जुष्टं सेवितमतएव दृष्टादृष्टफलरहितमित्याह। अस्वर्ग्यमकीर्तिकरमिति विशेषणद्वयेन स्वर्गानर्हं प्रत्यवायजनकत्वात्। अकीर्तिकरमयशस्यं किं मोक्षेच्छातः किंवा स्वर्गेच्छातः अथवा कीर्तिच्छातः इति किंशब्देनाक्षिप्यते। हेतुत्रयमपि निषेधयति। त्रिभिर्विशेषणैरुत्तरार्धेन। आर्यैर्मुमुक्षुभिर्न जुष्टमसेवितमिति केचित् न आर्यैर्जुष्टम्। यत्त्वार्यैरजुष्टमिति विग्रहो दर्शितस्तत्त्वर्थैक्येऽपि पदव्युत्क्रमदोषादुपेक्ष्यमित्यन्ये स्वधर्मयुद्धं कुर्वन्मलात्मकं पापं न प्राप्स्यसीति द्योतयन्नाह अर्जुनेति। अर्जुननाम्ना प्रख्यातस्य तव नैतद्युक्तमित्येके। हे अर्जुन स्वच्छस्वभाव तव नैतद्युक्तमिति भाव इत्यन्ये।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhrībhagavān uvācha
kutaḥwherefrom
tvāto you
kaśhmalamdelusion
idamthis
viṣhamein this hour of peril
samupasthitamovercome
anāryacrude person
juṣhṭampracticed
aswargyamwhich does not lead to the higher abodes
akīrtikaram
arjunaArjun
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.1
सञ्जय उवाच तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्। विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः

वैसी कायरता से आविष्ट उन अर्जुन के प्रति, जो कि विषाद कर रहे हैं और आँसुओं के कारण जिनके नेत्रों की देखने की शक्ति अवरुद्ध हो रही है, भगवान् मधुसूदन ये (आगे कहे जानेवाले) वचन बोले। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.3
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप

हे पृथानन्दन अर्जुन ! इस नपुंसकताको मत प्राप्त हो; क्योंकि तुम्हारेमें यह उचित नहीं है। हे परंतप ! हृदयकी इस तुच्छ दुर्बलताका त्याग करके युद्धके लिये खड़े हो जाओ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 2
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 2
श्री भगवानुवाच कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन

श्रीभगवान् बोले - हे अर्जुन! इस विषम अवसरपर तुम्हें यह कायरता कहाँसे प्राप्त हुई, जिसका कि श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते, जो स्वर्गको देनेवाली नहीं है और कीर्ति करनेवाली भी नहीं है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 2 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 2 का हिंदी अर्थ: "श्रीभगवान् बोले - हे अर्जुन! इस विषम अवसरपर तुम्हें यह कायरता कहाँसे प्राप्त हुई, जिसका कि श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते, जो स्वर्गको देनेवाली नहीं है और कीर्ति करनेवाली भी नहीं है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 2?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 2 translates to: ", "From whence has this perilous strait come upon you, this dejection which is unworthy of you, disgraceful, and which will close the gates of heaven upon you, O Arjuna? — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"श्री भगवानुवाच कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्त" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 2 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। श्रीभगवान् बोले - हे अर्जुन! इस विषम अवसरपर तुम्हें यह कायरता कहाँसे प्राप्त हुई, जिसका कि श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते, जो स्वर्गको देनेवाली नहीं है और कीर्ति करनेवाली भी नहीं है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhrī bhagavān uvācha" mean in English?

"śhrī bhagavān uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 2. , "From whence has this perilous strait come upon you, this dejection which is unworthy of you, disgraceful, and which will close the gates of heaven upon you, O Arjuna? — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.