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Adhyay 2, Shlok 1
सञ्जय उवाच तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्। विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः

वैसी कायरता से आविष्ट उन अर्जुन के प्रति, जो कि विषाद कर रहे हैं और आँसुओं के कारण जिनके नेत्रों की देखने की शक्ति अवरुद्ध हो रही है, भगवान् मधुसूदन ये (आगे कहे जानेवाले) वचन बोले। — VaniSagar

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TeluguIND

: ఆ విధంగా జాలితో, నిరుత్సాహానికి గురై, కన్నీళ్లతో నిండిన కళ్లతో, ఉద్రేకంతో ఉన్న అతనితో, మధుసూదనుడు (మధుని నాశనం చేసేవాడు) లేదా కృష్ణుడు ఈ మాటలు చెప్పాడు.

TamilIND

: இவ்வாறு பரிதாபப்பட்டு, விரக்தியடைந்து, கண்ணீர் நிறைந்த கண்களுடன், கலக்கமடைந்த அவரிடம், மதுசூதனன் (மதுவை அழிப்பவன்) அல்லது கிருஷ்ணன் இந்த வார்த்தைகளைப் பேசினார்.

MalayalamIND

: അങ്ങനെ ദയനീയമായി, നിരാശനായി, നിറഞ്ഞ കണ്ണുകളോടെ, കണ്ണുനീർ നിറഞ്ഞവനും അസ്വസ്ഥനുമായി, മധുസൂദനൻ (മധുവിനെ നശിപ്പിക്കുന്നവൻ) അല്ലെങ്കിൽ കൃഷ്ണൻ ഈ വാക്കുകൾ പറഞ്ഞു.

OdiaIND

: ତାଙ୍କ ପ୍ରତି, ଯିଏ ଏହିପରି ଦୟା, ହତାଶ, ଆଖିରେ ଲୁହରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ଉତ୍ତେଜିତ ହୋଇ ମଧୁସୂଦନ (ମଧୁ ବିନାଶକ) କିମ୍ବା କୃଷ୍ଣ ଏହି କଥା କହିଥିଲେ |

KonkaniIND

: अशे तरेन दयाळ, निराश, दुकांनी भरिल्ल्या दोळ्यांच्या आनी आकुल जाल्ल्या ताका मधुसूदन (मधुचो नाशक) वा कृष्णान हीं उतरां उलयलीं.

SindhiIND

ان لاءِ، جنهن کي اهڙيءَ طرح رحم اچي ويو، مايوسي، ڳوڙهن سان ڀريل اکين سان، مڌوسودن (ماڌو کي تباهه ڪندڙ) يا ڪرشن اهي لفظ ٻڌايا.

AssameseIND

: যি এনেদৰে কৰুণাত আপ্লুত, হতাশ, চকুলোৰে ভৰা আৰু উত্তেজিত চকুৰে মধুসুদনে (মধুৰ ধ্বংসকাৰী) বা কৃষ্ণই এই কথাবোৰ ক’লে।

DogriIND

: जिसगी इस चाल्ली दया कन्नै त्रुट्टी गेदा हा, निराश होई गेदा हा, अश्रु कन्नै भरोची दी अक्खीं कन्नै आक्रोशित हा, उसी मधुसूदन (मधु दा नाशक) जां कृष्ण ने एह् शब्द बोले।

MizoIND

: Chutianga khawngaihnain a hneh, beidawng, mittui tla leh rilru buai tak hnenah chuan Madhusudana (Madhu tichhetu) emaw Krishna emaw chuan heng thute hi a sawi a ni.

BhojpuriIND

: जेकरा एह तरह से दया से डूबल, निराश, लोर से भरल आँख आ आक्रोशित रहे, ओकरा से मधुसूदन (मधु के नाशक) भा कृष्ण ई बात कहले।

GujaratiIND

: તેના માટે, જે આ રીતે દયાથી, નિરાશાથી, આંસુઓથી ભરેલી આંખો સાથે અને ઉશ્કેરાયેલા હતા, મધુસુદન (મધુનો નાશ કરનાર) અથવા કૃષ્ણ આ શબ્દો બોલ્યા.

NepaliIND

: जसलाई यसरी दयालु, निराश, आँसुले भरिएको र आक्रोशित आँखाले विजय प्राप्त भएको थियो, मधुसूदन (मधुको संहारक) वा कृष्णले यी शब्दहरू बोले।

Sacred Commentaries

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Swami Ramsukhdas

2.1।। व्याख्या--'तं तथा कृपयाविष्टम्'--अर्जुन रथमें सारथिरूपसे बैठे हुए भगवान्को यह आज्ञा देते हैं कि हे अच्युत! मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कीजिये ,जिससे मैं यह देख लूँ कि इस युद्धमें मेरे साथ दो हाथ करनेवाले कौन हैं? अर्थात् मेरे-जैसे शूरवीरके साथ कौन-कौन-से योद्धा साहस करके लड़ने आये हैं? अपनी मौत सामने दीखते हुए भी मेरे साथ लड़नेकी उनकी हिम्मत कैसे हुई? इस प्रकार जिस अर्जुनमें युद्धके लिये इतना उत्साह था, वीरता थी, वे ही अर्जुन दोनों सेनाओंमें अपने कुटुम्बियोंको देखकर उनके मरनेकी आशंकासे मोहग्रस्त होकर इतने शोकाकुल हो गये हैं कि उनका शरीर शिथिल हो रहा है, मुख सूख रहा है, शरीरमें कँपकँपी आ रही है, रोंगटे खड़े हो रहे हैं, हाथसे धनुष गिर रहा है, त्वचा जल रही है, खड़े रहनेकी भी शक्ति नहीं रही है और मन भी भ्रमित हो रहा है। कहाँ तो अर्जुनका यह स्वभाव कि 'न दैन्यं न पलायनम्' और कहाँ अर्जुनका कायरताके दोषसे शोकाविष्ट होकर रथके मध्यभागमें बैठ जाना! बड़े आश्चर्यके साथ सञ्जय यही भाव उपर्युक्त पदोंसे प्रकट कर रहे हैं। पहले अध्यायके अट्ठाईसवें श्लोकमें भी सञ्जयने अर्जुनके लिये 'कृपया परयाविष्टः' पदोंका प्रयोग किया है। 'अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्'--अर्जुन-जैसे महान् शूरवीरके भीतर भी कौटुम्बिक मोह छा गया और नेत्रोंमें आँसू भर आये! आँसू भी इतने ज्यादा भर आये कि नेत्रोंसे पूरी तरह देख भी नहीं सकते। 'विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः'--इस प्रकार कायरताके कारण विषाद करते हुए अर्जुनसे भगवान् मधुसूदनने ये (आगे दूसरे-तीसरे श्लोकोंमें कहे जाने-वाले) वचन कहे। यहाँ 'विषीदन्तमुवाच' कहनेसे ही काम चल सकता था, 'इदं वाक्यम्' कहनेकी जरूरत ही नहीं थी; क्योंकि 'उवाच' क्रियाके अन्तर्गत ही 'वाक्यम्' पद आ जाता है। फिर भी 'वाक्यम्' पद कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का यह वचन, यह वाणी बड़ी विलक्षण है। अर्जुनमें धर्मका बाना पहनकर जो कर्तव्य-त्यागरूप बुराई आ गयी थी ,उसपर यह भगवद्वाणी सीधा आघात पहुँचानेवाली है। अर्जुनका युद्धसे उपराम होनेका जो निर्णय था उसमें खलबली मचा देनेवाली है। अर्जुनको अपने दोषका ज्ञान कराकर अपने कल्याणकी जिज्ञासा जाग्रत् करा देनेवाली है। इस गम्भीर अर्थवाली वाणीके प्रभावसे ही अर्जुन भगवान्का शिष्यत्व ग्रहण करके उनके शरण हो जाते हैं (2। 7)। सञ्जयके द्वारा 'मधुसूदनः' पद कहनेका तात्पर्य है कि भगवान् श्रीकृष्ण मधु नामक दैत्यको मारनेवाले अर्थात् दुष्ट स्वभाववालोंका संहार करनेवाले हैं। इसलिये वे दुष्ट स्वभाववाले दुर्योधनादिका नाश करवाये बिना रहेंगे नहीं। सम्बन्ध--भगवान्ने अर्जुनके प्रति कौनसे वचन कहे--इसे आगेके दो श्लोकोंमें कहते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

No such translation is available. Translation starts from 2.10

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Sri Anandgiri

अहिंसा परमो धर्मो भिक्षाशनं चेत्येवंलक्षणया बुद्ध्या युद्धवैमुख्यमर्जुनस्य श्रुत्वा स्वपुत्राणां राज्यैश्वर्यमप्रचलितमवधार्य स्वस्थहृदयं धृतराष्ट्रं दृष्ट्वा तस्य दुराशामपनेष्यामीति मनीषया संजयस्तं प्रत्युक्तवानित्याह संजय इति। परमेश्वरेण स्मार्यमाणोऽपि कृत्याकृत्ये सहसा नार्जुनः सस्मार विपर्ययप्रयुक्तस्य शोकस्य दृढतरमोहहेतुत्वात्तथापि तं भगवान्नोपेक्षितवानित्याह तं तथेति। तं प्रकृतं पार्थं तथा स्वजनमरणप्रसङ्गदर्शनेन कृपया करुणयाविष्टमधिष्ठितमश्रुभिः पूर्णे समाकुले चेक्षणे यस्य तमश्रुव्याप्ततरलाक्षं विषीदन्तं शोचन्तमिदं वक्ष्यमाणं वाक्यं सोपपत्तिकं वचनं मधुनामानमसुरं सूदितवानिति मधुसूदनो भोगवानुक्तवान्नतु यथोक्तमर्जुनमुपेक्षितवानित्यर्थः।

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Sri Dhanpati

एवं रथोपस्थ उपविष्टमर्जुनं भगवान्किमुक्तवानित्याकाङ्क्षायां संजय उवाच तमिति। यत्त्वहिंसा परमो धर्मो भिक्षाशनं चेत्येवं लक्षणया बुद्य्धा युद्धवैमुख्यामर्जुनस्य श्रुत्वा स्वपुत्राणां राज्यमप्रचलितमित्यवधार्य स्वस्थहृदयस्य धृतराष्ट्रस्य हर्षनिमित्तां ततः किं वृत्तिमित्याकाङ्क्षमपनिनीषुः संजय उवाचेति तत्तु पूर्वग्रन्थविरोधादुपेक्ष्यम्। तमर्जुनं तथा पूर्वोक्तेन प्रकारेण कृपया स्नेहजन्ययाऽऽविष्टं व्याप्तम्। अश्रुभिः पूर्णे आकुले दर्शनाक्षमे ईक्षणे नेत्रे यस्य तम्। विषादं बन्धुवियोगाशङ्कानिमित्तं शोकं प्राप्नुवन्तमिदं वक्ष्यमाणं वाक्यं वक्तुं योग्यं वचनामुवाच नतूपेक्षितवानित्यर्थः। मध्वादिदुष्टसूदनो भीमादिद्वारा दुर्योधनादिदुष्टसूदनायोवाचेति सूचयन्नाह मधुसूदन इति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sañjayaḥ uvāchaSanjay said
tamto him (Arjun)
tathāthus
kṛipayāwith pity
āviṣhṭamoverwhelmed
aśhrupūrṇa
ākuladistressed
īkṣhaṇameyes
viṣhīdantamgrief
idamthese
vākyamwords
uvāchasaid
madhusūdanaḥShree Krishn, slayer of the Madhu demon
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Bhagavad Gita · 2.2
श्री भगवानुवाच कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन

श्रीभगवान् बोले - हे अर्जुन! इस विषम अवसरपर तुम्हें यह कायरता कहाँसे प्राप्त हुई, जिसका कि श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते, जो स्वर्गको देनेवाली नहीं है और कीर्ति करनेवाली भी नहीं है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 1
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 1
सञ्जय उवाच तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्। विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः

वैसी कायरता से आविष्ट उन अर्जुन के प्रति, जो कि विषाद कर रहे हैं और आँसुओं के कारण जिनके नेत्रों की देखने की शक्ति अवरुद्ध हो रही है, भगवान् मधुसूदन ये (आगे कहे जानेवाले) वचन बोले। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 1 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 1 का हिंदी अर्थ: "वैसी कायरता से आविष्ट उन अर्जुन के प्रति, जो कि विषाद कर रहे हैं और आँसुओं के कारण जिनके नेत्रों की देखने की शक्ति अवरुद्ध हो रही है, भगवान् मधुसूदन ये (आगे कहे जानेवाले) वचन बोले। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 1?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 1 translates to: ": To him, who was thus overcome with pity, despondent, with eyes full of tears and agitated, Madhusudana (the destroyer of Madhu) or Krishna spoke these words. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सञ्जय उवाच तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्। विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुस" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 1 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। वैसी कायरता से आविष्ट उन अर्जुन के प्रति, जो कि विषाद कर रहे हैं और आँसुओं के कारण जिनके नेत्रों की देखने की शक्ति अवरुद्ध हो रही है, भगवान् मधुसूदन ये (आगे कहे जानेवाले) वचन बोले। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sañjaya uvācha" mean in English?

"sañjaya uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 1. : To him, who was thus overcome with pity, despondent, with eyes full of tears and agitated, Madhusudana (the destroyer of Madhu) or Krishna spoke these words. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.