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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 7
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः

नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है। उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

உண்மையாகவே, கட்டாயச் செயலைத் துறப்பது முறையல்ல; மாயையால் அதையே கைவிடுவது தாமசி என்று அறிவிக்கப்படுகிறது.

BhojpuriIND

सचमुच, अनिवार्य कर्म के त्याग उचित नइखे; भ्रम से उहे के परित्याग के तामस घोषित कइल जाला।

DogriIND

सचमुच, फर्ज कर्म दा त्याग उचित नेईं ऐ; भ्रम दे कारण उसी दा त्याग गी तामस घोशित कीता जंदा ऐ।

OdiaIND

ପ୍ରକୃତରେ, ବାଧ୍ୟତାମୂଳକ କାର୍ଯ୍ୟରୁ ତ୍ୟାଗ କରିବା ଠିକ୍ ନୁହେଁ; ଭ୍ରାନ୍ତିରୁ ସମାନ ପରିତ୍ୟାଗକୁ ତମାସିକ ବୋଲି ଘୋଷଣା କରାଯାଇଛି |

AssameseIND

নিশ্চয়কৈ বাধ্যতামূলক কাৰ্য্যৰ ত্যাগ সঠিক নহয়; মোহৰ বাবে একেটাকে পৰিত্যাগ কৰাটো তামাছিক বুলি ঘোষণা কৰা হয়।

MaithiliIND

सचमुच, अनिवार्य कर्म के त्याग उचित नहिं; भ्रम सँ ओही के परित्याग तामस घोषित कयल गेल अछि |

PunjabiIND

ਸੱਚਮੁੱਚ, ਫ਼ਰਜ਼ ਕਰਮ ਦਾ ਤਿਆਗ ਉਚਿਤ ਨਹੀਂ ਹੈ; ਭੁਲੇਖੇ ਵਿੱਚੋਂ ਉਸ ਦਾ ਤਿਆਗ ਤਾਮਸਿਕ ਕਰਾਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਹੈ।

BengaliIND

নিঃসন্দেহে ফরজ কর্ম পরিত্যাগ করা ঠিক নয়; ভ্রম থেকে এর পরিত্যাগকে তামসিক বলে ঘোষণা করা হয়।

TeluguIND

నిశ్చయంగా, తప్పనిసరి చర్యను త్యజించడం సరైనది కాదు; భ్రాంతితో దానిని విడిచిపెట్టడం తామసికమని ప్రకటించబడింది.

MarathiIND

खरेच, अनिवार्य कृतीचा त्याग योग्य नाही; भ्रमातून त्याचा त्याग करणे हे तामसिक असल्याचे घोषित केले आहे.

GujaratiIND

ખરેખર, ફરજિયાત ક્રિયાનો ત્યાગ યોગ્ય નથી; ભ્રમણામાંથી તેનો ત્યાગ તામસિક કહેવાય છે.

SindhiIND

بيشڪ واجب عمل کان انڪار مناسب ناهي. انهيءَ کي ماٺ ڪري ڇڏڻ کي تامسڪ چئبو آهي.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- [तीन तरहके त्यागका वर्णन भगवान् इसलिये करते हैं कि अर्जुन कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करना चाहते थे -- श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके (गीता 2। 5) अतः त्रिविध त्याग बताकर अर्जुनको चेत कराना था? और आगेके लिये मनुष्यमात्रको यह बताना था कि नियत कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करना भगवान्को मान्य (अभीष्ट) नहीं है। भगवान् तो सात्त्विक त्यागको ही वास्तवमें त्याग मानते हैं। सात्त्विक त्यागसे संसारके सम्बन्धका सर्वथा विच्छेद हो जाता है।दूसरी बात? सत्रहवें अध्यायमें भी भगवान् गुणोंके अनुसार श्रद्धा? आहार आदिके तीनतीन भेद कहकर आये हैं? इसलिये यहाँ भी अर्जुनद्वारा त्यागका तत्त्व पूछनेपर भगवान्ने त्यागके तीन भेद कहे हैं।]नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने त्यागके विषयमें अपना जो निश्चित उत्तम मत बताया है? उससे यह तामस त्याग बिलकुल ही विपरीत है और सर्वथा निकृष्ट है? यह बतानेके लिये यहाँ तु पद आया है।नियत कर्मोंका त्याग करना कभी भी उचित नहीं है क्योंकि वे तो अवश्यकर्तव्य हैं। बलिवैश्वदेव आदि यज्ञ करना? कोई अतिथि आ जाय तो गृहस्थधर्मके अनुसार उसको अन्न? जल आदि देना? विशेष पर्वमें या श्राद्धतर्पणके दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराना और दक्षिणा देना? अपने वर्णआश्रमके अनुसार प्रातः और सांयकालमें सन्ध्या करना आदि कर्मोंको न मानना और न करना ही नियत कर्मोंका त्याग है।मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः -- ऐसे नियत कर्मोंको मूढ़तासे अर्थात् बिना विवेकविचारके छोड़ देना तामस त्याग कहा जाता है। सत्सङ्ग? सभा? समिति आदिमें जाना आवश्यक था? पर आलस्यमें पड़े रहे? आराम करने लग गये अथवा सो गये घरमें मातापिता बीमार हैं? उनके लिये वैद्यको बुलाने या औषधि लानेके लिये जा रहे थे? रास्तेमें कहींपर लोग ताशचौपड़ आदि खेल रहे थे? उनको देखकर खुद भी खेलमें लग गये और वैद्यको बुलाना या ओषधि लाना भूल गये कोर्टमें मुकदमा चल रहा है? उसमें हाजिर होनेके समय हँसीदिल्लगी? खेलतमाशा आदिमें लग गये और समय बीत गया शरीरके लिये शौचस्नान आदि जो आवश्यक कर्तव्य हैं? उनको आलस्य और प्रमादके कारण छोड़ दिया -- यह सब तामस त्यागके उदाहरण हैं।विहित कर्म और नियत कर्ममें क्या अन्तर है शास्त्रोंने जिन कर्मोंको करनेकी आज्ञा दी है? वे सभी विहित कर्म कहलाते हैं। उन सम्पूर्ण विहित कर्मोंका पालन एक व्यक्ति कर ही नहीं सकता क्योंकि शास्त्रोंमें सम्पूर्ण वारों तथा तिथियोंके व्रतका विधान आता है। यदि एक ही मनुष्य सब वारोंमें या सब तिथियोंमें व्रत करेगा तो फिर वह भोजन कब करेगा इससे यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यके लिये सभी विहित कर्म लागू नहीं होते। परन्तु उन विहित कर्मोंमें भी वर्ण? आश्रम और परिस्थितिके अनुसार जिसके लिये जो कर्तव्य आवश्यक होता है? उसके लिये वह नियत कर्म कहलाता है। जैसे ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्र -- चारों वार्णोंमें जिसजिस वर्णके लिये जीविका और शरीरनिर्वाहसम्बन्धी जितने भी नियम हैं? उसउस वर्णके लिये वे सभी नियत कर्म हैं।नियत कर्मोंका मोहपूर्वक त्याग करनेसे वह त्याग तामस हो जाता है तथा सुख और आरामके लिये त्याग,करनेसे वह त्याग राजस हो जाता है। सुखेच्छा? फलेच्छा तथा आसक्तिका त्याग करके नियत कर्मोंको करनेसे वह त्याग सात्त्विक हो जाता है। तात्पर्य यह है कि मोहमें उलझ जाना तामस पुरुषका स्वभाव है? सुखआराममें उलझ जाना राजस पुरुषका स्वभाव है और इन दोनोंसे रहित होकर सावधानीपूर्वक निष्कामभावसे कर्तव्यकर्म करना सात्त्विक पुरुषका स्वभाव है। इस सात्त्विक स्वभाव अथवा सात्त्विक त्यागसे ही कर्म और कर्मफलसे सम्बन्धविच्छेद होता है। राजस और तामस त्यागसे नहीं क्योंकि राजस और तामस त्याग वास्तवमें त्याग है ही नहीं।लोग सामान्य रीतिसे स्वरूपसे कर्मोंको छोड़ देनेको ही त्याग मानते हैं क्योंकि उन्हें प्रत्यक्षमें वही त्याग दीखता है। कौन व्यक्ति कौनसा काम किस भावसे कर रहा है? इसका उन्हें पता नहीं लगता। परन्तु भगवान् भीतरकी कामनाममताआसक्तिके त्यागको ही त्याग मानते हैं क्योंकि ये ही जन्ममरणके कारण हैं (गीता 13। 21)।यदि बाहरके त्यागको ही असली त्याग माना जाय तो सभी मरनेवालोंका कल्याण हो जाना चाहिये क्योंकि उनकी तो सम्पूर्ण वस्तुएँ छूट जाती हैं और तो क्या? अपना कहलानेवाला शरीर भी छूट जाता है और उनको वे वस्तुएँ प्रायः यादतक नहीं रहतीं अतः भीतरका त्याग ही असली त्याग है। भीतरका त्याग होनेसे बाहरसे वस्तुएँ अपने पास रहें या न रहें? मनुष्य उनसे बँधता नहीं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

अतः आत्मज्ञानरहित कर्माधिकारी मुमुक्षुके लिये --, विहित -- नित्यकर्मोंका संन्यास यानी परित्याग करना नहीं बन सकता? क्योंकि अज्ञानीके लिये नित्यकर्म शुद्धिके हेतु माने गये हैं। अतः मोहसे अज्ञानपूर्वक ( किया हुआ ) उन नित्यकर्मोंका परित्याग ( तामस कहा गया है )। नियत अवश्य कर्तव्यको कहते हैं? फिर उसका त्याग किया जाना अत्यन्त विरुद्ध है? अतः यह मोहनिमित्तक त्याग तामस कहा गया है। मोह ही तम है? यह प्रसिद्ध है।

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Sri Anandgiri

नित्यकर्मणामवश्यकर्तव्यत्वमुक्तमुपजीव्यापेक्षितं पूरयन्ननन्तरश्लोकमवतारयति -- तस्मादिति। ननु कश्चिन्नियतमपि कर्म त्यजन्नुपलभ्यते तत्राह -- मोहादिति। अज्ञानं पावनत्वापरिज्ञानम्। अज्ञस्य नित्यकर्मत्यागो मोहादित्येतदुपपादयति -- नियतं चेति। नित्यकर्मत्यागस्य मोहकृतत्वे कुतस्तामसत्वमित्याशङ्क्याह -- मोहश्चेति।

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Sri Dhanpati

स्वाध्यवसायमुक्त्वा त्यागस्य त्रैविध्यं दर्शयितुमारभते। नियतस्य नित्यस्य तु कर्मणः मुमुक्षोरज्ञास्याधिकृतस्य संन्यासः परित्यागो नोपपद्यते नोपपन्नो भवति नियतमवश्यकर्तव्यं त्यज्यते चेति विप्रतिषिद्धत्वात्। मोहात्पावनत्वापरिज्ञानात्तस्य नियतस्यावश्यकर्तव्यतया वेदविहितस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः। मोहश्च तमस्तन्निमित्तकत्वादित्यर्थः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
niyatasyaof prescribed duties
tubut
sanyāsaḥrenunciation
karmaṇaḥactions
nanever
upapadyateto be performed
mohātdeluded
tasyaof that
parityāgaḥrenunciation
tāmasaḥin the mode of ignorance
parikīrtitaḥhas been declared
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.6
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्िचतं मतमुत्तमम्

हे पार्थ ! (पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप -- ) इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये -- यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.8
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्

जो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है -- ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे, तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 7
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 7
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः

नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है। उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 7 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 7 का हिंदी अर्थ: "नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है। उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 7?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 7 translates to: "Verily, the renunciation of obligatory action is not proper; the abandonment of the same out of delusion is declared to be Tamasic. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 7 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है। उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "niyatasya tu sannyāsaḥ karmaṇo nopapadyate" mean in English?

"niyatasya tu sannyāsaḥ karmaṇo nopapadyate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 7. Verily, the renunciation of obligatory action is not proper; the abandonment of the same out of delusion is declared to be Tamasic. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.