Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 8
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्

जो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है -- ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे, तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

உடல் தொல்லைக்கு அஞ்சி செயலைக் கைவிடுபவன் (அது வலியுடையது என்பதால்) அத்தகைய ராஜஸத் துறவுச் செய்வதால் துறந்த புண்ணியத்தைப் பெறுவதில்லை.

MalayalamIND

ശരീരപ്രശ്നങ്ങളെ ഭയന്ന് (അത് വേദനാജനകമായതിനാൽ) കർമ്മം ഉപേക്ഷിക്കുന്നവൻ, അത്തരം രാജസിക പരിത്യാഗം ചെയ്യുന്നതിലൂടെ ത്യാഗത്തിൻ്റെ ഗുണം നേടുന്നില്ല.

TeluguIND

శారీరక బాధలకు భయపడి (అది బాధాకరమైనది కాబట్టి) క్రియను విడిచిపెట్టినవాడు, అటువంటి రాజస త్యజించడం ద్వారా త్యజించిన పుణ్యాన్ని పొందలేడు.

KannadaIND

ಶಾರೀರಿಕ ತೊಂದರೆಯ ಭಯದಿಂದ (ನೋವುಕರವಾದ ಕಾರಣ) ಕರ್ಮವನ್ನು ತ್ಯಜಿಸುವವನು ಅಂತಹ ರಾಜಸಿಕ ತ್ಯಾಗವನ್ನು ಮಾಡುವುದರಿಂದ ತ್ಯಾಗದ ಪುಣ್ಯವನ್ನು ಪಡೆಯುವುದಿಲ್ಲ.

SindhiIND

جيڪو جسماني مصيبت جي خوف کان عمل کي ڇڏي ڏئي ٿو (ڇاڪاڻ ته اهو ڏکوئيندڙ آهي)، اهڙي راجسازي جي ورتاءَ ڪرڻ سان تصرف جي فضيلت حاصل نه ٿيندي آهي.

MarathiIND

जो शारिरीक त्रासाच्या भीतीने कर्म सोडून देतो (कारण ते दुःखदायक आहे) त्याला अशा राजसी संन्यासाने त्यागाचे पुण्य प्राप्त होत नाही.

BengaliIND

যে ব্যক্তি শারীরিক কষ্টের ভয়ে কর্ম ত্যাগ করে (কারণ এটি বেদনাদায়ক), সে এই জাতীয় রাজসিক ত্যাগের দ্বারা ত্যাগের পুণ্য লাভ করে না।

NepaliIND

जसले शारीरिक कष्टको डरले कर्म त्याग्छ (किनभने यो पीडादायी छ) उसले यस्तो राजसिक त्याग गरेर त्यागको पुण्य प्राप्त गर्दैन।

GujaratiIND

જે વ્યક્તિ શારીરિક તકલીફના ડરથી (કારણ કે તે દુઃખદાયક છે) કર્મનો ત્યાગ કરે છે, તે આવા રાજસિક ત્યાગ કરવાથી ત્યાગની યોગ્યતા પ્રાપ્ત કરતો નથી.

PunjabiIND

ਜੋ ਸਰੀਰਕ ਕਸ਼ਟ ਦੇ ਡਰ ਤੋਂ (ਕਿਉਂਕਿ ਇਹ ਦੁਖਦਾਈ ਹੈ) ਕਰਮ ਨੂੰ ਤਿਆਗ ਦਿੰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਅਜਿਹੇ ਰਾਜਸੀ ਤਿਆਗ ਕਰਨ ਨਾਲ ਤਿਆਗ ਦੀ ਮੇਹਰ ਨਹੀਂ ਪਾਉਂਦਾ।

MizoIND

Taksa lama harsatna hlauhna avanga thiltih kalsan (a hrehawm avangin), chutiang Rajasic inhnuhdawh chu a tih chuan inhnuhdawh theihna a hmu lo.

MaithiliIND

जे शारीरिक क्लेशक भय सँ कर्म त्याग करैत अछि (कष्टदायक हेबाक कारणे), ओ एहन राजसी त्याग कए त्यागक पुण्य नहि प्राप्त करैत अछि |

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- दुःखमित्येव यत्कर्म -- यज्ञ? दान आदि शास्त्रीय नियत कर्मोंको करनेमें केवल दुःख ही भोगना पड़ता है? और उनमें है ही क्या क्योंकि उन कर्मोंको करनेके लिये अनेक नियमोंमें बँधना पड़ता है और खर्चा भी करना पड़ता है -- इस प्रकार राजस पुरुषको उन कर्मोंमें केवल दुःखहीदुःख दीखता है। दुःख दीखनेका कारण यह है कि उनका परलोकपर? शास्त्रोंपर? शास्त्रविहित कर्मोंपर और उन कर्मोंके परिणामपर श्रद्धाविश्वास नहीं होता।,कायक्लेशभयात्त्यजेत् -- राजस मनुष्यको शास्त्रमर्यादा और लोकमर्यादाके अनुसार चलनेसे शरीरमें क्लेश अर्थात् परिश्रमका अनुभव होता है । राजस मनुष्यको अपने वर्ण? आश्रम आदिके धर्मका पालन करनेमें और मातापिता? गुरु? मालिक आदिकी आज्ञाका पालन करनेमें पराधीनता और दुःखका अनुभव होता है तथा उनकी आज्ञा भङ्ग करके जैसी मरजी आये? वैसा करनेमें स्वाधीनता और सुखका अनुभव होता है। राजस मनुष्योंके विचार यह होते हैं कि गृहस्थमें आराम नहीं मिलता? स्त्रीपुत्र आदि हमारे अनुकूल नहीं हैं अथवा सब कुटुम्बी मर गये हैं? घरमें काम करनेके लिये कोई रहा नहीं? खुदको तकलीफ उठानी पड़ती है? इसलिये साधु बन जायँ तो आरामसे रहेंगे? रोटी? कपड़ा आदि सब चीजें मुफ्तमें मिल जायँगी? परिश्रम नहीं करना पड़ेगा कोई ऐसी सरकारी नौकरी मिल जाय? जिससे काम कम करना पड़े और रुपये आरामसे मिलते रहें? हम काम न करें तो भी उस नौकरीसे हमें कोई छुड़ा न सके? हम नौकरी छोड़ देंगे तो हमें पेंशन मिलती रहेगी? इत्यादि। ऐसे विचारोंके कारण उन्हें घरका कामधन्धा करना अच्छा नहीं लगता और वे उसका त्याग कर देते हैं।यहाँ शङ्का होती है कि ज्ञानप्राप्तिके साधनोंमें दुःख और दोषको बारबार देखनेकी बात कही है (गीता 13। 8) और यहाँ कर्मोंमें दुःख देखकर उनका त्याग करनेको राजस त्याग कहा है अर्थात् कर्मोंके त्यागका निषेध किया है -- इन दोनों बातोंमें परस्पर विरोध प्रतीत होता है। इसका समाधान है कि वास्तवमें इन दोनोंमें विरोध नहीं है? प्रत्युत इन दोनोंका विषय अलगअलग है। वहाँ (गीता 13। 8 में) भोगोंमें दुःख और दोषको देखनेकी बात है और यहाँ नियत कर्तव्यकर्मोंमें दुःखको देखनेकी बात है। इसलिये वहाँ भोगोंका त्याग करनेका विषय है और यहाँ कर्तव्यकर्मोंका त्याग करनेका विषय है। भोगोंका तो त्याग करना चाहिये? पर कर्तव्यकर्मोंका त्याग कभी नहीं करना चाहिये। कारण कि जिन भोगोंमें सुखबुद्धि और गुणबुद्धि हो रही है? उन भोगोंमें बारबार दुःख और दोषको देखनेसे भोगोंसे वैराग्य होगा? जिससे परमात्मतत्त्वकी प्राप्त होगी परन्तु नियत कर्तव्यकर्मोंमें दुःख देखकर उन कर्मोंका त्याग करनेसे सदा पराधीनता और दुःख भोगना पड़ेगा -- यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः (गीता 3। 9)। तात्पर्य यह हुआ कि भोगोंमें दुःख और दोष देखनेसे भोगासक्ति छूटेगी? जिससे कल्याण होगा और कर्तव्यमें दुःख देखनेसे कर्तव्य छूटेगा? जिससे पतन होगा।कर्तव्यकर्मोंका त्याग करनेमें तो राजस और तामस -- ये दो भेद होते हैं? पर परिणाम(आलस्य? प्रमाद? अतिनिद्रा आदि) में दोनों एक हो जाते हैं अर्थात् परिणाममें दोनों ही तामस हो जाते हैं? जिसका फल अधोगति होता है -- अधो गच्छन्ति तामसाः (गीता 14। 18)।एक शङ्का यह भी हो सकती है कि सत्सङ्ग? भगवत्कथा? भक्तचरित्र सुननेसे किसीको वैराग्य हो जाय तो वह प्रभुको पानेके लिये आवश्यक कर्तव्यकर्मोंको भी छोड़ देता है और केवल भगवान्के भजनमें लग जाता है। इसलिये उसका वह कर्तव्यकर्मोंका त्याग राजस कहा जाना चाहिये ऐसी बात नहीं है। सांसारिक कर्मोंको छोड़कर जो भजनमें लग जाता है? उसका त्याग राजस या तामस नहीं हो सकता। कारण कि भगवान्को प्राप्त करना मनुष्यजन्मका ध्येय है अतः उस ध्येयकी सिद्धिके लिये कर्तव्यकर्मोंका त्याग करना वास्तवमें कर्तव्यका त्याग करना नहीं है? प्रत्युत असली कर्तव्यको करना है। उस असली कर्तव्यको करते हुए आलस्य? प्रमाद आदि दोष नहीं आ सकते क्योंकि उसकी रुचि भगवान्में रहती है। परन्तु राजस और तामस त्याग करनेवालोंमें आलस्य? प्रमाद आदि दोष आयेंगे ही क्योंकि उसकी रुचि भोगोंमें रहती है।स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् -- त्यागका फल शान्ति है। राजस मनुष्य त्याग करके भी त्यागके फल(शान्ति) को नहीं पाता। कारण कि उसने जो त्याग किया है? वह अपने सुखआरामके लिये ही किया है। ऐसा त्याग तो पशुपक्षी आदि भी करते हैं। अपने सुखआरामके लिये शुभकर्मोंका त्याग करनेसे राजस मनुष्यको शान्ति तो नहीं मिलती? पर शुभकर्मोंके त्यागका फल दण्डरूपसे जरूर भोगना पड़ता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तथा --, समस्त कर्म दुःखरूप हैं? ऐसा मानकर जो कोई शारीरिक क्लेशके भयसे कर्मोंको छोड़ बैठता है? वह,( ऐसा ) राजस त्याग करके? त्यागका फल अर्थात् ज्ञानपूर्वक किये हुए सर्वकर्मसंन्यासका मोक्षरूप फल? नहीं पाता।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

इतश्च नित्यकर्मत्यागो नाज्ञस्य संभवतीत्याह -- किञ्चेति। ननु मोहं विनैव दुःखात्मकं कर्म कायक्लेशभयात्त्यजति। करणानि हि कार्यं जनयन्ति श्राम्यन्ति च? तथाच न तत्त्यागस्तामसो युक्तस्तत्राह --,दुःखमित्येवेति। यत्कर्म दुःखात्मकमशक्यसाध्यमित्येवालोच्य ततो निवर्तते देहस्येन्द्रियाणां च क्लेशात्मनो भयात्त्यजति स तत्त्यक्त्वा रजोनिमित्तं त्यागं कृत्वापि न तत्फलं मोक्षं लभते? किंतु कृतेनैव राजसेन त्यागेन तदनुरूपं नरकं प्रतिपद्यत इत्याह -- दुःखमित्येवेत्यादिना।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

एवं तामसत्यागप्रकारमुक्त्वा राजसं तमाह -- दुःखमिति। मोहाभावेऽपि दुःखमेवेति मत्वा यत्कर्म कायक्लेशभयाच्छरीरदुःखभयात्त्यजेत्। यदित्यव्ययं वा। यस्त्यजेदित्यर्थः। स राजसं रजोनिर्वत्तं त्यागं कृत्वा ज्ञानपूर्वकस्य सर्वकर्मत्यागस्य फलं मोक्षाख्यं नैव लभेत्। एवकारेणैतादृशत्यागवता मोक्षाशापि न कर्तव्येति सूचयति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
duḥkhamtroublesome
itias
evaindeed
yatwhich
karmaduties
kāyabodily
kleśhadiscomfort
bhayātout of fear
tyajetgiving up
saḥthey
kṛitvāhaving done
rājasamin the mode of passion
tyāgamrenunciation of desires for enjoying the fruits of actions
nanever
evacertainly
tyāgarenunciation of desires for enjoying the fruits of actions
phalamresult
labhetattain
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.7
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः

नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है। उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.9
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः

हे अर्जुन ! 'केवल कर्तव्यमात्र करना है' -- ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 8
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 8
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्

जो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है -- ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे, तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 8 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 8 का हिंदी अर्थ: "जो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है -- ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे, तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 8?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 8 translates to: "He who abandons action out of fear of bodily trouble (because it is painful), does not obtain the merit of renunciation by performing such Rajasic renunciation. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 8 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। जो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है -- ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे, तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "duḥkham ity eva yat karma kāya-kleśha-bhayāt tyajet" mean in English?

"duḥkham ity eva yat karma kāya-kleśha-bhayāt tyajet" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 8. He who abandons action out of fear of bodily trouble (because it is painful), does not obtain the merit of renunciation by performing such Rajasic renunciation. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.