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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 6
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्िचतं मतमुत्तमम्

हे पार्थ ! (पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप -- ) इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये -- यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है। — VaniSagar

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TamilIND

ஆனால், இந்தச் செயல்கள் கூட, பற்றுதலையும் வெகுமதிக்கான ஆசையையும் விட்டுவிட்டுச் செய்யப்பட வேண்டும், ஓ அர்ஜுனா; இது எனது உறுதியான மற்றும் உறுதியான நம்பிக்கை.

MalayalamIND

എന്നാൽ ഈ കർമ്മങ്ങൾ പോലും ചെയ്യേണ്ടതാണ്, ഹേ അർജ്ജുനാ, ആസക്തിയും പ്രതിഫലത്തിനായുള്ള ആഗ്രഹവും ഉപേക്ഷിച്ച്; ഇത് എൻ്റെ ഉറപ്പുള്ളതും ഉറപ്പുള്ളതുമായ ബോധ്യമാണ്.

NepaliIND

तर यी कर्महरू पनि आसक्ति र पुरस्कारको चाहनालाई छोडेर गर्नुपर्छ, हे अर्जुन; यो मेरो निश्चित र सबैभन्दा पक्का विश्वास हो।

BhojpuriIND

बाकिर ई कर्म भी करे के चाहीं, आसक्ति आ फल के इच्छा के छोड़ के, हे अर्जुन; ई हमार पक्का आ सबसे आश्वस्त विश्वास बा.

BengaliIND

কিন্তু হে অর্জুন, আসক্তি ও পুরস্কারের আকাঙ্ক্ষা বাদ দিয়ে এই কর্মগুলিও করা উচিত; এটা আমার নিশ্চিত এবং সবচেয়ে নিশ্চিত প্রত্যয়।

TeluguIND

కానీ ఈ చర్యలను కూడా నిర్వహించాలి, అనుబంధాన్ని మరియు ప్రతిఫలాల కోరికను పక్కనపెట్టి, ఓ అర్జునా; ఇది నా నిశ్చయమైన మరియు అత్యంత నిశ్చయమైన నమ్మకం.

GujaratiIND

પણ આ ક્રિયાઓ પણ આસક્તિ અને પારિતોષિકની ઈચ્છા છોડીને કરવી જોઈએ, હે અર્જુન; આ મારી ચોક્કસ અને સૌથી ખાતરીપૂર્વકની ખાતરી છે.

PunjabiIND

ਪਰ ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਮੋਹ ਅਤੇ ਫਲ ਦੀ ਲਾਲਸਾ ਨੂੰ ਛੱਡ ਕੇ ਇਹ ਕਰਮ ਵੀ ਕੀਤੇ ਜਾਣੇ ਚਾਹੀਦੇ ਹਨ; ਇਹ ਮੇਰਾ ਪੱਕਾ ਅਤੇ ਸਭ ਤੋਂ ਪੱਕਾ ਯਕੀਨ ਹੈ।

SindhiIND

پر پوءِ به اهي عمل ڪرڻ گهرجن، اي ارجن، لاڳاپن ۽ انعامن جي تمنا کي ڇڏي. اهو منهنجو يقين ۽ يقين ڏياريو آهي.

KannadaIND

ಆದರೆ ಬಾಂಧವ್ಯ ಮತ್ತು ಪ್ರತಿಫಲದ ಆಸೆಯನ್ನು ಬಿಟ್ಟು ಈ ಕ್ರಿಯೆಗಳನ್ನೂ ಮಾಡಬೇಕು, ಓ ಅರ್ಜುನ; ಇದು ನನ್ನ ಖಚಿತ ಮತ್ತು ಅತ್ಯಂತ ಖಚಿತವಾದ ನಂಬಿಕೆಯಾಗಿದೆ.

MarathiIND

पण हे अर्जुना, आसक्ती आणि बक्षिसेची इच्छा बाजूला ठेवून या क्रिया केल्या पाहिजेत; ही माझी निश्चित आणि खात्रीशीर खात्री आहे.

OdiaIND

କିନ୍ତୁ ଅର୍ଜୁନ, ସଂଲଗ୍ନତା ଏବଂ ପୁରସ୍କାରର ଇଚ୍ଛାକୁ ଛାଡି ଏହି କାର୍ଯ୍ୟଗୁଡ଼ିକ ମଧ୍ୟ କରାଯିବା ଉଚିତ୍; ଏହା ମୋର ନିର୍ଦ୍ଦିଷ୍ଟ ଏବଂ ନିଶ୍ଚିତ ନିଶ୍ଚିତ ବିଶ୍ୱାସ |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- एतान्यपि तु कर्माणि ৷৷. निश्चितं मतमुत्तमम् -- यहाँ एतानि पदसे पूर्वश्लोकमें कहे यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंकी तथा अपि पदसे शास्त्रविहित पठनपाठन? खेतीव्यापार आदि जीविकासम्बन्धी कर्म शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार खानापीना? उठनाबैठना? सोनाजागना आदि शारीरिक कर्म और परिस्थितिके अनुसार सामने आये अवश्य कर्तव्यकर्म -- इन सभी कर्मोंको लेना चाहिये। इन समस्त कर्मोंको आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करके जरूर करना चाहिये। अपनी कामना? ममता और आसक्तिका त्याग करके कर्मोंको केवल प्राणिमात्रके हितके लिये करनेसे कर्मोंका प्रवाह संसारके लिये और योग अपने लिये हो जाता है। परन्तु कर्मोंको अपने लिये करनेसे कर्म बन्धनकारक हो जाते हैं -- अपने व्यक्तित्वको नष्ट नहीं होने देते।गीतामें कहीं सङ्ग(आसक्ति) के त्यागकी बात आती है और कहीं कर्मोंके फलके त्यागकी बात आती है। इस श्लोकमें सङ्ग और फल -- दोनोंके त्यागकी बात आयी है। इसका तात्पर्य यह है कि गीतामें जहाँ सङ्गके त्यागकी बात कही है? वहाँ उसके साथ फलके त्यागकी बात भी समझ लेनी चाहिये और जहाँ फलके त्यागकी बात कही है? वहाँ उसके साथ सङ्गके त्यागकी बात भी समझ लेनी चाहिये। यहाँ अर्जुनने त्यागके तत्त्वकी बात पूछी है अतः भगवान्ने त्यागका यह तत्त्व बताया है कि सङ्ग (आसक्ति) और फल -- दोनोंका ही त्याग करना चाहिये? जिससे साधकको यह जानकारी स्पष्ट हो जाय कि आसक्ति न तो कर्ममें रहनी चाहिये और न फलमें ही रहनी चाहिये। आसक्ति न रहनेसे मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदि कर्म करनेके औजारों(करणों)में तथा प्राप्त वस्तुओँमें ममता नहीं रहती (गीता 5। 11)।सङ्ग (आसक्ति या सम्बन्ध) सूक्ष्म होता है और फलेच्छा स्थूल होती है। सङ्ग या आसक्तिकी सूक्ष्मता वहाँतक है? जहाँ चेतनस्वरूपने नाशवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ा है। वहीँसे आसक्ति पैदा होती है? जिससे जन्ममरण आदि सब अनर्थ होते -- कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। आसक्तिका त्याग करनेसे नाशवान्के साथ जोड़े हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और स्वतःस्वाभाविक रहनेवाली असङ्गताका अनुभव हो जाता है।इस विषयमें एक और बात समझनेकी है कि कई दार्शनिक इस नाशवान् संसारको असत् मानते हैं क्योंकि यह पहले भी नहीं था और पीछे भी नहीं रहेगा? इसलिये वर्तमानमें भी यह नहीं है जैसे -- स्वप्न। कई दार्शनिकोंका यह मत है कि संसार परिवर्तनशील है? हरदम बदलता रहता है? कभी एक रूप नहीं रहता जैसे -- अपना शरीर। कई यह मानते हैं कि परिवर्तनशील होनेपर भी संसारका कभी अभाव नहीं होता? प्रत्युत तत्त्वसे सदा रहता है जैसे -- जल (जल ही बर्फ? बादल? भाप और परमाणुरूपसे हो जाता है? पर स्वरूपसे वह मिटता नहीं)। इस तरह अनेक मतभेद हैं किन्तु नाशवान् जडका अपने अविनाशी चेतनस्वरूपके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है? इसमें किसी भी दार्शनिकका मतभेद नहीं है। सङ्गं त्यक्त्वा पदोंसे भगवान्ने उसी सम्बन्धका त्याग कहा है।प्रकृति सत् है या असत् है अथवा सत्असत्से विलक्षण है अनादिसान्त है या अनादिअनन्त है इस झगड़ेमें पड़कर साधकको अपना अमूल्य समय खर्च नहीं करना चाहिये? प्रत्युत इस प्रकृतिसे तथा प्रकृतिके कार्य शरीरसंसारसे अपना सम्बन्धविच्छेद करना चाहिये? जो कि स्वतः हो ही रहा है। स्वतः होनेवाले सम्बन्धविच्छेदका केवल अनुभव करना है कि शरीर तो प्रतिक्षण बदलता ही रहता है और स्वयं निर्विकाररूपसे सदा ज्योंकात्यों रहता है।अब प्रश्न यह होता है कि फल क्या है प्रारब्धकर्मके अनुसार अभी हमें जो परिस्थिति? वस्तु? देश? काल आदि प्राप्त हैं? वह सब कर्मोंका प्राप्त फल है और भविष्यमें जो परिस्थिति? वस्तु आदि प्राप्त होनेवाली है? वह सब कर्मोंका अप्राप्त फल है। प्राप्त तथा अप्राप्त फलमें आसक्ति रहनेके कारण ही प्राप्तमें ममता और अप्राप्तकी कामना होती है। इसलिये भगवान्ने त्यक्त्वा फलानि च कहकर फलोंका त्याग करनेकी बात कही है।कर्मफलका त्याग क्यों करना चाहिये क्योंकि कर्मफल हमारे साथ रहनेवाला है ही नहीं। कारण यह है कि जिन कर्मोंसे फल बनता है? उन कर्मोंका आरम्भ और अन्त होता है अतः उनका फल भी प्राप्त और नष्ट होनेवाला ही है। इसलिये कर्मफलका त्याग करना है। फलके त्यागमें वस्तुतः फलकी आसक्तिका? कामनाका ही त्याग करना है। वास्तवमें आसक्ति हमारे स्वरूपमें है नहीं? केवल मानी हुई है।दूसरी बात? जो अपना स्वरूप होता है? उसका त्याग नहीं होता जैसे -- प्रज्वलित अग्नि उष्णता और प्रकाशका त्याग नहीं कर सकती। जो चीज अपनी नहीं होती? उसका भी त्याग नहीं होता जैसे -- संसारमें अनेक वस्तुएँ पड़ी हैं परन्तु उनका हम त्याग करें -- ऐसा कहना भी नहीं बनता क्योंकि वे वस्तुएँ हमारी हैं ही नहीं। इसलिये त्याग उसीका होता है? जो वास्तवमें अपना नहीं है? पर जिसको अपना मान लिया है। ऐसे ही प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर आदि हमारे नहीं हैं? फिर भी उनको हम अपना मानते हैं? तो इस अपनेपनकी मान्यताका ही त्याग करना है। मनुष्यके सामने कर्तव्यरूपसे जो कर्म आ जाय? उसको फल और आसक्तिका त्याग करके सावधानीके साथ तत्परतापूर्वक करना चाहिये -- कर्तव्यानि। कर्मयोगमें विधिनिषेधको लेकर अमुक काम करना है और अमुक काम नहीं करना है -- ऐसा विचार तो करना ही है परन्तु अमुक काम ब़ड़ा है और अमुक काम छोटा है -- ऐसा विचार नहीं करना है। कारण कि जहाँ कर्म और उसके फलसे अपना कोई सम्बन्ध ही नहीं है? वहाँ यह कर्म बड़ा है? यह कर्म छोटा है इस कर्मका फल बड़ा है? इस कर्मका फल छोटा है -- ऐसा विचार हो ही नहीं सकता। कर्मका बड़ा या छोटा होना फलकी इच्छाके कारण ही दीखता है? जब कि कर्मयोगमें फलेच्छाका त्याग होता है। ,कर्म करना रागपूर्तिके लिये भी होता है और रागनिवृत्तिके लिये भी। कर्मयोगी रागनिवृत्तिके लिये अर्थात् करनेका राग मिटानेके लिये ही सम्पूर्ण कर्तव्यकर्म करता है -- आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते (गीता 6। 3)? न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते (गीता 3। 4)। अपने लिये कर्म करनेसे करनेका राग बढ़ता है। इसलिये कर्मयोगी कोई भी कर्म अपने लिये नहीं करता? प्रत्युत केवल दूसरोंके हितके लिये ही करता है। उसके स्थूलशरीरमें होनेवाली क्रिया? सूक्ष्मशरीरमें होनेवाला परहितचिन्तन तथा कारणशरीरमें होनेवाली स्थिरता -- तीनों ही दूसरोंके हितके लिये होती हैं? अपने लिये नहीं। इसलिये उसका करनेका राग सुगमतासे मिट जाता है। परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें संसारका राग ही बाधक है। अतः राग मिटनेपर कर्मयोगीको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति अपनेआप हो जाती है (गीता 4। 38)।कर्तव्य शब्दका अर्थ होता है -- जिसको हम कर सकते हैं तथा जिसको जरूर करना चाहिये और जिसको करनेसे उद्देश्यकी सिद्धि जरूर होती है। उद्देश्य वही कहलाता है? जो नित्यसिद्ध और अनुत्पन्न है अर्थात् जो अनादि है और जिसका कभी विनाश नहीं होता। उस उद्देश्यकी सिद्धि मनुष्यजन्ममें ही होती है और उसकी सिद्धिके लिये ही मनुष्यशरीर मिला है? न कि कर्मजन्य परिस्थितिरूप सुखदुःख भोगनेके लिये। कर्मजन्य परिस्थिति वह होती है? जो उत्पन्न और नष्ट होती हो। वह परिस्थिति तो मनुष्यके अलावा पशुपक्षी? कीटपतङ्ग? वृक्षलता? नारकीयस्वर्गीय आदि योनियोंके प्राणियोंको भी मिलती है? जहाँ कर्तव्यका कोई प्रश्न ही नहीं है और जहाँ उद्देश्यकी पूर्तिका अधिकार भी नहीं है।भगवान्के द्वारा अपने मतको निश्चितम् कहनेका तात्पर्य है कि इस मतमें सन्देहकी कोई गुंजाइश नहीं है? यह मत अटल है अर्थात् यह किञ्चिन्मात्र भी इधरउधर नहीं हो सकता और उत्तमम् कहनेका तात्पर्य है कि,इस मतमें शास्त्रीय दृष्टिसे कोई कमी नहीं है? प्रत्युत यह पूर्णताको प्राप्त करानेवाला है। सम्बन्ध -- इसी अध्यायके चौथे श्लोकमें भगवान्ने तीन प्रकारके त्यागकी बात कही थी। अब आगेके तीन श्लोकोंमें उसी त्रिविध त्यागका वर्णन करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

जो पवित्र करनेवाले बतलाये गये हैं? ऐसे ये यज्ञ? दान और तपरूप कर्म भी तद्विषयक आसक्ति और फलका त्याग करके ही किये जाने चाहिये? अर्थात् आसक्ति और फलके त्यागपूर्वक ही इनका अनुष्ठान करना उचित है। यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है। इस विषयमें मेरा निश्चय सुन इस प्रकार प्रतिज्ञा करके और ( उनकी कर्तव्यतामें ) पावनत्वरूप हेतु बतलाकर जो ऐसा कहना है कि? ये कर्म किये जाने चाहिये यह मेरा निश्चित उत्तम मत है यह प्रतिज्ञा किये हुए विषयका उपसंहार ही है? किसी अपूर्व विषयका वर्णन नहीं है क्योंकि एतानि शब्दका आशय प्रकरणमें अत्यन्त निकटवर्ती विषयको ही लक्ष्य कराना होता है। आसक्तियुक्त और फलेच्छुक मनुष्योंके लिये यद्यपि ये ( यज्ञ? दान और तपरूप ) कर्म बन्धनके कारण हैं? तो भी मुमुक्षुको ( फलआसक्तिसे रहित होकर ) करने चाहिये? यही अपि शब्दका अभिप्राय है। यहाँ,( यज्ञ? दान और तपसे अतिरिक्त ) अन्य ( काम्य ) कर्मोंको लक्ष्य करके एतानि के साथ अपि शब्दका,प्रयोग नहीं है। कुछ अन्य टीकाकार कहते हैं कि नित्यकर्मोंके फलका अभाव होनेके कारण उनको फल और आसक्ति छोड़कर कर्तव्य बतलाना नहीं बन सकता? ( अतः ) एतान्यपि इस पदका अभिप्राय यह है कि जो नित्यकर्मोंसे अतिरिक्त काम्य कर्म है वे भी करने चाहिये? फिर यज्ञ? दान और तपरूप नित्यकर्मोंके विषयमें तो कहना ही क्या है। यह अर्थ ( करना ) ठीक नहीं क्योंकि यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि इत्यादि वचनोंसे नित्यकर्मोंका भी फल होता है यह सिद्ध किया गया है। नित्यकर्मोंको भी बन्धनकारक होनेकी आशङ्कासे छोड़नेकी इच्छा रखनेवाले मुमुक्षुकी प्रवृत्ति काम्यकर्मोंमें कैसे हो सकती है इसके सिवा सकाम कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं इस कथनमें काम्यकर्मोंकी निन्दा की जानेके कारण और,यथार्थ कर्मके अतिरिक्त अन्य कर्म बन्धन कारक हैं इस कथनसे काम्यकर्म बन्धनकारक माने जानेके कारण? एवं वेद त्रिगुणात्मक (संसार) को विषय करनेवाले हैं तीनों वेदोंको जाननेवाले सोमरस पीनेवाले पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आ जाते हैं ऐसा कहा जानेके कारण और साथ ही काम्यकर्मोंका विषय बहुत दूर व्यवधानयुक्त होनेके कारण भी ( यह सिद्ध होता है कि ) एतान्यपि यह कथन काम्यकर्मोंके विषयमें नहीं है।

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Sri Anandgiri

प्रतिज्ञातमर्थमुपसंहरति -- एतान्यपीति। उपसंहारश्लोकाक्षराणि व्याकरोति -- एतानीत्यादिना। अक्षरार्थमुक्त्वा तात्पर्यार्थमाह -- निश्चयमिति। प्रकृतार्थोपसंहारे गमकमाह -- एतान्यपीति। अपिशब्दस्य विवक्षितमर्थं दर्शयति -- सासङ्गस्येति। व्यावर्त्यं कीर्तयति -- नत्विति। एतान्यपीत्यादिवाक्यं न नित्यकर्मविषयमिति मतमुपन्यस्यति -- अन्य इति। न चेदिदं नित्यकर्मविषयं किंविषयं तर्हीत्याशङ्क्य वाक्यमवतार्य व्याकरोति -- एतानीत्यादिना। नित्यानामफलत्वमुपेत्य यच्चोद्यं तदयुक्तमिति दूषयति -- तदसदिति। यत्तु काम्यान्यपि कर्तव्यानीति तन्निरस्यति -- नित्यान्यपीति। किञ्च काम्यानां भगवता निन्दितत्वान्न तेषु मुमुक्षोरनुष्ठानमित्याह -- दूरेणेति। किञ्च मुमुक्षोरपेक्षितमोक्षापेक्षया विरुद्धफलत्वात्काम्यकर्मणां न तेषु तस्यानुष्ठानमित्याह -- यज्ञार्थादिति। काम्यानां बन्धहेतुत्वं निश्चितमित्यत्रैव पूर्वोत्तरवाक्यानुकूल्यं दर्शयति -- त्रैगुण्येति। किञ्च पूर्वश्लोके यज्ञादिनित्यकर्मणां प्रकृतत्वादेतच्छब्देन संनिहितवाचिना परामर्शात्काम्यकर्मणां चकाम्यानां कर्मणाम् इति व्यवहितानां संनिहितपरामर्शकैतच्छब्दाविषयत्वान्न काम्यकर्माण्येतान्यपीति व्यपदेशमर्हतीत्याह -- दूरेति।

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Sri Dhanpati

प्रतिज्ञातमर्थपसंहरति। एतानि यज्ञदानतपांसि ससङ्गस्य फलार्थिनो बन्धहेतवोऽपि कर्माणि मुमुक्षुभिः सङ्गं कर्तृत्वाभिनिवेशं फलानि च त्यक्त्वा परित्यज्य चित्तशुद्ध्यर्थ कर्तव्यानीत्येतन्निश्चितं मम परमेश्वरस्य वासुदेवस्य मतम्। यतो ममेदं निश्चितमत उत्तमं सर्वोत्कृष्टम्। उत्तमत्वान्मम निश्चितमितिव वा। त्वया तु मत्संबन्धिना मदीयं निश्चितं मतमेवोपादेयमिति सूचनाय संबोधनं पार्थेति। यत्तु अपिशब्द एवशब्दार्थ इति भाष्यविरुद्धं अन्ये वर्णयन्ति तन्नादर्तव्यम्। सति संभवे स्वार्थत्यागस्यान्याय्यत्वात्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
etānithese
api tumust certainly be
karmāṇiactivities
saṅgamattachment
tyaktvāgiving up
phalānirewards
chaand
kartavyānishould be done as duty
itisuch
memy
pārthaArjun, the son of Pritha
niśhchitamdefinite
matamopinion
uttamamsupreme
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.5
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्

यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप -- ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.7
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः

नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है। उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 6
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 6
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्िचतं मतमुत्तमम्

हे पार्थ ! (पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप -- ) इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये -- यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ: "हे पार्थ ! (पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप -- ) इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये -- यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 6?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 6 translates to: "But even these actions should be performed, leaving aside attachment and the desire for rewards, O Arjuna; this is my certain and most assured conviction. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्िचतं मतमुत" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 6 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। हे पार्थ ! (पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप -- ) इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये -- यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "etāny api tu karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā phalāni cha" mean in English?

"etāny api tu karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā phalāni cha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 6. But even these actions should be performed, leaving aside attachment and the desire for rewards, O Arjuna; this is my certain and most assured conviction. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.