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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 5
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्

यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप -- ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

தியாகம், கொடை, துறவு போன்ற செயல்களை கைவிடக்கூடாது, ஆனால் செய்ய வேண்டும்; ஏனெனில் தியாகம், கொடை, சிக்கனம் ஆகியவை ஞானிகளை தூய்மைப்படுத்தும்.

AssameseIND

যজ্ঞ, দান, তপস্যাৰ কামবোৰ পৰিত্যাগ কৰিব নালাগে, কিন্তু কৰিব লাগে; কিয়নো বলিদান, দান আৰু তপেৰেই জ্ঞানীসকলৰ শুদ্ধিকৰ।

BengaliIND

ত্যাগ, দান এবং তপস্যার কাজগুলি পরিত্যাগ করা উচিত নয়, তবে সম্পাদন করা উচিত; কারণ ত্যাগ, দান এবং তপস্যা জ্ঞানীদের পরিশুদ্ধকারী।

PunjabiIND

ਬਲੀਦਾਨ, ਦਾਤ ਅਤੇ ਤਪੱਸਿਆ ਦੇ ਕਰਮ ਛੱਡੇ ਨਹੀਂ ਜਾਣੇ ਚਾਹੀਦੇ, ਪਰ ਕੀਤੇ ਜਾਣੇ ਚਾਹੀਦੇ ਹਨ; ਕਿਉਂਕਿ ਕੁਰਬਾਨੀ, ਦਾਤ ਅਤੇ ਤਪੱਸਿਆ ਬੁੱਧੀਮਾਨਾਂ ਦੀ ਪਵਿੱਤਰਤਾ ਹਨ।

MaithiliIND

यज्ञ, दान, तपस्य कर्म के त्याग नै करबाक चाही, बल्कि करबाक चाही; कारण यज्ञ, दान आ तप ज्ञानी लोकनिक शुद्धिकारक होइत छैक |

BhojpuriIND

यज्ञ, दान आ तपस्या के काम ना छोड़े के चाहीं, बलुक करे के चाहीं; काहे कि यज्ञ, दान आ तप ज्ञानी लोग के शुद्ध करे वाला होला।

SindhiIND

قرباني، تحفا ۽ سادگي جا عمل نه ڇڏڻ گهرجن، پر انجام ڏيڻ گهرجن؛ ڇاڪاڻ ته قرباني، تحفا ۽ سادگي عقلمندن جي پاڪائي آهن.

KonkaniIND

यज्ञ, दान, तप हीं कृत्यां सोडून दिवचीं न्हय, पूण करचीं; कारण यज्ञ, दान आनी तप हीं ज्ञानी मनशांचीं शुध्दीकरणां.

NepaliIND

बलिदान, दान र तपस्याका कार्यहरू त्याग्नु हुँदैन, तर गर्नु पर्छ; किनभने यज्ञ, दान र तपस्या ज्ञानीहरूको शुद्धिकरण हुन्।

GujaratiIND

બલિદાન, દાન અને તપસ્યાના કાર્યોનો ત્યાગ ન કરવો જોઈએ, પરંતુ કરવું જોઈએ; કારણ કે બલિદાન, દાન અને તપ એ જ્ઞાનીઓની શુદ્ધિ છે.

MalayalamIND

ത്യാഗം, ദാനം, തപസ്സ് എന്നിവ ഉപേക്ഷിക്കരുത്, മറിച്ച് അനുഷ്ഠിക്കണം; എന്തെന്നാൽ, ത്യാഗവും ദാനവും തപസ്സും ജ്ഞാനികളെ ശുദ്ധീകരിക്കുന്നു.

MarathiIND

यज्ञ, दान आणि तपस्या या कृत्यांचा त्याग करू नये, तर ते केले पाहिजे; कारण त्याग, दान आणि तप हे ज्ञानी लोकांचे शुद्धीकरण करणारे आहेत.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् -- यहाँ भगवान्ने दूसरोंके मत (18। 3) को ठीक बताया है। भगवान् कठोर शब्दोंसे किसीके मतका खण्डन नहीं करते। आदर देनेके लिये भगवान् दूसरेके मतका वास्तविक अंश ले लेते हैं और उसमें अपना मत भी शामिल कर देते हैं। यहाँ भगवान्ने दूसरेके मतके अनुसार कहा कि यज्ञ? दान और तपरूप कर्म छोड़ने नहीं चाहिये। इसके साथ भगवान्ने अपना मत बताया कि इतना ही नहीं? प्रत्युत उनको न करते हों तो जरूर करना चाहिये -- कार्यमेव तत्। कारण कि यज्ञ? दान और तप -- तीनों कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् -- यहाँ चैव पदका तात्पर्य है कि नित्य? नैमित्तिक? जीविकासम्बन्धी? शरीरसम्बन्धी आदि जितने भी कर्तव्यकर्म हैं? उनको भी जरूर करना चाहिये क्योंकि वे भी मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।,जो मनुष्य समत्वबुद्धिसे युक्त होकर कर्मजन्य फलका त्याग कर देते हैं? वे मनीषी हैं -- कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः (गीता 2। 51)। ऐसे मनीषियोंको वे यज्ञादि कर्म पवित्र करते हैं। परन्तु जो वास्तवमें मनीषी नहीं हैं? जिनकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं अर्थात् अपने सुखभोगके लिये ही जो यज्ञ? दानादि कर्म करते हैं? उनको वे कर्म पवित्र नहीं करते? प्रत्युत वे कर्म बन्धनकारक हो जाते हैं।इस श्लोकके पूर्वार्धमें यज्ञदानतपःकर्म -- ऐसा समासयुक्त पद दिया है और उत्तरार्धमें यज्ञो दानं तपः -- ऐसे अलगअलग पद दिये हैं? इसका तात्पर्य है कि भगवान्ने समासयुक्त पदसे यह बताया है कि यज्ञ? दान और तपका त्याग नहीं करना चाहिये? प्रत्युत इनको जरूर करना चाहिये और अलगअलग पदोंसे यह बताया है,कि इनमेंसे एकएक कर्म भी मनीषीको पवित्र करनेवाला है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

वह निश्चय क्या है इसपर कहते हैं --, यज्ञ? दान और तप? ये तीन प्रकारके कर्म त्यागनेयोग्य नहीं हैं अर्थात् इन तीनोंका त्याग करना उचित नहीं है? इन्हें तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ? दान और तप ये तीनों बुद्धिमानोंको अर्थात् फलकामनारहित पुरुषोंको? पवित्र करनेवाले हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

तमेव भगवतो निश्चयं विशेषतो निर्धारयितुं प्रश्नपूर्वकमनन्तरश्लोकप्रवृत्तिं दर्शयति -- कः पुनरिति। यज्ञादीनां कर्तव्यत्वे हेतुमाह -- यज्ञ इति। न केवलमत्याज्यं किंतु कर्तव्यमेवेत्याह -- कार्यमिति। प्रतिज्ञातमेवं विभज्य हेतुं विभजते -- कस्मादिति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

प्रतिज्ञातं निश्चयं प्रदर्शयन् तत्र हेतुमाह -- यज्ञो दानं तप इत्येतन्त्रिविधं कर्म न त्याज्यं न त्यक्तव्यम्। व्यतिरेकेणोक्तमर्थमन्वयेन द्रढयति। कार्यमेव तत् त्रिविधं कर्म करणीयमेव। चो हेतौ। यस्माद्यज्ञदानतषांस्येव पावनानि विशुद्धिकराणि। पवानान्येवेति वा। मनीषिणां कुशलानां फलाभिसंधिरहितानाम्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yajñasacrifice
dānacharity
tapaḥpenance
karmaactions
nanever
tyājyamshould be abandoned
kāryam evamust certainly be performed
tatthat
yajñaḥsacrifice
dānamcharity
tapaḥpenance
chaand
evaindeed
pāvanānipurifying
manīṣhiṇāmfor the wise
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.4
निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! तू संन्यास और त्याग -- इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें मेरा निश्चय सुन; क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ ! त्याग तीन प्रकारका कहा गया है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.6
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्िचतं मतमुत्तमम्

हे पार्थ ! (पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप -- ) इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये -- यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 5
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 5
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्

यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप -- ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 5 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 5 का हिंदी अर्थ: "यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप -- ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 5?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 5 translates to: "Acts of sacrifice, gift, and austerity should not be abandoned, but should be performed; for sacrifice, gift, and austerity are the purifiers of the wise. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 5 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप -- ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yajña-dāna-tapaḥ-karma na tyājyaṁ kāryam eva tat" mean in English?

"yajña-dāna-tapaḥ-karma na tyājyaṁ kāryam eva tat" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 5. Acts of sacrifice, gift, and austerity should not be abandoned, but should be performed; for sacrifice, gift, and austerity are the purifiers of the wise. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.